धीरे धीरे कितने नाजायज खर्चे से जुड़ते गए है हम. ● टॉयलेट धोने का हार्पिक अलग, ● बाथरूम धोने का अलग. ● टॉयलेट की बदबू दूर करने के लिए खुशबू छोड़ने वाली टिकिया भी जरुरी है. ● कपडे हाथ से धो रहे हो तो अलग वाॅशिंग पाउडर और मशीन से धो रहे हो तो खास तरह का पाउडर... (नहीं तो तुम्हारी 20000 की मशीन बकेट से ज्यादा कुछ नहीं.) ● और हाँ, कॉलर का मैल हटाने का व्हॅनिश तो घर में होगा ही, ● हाथ धोने के लिए नहाने वाला साबुन तो दूर की बात, ● लिक्विड ही यूज करो, साबुन से कीटाणु 'ट्रांसफर' होते है (ये तो वो ही बात हो गई कि कीड़े मारनेवाली दवा में कीड़े पड़ गए) ● बाल धोने के लिए शैम्पू ही पर्याप्त नहीं, ● कंडीशनर भी जरुरी है, ● फिर बॉडी लोशन, ● फेस वाॅश, ● डियोड्रेंट, ● हेयर जेल, ● सनस्क्रीन क्रीम, ● स्क्रब, ● 'गोरा' बनाने वाली क्रीम लेना अनिवार्य है ही. ●और हाँ दूध ( जो खुद शक्तिवर्धक है) की शक्ति बढाने के लिए हॉर्लिक्स मिलाना तो भूले नहीं न आप... ● मुन्ने का हॉर्लिक्स अलग, ● मुन्ने की मम्मी का अलग, ● और मुन्ने के पापा का डिफरेंट. ● साँस की बदबू दूर करने के लिये ब्रश करना ही पर्याप्त नहीं, माउथ वाश से कुल्ले करना भी जरुरी है.... तो श्रीमान जी... 10-15 साल पहले जिस घर का खर्च 8 हज़ार में आसानी से चल जाता था, आज उसी का बजट 40 हजार को पार कर गया है! तो उसमें सारा दोष महंगाई का ही नहीं है, कुछ हमारी बदलती सोच भी है! और दिनरात tv पर दिखाये जानवाले विज्ञापनों का परिणाम है! सोचो.. सीमित साधनों के साथ स्वदेशी जीवन शैली अपनायें, देश का पैसा बचाएं। जितना हो सके साधारण जीवन शैली अपनाये ! राधे राधे बोल भाई। इसी में सार है । बाकी सब बैकार है । .

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64 योगिनीयो के मंत्र 〰〰🌼〰🌼〰〰 १. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा । २. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कपलिनी नागलक्ष्मी स्वाहा । ३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा । ४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा ५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विरोधिनी विलासिनी स्वाहा । ६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा । ७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्र रक्त भोग रूपा स्वाहा । ८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा । ९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा । १०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा । ११. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री घना महा जगदम्बा स्वाहा । १२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बलाका काम सेविता स्वाहा । १३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा । १४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा । १५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा । १६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा । १७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा १८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भगमालिनी तारिणी स्वाहा १९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्यकलींना तंत्रार्पिता स्वाहा । २०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा । २१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा । २२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री महवज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा । २३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा । २४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा । २५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा । २६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा । २७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा । २८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री विजया देवी वसुदा स्वाहा । २९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा । ३०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा । ३१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा । ३२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा । ३३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री डाकिनी मदसालिनी स्वाहा । ३४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री राकिनी पापराशिनी स्वाहा । ३५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा । ३६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा । ३७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा । ३८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा । ३९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा । ४०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री षोडशी लतिका देवी स्वाहा । ४१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा । ४२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा । ४३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा । ४४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा । ४५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा । ४६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मातंगी कांटा युवती स्वाहा । ४७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा । ४८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा । ४९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा । ५०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री मोहिनी माता योगिनी स्वाहा । ५१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा । ५२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा । ५३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री नारसिंही वामदेवी स्वाहा । ५४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा । ५५. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा । ५६. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा । ५७. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा । ५८. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा । ५९. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा । ६०. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा । ६१. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा । ६२. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा । ६३. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री लक्ष्मीh मनोरमायोनि स्वाहा । ६४. ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा। 〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰🌼〰〰

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🙏🙏🌹🌹 जय माता दी🙏🙏🌹🌹 दुर्गा कवच🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹 देवी कवच में शरीर के समस्त अंगों का उल्लेख है। देवी कवच पढते जाइये, और भगवती से कामना करते रहें कि हम निरोगी रहें: 🙏🌹 ॐ नमश्चण्डिकायै। ॐ यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्। यन्न कस्य चिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह॥1॥🌹🌹🌹🌹🌹 ॥मार्कण्डेय उवाच॥ मार्कण्डेय जी ने कहा हे पितामह! जो इस संसार में परम गोपनीय तथा मनुष्यों की सब प्रकार से रक्षा करने वाला है और जो अब तक आपने दूसरे किसी के सामने प्रकट नहीं किया हो, ऐसा कोई साधन मुझे बताइये। ॥ब्रह्मोवाच॥ अस्ति गुह्यतमं विप्रा सर्वभूतोपकारकम्। दिव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्वा महामुने॥2॥ 🌹🌹ब्रह्मन्! ऐसा साधन तो एक देवी का कवच ही है, जो गोपनीय से भी परम गोपनीय, पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियों का उपकार करनेवाला है। महामुने! उसे श्रवण करो। प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी। तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्॥3॥🌹🌹🌹 प्रथम नाम शैलपुत्री है, दूसरी मूर्तिका नाम ब्रह्मचारिणी है। तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है। चौथी पञ्चम🌹स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्॥4॥🌹🌹 पाँचवीं दुर्गा का नाम स्कन्दमाता है। देवी के छठे रूप को कात्यायनी कहते हैं। सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नाम से प्रसिद्ध है। नवमं सिद्धिदात्री च नव दुर्गाः प्रकीर्तिताः। उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना॥5॥ 🌹🌹नवीं दुर्गा का नाम सिद्धिदात्री है। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं। ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान् के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे। विषमे दुर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः॥6॥