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रविवार, खंडोबा,भैरोबा,सुर्यनारायण रविवार पुर्वापार पासुन भैरवनाथ खंडेराव आणि सूर्यनारायण यांचे सेवेसाठी आपल्या ऋषीमुनींनी योजुन दीलेला आहे. सुर्यनारायणाची सेवा, (सुर्याला जल अर्पण करावे, सुर्य नमस्कार घालावे सुर्यनारायणाची स्तुती म्हणावी. ज्या जातकांना सुर्यनारायणाचे बल कमी पडत असेल त्यांनी लाल दान - मसुर, गुळ, गहु, तांबे, लाल वस्र गणपती मंदिरात दान केल्याने सूर्य बल प्राप्त होते) भैरवनाथाची सेवा (कालभैरव अष्टक म्हणावे ज्या जातकांना बाँसगीरी, वैरभाव, जुने येने वसुल न होने (ते वसुल करणे साठी) एक रूपयाच्या शिक्यावर कालभैरव अष्टक म्हणावे आणि तो शिक्का तुलसी कुडांत कींवा तुलसी खालच्या मातीत खोलवर बुजवुन ठेवावा.ज्या जातकांना बाहेरची बाधा आणि सर्प दंश झाला असेल त्यांना भैरवनाथ महारांजा जवळ सव्वा महीना ठेवतात बाधा दुर होते. नैवेद्य - शेंगदाणे चटणी आणि भाकरी हा नैवेद्य तसेच गव्हाच्या जाड पिठाची बट्टी आणि वांग्याची भाजी, गुळ, हा नैवेद्य भैरवनाथ महाराजांना देतात खंडेराव महाराज - आपले सर्वाचे कुलदैवत श्री खंडेराव महाराज आहेत यांचे मंदीर प्रत्येक गावात आहे म्हालसाई आणि बाणाई ह्या दोन पत्नीसह त्यांची मुर्तीचा टाक आपल्या देव्हार्यात असतो. त्यांचे मूळ ठिकाण जेजुरी येथे आहे .घोडा आणि कुत्रा हे पशु त्यांचे सानिध्यात असतात. शीघ्र फलदायी अशी त्यांची सेवा असते. चंपाशष्टीला आपण त्यांची तलीआरती करतो. लग्नविधी आगोदर रवीवार पाहुन आपण अष्टवर त्यांचे नावे जेवु घालतो आणि नंतरच लग्नाचे इतर विधी करतो .नैवेद्य - गुल आणि बट्टीचा चुर्मा लाडु, तसेच भरीत आणि भाकरी 🙏🌹खंडेराव महाराज की जय, भैरवनाथ महाराज की जय, सुर्यनारायण महाराज की जय 🌹🙏 🙏🌹शुभ रविवार 🌹🙏!!श्री स्वामी समर्थ! !🙏 🙏 ✍️ सौ ज्योतीताई यशवंतराव दुसाने, पाचोरा पती - यशवंतराव पंडीतराव दुसाने - स्टँप��

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[1/16, 6:03 PM] Sangale Samadhan: मकर संक्रंति के दिन जरूर पढ़े श्रीसत्यनारायण की कथा पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय की बात है जब एकबार विष्णु भक्त नारद जी ने भ्रमण करते हुए मृत्युलोक के प्राणियों को अपने-अपने कर्मों के अनुसार तरह-तरह के दुखों से परेशान होते देखा. इससे उनका संतहृदय द्रवित हो उठा और वे वीणा बजाते हुए अपने परम आराध्य भगवान श्रीहरि की शरण में हरि कीर्तन करते क्षीरसागर पहुंच गये और स्तुतिपूर्वक बोले, ‘हे नाथ! यदि आप मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तो मृत्युलोक के प्राणियों की व्यथा हरने वाला कोई छोटा-सा उपाय बताने की कृपा करें.' तब भगवान ने कहा, 'हे वत्स! तुमने विश्वकल्याण की भावना से बहुत सुंदर प्रश्न किया है. अत: तुम्हें साधुवाद है. आज मैं तुम्हें ऐसा व्रत बताता हूं जो स्वर्ग में भी दुर्लभ है और महान पुण्यदायक है तथा मोह के बंधन को काट देने वाला है और वह है श्रीसत्यनारायण व्रत. इसे विधि-विधान से करने पर मनुष्य सांसारिक सुखों को भोगकर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर लेता है.' इसके बाद काशीपुर नगर के एक निर्धन ब्राह्मण को भिक्षावृत्ति करते देख भगवान विष्णु स्वयं ही एक बूढ़े ब्राह्मण के रूप में उस निर्धन ब्राह्मïण के पास जाकर कहते हैं, ‘हे विप्र! श्री सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं. तुम उनके व्रत-पूजन करो जिसे करने से मुनष्य सब प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है. इस व्रत में उपवास का भी अपना महत्व है किंतु उपवास से मात्र भोजन न लेना ही नहीं समझना चाहिए. उपवास के समय हृदय में यह धारणा होनी चाहिए कि आज श्री सत्यनारायण भगवान हमारे पास ही विराजमान हैं. अत: अंदर व बाहर शुचिता बनाये रखनी चाहिए और श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान का पूजन कर उनकी मंगलमयी कथा का श्रवण करना चाहिए.’ सायंकाल में यह व्रत-पूजन अधिक प्रशस्त माना जाता है. साधु वैश्य ने भी यही प्रसंग राजा उल्कामुख से विधि-विधान के साथ सुना, किंतु उसका विश्वास अधूरा था. श्रद्धा में कमी थी. वह कहता था कि संतान प्राप्ति पर सत्यव्रत-पूजन करूंगा. समय बीतने पर उसके घर एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया. उसकी श्रद्धालु पत्नी ने व्रत की याद दिलायी तो उसने कहा कि कन्या के विवाह के समय करेंगे. समय आने पर कन्या का विवाह भी हो गया किंतु उस वैश्य ने व्रत नहीं किया. वह अपने दामाद को लेकर व्यापार के लिए चला गया. उसे चोरी के आरोप में राजा चन्द्रकेतु द्वारा दामाद सहित कारागार में डाल दिया गया. पीछे घर में भी चोरी हो गयी. पत्नी लीलावती व पुत्री कलावती भिक्षावृत्ति के लिए विवश हो गयीं. एक दिन कलावती ने किसी विप्र के घर श्री सत्यनारायण का पूजन होते देखा और घर आकर मां को बताया. तब मां ने अगले दिन श्रद्धा से व्रत-पूजन कर भगवान से पति और दामाद के शीघ्र वापस आने का वरदान मांगा. श्रीहरि प्रसन्न हो गये और स्वप्न में राजा को दोनों बंदियों को छोडऩे का आदेश दिया. राजा ने उनका धन-धान्य तथा प्रचुर द्रव्य देकर उन्हें विदा किया. घर आकर पूर्णिमा और संक्रांति को सत्यव्रत का जीवन पर्यन्त आयोजन करता रहा, फलत: सांसारिक सुख भोगकर उसे मोक्ष प्राप्त हुआ. इसी प्रकार राजा तुङ्गध्वज ने वन में गोपगणों को श्री सत्यनारायण भगवान का पूजन करते देखा, किंतु प्रभुता के मद में चूर राजा न तो पूजास्थल पर गया, न दूर से ही प्रणाम किया और न ही गोपगणों द्वारा दिया प्रसाद ग्रहण किया. परिणाम यह हुआ कि राजा के पुत्र, धन-धान्य, अश्व-गजादि सब नष्ट हो गये. राजा को अकस्मात् यह आभास हुआ कि विपत्ति का कारण सत्यदेव भगवान का निरादर है. उसे बहुत पश्चाताप हुआ. वह तुरंत वन में गया. गोपगणों को बुलाकर काफी समय लगाकर सत्यनारायण भगवान की पूजा की. फिर उसने उनसे ही प्रसाद ग्रहण किया तथा घर आ गया. उसने देखा कि विपत्ति टल गयी और उसकी सारी संपत्ति तथा जन सुरक्षित हो गये. राजा प्रसन्नता से भर गया और सत्यव्रत के आचरण में निरत हो गया तथा अपना सर्वस्व भगवान को अर्पित कर दिया. [1/16, 6:05 PM] Sangale Samadhan: जानिए संसार को कलयुग से बचाने के लिए भगवान विष्णु कब लेंगे कल्कि अवतार ? इस भगवान विष्णु जी की विधि-विधान से पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है. ऐसी मान्यता है कि यदि भक्त सच्चे मन से भगवान विष्णु को पूजता है तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. वैसे हर दिन श्री हरि की पूजा की जाती है लेकिन हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार को भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं. पुराणों में भगवान विष्णु के दो रूप बताए गए हैं. एक रूप में तो उन्हें बहुत शांत, प्रसन्न और कोमल बताया गया है और दूसरे रूप में प्रभु को बहुत भयानक बताया गया है. जहां श्रीहरि काल स्वरूप शेषनाग पर आरामदायक मुद्रा में बैठे हैं. लेकिन प्रभु का रूप कोई भी हो, उनका हृदय तो कोमल है और तभी तो उन्हें कमलाकांत और भक्तवत्सल कहा जाता है. कहा जाता है कि भगवान विष्णु का शांत चेहरा कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति को शांत रहने की प्रेरणा देता है. भगवान विष्णु का मानना है कि समस्याओं का समाधान शांत रहकर ही सफलतापूर्वक ढूंढा जा सकता है. एक इंसान दूसरे के खून का प्यासा