. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 070 भगवत्-भजन में बाधक भाव भगवन्नाम सभी प्रकार के सुखों को देने वाला है। इसमें अधिकारी-अनधिकारी का कोई भी भेद-भाव नहीं। सभी वर्ण के, सभी जाति के, सभी प्रकार के स्त्री-पुरुष भगवन्नाम का सहारा लेकर भगवान के पाद्पद्मों तक पहुँच सकतें हैं। देख, काल, स्थान, विधि तथा पात्रापात्र का भगवन्नाम में कोई नियम नहीं। सभी देशों में, सभी समय में, सभी स्थानों में शुद्ध-अशुद्ध कैसी भी अवस्था में हो, चाहे भले ही जप करने वाला बड़ा भारी दुराचारी ही क्यों न हो, भगवन्नाम में इन बातों का भेदभाव नहीं। नाम-जप तो सभी को, सभी अवस्‍थाओं में कल्याणकारी ही है। फिर भी भगवन्नाम में दस बड़े भारी अपराध बताये गये हैं। पूर्वजन्‍मों के शुभकर्मों से, महात्माओं के सत्संग से अथवा भगवत्कृपा से जिसकी भगवन्नाम में निष्ठा जग गयी हो, उसे बड़ी सावधानी के साथ इन दस अपराधों से बचे रहना चाहिये। महाप्रभु अपने सभी भक्तों को नामापराध से बचे रहने का सदा उपदेश करते रहते थे। वे भक्तों की सदा देख-रेख रखते। किसी भी भक्त को किसी की निंदा करते देखते, तभी उसे सचेत करके कहने लगते- ‘देखो, तुम भूल कर रहे हो। भगवद्भजन में दूसरों की निंदा करना तथा भक्तों के प्रति द्वेष के भाव रखना महान पाप है। जो अभक्त हैं, उनकी उपेक्षा करो, उनके संबंध में कुछ सोचो ही नहीं। उनसे अपना संबंध ही मत रखो और जो भगवद्भक्त हैं, उनकी चरण-रज को सदा अपने सिर का आभूषण समझो। उसे अपने शरीर का सुंदर सुगन्धित अंगराग समझकर सदा भक्तिपूर्वक शरीर में मला करो।’ इसीलिये प्रभु के भक्तों में आपस में बड़ा ही भारी स्नेह था। भक्त एक-दूसरे को देखते ही आपस में लिपट जाते। कोई किसी के पैरों को ही पकड़ लेता, कोई किसी की चरण-धूलि को ही अपने मस्तक पर मलने लगता और कोई भक्त को दूर से ही देखकर धूलि में लोटकर साष्टांग प्रणाम ही करने लगता। भक्तों की शिक्षा के निमित्त वे भगवन्नामापराध की बड़ी भारी भर्त्सना करते और जब तक जिसके समीप वह अपराध हुआ है, उसके समीप क्षमा न करा लेते तब तक उस अपराधी के अपराध को क्षमा हुआ ही नहीं समझते थे। गोपाल चापाल ने श्रीवास पण्डित का अपराध किया था, इसी कारण उसके सम्पूर्ण शरीर मे गलित कुष्ठ हो गया था, वह अपने दु:ख से दु:खी होकर प्रभु ने शरणापन्न हुआ और अपने अपराध को स्वीकार करते हुए उसने क्षमा-याचना के लिये प्रार्थना की। प्रभु ने स्पष्ट कह दिया- ‘इसकी एक ही ओषधि है, जिन श्रीवास पण्डित का तुमने अपराध किया है, उन्हीं के चरणोदक को पान करो तो तुम्हारा अपराध क्षमा हो सकता है। मुझमें वैष्णवापराधी को क्षमा करने की सामर्थ्य नहीं है।’ गोपाल चापाल ने ऐसा ही किया। श्रीवास के चरणोदक को निष्कपट भाव से प्रेमपूर्वक पीने ही से उसका कुष्ठ चला गया। नामापराधी चाहे कोई भी हो प्रभु उसी को यथोचित दण्ड देते और अधिकारी हुआ तो उसका प्रायश्चित्त भी बताते थे। यहाँ तक कि अपनी श्रीशची देवी के अपराध को भी उन्होंने क्षमा नहीं किया और जब तक जिनका अपराध हुआ था, उनसे क्षमा नहीं करा ली तब तक उन पर कृपा ही नहीं की। बात यह थी कि महाप्रभु के ज्येष्ठ भ्राता विश्वरूपी अद्वैताचार्य जी के ही पास पढ़ा करते थे। वे आचार्य को ही अपना सर्वस्व समझते और सदा उनके ही समीप बने रहते थे, केवल रोटी खाने भर के लिये घर जाते थे। अद्वैताचार्य उन्हें ‘योगवासिष्ठ’ पढ़ाया करते थे। वे बाल्याकाल से ही सुशील, सदाचारी, मेधावी तथा संसारी विषयों से एकदम विरक्त थे। योगवासिष्ठ के श्रवणमात्र से उनके हृदय का छिपा हुआ त्याग-वैराग्य एक दम उभड़ पड़ा और वे सर्वस्व त्यागकर परिव्राजक बन गये। अपने सर्वगुणसम्पन्न प्रिय पुत्र को असमय में गृह त्यागकर सदा के लिये चले जाने के कारण माता को अपार दु:ख हुआ और उसने विश्वरूप के वैराग्य का मूल कारण अद्वैताचार्य को ही समझा। वात्सल्य प्रेम के कारण भूली हूई भोली-भाली माता ने सोचा- ‘अद्वैताचार्य ने ही ज्ञान की पोथी पढ़ा-पढ़ाकर मेरे प्राण प्यारे पुत्र को परिव्राजक बना दिया।’ जब माता बहुत रुदन करने लगी और अद्वैताचार्य जी के समीप भाँति-भाँति का विलाप करने लगी, तब अद्वैताचार्य जी ने यों ही बातों-ही-बातों में समझाते हुए कह दिया था- ‘शोक करने की क्या बात है। विश्वरूप ने कोई बुरा काम थोड़े ही किया है, उसने तो अपने इस शुभ काम में अपने कुल की आगे-पीछे की 21 पीढ़ियों को तार दिया। हम तो समझते हैं पढ़ना-लिखना उसी का सार्थक हुआ। जिन्हें पोथी पढ़ लेने पर भी ज्ञान नहीं होता, वे पठित-मुर्ख हैं। ऐसे पुस्तक के कीड़े बने हुए पुरुष पुस्तक पढ़ लेने पर भी उसके असली मर्म से वंचित ही रहते हैं।’ बेचारी माता के तो कलेजे से टुकड़ा निकल गया था, उसे ऐसे समय में ये इतनी ऊँची ज्ञान की बातें कैसे प्रिय लग सकती थीं। इन बातों से उसके मन में इन्हीं भावों का दृढ़ निश्चय हो गया कि विश्वरूप के गृहत्याग में आचार्य की जरूर सम्मति है। वह आचार्य से अत्यधिक स्नेह करता था, इनकी आज्ञा के बिना वह जा ही नहीं सकता। इन भावों को माता ने मन में ही छिपाये रखा। किसी के सामने उन्हें प्रकट नहीं किया। अब जब निमाई भी आचार्य के संसर्ग में अधिक रहने लगे और आचार्य ही सबसे अधिक भगवद्भाव से इनकी पूजा-स्तुति करने लगे, तो बेचारी दु:खिनी माता से अब नहीं रहा गया। कहावत है- ‘दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।’ माता का हृदय पहले से ही घायल बना हुआ था। विश्वरूप उसके हृदय में पहले ही एक बड़ा भारी घाव कर गये थे, वह अभी पूरने भी नहीं पाया था कि निमाई भी उसी के पथ का अनुसरण करते हुए दिखायी देने लगे। निमाई अब भक्तों को छोड़कर एक क्षण भर के लिये भी संसारी कामों को करना पसंद नहीं करते। वे विष्णुप्रिया जी से अब बातें ही नहीं करते हैं, सदा भक्तमण्डल में बैठे हुए श्रीकृष्ण-कथा ही कहते-सुनते रहते हैं, नाती का मुख देखने के लिये उतावली बैठी हुई माता को अपने पुत्र का बर्ताव रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ। इसके मूल में भी आचार्य अद्वैत का ही हाथ दीखने लगा। माता अब अपने मनोगत भावों को अधिक न छिपा सकीं। उनकी मनोव्यथा लोगों से बातें करते-करते आप-से-आप ही हृदय को फोड़कर बाहर निकल पड़ती। वे आंसू बहाते-बहाते अधीर होकर कहने लगतीं- ‘इन वृद्ध आचार्य को मुझ दु:खिनी विधवा के ऊपर दया भी नहीं आती। मेरे एक पुत्र को तो इन्होंने संन्यासी बना दिया। मेरे पति मुझे बीच में ही धोख देकर सदा के लिये चल बसे। मुझ बिलखती हूई दु:खिनी के ऊपर उन्हें तनिक भी दया नहीं आयी। अब मेरे जीवन का सहारा, मुझ अंधी की एकमात्र आधार लकड़ी यह निमाई ही है। इसे छोड़कर मेरे लिये सभी संसार सूना-ही-सूना है। मेरे आगे-पीछे बस यही एक आश्रय है, इसे भी आचार्य संन्यासी बनाना चाहते हैं। सदा इसे लेकर कीर्तन ही करते रहते हैं। मेरा निमाई कितना सीधा है। अद्वैताचार्य ने उनके साथी भक्तों ने उसे ईश्वर बता-बताकर विरक्त बना दिया है, वह घर की ओर कुछ ध्यान ही नहीं देता। सदा भक्तों के ही साथ घूमा करता है।’ माता की इन बातों से श्रीवास आदि भक्तों को तथा अद्वैताचार्य जी को मन-ही-मन कुछ दु:ख होता था। प्रभु भी भक्तों के मनोभावों को ताड़ गये। भक्तों को शिक्षा देने के निमित्त प्रभु ने माता के ऊपर कुछ क्रोध प्रकट करते हुए उस वैष्णव-निंदारूपी पाप का प्रायश्चित्त कराया। एक दिन प्रभु भगवदावेश में भगवन्मूर्तियों को एक ओर हटाकर भगवान के सिंहासन पर आरूढ़ हुए और उपस्थित सभी भक्तों से वरदान मांगने के लिये कहा। भक्तों ने अपने-अपने इच्छानुसार किसी ने अपने पिता की दुष्टता छुड़ाने का, किसी के स्त्री की बुद्धि शुद्ध हो जाने का, किसी ने पुत्र का और किसी ने भगवद्भक्ति का वर मांगा। प्रभु ने आवेश में ही आकर सभी को उन-उनका अभीष्ट वरदान दिया। उसी समय श्रीवास पण्डित ने अति दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! ये शचीमाता यदा दु:खिनी ही बनी रहती है। ये दु:ख के कारण सदा अश्रु ही बहाती रहती हैं। भगवन! इनके उपर भी ऐसी कृपा होनी चाहिये कि इनका शोक-सन्ताप सब दूर हो जाय।‘ प्रभु ने उसी प्रकार सिंहासन पर बैठे-ही-बैठे भगवदावेश में ही कहा- ‘शचीमाता पर कृपा कभी नहीं हो सकती। इसने वैष्णवापराध किया है। अपने अपराध करने वाले को तो मैं क्षमा कर भी सकता हूँ; किंतु वैष्णवों का अपराध करने वाले को क्षमा करने की मुझमें सामर्थ्य नहीं।’ श्रीवास पण्डित ने अत्यंत दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! भला यह भी कभी हो सकता है कि जिस माता ने आपको गर्भ में धारण किया है, उसका अपराध ही क्षमा न हो सके। आपको गर्भ में धारण करने से तो ये जगज्जननी बन गयीं। इनके लिये क्या अपना और क्या पराया? सभी तो इनके पुत्र हैं। जिसे चाहें जो कुछ ये कह सकती हैं।’ प्रभु ने कहा- ‘कुछ भी हो, वैष्णवों का अपराध करने वाला चाहे कोई भी हो उसकी निष्कृति नहीं हो सकती। साक्षात देवाधिदेव महादेव जी भी वैष्णवों का अपराध करने पर तत्क्षण ही नष्ट हो सकते हैं।’ श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! कुछ भी तो इनके अपराध-विमोचन का उपाय होना चाहिये।’ प्रभु ने कहा- ‘शचीमाता का अपराध अद्वैताचार्य के प्रति है। यदि आचार्य की चरण-धूलि माता सिर पर चढ़ावें और आचार्य ही इसे हृदय से क्षमा कर दें तब यह कृपा की अधिकारिणी बन सकती हैं।’ उस समय आचार्य दूसरे स्थान में थे, सभी भक्त आचार्य के समीप गये और वहाँ जाकर उन्होंने सभी वृत्तांत कहा। प्रभु की बातें सुनकर आचार्य प्रेम में विभोर होकर अश्रु-विमोचन करने लगे। वे रोते-रोते कहने लगे- ‘यही तो प्रभु की भक्तवत्सलता है। भला भगन्माता शचीदेवी का अपराध हो ही क्या सकता है? यह तो प्रभु हम लोगों को शिक्षा देने के लिये इस लीला का अभिनय करा रहे हैं, तो मैं हृदय से कहता हूँ, माता के प्रति मेरे मन में किसी प्रकार का बुरा भाव नहीं है। यदि आप मुझे प्रभु की आज्ञा से ‘क्षमा कर दी’ ऐसा कहने के लिये ही विवश करते हैं तो मैं कहे देता हूँ। वैसे तो माता ने मेरा कोई अपराध किया ही नहीं हैं। यदि प्रभु की दृष्टि में यह अपराध है तो मैं उसे हृदय से क्षमा करता हूँ। रही चरण-धूलि की बात सो शचीमाता तो जगद्वन्द्य हैं। उनकी चरण-धूलि ही भक्तों के शरीर का अंगराग है। भला, माता को मैं अपने पैर कैसे छुआ सकता हूँ।’ इस प्रकार भक्तों में झगड़ा हो ही रहा था कि इतने में ही शचीदेवी भी वहाँ आ पहुँची और उन्होंने जल्दी से अद्वैताचार्य की चरण-धूलि अपने मस्तक पर चढ़ा ली। इसी बात से भक्तों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे आनन्द के साथ नृत्य करने लगे। भक्तों में एक-दूसरे के प्रति जो कुछ थोड़ा-बहुत मनोमालिन्य था, वह इस घटना से एकदम समूल नष्ट हो गया और भक्त परस्पर एक-दूसरे का प्रेम से गले लगा-लगाकर आंलिगन करने लगे। इसी प्रकार नवद्वीप में एक देवानंद पण्डित थे। वे वैसे तो बड़े भारी पण्डित थे, शास्त्रों का ज्ञान उन्हें यथावत था। श्रीमद्भागवत के पढ़ाने के लिये दूर-दूर तक इनकी ख्याति थी। बहुत दूर-दूर से विद्यार्थी इनके पास श्रीमद्भागवत और गीता पढ़ने के लिये आते थे। ये स्वभाव के बुरे नहीं थे, संसारी सुखों से उदासीन और विरक्त थे; किंतु अभी तक इनके हृदय में प्रेमका अंकुर उदित नहीं था। हृदय में प्रेम का बीज तो पड़ा हुआ था, किंतु श्रद्धा और साधु-कृपारूपी जल के बिना क्षेत्र शुष्क ही पड़ा था। सुखे खेत में बीज अंकुरित कैसे हो सकता है, जब तक कि वह सुंदर वारि से सींचा न जाय? दयार्द्र-हृदय गौरांग ने एक दिन नगर-भ्रमण करते समय उनके ऊपर भी कृपा की। उनके ऊपर उसे वाक्-प्रहार कारके उनके सुखे और जमे हुए हृदयरूपी क्षेत्र को पहले तो जोत दिया, फिर कृपारुपी जल से सींचकर उसे स्निग्ध और उत्पन्न होने योग्य बना दिया। देवानंद को श्रीमद्भागवत पढ़ाते देखकर प्रभु क्रोधित भाव से कहने लगे- ‘ओ पण्डित! श्रीमद्भागवत के अर्थों का अनर्थ क्यों किया करता है? तू भागवत के अर्थों को क्या जाने? श्रीमद्भागवत तो साक्षात श्रीकृष्ण का विग्रह ही है। जिनके हृदय में प्रेम नहीं, भक्ति नहीं, साधु-महात्मा और ब्राह्मण-वैष्णवों के प्रति श्रद्धा नहीं, वह श्रीमद्भागवत की पुस्तक के छूने का अधिकारी ही नहीं। भागवत, गंगा जी, तुलसी और भगवद्भक्त- ये भगवान के रूप ही है। जो शुष्क हृदय के हैं, जिनके अन्त:करण में भक्ति नहीं, वे इनके द्वारा क्या लाभ उठा सकते हैं। वैसे ही ज्ञान की बातें बघारता रहता है या कुछ समझता भी है? ऐसे पढ़ने से क्या लाभ। ला, तेरी पुस्तक को फाड़कर श्रीगंगा जी के प्रवाह में प्रवाहित कर दूं।’ इतना कहकर प्रभु भावावेश में उनकी पुस्तक फाड़ने के लिये दौड़े। भक्तों ने यह देखकर प्रभु को पकड़ लिया और शांत किया। प्रभु को भावावेश में देखकर भक्त उन्हें आगे ले गये। लौटते हुए प्रभु फिर देवानंद के स्थान पर आये। उस समय प्रभु भावावेश में नहीं थे, उन्होंने देवानंद जी को वह बात याद दिलायी, जब वे एक बार श्रीमद्भागवत पाठ पढ़ा रहे थे और श्रीवास पण्डित भी पाठ सुनने आये थे। जिस श्रीमद्भागवत के अक्षर-अक्षर में ठूँस-ठूँसकर प्रेम रस भरा हुआ है, ऐसी भागवत का जब श्रीवास जी ने पाठ सुना तो वे प्रेम में बेहोश होकर मूर्च्छित हो गये, आपके भक्तो ने उन्हें उठाकर बाहर डाल दिया था और आपने इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं की। महाभागवत श्रीवास पण्डित के भावों को जब आपने ही नहीं समझा तब आपके शिष्य तो समझते ही क्या? आपने उस समय एक भगवद्भक्त का बुरी तरह से तिरस्कार कराया, यह आपके ऊपर अपराध चढ़ा। देवानंद विरक्त थे, विद्वान थे, शास्त्रज्ञ थे, फिर भी उन्होंने प्रभु के क्रोधयुक्त वचनों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। भगवत्कृपा से उनकी बृद्धि शुद्ध हो गयी। उन्हें अपनी भूल का अनुभव होने लगा। वे प्रभु के शरणापन्न हुए और उन्होंने अपने पूर्व के भूल तथा अज्ञान में किये जाने वाले उपराध के लिए श्रीवास पण्डित से क्षमा याचना की। जब प्रभु की उनके ऊपर कृपा हो गयी, तब उनके भगवद्भक्त होने में क्या देर थी। वे उस दिन से परमभक्त बन गये। प्रभु अपने भक्तों को भजन की प्रणाली और भजन किस प्रकार के बनकर करना चाहिये इसकी शिक्षा सदा दिया करते थे। एक दिन आप भक्तों को भगवन्नाम का माहात्म्य बता रहे थे। माहात्म्य बताते हुए उन्होंने कहा- ‘भक्त को अपने लिये तृण से भी नीचा समझना चाहिये और वृक्षों से भी अधिक सहनशील। स्वयं तो कभी मान की इच्छा करे नहीं, किंतु दूसरों को सदा सम्‍मान प्रदान करते रहना चाहिये। इस प्रकार होकर निरन्तर भगवन्नामों का ही चिंतन-स्मरण करते रहना चाहिये। सबसे अधिक सहनशीलता पर ध्यान देना चाहिये। जिसमें सहनशीलता नहीं, वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी और पण्डित ही क्यों न हो, कभी भी भगवत्कृपा का अधिकारी नहीं बन सकता। सहनशीलता का पाठ वृक्षों से लेना चाहिये। वृक्ष किसी से कटु वचन नहीं बोलते, उन्हें जो ईंट-पत्थर मारता है तो उस पर रोष न करके उलटे प्रहार करने वाले को पके हुए फल ही देते हैं। भूख-प्यास लगने पर भोजन तथा जल की याचना नहीं करते। सदा एकांत में ही रहते हैं। इसी प्रकार भक्त को जनसंसद से पृथक रहकर किसी से किसी बात की याचना न करते हुए अमानी और सहनशील बनकर भगवत-चिंतन करते रहना चाहिये।‘ इसके अनन्तर आपने- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ इस श्लोक की व्याख्या भक्तों को बतायी। तीन बार मना करने से यह अभिप्राय है कि कलियुग में इससे सरल और सुगम उपाय कोई दूसरा है ही नहीं। एक हृदयहीन जड़-बुद्धि वाला विद्यार्थी भी प्रभु की इस व्याख्या को सुन रहा था। उसने कहा- ‘यह तो सब शास्त्रों में अर्थवाद है। नामकी प्रशंसा में वैसे ही बहुत-सी चढ़ा-बढ़ाकर बातें कह दी हैं। वास्तव में कोरे नाम से कुछ नहीं होता। लोगों की नाम में प्रवृत्ति हो, इसलिये ऐसे वाक्य कह दिये हैं।’ इतना सुनते ही प्रभु ने अपने दोनों कान बंद कर लिये और ‘श्रीहरि’ ‘श्रीहरि’ कहकर वे सभी भक्तों से कहने लगे- ‘भगवन्नाम में अर्थवाद कहने वाले को पातक लगता ही है, सुनने वाले को भी पाप होता है। इसलिये चलो, हम सभी गंगाजी में सचैल स्नान करें, तभी इस भगवन्नाम में अर्थवाद सुनने वाले पाप से मुक्त हो सकेंगे।’ यह कहकर प्रभु भक्तों के सहित गंगास्नान के लिये चले गये। सभी भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति के सहित सुरसरि के सुंदर सुशीतल नीर में स्नान किया। स्नान कर लेने के अनन्तर प्रभु ने सभी भक्तों के सम्मुख भक्ति की महिमा का वर्णन किया। प्रभु भक्तों को लक्ष्य करके उन्हें समझाते हुए कहने लगे- ‘भाई! तुम्ही सोचो, जो अखिलकोटि ब्रह्माण्डनायक हैं, जिनके एक-एक रोम-कूप में अंसख्यों ब्रह्माण्ड समा सकते हैं, उन्हें कोई योग के ही द्वारा प्राप्त करना चाहे, तो वे उसके वश में केवल श्वास रोकने से ही कैसे आ सकते हैं! कोई कहे कि हम तत्त्वों की संख्या कर-करके उनका पता लगा लेंगे, तो यह उसकी कोरी मूर्खता है। भला, जो बुद्धि से अतीत हैं, जिनके लिये चारों वेद नेति-नेति कहकर कथन कर रहे हैं उनका ज्ञान सांख्य के द्वारा हो ही कैसे सकता है। अब रही धर्म की बात सो धर्म तो उलटा बंधन का ही हेतु है। धर्म से तो तीनों लोकों के विषय-सुखों की ही प्राप्ति हो सकती है। वह भी एक प्रकार से सुवर्ण की बेड़ी ही है। कोई जप से अथवा केवल त्याग से ही उन्हें प्रसन्न करना चाहे तो वे कैसे प्रसन्न हो सकते हैं? त्याग कोई कर ही क्या सकता है? उनकी कृपा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। भक्ति से हीन होकर जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, दान, अनुष्ठान आदि कैसे भी सत्कर्म क्यों न किये जायँ, सभी व्यर्थ है। इस बात को भगवान से उद्धव से स्वयं ही कहा है- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥ इस प्रकार भक्तों को भगवद्भक्ति की शिक्षा देते हुए प्रभु सभी को अपूर्व सुख और आनन्द पहुँचाते हुए नवद्वीप में भाँति-भाँति की लीलाएँ करने लगे। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे"

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 070 भगवत्-भजन में बाधक भाव भगवन्नाम सभी प्रकार के सुखों को देने वाला है। इसमें अधिकारी-अनधिकारी का कोई भी भेद-भाव नहीं। सभी वर्ण के, सभी जाति के, सभी प्रकार के स्त्री-पुरुष भगवन्नाम का सहारा लेकर भगवान के पाद्पद्मों तक पहुँच सकतें हैं। देख, काल, स्थान, विधि तथा पात्रापात्र का भगवन्नाम में कोई नियम नहीं। सभी देशों में, सभी समय में, सभी स्थानों में शुद्ध-अशुद्ध कैसी भी अवस्था में हो, चाहे भले ही जप करने वाला बड़ा भारी दुराचारी ही क्यों न हो, भगवन्नाम में इन बातों का भेदभाव नहीं। नाम-जप तो सभी को, सभी अवस्‍थाओं में कल्याणकारी ही है। फिर भी भगवन्नाम में दस बड़े भारी अपराध बताये गये हैं। पूर्वजन्‍मों के शुभकर्मों से, महात्माओं के सत्संग से अथवा भगवत्कृपा से जिसकी भगवन्नाम में निष्ठा जग गयी हो, उसे बड़ी सावधानी के साथ इन दस अपराधों से बचे रहना चाहिये। महाप्रभु अपने सभी भक्तों को नामापराध से बचे रहने का सदा उपदेश करते रहते थे। वे भक्तों की सदा देख-रेख रखते। किसी भी भक्त को किसी की निंदा करते देखते, तभी उसे सचेत करके कहने लगते- ‘देखो, तुम भूल कर रहे हो। भगवद्भजन में दूसरों की निंदा करना तथा भक्तों के प्रति द्वेष के भाव रखना महान पाप है। जो अभक्त हैं, उनकी उपेक्षा करो, उनके संबंध में कुछ सोचो ही नहीं। उनसे अपना संबंध ही मत रखो और जो भगवद्भक्त हैं, उनकी चरण-रज को सदा अपने सिर का आभूषण समझो। उसे अपने शरीर का सुंदर सुगन्धित अंगराग समझकर सदा भक्तिपूर्वक शरीर में मला करो।’ इसीलिये प्रभु के भक्तों में आपस में बड़ा ही भारी स्नेह था। भक्त एक-दूसरे को देखते ही आपस में लिपट जाते। कोई किसी के पैरों को ही पकड़ लेता, कोई किसी की चरण-धूलि को ही अपने मस्तक पर मलने लगता और कोई भक्त को दूर से ही देखकर धूलि में लोटकर साष्टांग प्रणाम ही करने लगता। भक्तों की शिक्षा के निमित्त वे भगवन्नामापराध की बड़ी भारी भर्त्सना करते और जब तक जिसके समीप वह अपराध हुआ है, उसके समीप क्षमा न करा लेते तब तक उस अपराधी के अपराध को क्षमा हुआ ही नहीं समझते थे। गोपाल चापाल ने श्रीवास पण्डित का अपराध किया था, इसी कारण उसके सम्पूर्ण शरीर मे गलित कुष्ठ हो गया था, वह अपने दु:ख से दु:खी होकर प्रभु ने शरणापन्न हुआ और अपने अपराध को स्वीकार करते हुए उसने क्षमा-याचना के लिये प्रार्थना की। प्रभु ने स्पष्ट कह दिया- ‘इसकी एक ही ओषधि है, जिन श्रीवास पण्डित का तुमने अपराध किया है, उन्हीं के चरणोदक को पान करो तो तुम्हारा अपराध क्षमा हो सकता है। मुझमें वैष्णवापराधी को क्षमा करने की सामर्थ्य नहीं है।’ गोपाल चापाल ने ऐसा ही किया। श्रीवास के चरणोदक को निष्कपट भाव से प्रेमपूर्वक पीने ही से उसका कुष्ठ चला गया। नामापराधी चाहे कोई भी हो प्रभु उसी को यथोचित दण्ड देते और अधिकारी हुआ तो उसका प्रायश्चित्त भी बताते थे। यहाँ तक कि अपनी श्रीशची देवी के अपराध को भी उन्होंने क्षमा नहीं किया और जब तक जिनका अपराध हुआ था, उनसे क्षमा नहीं करा ली तब तक उन पर कृपा ही नहीं की। बात यह थी कि महाप्रभु के ज्येष्ठ भ्राता विश्वरूपी अद्वैताचार्य जी के ही पास पढ़ा करते थे। वे आचार्य को ही अपना सर्वस्व समझते और सदा उनके ही समीप बने रहते थे, केवल रोटी खाने भर के लिये घर जाते थे। अद्वैताचार्य उन्हें ‘योगवासिष्ठ’ पढ़ाया करते थे। वे बाल्याकाल से ही सुशील, सदाचारी, मेधावी तथा संसारी विषयों से एकदम विरक्त थे। योगवासिष्ठ के श्रवणमात्र से उनके हृदय का छिपा हुआ त्याग-वैराग्य एक दम उभड़ पड़ा और वे सर्वस्व त्यागकर परिव्राजक बन गये। अपने सर्वगुणसम्पन्न प्रिय पुत्र को असमय में गृह त्यागकर सदा के लिये चले जाने के कारण माता को अपार दु:ख हुआ और उसने विश्वरूप के वैराग्य का मूल कारण अद्वैताचार्य को ही समझा। वात्सल्य प्रेम के कारण भूली हूई भोली-भाली माता ने सोचा- ‘अद्वैताचार्य ने ही ज्ञान की पोथी पढ़ा-पढ़ाकर मेरे प्राण प्यारे पुत्र को परिव्राजक बना दिया।’ जब माता बहुत रुदन करने लगी और अद्वैताचार्य जी के समीप भाँति-भाँति का विलाप करने लगी, तब अद्वैताचार्य जी ने यों ही बातों-ही-बातों में समझाते हुए कह दिया था- ‘शोक करने की क्या बात है। विश्वरूप ने कोई बुरा काम थोड़े ही किया है, उसने तो अपने इस शुभ काम में अपने कुल की आगे-पीछे की 21 पीढ़ियों को तार दिया। हम तो समझते हैं पढ़ना-लिखना उसी का सार्थक हुआ। जिन्हें पोथी पढ़ लेने पर भी ज्ञान नहीं होता, वे पठित-मुर्ख हैं। ऐसे पुस्तक के कीड़े बने हुए पुरुष पुस्तक पढ़ लेने पर भी उसके असली मर्म से वंचित ही रहते हैं।’ बेचारी माता के तो कलेजे से टुकड़ा निकल गया था, उसे ऐसे समय में ये इतनी ऊँची ज्ञान की बातें कैसे प्रिय लग सकती थीं। इन बातों से उसके मन में इन्हीं भावों का दृढ़ निश्चय हो गया कि विश्वरूप के गृहत्याग में आचार्य की जरूर सम्मति है। वह आचार्य से अत्यधिक स्नेह करता था, इनकी आज्ञा के बिना वह जा ही नहीं सकता। इन भावों को माता ने मन में ही छिपाये रखा। किसी के सामने उन्हें प्रकट नहीं किया। अब जब निमाई भी आचार्य के संसर्ग में अधिक रहने लगे और आचार्य ही सबसे अधिक भगवद्भाव से इनकी पूजा-स्तुति करने लगे, तो बेचारी दु:खिनी माता से अब नहीं रहा गया। कहावत है- ‘दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंककर पीता है।’ माता का हृदय पहले से ही घायल बना हुआ था। विश्वरूप उसके हृदय में पहले ही एक बड़ा भारी घाव कर गये थे, वह अभी पूरने भी नहीं पाया था कि निमाई भी उसी के पथ का अनुसरण करते हुए दिखायी देने लगे। निमाई अब भक्तों को छोड़कर एक क्षण भर के लिये भी संसारी कामों को करना पसंद नहीं करते। वे विष्णुप्रिया जी से अब बातें ही नहीं करते हैं, सदा भक्तमण्डल में बैठे हुए श्रीकृष्ण-कथा ही कहते-सुनते रहते हैं, नाती का मुख देखने के लिये उतावली बैठी हुई माता को अपने पुत्र का बर्ताव रुचिकर प्रतीत नहीं हुआ। इसके मूल में भी आचार्य अद्वैत का ही हाथ दीखने लगा। माता अब अपने मनोगत भावों को अधिक न छिपा सकीं। उनकी मनोव्यथा लोगों से बातें करते-करते आप-से-आप ही हृदय को फोड़कर बाहर निकल पड़ती। वे आंसू बहाते-बहाते अधीर होकर कहने लगतीं- ‘इन वृद्ध आचार्य को मुझ दु:खिनी विधवा के ऊपर दया भी नहीं आती। मेरे एक पुत्र को तो इन्होंने संन्यासी बना दिया। मेरे पति मुझे बीच में ही धोख देकर सदा के लिये चल बसे। मुझ बिलखती हूई दु:खिनी के ऊपर उन्हें तनिक भी दया नहीं आयी। अब मेरे जीवन का सहारा, मुझ अंधी की एकमात्र आधार लकड़ी यह निमाई ही है। इसे छोड़कर मेरे लिये सभी संसार सूना-ही-सूना है। मेरे आगे-पीछे बस यही एक आश्रय है, इसे भी आचार्य संन्यासी बनाना चाहते हैं। सदा इसे लेकर कीर्तन ही करते रहते हैं। मेरा निमाई कितना सीधा है। अद्वैताचार्य ने उनके साथी भक्तों ने उसे ईश्वर बता-बताकर विरक्त बना दिया है, वह घर की ओर कुछ ध्यान ही नहीं देता। सदा भक्तों के ही साथ घूमा करता है।’ माता की इन बातों से श्रीवास आदि भक्तों को तथा अद्वैताचार्य जी को मन-ही-मन कुछ दु:ख होता था। प्रभु भी भक्तों के मनोभावों को ताड़ गये। भक्तों को शिक्षा देने के निमित्त प्रभु ने माता के ऊपर कुछ क्रोध प्रकट करते हुए उस वैष्णव-निंदारूपी पाप का प्रायश्चित्त कराया। एक दिन प्रभु भगवदावेश में भगवन्मूर्तियों को एक ओर हटाकर भगवान के सिंहासन पर आरूढ़ हुए और उपस्थित सभी भक्तों से वरदान मांगने के लिये कहा। भक्तों ने अपने-अपने इच्छानुसार किसी ने अपने पिता की दुष्टता छुड़ाने का, किसी के स्त्री की बुद्धि शुद्ध हो जाने का, किसी ने पुत्र का और किसी ने भगवद्भक्ति का वर मांगा। प्रभु ने आवेश में ही आकर सभी को उन-उनका अभीष्ट वरदान दिया। उसी समय श्रीवास पण्डित ने अति दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! ये शचीमाता यदा दु:खिनी ही बनी रहती है। ये दु:ख के कारण सदा अश्रु ही बहाती रहती हैं। भगवन! इनके उपर भी ऐसी कृपा होनी चाहिये कि इनका शोक-सन्ताप सब दूर हो जाय।‘ प्रभु ने उसी प्रकार सिंहासन पर बैठे-ही-बैठे भगवदावेश में ही कहा- ‘शचीमाता पर कृपा कभी नहीं हो सकती। इसने वैष्णवापराध किया है। अपने अपराध करने वाले को तो मैं क्षमा कर भी सकता हूँ; किंतु वैष्णवों का अपराध करने वाले को क्षमा करने की मुझमें सामर्थ्य नहीं।’ श्रीवास पण्डित ने अत्यंत दीन-भाव से कहा- ‘प्रभो! भला यह भी कभी हो सकता है कि जिस माता ने आपको गर्भ में धारण किया है, उसका अपराध ही क्षमा न हो सके। आपको गर्भ में धारण करने से तो ये जगज्जननी बन गयीं। इनके लिये क्या अपना और क्या पराया? सभी तो इनके पुत्र हैं। जिसे चाहें जो कुछ ये कह सकती हैं।’ प्रभु ने कहा- ‘कुछ भी हो, वैष्णवों का अपराध करने वाला चाहे कोई भी हो उसकी निष्कृति नहीं हो सकती। साक्षात देवाधिदेव महादेव जी भी वैष्णवों का अपराध करने पर तत्क्षण ही नष्ट हो सकते हैं।’ श्रीवास पण्डित ने कहा- ‘प्रभो! कुछ भी तो इनके अपराध-विमोचन का उपाय होना चाहिये।’ प्रभु ने कहा- ‘शचीमाता का अपराध अद्वैताचार्य के प्रति है। यदि आचार्य की चरण-धूलि माता सिर पर चढ़ावें और आचार्य ही इसे हृदय से क्षमा कर दें तब यह कृपा की अधिकारिणी बन सकती हैं।’ उस समय आचार्य दूसरे स्थान में थे, सभी भक्त आचार्य के समीप गये और वहाँ जाकर उन्होंने सभी वृत्तांत कहा। प्रभु की बातें सुनकर आचार्य प्रेम में विभोर होकर अश्रु-विमोचन करने लगे। वे रोते-रोते कहने लगे- ‘यही तो प्रभु की भक्तवत्सलता है। भला भगन्माता शचीदेवी का अपराध हो ही क्या सकता है? यह तो प्रभु हम लोगों को शिक्षा देने के लिये इस लीला का अभिनय करा रहे हैं, तो मैं हृदय से कहता हूँ, माता के प्रति मेरे मन में किसी प्रकार का बुरा भाव नहीं है। यदि आप मुझे प्रभु की आज्ञा से ‘क्षमा कर दी’ ऐसा कहने के लिये ही विवश करते हैं तो मैं कहे देता हूँ। वैसे तो माता ने मेरा कोई अपराध किया ही नहीं हैं। यदि प्रभु की दृष्टि में यह अपराध है तो मैं उसे हृदय से क्षमा करता हूँ। रही चरण-धूलि की बात सो शचीमाता तो जगद्वन्द्य हैं। उनकी चरण-धूलि ही भक्तों के शरीर का अंगराग है। भला, माता को मैं अपने पैर कैसे छुआ सकता हूँ।’ इस प्रकार भक्तों में झगड़ा हो ही रहा था कि इतने में ही शचीदेवी भी वहाँ आ पहुँची और उन्होंने जल्दी से अद्वैताचार्य की चरण-धूलि अपने मस्तक पर चढ़ा ली। इसी बात से भक्तों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वे आनन्द के साथ नृत्य करने लगे। भक्तों में एक-दूसरे के प्रति जो कुछ थोड़ा-बहुत मनोमालिन्य था, वह इस घटना से एकदम समूल नष्ट हो गया और भक्त परस्पर एक-दूसरे का प्रेम से गले लगा-लगाकर आंलिगन करने लगे। इसी प्रकार नवद्वीप में एक देवानंद पण्डित थे। वे वैसे तो बड़े भारी पण्डित थे, शास्त्रों का ज्ञान उन्हें यथावत था। श्रीमद्भागवत के पढ़ाने के लिये दूर-दूर तक इनकी ख्याति थी। बहुत दूर-दूर से विद्यार्थी इनके पास श्रीमद्भागवत और गीता पढ़ने के लिये आते थे। ये स्वभाव के बुरे नहीं थे, संसारी सुखों से उदासीन और विरक्त थे; किंतु अभी तक इनके हृदय में प्रेमका अंकुर उदित नहीं था। हृदय में प्रेम