🌹🌹 जो मनुष्य अग्नि में जल रहा हो, रणभूमि में शत्रुओं से घिर गया हो, विषम संकट में फँस गया हो तथा इस प्रकार भय से आतुर होकर जो भगवती दुर्गा की शरण में प्राप्त हुए हों, उनका कभी कोई न तेषां जायते किञ्चिदशुभं रणसङ्कटे। नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं न ही॥7॥ 🌹🌹युद्ध समय संकट में पड़ने पर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखाई देती। उनके शोक, दु:ख और भय की प्राप्ति नहीं होती। यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते। ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः॥8॥ 🌹🌹🌹जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवी का स्मरण किया है, उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है। देवेश्वरि! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं, उनकी तुम नि:सन्देह रक्षा करती हो। प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना। ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना॥9॥ 🌹🌹🌹चामुण्डादेवी प्रेत पर आरूढ़ होती हैं। वाराही भैंसे पर सवारी करती हैं। ऐन्द्री का वाहन ऐरावत हाथी है। वैष्णवी देवी गरुड़ पर ही आसन जमाती हैं। माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना। लक्ष्मी: पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया॥10॥🌹🌹🌹 माहेश्वरी वृषभ पर आरूढ़ होती हैं। कौमारी का मयूर है। भगवान् विष्णु की प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमल के आसन पर विराजमान हैं,और हाथों में कमल धारण किये हुए हैं। श्वेतरूपधारा देवी ईश्वरी वृषवाहना। ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता॥ 11॥🌹🌹🌹 वृषभ पर आरूढ़ ईश्वरी देवी ने श्वेत रूप धारण कर रखा है। ब्राह्मी देवी हंस पर बैठी हुई हैं और सब प्रकार के आभूषणों से विभूिषत हैं। इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः। नानाभरणशोभाढया नानारत्नोपशोभिता:॥ 12॥🌹🌹🌹 इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकार की योग शक्तियों से सम्पन्न हैं। इनके सिवा और भी बहुत-सी देवियाँ हैं, जो अनेक प्रकार के आभूषणों की शोभा से युक्त तथा नाना प्रकार के रत्नों से सुशोभित हैं। दृश्यन्ते रथमारूढा देव्याः क्रोधसमाकुला:। शङ्खं चक्रं गदां शक्तिं हलं च मुसलायुधम्॥13॥🌹🌹🌹🌹🌹 खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव च। कुन्तायुधं त्रिशूलं च शार्ङ्गमायुधमुत्तमम्॥ 14॥🌹🌹🌹🌹 दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय च। धारयन्त्यायुद्धानीथं देवानां च हिताय वै॥ 15॥🌹🌹🌹🌹🌹 ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोध में भरी हुई हैं और भक्तों की रक्षा के लिए रथ पर बैठी दिखाई देती हैं। ये शङ्ख, चक्र, गदा, शक्ति, हल और मूसल, खेटक और तोमर, परशु तथा पाश, कुन्त औ त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र-शस्त्र अपने हाथ में धारण करती हैं। दैत्यों के शरीर का नाश करना,भक्तों को अभयदान देना और देवताओं का कल्याण करना यही उनके शस्त्र-धारण का उद्देश्य है। नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे। महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि॥16॥🌹🌹🌹🌹🌹 महान् रौद्ररूप, अत्यन्त घोर पराक्रम, महान् बल और महान् उत्साह वाली देवी तुम महान् भय का नाश करने वाली हो,तुम्हें नमस्कार है त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि। प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्रि आग्नेय्यामग्निदेवता॥ 17॥🌹🌹🌹🌹 दक्षिणेऽवतु वाराही नैऋत्यां खङ्गधारिणी। प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी॥ 18॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 तुम्हारी और देखना भी कठिन है। शत्रुओं का भय बढ़ाने वाली जगदम्बिक मेरी रक्षा करो। पूर्व दिशा में ऐन्द्री इन्द्रशक्ति)मेरी रक्षा करे। अग्निकोण में अग्निशक्ति,दक्षिण दिशा में वाराही तथा नैर्ऋत्यकोण में खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे। पश्चिम दिशा में वारुणी और वायव्यकोण में मृग पर सवारी करने वाली देवी मेरी रक्षा करे। उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी। ऊर्ध्वं ब्रह्माणी में रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा॥ 19॥🌹🌹🌹🌹 उत्तर दिशा में कौमारी और ईशानकोण में शूलधारिणी देवी रक्षा करे। ब्रह्माणि!तुम ऊपर की ओर से मेरी रक्षा करो और वैष्णवी देवी नीचे की ओर से मेरी रक्षा करे । एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहाना। जाया मे चाग्रतः पातु: विजया पातु पृष्ठतः॥ 20॥