हो जाएगा शास्त्रों में कहा गया है कि जैसे-जैसे घोर कलियुग आता जाएगा, वैसे-वैसे दिनों-दिन धर्म, सत्य, पवित्रता, क्षमा, आयु समाप्ति की कगार पर आ जाएंगे. यह भी बताया गया है कि कलियुग में जिसके पास धन होगा उसी को लोग कुलीन, सदाचारी मानेंगे और जो जितना छल-कपट कर सकेगा वह समाज में लोगों की नजरों में सबसे कुशल व्यवहार वाला माना जाएगा. माना जाता है कि जिस प्रकार से कलियुग (वर्तमान युग) में वारदात की घटनाएं सामने आ रही हैं, एक समय ऐसा भी आएगा जब ऐसी घटनाएं अपने चरम पर होंगी. एक इंसान दूसरे के खून का प्यासा हो जाएगा. गरीब से लेकर अमीर वर्ग के लोगों में ईष्या होने लगेगी. अधर्मियों का बोलबाला होगा. पत्तियां खाकर अपना जीवन व्यतीत करेंगे एक प्रजा को संभालने के लिए हमेशा ही एक राजा मौजूद होता है लेकिन आने वाले घोर कलियुग के समय में किसी भी नगर का राजा नहीं होगा. वहां केवल अधर्मियों का राज होगा. दरअसल जो बल से बली होगा सारे साम्राज्य में उसका राज होगा. मान्यता है कि एक समय ऐसा भी आएगा जब चारों ओर अकाल पड़ जाएगा. लोग भोजन की भूख को छोड़कर जानवरों की तरह पत्तियां खाकर अपना जीवन व्यतीत करेंगे. कलियुग यानी कलह-क्लेश से युक्त का युग. इस युग में लोगों में सिर्फ और सिर्फ असंतोष दिखाई देगा और जैसे-जैसे बल-बुद्धि, धर्म, पूजा-पाठ का अंत होगा, लोग धर्म में पाखंड से जुड़ने लगेंगे. कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है वहीं विष्णु पुराण के अनुसार ऐसे समय में भगवान जिनका रंग गोरा बताया जाता है वह गुस्से के कारण काला हो जाएगा. युद्ध के समय इनके हाथों में दो तलवारें होती हैं. इनका नाम कल्कि होगा. यह एक ब्राम्हण के घर जन्म लेंगे. कल्कि को विष्णु का भावी और अंतिम अवतार माना गया है. पृथ्वी पर जब पाप की सीमा पार होने लगेगी तब दुष्टों के संहार के लिए विष्णु का यह अवतार प्रकट होगा. इसी के साथ कलियुग की समाप्ति हो जाएगी और सतयुग दोबारा प्रारंभ होगा. [1/17, 6:42 AM] Sangale Samadhan: शनिवार के दिन भूल कर भी न लाए इन चीजों को... मान्यता है कि किसी भी काम में अड़चन आ रही हो तो शनिदेव की आराधना करनी चाहिए. शनिदेव प्रसन्न होते हैं तो बिगड़े हुए काम बन जाते हैं और सफलता मिलती है. शनिदेव मनुष्य के कर्म और फल से संबंध रखते हैं. शनि की कृपा के बिना ना तो विवाह होता है और ना ही संतान का सुख मिलता है. मान्‍यताओं के मुताबिक इस दिन कुछ गलत चीजें घर में लाने से शनिदेव के प्रकोप का सामना करना पड़ सकता है. हम आज आपको ऐसी ही कुछ चीजों के बारे में जानकारी दे रहे हैं, जिन्हें शनिवार को खरीदने से बचना चाहिए- काला रंग: शनिवार को काले कपड़े या काले जूते नहीं खरीदने चाहिए. इससे शनिदेव क्रोधित होते हैं. ऐसा करने से हर कार्य में असफलता मिलती हैं और भाग्‍य साथ नहीं देता. नमक: शनिवार को नमक खरीदने से बचें. मान्‍यता है कि यह व्‍यक्ति को कर्जदार बनाता है और रोग होते हैं. काले तिल: शनिदेव को काले तिल नहीं खरीदने चाहिए. मान्‍यता है कि इस दिन ऐसा करने से कार्यों में बाधा उत्‍पन्‍न होती है. कैंची: शनिवार के दिन कैंची खरीदने से भी बचना चाहिए. मान्‍यता है कि इस दिन कैंची खरीदने से रिश्तों में तनाव पैदा होता है. झाडू: इस दिन झाडू भी खरीदने से बचना चाहिए. मान्‍यता है कि इससे धन का नाश हो होता है. लोहा: शनिवार के दिन लोहा खरीदने से बचना चाहिए. मान्‍यता है कि ऐसा करने से धन की हानि हो सकती है. तेल: मान्‍यताओं के अनुसार शनिवार के दिन तेल का दान तो किया जा सकता है, लेकिन इस दिन इसे खरीदना नहीं चाहिए. [1/17, 6:44 AM] Sangale Samadhan: आज इस विधि से करें शनि देव की पूजा, मिलेगा 'शनि दोष' से छुटकारा ------------------------------------------------------------------------------ शनिवार के दिन भगवान शनि देव की पूजा का विशेष महत्व है। शनि देव को न्यााय का देवता भी कहते हैं। लोग उनसे डरते हैं लेकिन वो ऐसे देवता हैं जो सभी के कर्मों का फल उसे देते हैं। उनसे हमारा कोई भी काम छुपा नहीं होता, चाहे वो काम बुरा हो या अच्छा। किसी व्यक्ति की कुंडली में अगर शनि दोष हो तो उसका कोई भी काम आसानी से नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति शनिवार के दिन पूरी भक्ति और सही तरीके से भगवान शनि की पूजा करता है तो उसे भगवान शनि की असीम कृपा मिलती है और ग्रहों की दशा सुधरती है। आइए जानते हैं कि कैसे करें शनि देव की पूजा: 1. हर शनिवार को शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीया जरूर जलाएं। इस दीये को भगवान के मंदिर में उनकी शिला के सामने जलाएं। 2. यदि आपके घर के आस पास शनि देव का मंदिर नही है तो किसी पीपल के पेड़ के नीचे दीया जलाएं। 3. शनि महाराज को तेल के दीये के साथ काली उड़द और फिर कोई भी काली वस्तु़ भेंट करें और फिर शनि चालीसा का पाठ करें। 4. शनि देव की पूजा करने के बाद हनुमान जी की भी पूजा करें। उनकी मूर्ति पर सिंदूर लगाएं और केला चढ़ाएं। 5. पूजा के अंत में शनि देव का मंत्र पढ़ें। ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: [1/17, 6:46 AM] Sangale Samadhan: अगर शनिदेव और हनुमान जी को करना है प्रसन्न तो शनिवार के दिन करें ये उपाय शनि देवता को न्याय का देवता कहा जाता है. ऐसी मान्यता है कि वह सभी के कर्मों का फल देते हैं. कोई भी बुरा काम उनसे छिपा नहीं, शनिदेव हर एक बुरे काम का फल मनुष्य को ज़रूर देते हैं. जो गलती जानकर की गई उसके लिए भी और जो अंजाने में हुई, दोनों ही गलतियों पर शनिदेव अपनी नजर रखते हैं. इसीलिए उनकी पूजा का बहुत महत्व है. कहते हैं कि अगर जीवन में शनिदेव और हनुमान जी का आशीर्वाद मिल जाए तो फिर हर समस्या से निजात पाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए आपको कुछ विशेष उपाय करने होंगे. और इस रिपोर्ट में हम उन्हीं विशेष उपायों की जानकारी देंगे जिन्हें आपको शनिवार के दिन करना चाहिए. शनिवार के उपाय 1. पहले उपाय में आपको शनिवार के दिन पीपल के पेड़ को छूते हुए सात बार परिक्रमा करनी चाहिए. इसे केवल एक शनिवार नहीं बल्कि हर शनिवार करते रहे. साथ ही परिक्रमा के दौरान"ॐ शं शनैश्चराय नमः" का जप भी करें. कहते हैं ऐसा करने से शनि देव की साढ़ेसाती और ढैय्या या फिर शनि से जुड़ा कोई भी दोष समाप्त हो जाता है. 2. शनिवार की शाम को किसी तालाब या ऐसी जगह जहां पर मछलियां हो वहां पर दाना डालें. साथ ही चीटियों को भी आटा खिलाएं. कहते हैं इस उपाय से शनि देव के साथ साथ भगवान हनुमानजी भी प्रसन्न होते हैं. और किस्मत खुल जाती है. इससे फायदा ये होगा कि अगर आप पर कोई कर्ज है नौकरी को लेकर कोई समस्या है तो जल्द ही वो दूर हो जाएगी. 3. शनिवार के दिन एकासना करने से भी काफी लाभ मिलता है. जब आप यह करें तब एक को एक बर्तन में रखें और मनोकामना मांगे. इसके बाद उस रोटी को किसी भी काले कुत्ते या काली गाय को खिला देना चाहिए. इस टोटके से फायदा ये होगा कि आपका हर अधूरा व अटका हुआ काम जल्द ही पूरा हो जाएगा. 4. चौथा उपाय भी आपके लिए काफी फायदेमंद होगा. हालांकि यह काफी लोग करते भी हैं. इसमें आपको शनिवार को के दिन शनि देव पर अवश्य रूप से जल चढ़ाना चाहिए. लेकिन इसके साथ साथ हनुमान जी की प्रतिमा के सामने तेल का दीया भी जलाएं. सिर्फ यही नहीं इस दिन काली चीज़ों का दान करना भी काफी लाभकारी माना गया है. काले तिल, चने व काले कपड़े दान किए जा सकते हैं.

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[1/15, 5:13 PM] Sangale Samadhan: ❄❄❄❄❄🏵️❄❄❄❄❄ *स्त्रियांनी भांगात कुंकू किंवा सिंदूर भरल्याने होणारे लाभ* *🔹पतीमध्ये क्षात्रतेजरूपी ज्योत सतत तेवत रहाणे ‘सुवासिनी स्त्रियांच्या भांगातील कुंकू किंवा सिंदूर पाहून हिंदु पुरुषांना शत्रूशी लढण्यासाठी मारक शक्ती आणि चैतन्य मिळून त्यांची क्षात्रवृत्ती अन् उत्साह वाढत असे. पतीमध्ये क्षात्रतेजरूपी ज्योत सतत तेवत ठेवण्यासाठी सुवासिनी स्त्रियांनी कुंकू किंवा सिंदूर यांचा कपाळावर किंवा भांगात लावण्यास वापर करणे, हे मानसिक आणि आध्यात्मिक या दोन्ही कारणांसाठी योग्य आहे. (युद्धासाठी जाणार्‍या पुरुषांनीही सतत स्वतःला सात्त्विकता, मारक शक्ती आणि चैतन्य मिळण्यासाठी कपाळाला कुंकू किंवा सिंदूर याचा टिळा लावावा.)* *🔹वाईट शक्तींपासून संरक्षण.* *स्त्रियांचे मस्तक पुरुषांच्या मस्तकाच्या तुलनेत मऊ आणि संवेदनशील असते. केसातील भांगाचा भाग हा मध्यभागी असल्याने तो सर्वाधिक संवेदनशील असतो. या भागाचे वाईट शक्तींपासून रक्षण होण्यासाठी भांगात सिंदूर भरला जातो.* *🔹सिंदुरापेक्षा कुंकवाचा वापर करणे अधिक योग्य.* *कुंकवातील मारक तत्त्वामुळे स्त्रीच्या सूक्ष्मदेहाचे वाईट शक्तींच्या आक्रमणांपासून संरक्षण होते आणि कुंकवातील चैतन्यामुळे तिचा सूक्ष्मदेह सात्त्विकता ग्रहण करतो. त्यामुळे त्याची शुद्धी होण्यास साहाय्य होते. सिंदुरामध्ये कुंकवाच्या तुलनेत मारक तत्त्व अल्प प्रमाणात असते; त्यामुळे सिंदुरापेक्षा कुंकवाचा वापर करणे अधिक योग्य आहे.* ❄❄❄❄❄🏵️❄❄❄❄❄ [1/15, 8:30 PM] Sangale Samadhan: पायाभरणी बांधकाम पायाभरणीत टाकावयाच्या वस्तू 1) नारळ, नारळाचे साल काढून शेंडी ठेवा, श्री सुक्त, एकवेळा ,वल्गला सुक्त एक वेळ, कालभैरव अष्टक एक वेळ वाचुन नारळ मध्यावर बुजवून ठेवा , 2) एक रुपयाचे काँइन्स घेऊन (९) त्यावर कालभैरव अष्टक वाचुन ते पुर्ण ल्पाँटवर आठ बाजु आणि मध्यभागी ठेवावे. 3) रक्षाकवच - रक्षा पाडुन त्या रक्षेवर स्वामीमंत्र अर्धातास करावा. आणि ती रक्षा पुर्ण ल्पाँटवर आणि सिंमेट मध्ये कालवावी , 4)दरवाजा (मुख्य)चौकट खाली शनिचे दान ठेवावे .काळ्या कपड्यात घोड्याची नाल, खिळा, काजळ डबी, गोकर्णाच्या बिया, कींवा निळे फुल. ऊडीद, काळे मीठ, बांधून चौकट ठेवण्या अगोदर खाली ठेवावे. 5) कुदळ टाकते वेळ भटजींनी दीलेल्या दगडावर भुसुक्त वाचावे आणि तो दगड वास्तूच्या मध्यावर बुजवून ठेवा टीप - वरील सर्व स्तोत्र आणि सुक्त नित्यसेवा ह्या पुस्तकात आहे ‼️श्री स्वामी समर्थ ‼️ ✍️ सौ ज्योतीताई यशवंतराव दुसाने पाचोरा जि जळगांव महाराष्ट्र साईपार्क वय वर्षे 56.🖋 [1/15, 8:30 PM] Sangale Samadhan: स्वभाव (चांगला आणि जालिम) श्री स्वामी समर्थ स्वभाव कसा असावा हा विषय नाही. पण कसा आहे आणि जोडीदाराचे वागणे कसे आहे, समोरच्या व्यक्तीला काय त्रास होतो हा विषय आहे. कुणाचा स्वभाव फार भोळा असतो, व्यक्ती ओळख लवकर होत नाही. आणि ओळख होते तेव्हा खूप वेळ निघून गेलेली असते. तर कुणाचा स्वभाव फार चंचल असतो. विषेशता आपली चुक कबुल न करणे. चोरावर मोर होने. चोराच्या उलट्या बोंबा असन. कामचोर असुन समोरच्या व्यक्तीच्या कष्टाकडे दुर्लक्ष करणं. स्वतःमध्ये अवगुण असुन कुणाचे सत़गुण कबुल न करणं. कुणाचे कौतुक होतांना पहावले न जाने. कुणाच्या भोळे पणाचा फायदा घेणे आणि कामं झाले म्हणजे भाडंन उकरुन बाजुस होने. तसेच काही घरांमध्ये कुटुंबात प्रमुख एखादी व्यक्ती स्री कींवा पुरुष असतात, कुटुंब प्रमुख म्हटले की सत्ता हाती असते. काही महाभाग विचारु नये असे वागतात. सर्व काही कुलुपबंद, त्यात खाद्य पदार्थ ही, नवे कपडे, लोकरी कपडे, देण्याघेण्याचे कपडे. अगदी टुथपेस्ट आणि मंजन ही कुलुप पँक असते, काही घरामध्ये स्रिया, सुना यांना कुटुंब प्रमुखांना विचारले शिवाय साखर काढणेची ही परवानगी नसते .(हे खरं आहे की काटकसर करावी, उधलमानकी करु नये. पण हे असे कुढवर चांगले आहे) ....? मणुष्याला मणुष्यासारखे न वागवता पशु सारखे वागवतात. कुणास खूप भुक लागली तरी अगोदर जेवनाची परवानगी नसने, किंवा टोचुन बोलन. आजारी आहे अशक्त आहे तरी रोजचा पुर्ण रहाडा आवरणं. स्वतःसाठी काहीच खर्च मोजायचा नाही पण इतरांसाठी थोड जरी केले तरी बोलून दाखवणे. घरातील सुनां आणि स्रीयांना दुयम स्थान देण्यात काहीच कसर न ठेवणे. खोट बोलण्यामुळे इतरांना होणारा त्रास तर फार भयानक असतो. सर्रास तोडांवर ही खोट बोलणे. आता कुटुंब प्रमुख म्हटल की मान ही मोठाच असतो ते कींवा त्या कश्याही वागल्या तरी कुणी तोडांवर न बोलता निमुट सहन करणारा मणुष्य रोज असे होत राहील्यास याला कंटाळून दुर होण्याचा प्रयत्न करतात. कींवा जीवनात नैराश्याच्या गर्तेत अडकलेल्या एकांताचा अनुभव घेतात. उदाहरणार्थ - जेवत असताना हे सांगणार आज स्वयपांक केला नाही आणि जेवायला वाढले नाही. आता अशा वातावरणात गुदमरायला होते कबुल आहे पण नित्य मरे त्याला कोण रडे. शेवटी हे घर त्यांचेही असते, जरी ते कुटुंब प्रमुख नसले तरी त्यांनाही त्याच घरात रहायचे असते. शेवटी सवय करुन घ्यावी लागते बाकी सदस्यांना . काय करणार, कुठे जाणार, आपले दात आणि आपलेच ओठ असतात. बरं बाहेर कुणा जवळ बोलायची सवय आणि सोय नसते. अजुन बाहेरचे म्हमांजी कठीण असतात. बाहेर मंधरा, कैकयी, शकुनी, दुर्योधन, रावण, कंस अगदी सर्वच तयार बसलेले असतात .म्हणुन घरातले लोखंडाचे चणे घरातच दलायचे असतात. एक मात्र खरे की असे कुटुंब प्रमुख असनार्या घराचे सदस्य नक्कीच पुण्यशिल आणि सहनशील असतात. कारण दुखांचा आहेर तर वैकुंठ माहेर असते... ..! 🖋 सौ ज्योतीताई यशवंतराव दुसाने पाचोरा जि जळगांव महाराष्ट्र साईपार्क गिरनापंपिग रोड ✍️ [1/16, 9:24 AM] Sangale Samadhan: दिनांक: १२ /०१ /२०२१ *२६७. अभंग क्र. ८८* *सुख पाहतां जवापाडें ।* *दु:ख पर्वता एवढें ।।१।।* *धरीं धरीं आठवण ।* *मानी संतांचे वचन ।।धृ।।* *नेलें रात्रीनें तें अर्धें ।* *बाळपण जराव्याधें ।।३।।* *तुका म्हणे पुढा ।* *घाणा जुंती जसी मुढा ।।३।।* जीवनात सुख शोधायला गेलो तर ते जवाच्या दाण्याइतकं छोटसं असतं. पण दु:ख मात्र एखाद्या पर्वतासारखं मोठं असतं. म्हणून संतांच्या वचनाची, संतांच्या उपदेशाची सतत आठवण ठेव, संतांचा उपदेश ऐक. अर्ध आयुष्य तर रात्र घेऊन जाते, बाळपण, जरा म्हणजे म्हातारपण आणि विविध व्याधींमध्ये बरचसं आयुष्य खर्च होतं. तुकाराम महाराज म्हणतात, "अशा वागण्याने अशा वागण्याने घाण्याला जुंपलेल्या बैलासारखा संसाराचा गाड्याला जुंपला जाशील." जगद्गुरू तुकाराम महाराजांना अवघं चाळीस-एक्केचाळीस वर्षांचं आयुष्य लाभलं. इ. स. १६०८ मध्ये तुकाराम महाराजांचा जन्म झाला आणि इ. स. १६४९ मध्ये तुकाराम महाराज हा इहलोक सोडून गेले. *सांसारिक आयुष्य एक्केचाळीस वर्षांचं लाभलं तरी खऱ्या अर्थाने ज्याला सामाजिक आयुष्य म्हणतात ते फक्त एकोणीस-वीस वर्षांचंच होतं. या अल्प आयुष्यात तुकाराम महाराजांनी हजारो अभंग रचले, सांसारिक सुखदुःखं अनुभवली आणि सामाजिक सुखदुःखांवरही भाष्य केलं. समाजाच्या हाडीमांसी रुजलेल्या जुनाट रुढी, परंपरा, अंधश्रद्धा, देवाधर्माच्या नावावर माजवण्यात आलेलं कर्मकांड आणि होत असलेलं शोषण, जन्माधिष्ठीत उच्चनीचता, स्त्रीया आणि शूद्रातीशूद्रांची गुलामगिरी याविरोधात संघर्ष केला. अस्मानी, सुलतानी आणि धार्मिक अत्याचारांमुळे बहुजन समाज अतिशय गतीहीन होऊन गेला होता. रसातळाला पोचला होता. त्यात जीव ओतण्याचं काम तुकाराम महाराजांनी केलं.