🌹🌹🌹 इसी प्रकार शव को अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डा देवी दसों दिशाओं में मेरी रक्षा करे। जया आगे से और विजया पीछे की ओर से मेरी रक्षा करे। अजिता वामपार्श्वे तु दक्षिणे चापराजिता। शिखामुद्योतिनि रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता॥21॥ 🌹🌹🌹वामभाग में अजिता और दक्षिण भाग में अपराजिता रक्षा करे। उद्योतिनी शिखा की रक्षा करे। उमा मेरे मस्तक पर विराजमान होकर रक्षा करे। मालाधारी ललाटे च भ्रुवो रक्षेद् यशस्विनी। त्रिनेत्रा च भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा च नासिके॥ 22॥🌹🌹🌹🌹 ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे। शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोर्द्वारवासिनी। कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शङ्करी ॥ 23॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 ललाट में मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनी देवी मेरी भौंहों का संरक्षण करे। भौंहों के मध्य भाग में त्रिनेत्रा और नथुनों की यमघण्टा देवी रक्षा करे। नासिकायां सुगन्‍धा च उत्तरोष्ठे च चर्चिका। अधरे चामृतकला जिह्वायां च सरस्वती॥ 24॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नासिका में सुगन्धा और ऊपर के ओंठ में चर्चिका देवी रक्षा करे। नीचे के ओंठ में अमृतकला तथा जिह्वा में सरस्वती रक्षा करे। दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका। घण्टिकां चित्रघण्टा च महामाया च तालुके॥ 25॥🌹🌹🌹🌹 कौमारी दाँतों की और चण्डिका कण्ठप्रदेश की रक्षा करे। चित्रघण्टा गले की घाँटी और महामाया तालु में रहकर रक्षा करे। कामाक्षी चिबुकं रक्षेद्‍ वाचं मे सर्वमङ्गला। ग्रीवायां भद्रकाली च पृष्ठवंशे धनुर्धारी॥ 26॥ 🌹🌹🌹🌹🌹कामाक्षी ठोढी की और सर्वमङ्गला मेरी वाणी की रक्षा करे। भद्रकाली ग्रीवा में और धनुर्धरी पृष्ठवंश (मेरुदण्ड)में रहकर रक्षा करे। नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी। स्कन्धयोः खङ्गिनी रक्षेद्‍ बाहू मे वज्रधारिणी॥27॥🌹🌹🌹🌹 कण्ठ के बाहरी भाग में नीलग्रीवा और कण्ठ की नली में नलकूबरी रक्षा करे। दोनों कंधों में खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओं की वज्रधारिणी रक्षा करे। हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चान्गुलीषु च। नखाञ्छूलेश्वरी🌹 रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी॥28॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 दोनों हाथों में दण्डिनी और उँगलियों में अम्बिका रक्षा करे। शूलेश्वरी नखों की रक्षा करे। कुलेश्वरी कुक्षि पेट)में रहकर रक्षा करे। स्तनौ रक्षेन्‍महादेवी मनः शोकविनाशिनी। हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी॥ 29॥🌹🌹🌹🌹🌹 महादेवी दोनों स्तनों की और शोकविनाशिनी देवी मन की रक्षा करे। ललिता देवी हृदय में और शूलधारिणी उदर में रहकर रक्षा करे। नाभौ च कामिनी रक्षेद्‍ गुह्यं गुह्येश्वरी तथा। पूतना कामिका मेढ्रं गुडे महिषवाहिनी॥30॥ 🌹🌹🌹🌹कट्यां भगवतीं रक्षेज्जानूनी विन्ध्यवासिनी। जङ्घे महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी॥31॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नाभि में कामिनी और गुह्यभाग की गुह्येश्वरी रक्षा करे। पूतना और कामिका लिङ्ग की और महिषवाहिनी गुदा की रक्षा करे। भगवती कटि भाग में और विन्ध्यवासिनी घुटनों की रक्षा करे। सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाली महाबला देवी दोनों पिण्डलियों की रक्षा करे। गुल्फयोर्नारसिंही च पादपृष्ठे तु तैजसी। पादाङ्गुलीषु श्रीरक्षेत्पादाध:स्तलवासिनी॥32॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 नारसिंही दोनों घुट्ठियों की और तैजसी देवी दोनों चरणों के पृष्ठभाग की रक्षा करे। श्रीदेवी पैरों की उँगलियों में और तलवासिनी पैरों के तलुओं में रहकर रक्षा करे। नखान् दंष्ट्रा कराली च केशांशचैवोर्ध्वकेशिनी। रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा॥33॥ 🌹🌹🌹🌹🌹🌹अपनी दाढों के कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकराली देवी नखों की और ऊर्ध्वकेशिनी देवी केशों की रक्षा करे। रोमावलियों के छिद्रों में कौबेरी और त्वचा की वागीश्वरी देवी रक्षा करे। रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती। अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं च मुकुटेश्वरी॥ 34 ॥🌹🌹🌹🌹🌹 पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा। ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसन्धिषु॥35 ॥