* तसं तुकाराम महाराजांचं घराणं चांगलं तालेवार घराणं होतं. त्यांच्या घरात पिढीजात सावकारी होती. शेती होती. बागायत होती. किराणा दुकान होतं. व्यापार होता. पण निरभ्र आकाशात एकाएकी काळे ढग जमा व्हावेत आणि त्यांनी सर्व आकाशच व्यापून टाकावं तसं झालं. थोरला भाऊ सावजी आध्यात्मिक वृत्तीचा होता. त्याच्या पत्नीचं निधन झालं. पत्नीच्या निधनानंतर सावजी एक दिवस कोणालाही न सांगता घर सोडून निघून गेला. त्याने संन्यास घेतला असं सांगितलं जातं. सुनेचा मृत्यू आणि मुलाचं घर सोडून जाणं यामुळे बोल्होबा, तुकाराम महाराजांचे वडील, खचले. त्यामुळे संसाराचा भार आला फक्त बारा वर्षांच्या तुकारामांवर ! तो त्यांनी यशस्वीपणे पेललाही. तुकाराम महाराजांचं लग्न झालं. त्यांना एक मुलगाही झाला. पण पत्नी सतत आजारीच असायची. म्हणून बोल्होबांनी तुकाराम महाराजांचं दुसरं लग्न पुण्याच्या गुळवे सावकाराच्या मुलीशी करुन दिलं. जरा बरे दिवस आले तोच पुन्हा महाभयंकर दुष्काळ पडला. सतत तीन वर्षांच्या दुष्काळाने सामान्य लोकांची स्थिती त्राही माम्, त्राही माम् अशी झाली. अन्न नाही, पाणी नाही. लोकांनी झाडाचा पाला पोटात भरला. कित्येक लोक अन्न अन्न करत मेले. कित्येकांनी पोटचे गोळे बाजारात विकले. पशूपक्षी किती मेले त्याची तर गणतीच नाही. तुकाराम महाराजांच्या पहिल्या पत्नीचा आणि मुलाचा याच दरम्यान मृत्यू झाला. पाठोपाठ वडिल गेले. आईही गेली. संकटं येतात तेंव्हा एकटी येत नाही म्हणतात. सुखाचे काही क्षण मिळत नाही तोच दु:खाचे पहाड अंगावर कोसळावेत असं आयुष्य सुरु होतं. "सुख पाहता जवापाडे । दु:ख पर्वता एवढे ।।" ही तुकाराम महाराजांची आत्मानुभूती होती. वैयक्तिक जीवनातली दु:खं माणूस सहन करु शकतो. पण दुष्काळाने सर्वांचीच दैना उडाली होती. आभाळच फाटलं होतं. सभोवतालची परिस्थिती पाहून उद्विग्न झालेले तुकाराम महाराज एके दिवशी घरातून बाहेर पडले ते पंधरा दिवस घरी परतलेच नाहीत. धाकटा भाऊ कान्होबा त्यांना इथे तिथे शोधत होता. पंधराव्या दिवशी त्याला ते भामनाथच्या डोंगरावर सापडले. कान्होबांनी त्यांची समजूत घालून त्यांना घराकडे चालवलं. वाटेत इंद्रायणी लागली. तुकाराम महाराज इंद्रायणीच्या काठावरच थांबले. कान्होबाला घरुन सर्व गहाणखतं आणायला सांगितली. आपल्या वाटेची सर्व गहाणखतं त्यांनी इंद्रायणीत सोडून दिली. मग ते घरी परतले. वैयक्तिक हितसंबंधांवर तुळशीपत्र ठेऊन स्वतः शोषण करणाऱ्या व्यवस्थेतून बाहेर पडले आणि मग समाजाचं शोषण करणाऱ्या व्यवस्थेविरोधात तुकाराम महाराजांनी रणशिंग फुंकलं. गुलामाला गुलामीतून मुक्त व्हायचं असलं तर सर्वात आधी त्याला आपल्या गुलामगिरीची जाणीव व्हावी लागते. तुकाराम महाराजांनी जनसामान्यांना ही जाणीव करुन द्यायला सुरुवात केली. आणि इथूनच एका नव्या संघर्षाला तोंड फुटलं. प्रस्थापित व्यवस्थेचे लाभार्थी तुकाराम महाराजांवर संतप्त झाले. त्यांनी सुरुवातीला तुकाराम महाराजांची अवहेलना केली, नंतर ते त्यांची चेष्टा करु लागले. त्यानंतर त्यांना तुकाराम महाराजांचा राग यायला लागला. ते कठोर शब्द वापरु लागले. तुकाराम महाराजांच्यावर धर्मपीठापुढे खटला भरण्यात आला. तुकाराम शूद्र असूनही त्यांच्या अभंगातून वेदांचा सार व्यक्त होतो. तुकाराम शूद्र असून ब्राह्मणांकडून पाया पडून घेतात, तुकाराम शूद्र असून स्वतःला गुरु म्हणवतात, असे आरोप त्यांच्या वर ठेवण्यात आले. शिक्षेपोटी त्यांचं घरदार जप्त करण्यात आलं. त्यांचे सर्व अभंग पाण्यात बुडवण्याची शिक्षा देण्यात आली. तुकाराम महाराजांना आपल्या हाताने आपले अभंग पाण्यात बुडवावे लागले. ही गोष्ट त्यांच्या मनाला फार लागली. त्यांनी अन्नपाणी सोडलं आणि त्या डोहाकाठीच धरणं धरलं. एकेक दिवस जात होता तसतशी त्यांच्याभोवताली गर्दी वाढतच गेली. तेरा दिवसांनी बुडालेले अभंग वर आले असं सांगतात. बुडालेले अभंग वर येऊच शकत नाहीत, पण आसपासच्या हजारोंच्या गर्दीच्या मुखाने आपले अभंग ऐकताना तुकाराम महाराजांच्या लक्षात आलं असावं की आपले अभंग जनमानसात रुजले आहेत, त्यांना आता कोणी नष्ट करु शकत नाही. चौदा दिवसांनी तुकाराम महाराजांनी उषोषण सोडलं आणि पुन्हा जोमाने हाती घेतलेलं कार्य सुरु केलं. एकदा देवळाभोवतीचा प्रदक्षिणा मार्ग मंबाजीने काटे टाकून बौद केला तेंव्हा तुकाराम महाराजांनी भक्तांना काटे टोचू नये म्हणून ते काटे काढून टाकले. मंबाजी इतका संतापला की त्याच काटेरी फांदीने त्याने तुकाराम महाराजांना रक्तबंबाळ होईतो मारहाण केली. एकदा लोहगावी एका स्त्रीने तुकाराम महाराजांच्या अंगावर उकळतं पाणी टाकलं. तुकाराम महाराजांच्या अनेक अभंगातून या छळांची वर्णनं येतात. *"कोपला पाटील गांवचे हे लोक । आता मज भीक कोण घाली ।।" पासून "लावूनि कोलित माझा करतील घात । सापडलो खोळेमधी ।।"* पर्यंतच्या अनेक अभंगांतून जगद्गुरू तुकाराम महाराज आपल्या छळाचा ताळेबंद मांडतात. या काळात तुकाराम महाराजांचा एक दिवसही असा गेला नाही की ज्या दिवशी त्यांना अपमान, अवहेलना वा मारहाण सहन करावी लागली नाही. *"रात्री दिवस आम्हा युद्धाचा प्रसंग ।"* अशा शब्दात तुकाराम महाराजांनी या संघर्ष काळाचं वर्णन केलं आहे. तुकाराम महाराज जेंव्हा म्हणतात, *"सुख पाहता जवापाडे । दु:ख पर्वता एवढे ।।"* तेंव्हा तो त्यांचा स्वतःचा अनुभव असतो. अशा जीवनात किती गुंतावं हे आपण ठरवायचं असतं. दुसऱ्या चरणात जगद्गुरू तुकाराम महाराज म्हणतात, *"धरीं धरीं आठवण ।* *मानी संतांचे वचन ।।धृ।।* जीवनात दु:ख फार आहे हे लक्षात ठेवा. आणि संतांचा उपदेश ध्यानी ठेऊन वागा. *चोरीमारी, व्यभिचार यापासून दूर रहा. परधन, परनारीपासून दूर रहा. स्वकष्टाने, उत्तम व्यवहारातून धन मिळवा आणि उदास मनाने खर्च करा. परोपकार करा. भूतमात्रांवर प्रेम करा.* तिसऱ्या चरणात तुकाराम महाराज सांगतात, *"*नेलें रात्रीनें तें अर्धें । बाळपण जराव्याधें ।।३।।* आयुष्य फार थोडं आहे. त्यातलं अर्ध तर झोपेतच जातं. बाळपण, म्हातारपण, आजारपाजारचे दिवस वजा केले तर शिल्लक किती रहातं ? म्हणून विचारपूर्वक जगा. पुण्याचा संचय करा. पापाचा संचय करु नका. शेवटच्या चरणात तुकाराम महाराज सांगतात, *"तुका म्हणे पुढा । घाणा जुंती जसी मुढा ।।३।।* घाण्याला जुंपलेला बैल गोल गोल फिरत रहातो. आपण फिरुन फिरुन त्याच जागेवर येतो आहे हे बैलाला कळत नाही. त्याच्या डोळ्यावर झापडं बांधलेली असतात. तसंच नुसतं वय वाढतं आहे पण प्रगती काहीच नाही, विकास नाही, बदल नाही, परिवर्तन नाही. सुधारणा नाही. आहे तसाच ठोंब्या आहे. पालथी घागर आहे. वरुन कितीही पाणी ओता, रिकामी ती रिकामीच रहाते. तसं तुमचं होऊ देऊ नका. त्याच त्याच चक्रात फिरत राहू नका. विचारपूर्वक जगा. सुखात उन्मत्त होऊ नका. दु:खात निराश होऊ नका. सर्व अनित्य आहे. सुखही कायमचं रहाणार नाही. दु:खही कायमचं रहाणार नाही. जे थोडं आयुष्य मिळालं ते सफल करा. यातच जीवनाचं साफल्य आहे. आज भारतातल्या अंधभक्तांची आणि जनतेची अवस्था घाण्याच्या बैलापेक्षा वाईट झाली आहे. घाण्याचा बैल गोल गोल फिरतो, फिरुन फिरुन एकाच जागी येतो. त्याची प्रगती नाही, पण निदान अधोगती तरी नाही. अंधभक्त स्वतःसह संपूर्ण देशाला पतनाच्या मार्गाने वेगाने घेऊन चालले आहेत. हिंसा, द्वेष अन्याय, अत्याचार यांना राजाश्रय लाभला आहे. देशाची अर्थव्यवस्था मोडून पडण्याच्या अंतीम टप्प्यावर उभी आहे. अतिशय थोड्या कालावधीत + ९ वरुन विकासाचा दर - २६ वर पोचला आहे. सामाजिक ऐक्य नष्ट करुन देश दुभंगवू पाहणाऱ्या शक्ती प्रबळ झालेल्या आहेत. अशा परिस्थितीत *आज आपला शिक्षित तरुण काय करत आहे ? शिक्षण-नोकरी-लग्न-संसार-पोरंबाळं-घरसंसार-म्हातारपण आणि शेवटी मरण ! प्राणी तरी यापेक्षा वेगळे काय जगतात ? उच्चशिक्षित, सुशिक्षित म्हणवणारे जर असे जनावरासारखंच जगत असतील तर मग शिक्षणाचा उपयोग काय? तरुणांनी केवळ पोटार्थी न होता, केवळ स्वतःचाच विचार न करता, समाजाचा, देशाचा विचार केला पाहिजे. समाजापुढे आज अनंत समस्या आहेत. बेरोजगारी, दारिद्र्य, कुपोषण, उपासमार, समाजात धुमसत असलेली हिंसा, स्त्रीयांवरचे अत्याचार, पूर्वास्पृश्यांवर होणारे अनाचार, भ्रष्टाचार, जातीयता, धर्मांधता, अंधश्रद्धा, बुवाबाबांचं फुटलेलं पेव, राजकारणात शिरलेले लबाड, ढोंगी, संधीसाधू, सतत ढासळत असलेली सामाजिक नैतिकता अशा अनेक क्षेत्रात करण्यासारखं युवकांना खूप काही आहे. स्वतःच्या आणि स्वतःच्या कुटुंबाच्या पलिकडे जाऊन समाजाच्या उत्थानासाठी, उद्धारासाठी आपली शक्ती आणि बुद्धी यांचा उपयोग करा. जन्माचं सार्थक करा असं तुकाराम महाराज या अभंगातून सांगत आहेत. तुकाराम महाराजांचा पांडुरंग या दीनदुबळ्या सामान्य रयतेत सामावलेला आहे. त्यांची सेवा म्हणजेच ईश्वराची सेवा !* *जगद्गुरूंचा उपदेश ध्यानी धरु तर हा भवसागर सुखरूप पार करु. आयुष्य सफल होईल. जीवनाचं सोनं होईल.* *जय जगद्गुरू !* - उल्हास पाटील *गाथा परिवार* gathaparivar.org 9975641677 [1/16, 9:56 AM] Sangale Samadhan: जय हरि माऊली! आज आपण "कालसर्प दोष" या विषयी माहिती घेणार आहोत. साधकांनो! मला बर्‍याच आपल्या समुहातील साधकांचे समस्या आल्या,येत आहे. त्या समस्या मध्ये प्रामुख्याने पितृदोष, कालसर्प दोष आढळून येत आहे. पितृदोषावर समुहावर बर्‍याच जाणकार सातत्याने माहीती देत आहे. त्यामुळे साधकांची पितृदोषावरची बरीच भीती कमी होत आहे,पण कालसर्प दोष आहे म्हणलं की बरेच साधक घाबरतात. कारण त्यांना कालसर्प दोष म्हणजे काय? तो कसा समजतो? त्यावर नेमका काय उपाय आहे? हेच माहीत नसते. मग कोणाकडून काहीतरी चुकीची माहिती मिळते व ते पार गोंधळून जातात. व निराश होतात. तसेच बर्‍याच साधकांनी मला कालसर्प दोषा संबंधित माहिती लेख टाकण्याची मागणी केली. याच कारणास्तव हा लेख प्रपंच! जन्मकुंडलीत कालसर्प दोष हा खूप काही भयंकर आहे, असे मानले जाते. मात्र, तसे नाही. कालसर्प दोष नसून तो एक योग आहे. कालसर्प योगाचा आपल्या जीवनावर काही थोड्याफार प्रमाणावर नकारात्मक प्रभाव आपल्यावर पडू शकतो. कालसर्प दोष/योग म्हणजे नक्की काय? त्याचे किती प्रकार आहेत? त्यावर परिणामकारक उपाय काय? .. ​ कुंडलीत सर्व ग्रह राहू व केतू यांच्या मध्ये येतात, तेव्हा कालसर्प योग येतो. त्यामुळे हा दोष नसून योग आहे. या योगात राहू सापाचे मुख व केतू शेपटी असतो. यामुळे भविष्यातील काही घटनांची पूर्वकल्पना मिळू शकते, असे सांगितले जाते. हा योग ज्यांच्या कुंडलीत येतो, ते अतिशय प्रतिकूल परिस्थितीतही उत्तम प्रकारे यश प्राप्त करू शकतात. अशा मंडळींना अचानक धनलाभ होतो; उच्चाधिकाराच्या जागा मिळतात. मात्र, उलटपक्षी हा योग तीव्र स्वरूपात असेल, तर दारिद्र्यही येते. खूप परीश्रम करून काहीही पदरात पडत नाही. कालसर्प योगाचे खालीलप्रमाणे प्रकार आहेत..... १) ​अनंत कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तीच्या पत्रिकेत राहू पहिल्या आणि केतू सातव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला अनंत कालसर्प योग म्हणतात. अशा व्यक्तींच्या वैवाहिक जीवनावर परिणाम होतात. विवाह योग लांबतात. मतभेद निर्माण होतात. नात्यात दुरावा निर्माण होऊ शकतो. पहिल्या घरातील राहूच्या अस्तित्वामुळे व्यक्तीला सतत संघर्ष करावा लागतो तर सातव्या घरातील केतुमुळे जोडीदारासोबत असमाधानकारक वातावरण राहते. २) ​कुळीक कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू दुसऱ्या आणि केतू आठव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला कुळिक कालसर्प योग म्हणतात. शैक्षणिक समस्या निर्माण होऊ शकतात. खाणे, पिणे, वाईट सवयी यांमुळे वारंवार आरोग्याच्या तक्रारी उद्भवू शकतात. अनेक रोग-व्याधी जडू शकतात. पत्रिकेतील द्वितीय स्थान हे धन-स्थान मानले जाते. या प्रकारच्या दोषामुळे माणसाला दारिद्र्य येऊ शकते. कुंडलीत कुलिक कालसर्प योगामुळे गंभीर अपघात होऊ शकतात. ३) ​वासुकी कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू तिसऱ्या आणि केतू नवव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला वासुकी कालसर्प योग असे म्हटले जाते. यामुळे माणसाच्या आयुष्यात अनेक आघाड्यांवर त्याला अडचणी येतात. प्रयत्नांना यश मिळत नाही. पैसे कमविण्यासाठी खूप मेहनत घ्यावी लागते. जन्मकुंडलीतील तिसरे घर हे व्यक्तीची मेहनत दर्शवते. तर नववे घर हे व्यक्तीचे नशीब आणि भाग्य दर्शवते. कुटुंबासाठी अनेक पातळ्यांवर झगडावे लागते. ४) ​पदम् कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तीच्या पत्रिकेत राहू पाचव्या घरात आणि केतू अकराव्या घरात असून इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला पदम कालसर्प योग म्हणतात. यामुळे शिक्षणाची समस्या, प्रेमसंबंध, प्रेम विवाह, आरोग्य आणि दैनिक उत्पन्नाशी संबंधित समस्या निर्माण होऊ शकतात, असे मानले जाते. विद्यार्थीच्या जन्म कुंडलीमध्ये हा योग असल्यास अभ्यासात खूप परिश्रम केल्यानंतरही त्यांना चांगले परिणाम मिळत नाहीत. ५) ​महापदम् कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तीच्या पत्रिकेत राहू सहाव्या आणि केतू बाराव्या घरात असून अन्य सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला महा पदम कालसर्प योग म्हणतात. यामुळे नोकरी, सेवा, हितशत्रूंचा त्रास, आरोग्य, अतिरिक्त खर्च, कमी उत्पन्न, सरकारी प्रशासन खात्यांकडून अडचणी यांसारख्या समस्या उद्भवू शकतात. आपल्याला जर अशा समस्यांशी संबंधित विषयांवर प्रश्न पडत असल्यास तज्ज्ञ व्यक्तीकडून आपल्या कुंडलीचे विश्लेषण केले पाहिजे. ६) ​शंकफळ कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू चौथ्या आणि केतू दहाव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील तर त्याला शंकफळ कालसर्प योग म्हणतात. याचा नकारात्मक प्रभाव बालपणी तीव्र प्रकारे दिसतो, असे सांगितले जाते. पत्रिकेलीत चतुर्थ स्थान हे बालपणीचा काळ दर्शवते. लहान वयात अनेक वाईट सवयी लागणे, शाळा बुडवणे तसेच वाईट मित्रांची संगत, अशा गोष्टींचा सामना करावा लागतो. यामुळे व्यवसाय धंद्यावर तसेच कामावर परिणाम होऊ शकतो. ७) ​तक्षक कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू सातव्या आणि केतू पहिल्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला तक्षक कालसर्प योग म्हणतात. यामुळे आयुष्यावर मोठे परिणाम होऊ शकतात. वैवाहिक जीवनात जोडीदारासोबतचे संबंध बिघडू शकतात. केतू प्रथम स्थानात असल्यामुळे आरोग्यावर परिणाम होतात. या योगात भागीदारीत धंदा करू नये. धंद्यात नुकसान होऊ शकते, असा सल्ला दिला जातो. यामुळे अनेक विरोधक निर्माण होतात. ८) ​कर्कोटक कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू आठव्या आणि केतू दुसऱ्या घरात असून इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला कर्कोटक कालसर्प योग म्हणतात. या योगामुळे आयुष्यातील प्रत्येक टप्प्यावर कमनशिबी असल्याचा भास होऊ शकतो. यामुळे वडिलोपार्जित