🌹🌹🌹🌹🌹 पार्वती देवी रक्त, मज्जा, वसा, माँस, हड्डी और मेद की रक्षा करे। आँतों की कालरात्रि और पित्त की मुकुटेश्वरी रक्षा करे। मूलाधार आदि कमल-कोशों में पद्मावती देवी और कफ में चूड़ामणि देवी स्थित होकर रक्षा करे। नख के तेज की ज्वालामुखी रक्षा करे। जिसका किसी भी अस्त्र से भेदन नहीं हो सकता, वह अभेद्या देवी शरीर की समस्त संधियों में रहकर रक्षा करे। शुक्रं ब्रह्माणी मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा। अहङ्कारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी॥36॥🌹🌹🌹🌹🌹 ब्रह्माणी!आप मेरे वीर्य की रक्षा करें। छत्रेश्वरी छाया की तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार,मन और बुद्धि की रक्षा करे। प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं च समानकम्। वज्रहस्ता च मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना॥37॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 हाथ में वज्र धारण करने वाली वज्रहस्ता देवी मेरे प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान वायु की रक्षा करे। कल्याण से शोभित होने वाली भगवती कल्याण शोभना मेरे प्राण की रक्षा करे। रसे रूपे च गन्धे च शब्दे स्पर्शे च योगिनी। सत्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा॥38॥ 🌹🌹🌹रस, रूप, गन्ध, शब्द और स्पर्श इन विषयों का अनुभव करते समय योगिनी देवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण,रजोगुण और तमोगुण की रक्षा सदा नारायणी देवी करे। आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥39॥🌹🌹🌹🌹🌹 वाराही आयु की रक्षा करे। वैष्णवी धर्म की रक्षा करे तथा चक्रिणी चक्र धारण करने वाली)देवी यश,कीर्ति,लक्ष्मी,धन तथा विद्या की रक्षा करे। आयू रक्षतु वाराही धर्मं रक्षतु वैष्णवी। यशः कीर्तिं च लक्ष्मीं च धनं विद्यां च चक्रिणी॥40॥🌹🌹🌹🌹🌹 इन्द्राणि! आप मेरे गोत्र की रक्षा करें। चण्डिके! तुम मेरे पशुओं की रक्षा करो। महालक्ष्मी पुत्रों की रक्षा करे और भैरवी पत्नी की रक्षा करे। पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्गं क्षेमकरी तथा। राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता॥ 41॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 मेरे पथ की सुपथा तथा मार्ग की क्षेमकरी रक्षा करे। राजा के दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहने वाली विजया देवी सम्पूर्ण भयों से मेरी रक्षा करे। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥ 42॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 देवी! जो स्थान कवच में नहीं कहा गया है, रक्षा से रहित है,वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो;क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो। रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु। तत्सर्वं रक्ष मे देवी जयन्ती पापनाशिनी॥43॥🌹🌹🌹🌹🌹 पदमेकं न गच्छेतु यदिच्छेच्छुभमात्मनः। कवचेनावृतो नित्यं यात्र यत्रैव गच्छति॥44॥🌹🌹🌹🌹🌹🌹 तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सर्वकामिकः। यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्। परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान्॥44॥ यदि अपने शरीर का भला चाहे तो मनुष्य बिना कवच के कहीं एक पग भी न जाए। कवच का पाठ करके ही यात्रा करे। कवच के द्वारा सब ओर से सुरक्षित मनुष्य जहाँ-जहाँ भी जाता है,वहाँ-वहाँ उसे धन-लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओं की सिद्धि करने वाली विजय की प्राप्ति होती है। वह जिस-जिस अभीष्ट वस्तु का चिन्तन करता है, उस-उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है। वह पुरुष इस पृथ्वी पर तुलना रहित महान् ऐश्वर्य का भागी होता है। निर्भयो जायते मर्त्यः सङ्ग्रमेष्वपराजितः। त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्यः कवचेनावृतः पुमान्॥45॥🌹🌹🌹🌹🌹 कवच से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है। युद्ध में उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकों में पूजनीय होता है। इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्। य: पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः॥46॥🌹🌹🌹🌹🌹 दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः। जीवेद् वर्षशतं साग्रामपमृत्युविवर्जितः॥47॥