संपत्तीचा लाभ घेता येत नाही, असे सांगितले जाते. या कालसर्प योगामुळे मित्र फसवतात. विवाह लांबतात. आरोग्याच्या तक्रारी वारंवार निर्माण होतात. ९) ​शंखनाद कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू नवव्या आणि केतू तिसऱ्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला शंखनाद कालसर्प योग, असे म्हटले जाते. अशा व्यक्तीस त्याच्या वडिलांकडून काही समस्या उद्भवू शकतात, असे सांगितले जाते. वडिलांकडून कोणताही पाठिंबा मिळत नाही. आर्थिक नुकसान, मित्रांकडून फसवणूक, आदी गोष्टींना सामोरे जावे लागू शकते. तसेच अगदी छोटी गोष्ट साध्य करण्यासाठी खूप कष्ट करावे लागतात, असे सांगितले जाते. १०) ​घातक कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू दहाव्या आणि केतू चौथ्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला घातक कालसर्प योग म्हणतात. यामुळे अशा व्यक्तींच्या जीवनात अनेक अडचणी येऊ शकतात. राहू दहाव्या घरात असल्यामुळे त्याला व्यावसायिक जीवनात अडचणी येऊ शकतात. सतत नोकरी तसेच व्यवसाय बदलत राहावे लागतात. आपल्या मातृभूमीपासून दूर राहण्याची वेळ येऊ शकते, असे सांगितले जाते. ११) ​विषधर कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू अकराव्या आणि केतू पाचव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला विषधर कालसर्प योग म्हणतात. या योगामुळे डोळे तसेच हृदयाचे विकार उद्भवू शकतात. लहान किंवा मोठ्या भावंडांशी असलेले संबंध बिघडतात. पैसा अत्यल्प प्रमाणात असतो. अभ्यासातील प्रगती खुंटते. अर्थार्जनासाठी घरापासून दूर राहावे लागते. आयुष्यात खूप संघर्षाला सामोरे जावे लागते. १२) ​​शेषनाग कालसर्प योग :- ज्या व्यक्तींच्या पत्रिकेत राहू बाराव्या आणि केतू सहाव्या घरात असून, इतर सर्व ग्रह या दोन ग्रहांच्या मध्ये आले असतील, तर त्याला शेषनाग कालसर्प योग, असे म्हटले जाते. हा योग असलेल्या व्यक्तींना सापाचे भय सतत सतावते. काहीही कारण नसताना कायदेशीर अडचणींना सामोरे जावे लागू शकते. आरोग्याच्या तक्रारी वारंवार उद्भवू शकतात. हा योग असलेल्या व्यक्तींना दोनदा विवाहाचे योग असू शकतात, असे सांगितले जाते. कुंडलीतील कालसर्प योगामुळे वारंवार वाईट स्वप्ने पडतात. स्वप्नात वारंवार साप दिसतात. यावर उपाय म्हणजे प्रतिदिन श्रीविष्णूंची उपासना केल्यास कालसर्प दोष दूर होऊ शकतो. याशिवाय गोमेद रत्न धारण करणे, नागकृती असलेली अंगठी चांदीत करून परिधान करणे, नागपंचमीचे व्रत करणे, राहू-केतूचे जप करणारी अनुष्ठाने करणे, असे काही उपाय केल्यास कालसर्प दोष दूर होण्यास मदत होऊ शकते. नाशिक येथील श्री क्षेत्र त्र्यंबकेश्वर येथे जाऊन पूजा-अनुष्ठान केले गेल्यास कालसर्प दोष दूर होतो. ज्या व्यक्तींना आपल्या कुंडलीत कालसर्प योग आहे, अशी शंका असल्यास ज्योतिषशास्त्रातील तज्ज्ञ व्यक्तींचा सल्ला घेऊनच उपाय करावा. टिप:- सदरील लेख आस्तिक लोकांसाठी असुन नास्तिक लोकांनी या लेखनाकडे दुर्लक्ष करावे अथवा मनोरंजन म्हणून पहावे पण समूहावर विनाकारण वादविवाद करु नये हि विनंती. ।।श्री स्वामी समर्थ।। स्वामी सेवक श्री मनोज देवा बालमटाकळीकर ९४२२८२६६९०

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हिच ती तिजोरी ज्या तिजोरीतुन सन १८७०-७१ च्या दुष्काळात देवमामलेदारांनी सरकारी खजिना बागलाण तालुक्यातील सर्व दुष्काळग्रस्त जनतेला वाटुन टाकला होता. त्या काळातील एक लाख सत्तावीस हजार रुपये म्हणजे आजच्या काळातले अब्जावधी रुपये होय आणि नंतर कलेक्टर च्या तपासणीत तो खजिना जसाच्या तसा भरुन आल्याचा दैवी चमत्कार घडला होता. त्यामूळे आजही ही तिजोरी सटाण्याच्या न्यायालयात ( कोर्टात ) जपुन ठेवलेली आहे. कोर्टाचे दैनंदिन कामकाज सुरु करण्यापूर्वी येथील अधिका-यांच्या हस्ते अगदी रोज न चुकता ह्या तिजोरीची पुजा अर्चा करुनच कोर्टाच्या कामकाजास सुरुवात केली जाते. देवमामलेदारांच्या स्मारक निर्मिती नंतर सदर तिजोरी भक्तांना दर्शनासाठी स्मारक परिसरात ठेवण्याचा देवमामलेदार देवस्थान ट्रस्ट चा मानस आहे. लवकरच राज्यपाल मा. भगतसिंग कोश्यारी यांच्या हस्ते स्मारकाचे भूमिपूजन झाल्यानंतर सटाण्यात एक आंतरराष्ट्रीय दर्जाचे भव्यदिव्य स्मारक उभे राहणार आहे. एखाद्या सरकारी अधिका-याच्या मंदीराबरोबरच भव्य स्मारक उभारणारे सटाणा हे जगातील एकमेव गाव असणार आहे. साहजिकच लाखो लोक हे स्मारक बघण्यासाठी येतील त्यामुळे देवमामलेदारांची पवित्र खुर्ची, तिजोरी, देवमामलेदारांच्या अंत्यविधी नंतर दुस-या दिवशी त्यांच्या राखेत मिळुन आलेली पंचमुखी पिंड (जी सध्या नाशिकच्या मंदिरात आहे) अशा अनेक वस्तु ज्या देवमामलेदारांच्या नित्य वापरातील होत्या आणि ज्या आजही बागलाणकरांनी सांभाळुन ठेवलेल्या आहेत अशा सर्व वस्तु त्या स्मारकात ठेवण्याचा देवमामलेदार देवस्थान ट्रस्ट चा मानस आहे... 🙏🏻🌸

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[1/11, 10:08 PM] Sangale Samadhan: कैसे की महादेव ने साहूकार की मदद, पढ़िएं सोमवार व्रत कथा एक समय की बात है, किसी नगर में एक साहूकार रहता था. उसके घर में धन की कोई कमी नहीं थी लेकिन उसकी कोई संतान नहीं थी इस कारण वह बहुत दुखी था. पुत्र प्राप्ति के लिए वह प्रत्येक सोमवार व्रत रखता था और पूरी श्रद्धा के साथ शिव मंदिर जाकर भगवान शिव और पार्वती जी की पूजा करता था. उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न हो गईं और भगवान शिव से उस साहूकार की मनोकामना पूर्ण करने का आग्रह किया. पार्वती जी की इच्छा सुनकर भगवान शिव ने कहा कि 'हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है.' लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति का मान रखने के लिए उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा जताई. माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन साथ ही यह भी कहा कि उसके बालक की आयु केवल बारह वर्ष होगी. माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था. उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख. वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा. कुछ समय के बाद साहूकार के घर एक पुत्र का जन्म हुआ. जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया. साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन दिया और कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ और मार्ग में यज्ञ कराना. जहां भी यज्ञ कराओ वहां ब्राह्मणों को भोजन कराते और दक्षिणा देते हुए जाना. दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी की ओर चल पड़े. रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था. लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था. राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए एक चाल सोची. साहूकार के पुत्र को देखकर उसके मन में एक विचार आया. उसने सोचा क्यों न इस लड़के को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं. विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा. लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह कर दिया गया. लेकिन साहूकार का पुत्र ईमानदार था. उसे यह बात न्यायसंगत नहीं लगी. उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुन्नी के पल्ले पर लिखा कि 'तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है. मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं.' जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई. राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया जिससे बारात वापस चली गई. दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया. जिस दिन लड़के की आयु 12 साल की हुई उसी दिन यज्ञ रखा गया. लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है. मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर सो जाओ. शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए. मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप शुरू किया. संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे. पार्वती ने भगवान से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा. आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें. जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया. अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है. लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे. माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया. शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया. शिक्षा समाप्त करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर चल दिया. दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था. उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया. उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया. इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे. उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए. उसी रात भगवान शिव ने व्यापारी के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है. इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. [1/11, 10:57 PM] Sangale Samadhan: जय हरि माऊली! आज आपण आपल्या जन्म पत्रिकेतील "गण" या विषयी माहिती घेणार आहोत. ज्योतिषशास्त्रानुसार विवाह जुळवतांना गुण मिलनाची पारंपारिक पद्घत आहे. वधु वरांचे ३६ गुण मिळाले तर ते अती शुभ मानतात. ३६ गुण वेगवेगळ्या गोष्टीवर दिले जातात. त्यातील 'गण' या संज्ञेला ६ गुण आहेत. त्यावरुनच गणाचे महत्त्व आपल्या लक्षात येईल. गणांचे तीन प्रकार आहेत. १) देवगण २) मनुष्यगण ३) राक्षसगण जातकाच्या जन्माच्या वेळी चंद्र ज्या नक्षत्रामध्ये असेल त्या नक्षत्राला जो गण दिलेला असतो, तो गण ज्योतिषशास्त्रानुसार त्या जातकाचा असतो. आधी आपण गण म्हणजे काय? हे लक्षात घेऊ. गणाचा संबंध मानवी स्वभाव आणि चारित्र्याशी येतो. हाताची पाचही बोटं सारखी नसतात. त्यामुळे प्रत्येक व्यक्तीसुद्घा सारखी असूच शकत नाही. 'व्यक्ती तितक्या प्रवृत्ती असतात' असं म्हटलं जातं ते विनाकारण नाही. प्रत्येक व्यक्तीचा स्वभाव हा वेगळा असतो. व्यक्तीचं हे वेगळेपण अधोरेखित करतो तो 'गण' होय. साधारणतः समाजामध्ये असे चित्र रंगविले गेले आहे, की नवरा-बायकोमध्ये काहीच भांडण नसतं. खरं भांडण असतं ते दोन्हीकडच्या घरातील सदस्यांमध्ये! त्यांचं आपसात जमत नाही, त्याचा परिणाम नवरा-बायोकाच्या संबंधावर, सांसारीक आयुष्यावर होतो. मतभेद हळू हळू वाढत जाऊन मनभेदांपर्यंत गोष्ट जावून पोहचते. हे अगदी खरं असलं तरी अनेक घरांमध्ये बाकीच्या सगळ्यांचं जमतं. फक्त नवरा-बायकोचं जमत नाही. त्यांच्यामध्ये सतत भांडणे होत राहतात. अगदी शुल्लक कारणांवरुन मोठी मोठी भांडणे होतात. नवरा म्हणतो, ''हिला मी माझ्या घरात ठेवणार नाही'' आणि दुसरीकडे बायको म्हणते, ''मी या घरात राहणार नाही.'' दोघांची तोंडे विरुद्घ दिशेला होतात. कोणीच नमतं घ्यायला, माघार घ्यायला तयार नसतं. बायको माहेरी निघुन जाते. मग दोन्हीकडची मंडळी काळजीत पडलेली असतात. अशा परिस्थितीत जर दोन्हीकडच्या परिवारातील मंडळी वैचारिकदृष्ट्या परिपक्व व समजूतदार असतील तर ते दोघांमध्ये मध्यस्ती घडवून आणतात आणि समजूतदार नसतील तर मग दोघं परिवारांमध्येही भांडण सुरु होतं. अशा जोडप्यांना काही दिवसांनंतर एकत्र आणलं जातं. त्यांची समजूत काढली जाते. मोठी लोक एकत्र बसून त्यांना समजूतीच्या चार गोष्टी सांगतात. त्यांचे मतभेद दूर करतात. त्यांच्या समस्या जाणून घेतात. त्यावर उपायोजना सांगतात. काही घटनांमध्ये नवरा-बायकोपैकी एकाला उपरती होते. त्यामुळे ते स्वतः याकामी पुढाकार घेतात. मग पुन्हा नव्याने संसाराला सुरुवात होते. काही दिवस, महिने व्यवस्थित सुरळीत सुरु राहतं. मात्र पुन्हा कुठल्यातरी कारणावरुन बिनसतं आणि पुन्हा वाद सुरु होतात. अशी अनेक जोडपी असतात.त्याच्यांतील असलेल्या वादाची कारणे ऐकूण तर कधी कधी हसायला येतं. वाटतं, की कशी लोक आहेत, हि एवढ्या कारणावरुन कोणी लहानमुलांसारखं भांडतं का? मात्र ज्योतिषशास्त्राचे अभ्यासक किंवा समुपदेशक असं म्हणू शकत नाही. कारण त्यांना त्यामागचं कारणही माहिती असतं. बहुतेकवेळी यामागचं कारण हे 'गण' असतं. गणांवरुन व्यक्तीचा स्वभाव ठरत असतो. त्यामुळे त्याचे संपूर्ण व्यक्तिमत्वही गणांवरुनच ठरते. गणांचे स्वभाव एका शब्दात जाणून घ्यायचे झाले तर व्यक्तीचा स्वभाव हा सात्विक असेल तर त्या वक्तीचा गण हा देवगण असतो. राजस स्वभावाचा व्यक्ती हा मनुष्यगणाचा असतो. तामस स्वभावाचा व्यक्ती हा साहजिकच राक्षसगणाचा असतो. गणांचा हा स्वभाव गुण लक्षात घेतला तर विवाहामध्ये गुणमिलन करतांना गणांचे मिलन होणे किती गरजेचे आहे, हे लक्षात येते. तीन गणांपैकी व्यक्ती कोणत्या गणाची आहे? हे बघुन समान गुण असल्यास गुणमिलनाचा एक भाग जुळला असे समजावे. आता या गणांविषयी आपण सविस्तररीत्या जाणून घेऊया. १)देवगण :- नक्षत्रे - अश्विनी, मृग, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, स्वाती, अनुराधा, श्रवण, रेवती आदी नक्षत्रांमध्ये जन्मलेल्या व्यक्तींचा गण हा देवगण असतो. देवगणाची स्वभाव वैशिष्ट्ये :- देवगण असलेल्या व्यक्तींचा स्वभाव हा सात्विक असतो. ते अतिशय शांत, समंजस, संयमीत, समजुतदार प्रवृत्तीचे असतात. देवगण असलेले व्यक्ती दानशूर, उदारमतवादी, तल्लख बुद्घीचे तर असतातच, त्या सोबत ते स्वतःपेक्षा समोरच्याचा विचार करणारे असतात. म्हणजे त्यांच्यामध्ये स्वार्थीपणा थोडा कमी असतो. त्यामुळे त्यांचा जोडीदार हा वाद न घालणारच असावा. उदारमतवादी असल्याने कुणाकडून चूक झाली असेल तर ती मोठ्या मनाने माफ करण्याचा सद्‌गुण देवगण व्यक्तींमध्ये असतो. देवगण असलेल्या व्यक्तीचा विवाह जर राक्षसगण असलेल्या व्यक्तीशी झाला तर त्यांचा हा शांततावाद राक्षसगणाच्या जोडीदारास घाबरटपणा वाटु शकतो. परिणामी एकमेकांबद्दल अत्यावश्यक असणारा आदर कमी होतो. त्याचा परिणाम संसारावरही होतो. २) मनुष्यगण :- नक्षत्रे - भरणी, रोहिणी, आद्रा, पूर्वाफाल्गुणी, उत्तराफाल्गुणी, पूर्वाषाढा, उत्तराषाढा, पूर्वभाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद आदी नक्षत्रांमध्ये जन्मलेल्या व्यक्तींचा गण हा मनुष्यगण असतो. मनुष्यगणाची स्वभाव वैशिष्ट्ये :- मनुष्यगण असलेली व्यक्ती हि राजस स्वभावाची असते. ते चांगल्याशी चांगले, वाईटाशी वाईट म्हणजे जशास तसे वागणारे असतात. या स्वभाव वैशिष्ट्यांमुळे सहसा या व्यक्ती सहसा समोरील व्यक्तीला स्वतःहून त्रास देत नाहीत. त्यामुळे मनुष्यगणापासून कोणाला त्रास होईल ही अपेक्षा करता येत नाही. मात्र मनुष्यगणाची व्यक्ती कोणाचा त्रास सहनही करीत नाहीत. बोलघेवडेपणा यांच्यात अजिबात नसतो. त्यामुळे आपणहून कुणाशी बोलायला, ओळख करुन घ्यायला त्यांना आवडत नाही. एकदा ओळख झाल्यानंतर मात्र ते मैत्रीला कधीही विसरत नाही. त्यामुळे मैत्री करण्यासाठी मनुष्यगण असलेल्या व्यक्ती सर्वोत्तम असतात, असे म्हणायला हरकत नाही. आपल्या स्वभाव वैशिष्ट्यांमुळे मनुष्यगणाच्या व्यक्ती आर्थिक परिस्थितीसह मनानेही श्रीमंत असतात. त्यामुळे त्यांना समाजात अधिक मानसन्मान असतो. स्वभावाने अतिशय सात्विक, सोज्ज्वळ अशी प्रतिमा असल्याने समाजातील कोणा दोघांमध्ये मतभेद भांडण झाल्यास मध्यस्थसाठी यांची आवर्जुन मदत घेतली जाते. मनुष्य गणाची सगळ्यात कमकुवत बाजू म्हणजे याच गणाच्या व्यक्तीस भुत,पिशाच्च व आत्मे पाहण्याची दैवीदृष्टी प्राप्त असते. या गणाच्या व्यक्तीस करणी बाधा लवकर बाधते. म्हणून या गणांच्या व्यक्तीने करणी बाधा करणाऱ्या लोकांपासून चार हात दुर रहावे. यांनी त्यांच्याशी न दोस्ती वा दुष्मनी करु नये. ३) राक्षसगण :- नक्षत्रे - कृतिका, अश्लेषा, मघा, चित्रा, विशाखा, जेष्ठा, मूल, धनिष्ठा, शततारका आदी नक्षत्रांमध्ये जन्मलेल्या व्यक्तींचा गण हा राक्षसगण असतो. राक्षसगणाची स्वभाव वैशिष्ट्ये :- पत्रिकेत राक्षासगण असल्यास समोरील व्यक्तीसुद्घा राक्षसगणाची असल्यास जास्त अनुरुपता येते किंवा तेच योग्य मानले जाते. साधारणतः राक्षसगण हे नाव ऐकल्याबरोबर भिती वाटणे हा मनुष्य स्वभाव आहे आणि ते स्वतःच्या बाबतीत असेल तर मग विचारायलाच नको. त्यामुळे राक्षसगणाच्या बाबतीत अनेक गैरसमज पसरलेले आहेत. मात्र त्यात भिती वाटण्यासारखं काहीच नसतं हेही तितकेच सत्य आहे. राक्षसगणाचे लोक हे साहसी आणि प्रबळ इच्छाशक्ती असलेले असतात. त्यामुळे प्रतिकूल परिस्थितीत ताकदीने उभे राहण्याची जिद्द त्यांच्यामध्ये ठासून ठासून भरलेली असते. राक्षसगण व्यक्ती ची अतिद्रिय शक्ती अतिशय मजबूत असल्याने यांना विपरीत घडणा-या घटनेची जाणीव फार लवकर होते. त्यामुळे समयसूचकता या व्यक्तींमध्ये असते. किंबहूना हे लोक सदैव दक्ष असतात आणि येणा-या प्रत्येक गोष्टीचा धाडसाने सामना करतात, असे म्हटल्यास वावगे ठरणार नाही. राक्षसगणाच्या मुलींना धडाकेबाज मुलं आवडतात. आपला जोडीदारही आपल्यासारखाच हवा असं त्यांना वाटतं. त्यामुळे नमतं घेणारा जोडीदार त्यांना नेभळट वाटतो. राक्षसगणाच्या व्यक्ती तापट, तामसी, आपल्या जोडीदारावर स्वामित्व गाजविणा-या असतात. आपलं तेच खरं अशी प्रवृत्ती त्यांची असल्याने ते आपलाच हेका पुरविणारे असतात. त्यामुळे विवाहासाठी गुणमिलन करतांना समान गण असणारे दोघं एकत्र येणं कधीही चांगलं असतं. तिघंही गुणांची गुणवैशिष्ट्ये आपण बघितली. आता गुणमिलन करीत असतांना ज्योतिषशास्त्रानुसार यांना गुण कसे दिले जातात, हेसुद्घा आपण जाणून घेऊया. जर वर आणि वधु दोघेही देवगणाचे, मनुष्यगणाचे, राक्षणगणाचे असतील तर ते सर्वोत्तम मानलं जातं. तेव्हा त्यांना ६ पैकी ६ गुण दिले जातात. जर वराचा गण देव व वधुचा गण मनुष्य असेल तर त्यालाही उत्तम मानुन ६ पैकी ६ गुण दिले जातात. जर वराचा गण मनुष्य आणि वधुचा गण देव असेल तर अशा गुणमिलनाला सामान्य माणुन ६ पैकी ५ गुण दिले जातात. जर वराचा गण देव आणि वधुचा गण राक्षस असेल ज्योतिषशास्त्रानुसार हे गुणमिलन होत नाही. अशा व्यक्तींचा विवाह करणे योग्य नसते. त्यांना ६ पैकी फक्त १ गुण दिला जातो. यातही वराचा गण मनुष्य व वधुचा गण राक्षस असेल तर ज्योतिषशास्त्रानुसार हे गुणमिलनही जमत नाही. अशा व्यक्तींनीही विवाह करणे योग्य नसते. त्यांना ६ पैकी ० गुण दिले जातात. हे गणांचे गुणमिलन जरी योग्य असले तरी विवाहासाठी पत्रिका जुळवित असतांना फक्त गणांचे गुण जुळत नाही म्हणून विवाह तोडता येत नाही. त्यामुळे फक्त गणांच्या गुणांवरुन कुठल्याच निष्कर्षापर्यंत पोहचू नये. ज्योतिषशास्त्र हे फार गहन शास्त्र आहे. त्यामध्ये कुठलीच गोष्ट ही ढोबळमानाने सांगितलेली नाही, तर प्रत्येक गोष्टीत गहन असा कार्यकारण भाव दडलेला आहे. विवाहासाठी पत्रिका जुळवित असतांना फारच मोठा ग्रहदोष असेल तरच विवाह करण्यास मनाई केली जाते. जेणे करुन विवाह झाल्यानंतर कुठली गंभीर समस्या उत्पन्न व्हायला नको. कधी कधी असेही बर्‍याच पाहण्यात आले की ज्यांच्या पत्रिके मध्ये गणांचे गुणमिलन होत नसतांनाही नवरा-बायकोचे सांसारीक आयुष्य अतिशय आनंदात व्यतीत होत आहे. मात्र विवाहासाठी गुणमिलन करीत असतांना गणांच्या गुणमिलनाला अजिबात महत्त्व नाही असा याचा अर्थ अजिबात होत नाही. गणांचे गुणमिलन झालेले नसतांनाही काही जणांना त्याचा त्रास होत नाही. कारण त्याव्यतीरीक्त त्यांच्या पत्रिकेमध्ये विवाहासाठी अनेक शुभ योग जुळून आलेले असतात. त्यामुळे त्यांच्या पत्रिकेमधून गणदोषांचा प्रभाव नाहीसा झालेला असतो. म्हणून गणदोष असेल तरी सरळ विवाह तोडण्याचा प्रयत्न करु नये. पत्रिकेतील दुस-या गोष्टींविषयी अधिक माहिती जाणून घ्यावी.याशिवाय महत्त्वाची गोष्ट अशी, की कित्येकदा पत्रिकेतील गणदोषांचे निवारण ज्योतिषशास्त्रात सांगितलेल्या उपायांवरुन केले जाऊ शकते. म्हणून विवाह जुळवितांना योग्य व तज्ञ ज्योतिष जाणकाराचा सल्ला घ्यावा. टिप :- सदरील लेख आस्तिक लोकांसाठी असुन नास्तिक लोकांनी या लेखनाकडे दुर्लक्ष करावे अथवा मनोरंजन म्हणून पहावे पण समूहावर वादविवाद करु नये हि विनंती. ।।श्री स्वामी समर्थ।। श्री मनोज देवा बालमटाकळीकर ९४२२८२६६९०

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रविवार पुर्वापार पासुन भैरवनाथ खंडेराव आणि सूर्यनारायण यांचे सेवेसाठी आपल्या ऋषीमुनींनी योजुन दीलेला आहे. सुर्यनारायणाची सेवा, (सुर्याला जल अर्पण करावे, सुर्य नमस्कार घालावे सुर्यनारायणाची स्तुती म्हणावी. ज्या जातकांना सुर्यनारायणाचे बल कमी पडत असेल त्यांनी लाल दान - मसुर, गुळ, गहु, तांबे, लाल वस्र गणपती मंदिरात दान केल्याने सूर्य बल प्राप्त होते) भैरवनाथाची सेवा (कालभैरव अष्टक म्हणावे ज्या जातकांना बाँसगीरी, वैरभाव, जुने येने वसुल न होने (ते वसुल करणे साठी) एक रूपयाच्या शिक्यावर कालभैरव अष्टक म्हणावे आणि तो शिक्का तुलसी कुडांत कींवा तुलसी खालच्या मातीत खोलवर बुजवुन ठेवावा.ज्या जातकांना बाहेरची बाधा आणि सर्प दंश झाला असेल त्यांना भैरवनाथ महारांजा जवळ सव्वा महीना ठेवतात बाधा दुर होते. नैवेद्य - शेंगदाणे चटणी आणि भाकरी हा नैवेद्य तसेच गव्हाच्या जाड पिठाची बट्टी आणि वांग्याची भाजी, गुळ, हा नैवेद्य भैरवनाथ महाराजांना देतात खंडेराव महाराज - आपले सर्वाचे कुलदैवत श्री खंडेराव महाराज आहेत यांचे मंदीर प्रत्येक गावात आहे म्हालसाई आणि बाणाई ह्या दोन पत्नीसह त्यांची मुर्तीचा टाक आपल्या देव्हार्यात असतो. त्यांचे मूळ ठिकाण जेजुरी येथे आहे .घोडा आणि कुत्रा हे पशु त्यांचे सानिध्यात असतात. शीघ्र फलदायी अशी त्यांची सेवा असते. चंपाशष्टीला आपण त्यांची तलीआरती करतो. लग्नविधी आगोदर रवीवार पाहुन आपण अष्टवर त्यांचे नावे जेवु घालतो आणि नंतरच लग्नाचे इतर विधी करतो .नैवेद्य - गुल आणि बट्टीचा चुर्मा लाडु, तसेच भरीत आणि भाकरी 🙏🌹खंडेराव महाराज की जय, भैरवनाथ महाराज की जय, सुर्यनारायण महाराज की जय 🌹🙏 🙏🌹शुभ रविवार 🌹🙏!!श्री स्वामी समर्थ! !🙏 🙏 ✍️ सौ ज्योतीताई यशवंतराव दुसाने, पाचोरा पती - यशवंतराव पंडीतराव दुसाने - स्टँपवेंडर, पाचोरा तहसिल पुत्र भुवनेश यशवंतराव दुसाने - पत्रकार ,पाचोरा पुत्र नागेश यशवंतराव दुसाने - स्टँपवेंडर ,पाचोरा

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