🌹🌹🌹🌹 देवी का यह कवच देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओं के समय श्रद्धा के साथ इसका पाठ करता है,उसे दैवी कला प्राप्त होती है। तथा वह तीनों लोकों में कहीं भी पराजित नहीं होता। इतना ही नहीं, वह अपमृत्यु रहित हो, सौ से भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है। नश्यन्ति टयाधय: सर्वे लूताविस्फोटकादयः। स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम्॥ 48॥🌹🌹🌹🌹 अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले। भूचराः खेचराशचैव जलजाश्चोपदेशिकाः॥49॥🌹🌹🌹🌹 सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा। अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबला॥ 50॥🌹🌹🌹🌹 ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसा:। ब्रह्मराक्षसवेतालाः कूष्माण्डा भैरवादयः॥ 51॥🌹🌹🌹🌹 नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥ 52॥🌹🌹🌹 मकरी, चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं। कनेर,भाँग,अफीम,धतूरे आदि का स्थावर विष,साँप और बिच्छू आदि के काटने से चढ़ा हुआ जङ्गम विष तथा अहिफेन और तेल के संयोग आदि से बनने वाला कृत्रिम विष-ये सभी प्रकार के विष दूर हो जाते हैं,उनका कोई असर नहीं होता। इस पृथ्वी पर मारण-मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकार के मन्त्र-यन्त्र होते हैं, वे सब इस कवच को हृदय में धारण कर लेने पर उस मनुष्य को देखते ही नष्ट हो जाते हैं। ये ही नहीं,पृथ्वी पर विचरने वाले ग्राम देवता,आकाशचारी देव विशेष,जल के सम्बन्ध से प्रकट होने वाले गण,उपदेश मात्र से सिद्ध होने वाले निम्नकोटि के देवता,अपने जन्म से साथ प्रकट होने वाले देवता, कुल देवता, माला (कण्ठमाला आदि), डाकिनी, शाकिनी, अन्तरिक्ष में विचरण करनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ,ग्रह, भूत, पिशाच, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, बेताल, कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदय में कवच धारण किए रहने पर उस मनुष्य को देखते ही भाग जाते हैं। कवचधारी पुरुष को राजा से सम्मान वृद्धि प्राप्ति होती है। यह कवच मनुष्य के तेज की वृद्धि करने वाला और उत्तम है। नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते। मानोन्नतिर्भावेद्राज्यं तेजोवृद्धिकरं परम्॥ 53॥🌹🌹 यशसा वद्धते सोऽपी कीर्तिमण्डितभूतले। जपेत्सप्तशतीं चणण्डीं कृत्वा तु कवचं पूरा॥ 54॥🌹🌹 यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्। तावत्तिष्ठति मेदिनयां सन्ततिः पुत्रपौत्रिकी॥54॥🙏🌹 कवच का पाठ करने वाला पुरुष अपनी कीर्ति से विभूषित भूतल पर अपने सुयश से साथ-साथ वृद्धि को प्राप्त होता है। जो पहले कवच का पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डी का पाठ करता है, उसकी जब तक वन, पर्वत और काननों सहित यह पृथ्वी टिकी रहती है, तब तक यहाँ पुत्र-पौत्र आदि संतान परम्परा बनी रहती है। देहान्ते परमं स्थानं यात्सुरैरपि दुर्लभम्। प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः॥55॥🙏 लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते ॥ॐ॥ ॥ 56॥🙏 देह का अन्त होने पर वह पुरुष भगवती महामाया के प्रसाद से नित्य परमपद को प्राप्त होता है, जो देवतोओं के लिए भी दुर्लभ है। वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याण शिव के साथ आनन्द का भागी होता है। ।। इति देव्या: कवचं सम्पूर्णम् ।🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏🙏 जय माता दी🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹A Sharma🙏🙏

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‼️अति सुंदर कथा।‼️ "प्रेम से भरी ओढ़नी" वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी। दूध बेचकर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी। ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती। वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी। सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी-कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती फिर लौटकर अपने प्रभु की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल-गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती। कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं। एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवनक्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई। दूध डालते समय मंदिर के गोसाईं की दृष्टि पड़ गई। गोसाईं जी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने दूध वापिस कर दिया। पंजीरी को खूब डाँटा, फटकारा और मंदिर में उस का प्रवेश निषेध कर दिया। पंजीरी पर तो आसमान टूट पड़ा। रोती-बिलखती घर पहुँची। ठाकुर! मुझसे बड़ा अपराध हो गया। क्षमा करो! पानी तो रोज मिलाती हूँ, तुमसे कहाँ छिपा है? ना मिलाओ तो गुजारा कैसे हो और उस बेचारी मछली का भी क्या दोष? उस पर तो तुम्हारी कृपा हुई तो तुम्हारे पास पहुँची लेकिन प्रभु! तुमने तो आज तक कोई आपत्ति नहीं की। प्रेम से दूध पीते रहे फिर ये गोसाईं कौन होता है मुझे रोकने वाला और मुझे अधिक दु:ख इसलिए है कि तुम्हारे मंदिर के गोसाईं ने मुझे इतनी खरी-खोटी सुनाई और तुम कुछ नहीं बोले! ठाकुर! यही मेरा अपराध है तो मैं प्रतिज्ञा करती हूँ कि तुम अगर रूठे रहोगे, मेरा चढ़ावा स्वीकार नहीं करोगे तो मैं भी अन्न-जल ग्रहण नहीं करुंगी। यहीं प्राण त्याग दूंगी। भूखी-प्यासी, रोते-रोते शाम हो गई तभी पंजीरी के कानों में एक मधुर आवाज़ सुनाई दी - माई ओ माई! उठी तो दरवाजे पर देखा कि एक सुदर्शन किंतु थका-हारा सा एक किशोर कुटिया में झाँक रहा है। कौन हो बेटा? मैया! बृजवासी ही हूँ! मदन मोहन के दर्शन करने आया हूँ। बड़ी भूख लगी है कुछ खाने को मिल जाए तो तुम्हारा बड़ा आभारी रहूँगा। पंजीरी के शरीर में ममता की लहर दौड़ गई। कोई पूछने की बात है बेटा! घर तुम्हारा है। ना जाने तुम कौन हो जिसने आते ही मुझ पर ऐसा जादू बिखेर दिया है। बड़ी दूर से आए हो क्या? क्या खाओगे? अभी जल्दी से बना दूँगी। अरे मैया! इस समय क्या रसोई बनाओगी! थोड़ा सा दूध दे दो! वही पीकर सो जाउँगा। दूध की बात सुनते ही पंजीरी की आँखें डबडबा आयीं फिर अपने आपको सँभालते हुए बोली - बेटा! दूध तो है पर सवेरे का है। जरा ठहरो! अभी गैया को सहला कर थोड़ा ताजा दूध दुह लेती हूँ। अरे! नहीं मैया, उसमें समय लगेगा। सवेरे का भूखा-प्यासा हूँ। दूध का नाम लेकर तूने मुझे अधीर बना दिया है। अरे! वही सुबह का दे दो, तुम बाद में दुहती रहना। डबडबायी आँखों से बोली - थोड़ा पानी मिला हुआ दूध है। अरे मैया! तुम मुझे भूखा मारोगी क्या? जल्दी से दूध छानकर दे दो वरना मैं यहीं प्राण छोड़ दूंगा। पंजीरी को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये बालक कैसी बात कर रहा है? दौड़ी-दौड़ी गई और झटपट दूध दे दिया। दूध पीकर बालक का चेहरा खिल उठा। मैया! कितना स्वादिष्ट दूध है! तू तो यूँ ही ना जाने क्या-क्या बहाने बना रही थी। अब तो मेरी आँखों में नींद भर आई है। अब मैं सो रहा हूँ। इतना कहकर वो वहीं सो गया। पंजीरी को फ़ुरसत हो गई तो दिन भर की थकान, दु:ख और अवसाद ने उसे फिर घेर लिया। जाड़े के दिन थे! भूखे पेट उसकी आँखों में नींद कहाँ से आती? जाडा़ बढ़ने लगा तो अपनी ओढ़नी बालक को ओढ़ा दी। दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया। ठाकुर जी बोले - मैया! मुझे भूखा मारेगी क्या? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी। स्वयं पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है। मैंने तो आज तुम्हारे घर आकर दूध पी लिया। अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख! मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ। मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना। गोसाईं भी अब तुम्हें कुछ ना कहेंगे! दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो! पंजीरी हड़बड़ाकर उठी! देखा कि, बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था। सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया। झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदनमोहन को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी। थोड़ी देर में सवेरा हो गया। पंजीरी ने देखा कि, ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं। इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया कि, प्रभु! एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं। गोसाईं जी ने सोचा कि, प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था। लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोलीं - गुसाईं जी! देखो तो लाला को! पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये। कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था लेकिन भूखा-प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया। गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए। भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला? भक्तिबंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला? माई! मुझे क्षमा कर दो। पंजीरी बोली - गुसाईं जी! देखी तुमने लाला की चतुराई! अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जान-बूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये। भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है। ठाकुर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे। अरे मैया! तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओढने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ!! ‼ प्रेम से कहो श्री राधे‼ ‼वृन्दावन बिहारीलाल की जय‼ कॉपी पेस्ट 🌷🌷 🌷जय श्री राधे राधे।🌷 🙏🙏

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🌿अति सुंदर कथा🌿 ✨ सच्ची घटना।✨ बात लगभग 10 -12 वर्ष पुरानी है। दिल्ली में एक भक्त जा रहा था तो रास्ते में उसने बांके बिहारी जी की फोटो लगी हुई देखी। कुछ देर तक वह उस फोटो को निहारता रहा बाद में उसने अनुमान लगाया यह शायद माता काली की फोटो है। कुछ समय बाद वह एक भागवत कथा में गया वहां व्यास जी महाराज के पीछे बांके बिहारी जी का चित्र लगा था उसे याद आया यह तो वही काली माता की फोटो है। दो-तीन घंटे कथा पर बैठने के बाद उसे ज्ञान हुआ कि यह तो वृंदावन के बांके बिहारी जी हैं और सोचने लगा इनकी फोटो इतनी आकर्षित है तो वास्तविकता में कितने आकर्षित होंगे? वह व्यक्ति और कोई नहीं 10वीं 12वीं में पढ़ने वाला एक छात्र था उसने निर्णय लिया वह समय निकालकर वृंदावन जाएगा लेकिन आज से पहले कभी वृंदावन गया नहीं था। उसको पता नहीं था वृंदावन का! आखिर उसने एक रिक्शे वाले से पूछा - भैया! यह वृंदावन कहां पड़ेगा? वहां जाने के लिए बस मिलेगी या ट्रेन मिलेगी, कहां से कैसे जाना पड़ेगा? उस रिक्शेवाले ने कहा - दिल्ली में निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन या सराय काले खां बस स्टैंड से आपको मथुरा की बस या ट्रेन लेनी पड़ेगी। वहां से पास में ही है वृंदावन। वह बस स्टैंड पहुंचा और जा करके उसने मथुरा की बदली बस वाले को कहा - भैया! वृंदावन जाना है। कहां उतरना है? बस के कंडक्टर ने कहा - आप छटीकरा उतर जाना। छटीकरा उतरकर उसने ऑटो किया और वृंदावन पहुंचा लेकिन गुरु पूर्णिमा का दिन था। अत्यंत भीड़ थी। बहुत पहले ही उसे उतार दिया गया। वह पैदल पहुंचा बिहारी जी का मंदिर पूछते हुए! बहुत भीड़ से होता हुआ वह बांके बिहारी जी के मंदिर पहुंचा। बांके बिहारी जी का पर्दा खुला तो अंदर देखता है कोई दिखाई ही नहीं दे रहा, दोनों ओर केवल जोत जलती हुई दिखाई दे रही है। वह कुछ समझ नहीं पाया। अत्यंत भीड़ के कारण बिना दर्शन के ही गार्ड ने उसको मंदिर के गेट से बाहर निकाल दिया। बाहर आकर वह भक्त व्याकुल होने लगा फिर पुन: प्रयास किया मंदिर में जाने का तो किसी ने कहा इस ओर से केवल प्रसाद वाले का रास्ता है। उसने सुना, उसने भी प्रसाद लिया। वो प्रसाद लेकर ऊपर बिहारी जी को प्रसाद चढ़ाने के लिए पहुंचा। पंडित जी बोले - कोई दक्षिणा रखो! जेब में हाथ डाला और याद आया कि पैसे तो बड़े कम बचे हैं, वापस दिल्ली भी जाना है और सोच-विचार कर उसने ₹100 प्रसाद पर रखे और नाम आंखों से बांके बिहारी जी को प्रसाद अर्पित कर दिया। अब दर्शन में मन कम लगा रहा है। पैसों की चिंता अधिक होने लगी, वापस जाना है। बिहारी जी के सामने उसकी आंखों में आंसू आ गए। इतने में पंडित जी ने डब्बा हाथ में पकड़ाया और बोले - चलो! आगे चलो। वह भक्त बोला - पंडित जी! यह डब्बा मेरा नहीं है। मेरा तो आधा किलो का था। आपने तो 1 किलो का दे दिया। अधिक भीड़ होने के कारण धक्का-मुक्की में उसे नीचे उतार दिया गया। मन में सोचा कोई बात नहीं। ठाकुर जी को प्रसाद चढा दिया, प्रणाम हो गया, जो भी ठाकुर जी की कृपा से मिल गया उसको सर से लगाकर मंदिर से बाहर आया। मंदिर से बाहर आकर उसने प्रसाद का डिब्बा खोला और सोचा थोड़ा सा प्रसाद चख लूं! जैसे ही डिब्बा खोला तो क्या देखता है? पेड़े के साथ प्रसाद में ₹500 का नोट रखा हुआ है। उसकी आंखों में आंसू आ गए। ठाकुर जी मेरे पास मात्र डेढ़ सौ रुपए बचे थे, घर जाना था इसलिए आंखों में आंसू आ गए थे लेकिन प्यारे आपने तो मेरे घर जाने की दुविधा ही दूर कर दी। दोनों हाथ जोड़कर ठाकुर जी की चौखट को प्रणाम किया और ठाकुर जी का शुक्रिया करता हुआ, ठाकुर जी का नाम लेता हुआ वापस दिल्ली आ गया, तबसे बिहारी जी में उसकी श्रद्धा इतनी बढ़ गई कि बार-बार जब भी समय मिलता, वृंदावन जाने लगा। श्री बांके बिहारी जी इस प्रकार से अपने भक्तों की छोटी-छोटी परेशानियों को भी दूर करते हैं। 🌿प्रेम से कहिए श्री बांकेबिहारी लाल की जय🙏 🌷जय श्री कुंजबिहारी जी की 🌷जय श्री राधे राधे।🌷 🙏🙏

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