का बीज तो पड़ा हुआ था, किंतु श्रद्धा और साधु-कृपारूपी जल के बिना क्षेत्र शुष्क ही पड़ा था। सुखे खेत में बीज अंकुरित कैसे हो सकता है, जब तक कि वह सुंदर वारि से सींचा न जाय? दयार्द्र-हृदय गौरांग ने एक दिन नगर-भ्रमण करते समय उनके ऊपर भी कृपा की। उनके ऊपर उसे वाक्-प्रहार कारके उनके सुखे और जमे हुए हृदयरूपी क्षेत्र को पहले तो जोत दिया, फिर कृपारुपी जल से सींचकर उसे स्निग्ध और उत्पन्न होने योग्य बना दिया। देवानंद को श्रीमद्भागवत पढ़ाते देखकर प्रभु क्रोधित भाव से कहने लगे- ‘ओ पण्डित! श्रीमद्भागवत के अर्थों का अनर्थ क्यों किया करता है? तू भागवत के अर्थों को क्या जाने? श्रीमद्भागवत तो साक्षात श्रीकृष्ण का विग्रह ही है। जिनके हृदय में प्रेम नहीं, भक्ति नहीं, साधु-महात्मा और ब्राह्मण-वैष्णवों के प्रति श्रद्धा नहीं, वह श्रीमद्भागवत की पुस्तक के छूने का अधिकारी ही नहीं। भागवत, गंगा जी, तुलसी और भगवद्भक्त- ये भगवान के रूप ही है। जो शुष्क हृदय के हैं, जिनके अन्त:करण में भक्ति नहीं, वे इनके द्वारा क्या लाभ उठा सकते हैं। वैसे ही ज्ञान की बातें बघारता रहता है या कुछ समझता भी है? ऐसे पढ़ने से क्या लाभ। ला, तेरी पुस्तक को फाड़कर श्रीगंगा जी के प्रवाह में प्रवाहित कर दूं।’ इतना कहकर प्रभु भावावेश में उनकी पुस्तक फाड़ने के लिये दौड़े। भक्तों ने यह देखकर प्रभु को पकड़ लिया और शांत किया। प्रभु को भावावेश में देखकर भक्त उन्हें आगे ले गये। लौटते हुए प्रभु फिर देवानंद के स्थान पर आये। उस समय प्रभु भावावेश में नहीं थे, उन्होंने देवानंद जी को वह बात याद दिलायी, जब वे एक बार श्रीमद्भागवत पाठ पढ़ा रहे थे और श्रीवास पण्डित भी पाठ सुनने आये थे। जिस श्रीमद्भागवत के अक्षर-अक्षर में ठूँस-ठूँसकर प्रेम रस भरा हुआ है, ऐसी भागवत का जब श्रीवास जी ने पाठ सुना तो वे प्रेम में बेहोश होकर मूर्च्छित हो गये, आपके भक्तो ने उन्हें उठाकर बाहर डाल दिया था और आपने इसमें कुछ भी आपत्ति नहीं की। महाभागवत श्रीवास पण्डित के भावों को जब आपने ही नहीं समझा तब आपके शिष्य तो समझते ही क्या? आपने उस समय एक भगवद्भक्त का बुरी तरह से तिरस्कार कराया, यह आपके ऊपर अपराध चढ़ा। देवानंद विरक्त थे, विद्वान थे, शास्त्रज्ञ थे, फिर भी उन्होंने प्रभु के क्रोधयुक्त वचनों का कुछ भी उत्तर नहीं दिया। भगवत्कृपा से उनकी बृद्धि शुद्ध हो गयी। उन्हें अपनी भूल का अनुभव होने लगा। वे प्रभु के शरणापन्न हुए और उन्होंने अपने पूर्व के भूल तथा अज्ञान में किये जाने वाले उपराध के लिए श्रीवास पण्डित से क्षमा याचना की। जब प्रभु की उनके ऊपर कृपा हो गयी, तब उनके भगवद्भक्त होने में क्या देर थी। वे उस दिन से परमभक्त बन गये। प्रभु अपने भक्तों को भजन की प्रणाली और भजन किस प्रकार के बनकर करना चाहिये इसकी शिक्षा सदा दिया करते थे। एक दिन आप भक्तों को भगवन्नाम का माहात्म्य बता रहे थे। माहात्म्य बताते हुए उन्होंने कहा- ‘भक्त को अपने लिये तृण से भी नीचा समझना चाहिये और वृक्षों से भी अधिक सहनशील। स्वयं तो कभी मान की इच्छा करे नहीं, किंतु दूसरों को सदा सम्‍मान प्रदान करते रहना चाहिये। इस प्रकार होकर निरन्तर भगवन्नामों का ही चिंतन-स्मरण करते रहना चाहिये। सबसे अधिक सहनशीलता पर ध्यान देना चाहिये। जिसमें सहनशीलता नहीं, वह चाहे कितना भी बड़ा विद्वान, तपस्वी और पण्डित ही क्यों न हो, कभी भी भगवत्कृपा का अधिकारी नहीं बन सकता। सहनशीलता का पाठ वृक्षों से लेना चाहिये। वृक्ष किसी से कटु वचन नहीं बोलते, उन्हें जो ईंट-पत्थर मारता है तो उस पर रोष न करके उलटे प्रहार करने वाले को पके हुए फल ही देते हैं। भूख-प्यास लगने पर भोजन तथा जल की याचना नहीं करते। सदा एकांत में ही रहते हैं। इसी प्रकार भक्त को जनसंसद से पृथक रहकर किसी से किसी बात की याचना न करते हुए अमानी और सहनशील बनकर भगवत-चिंतन करते रहना चाहिये।‘ इसके अनन्तर आपने- हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥ इस श्लोक की व्याख्या भक्तों को बतायी। तीन बार मना करने से यह अभिप्राय है कि कलियुग में इससे सरल और सुगम उपाय कोई दूसरा है ही नहीं। एक हृदयहीन जड़-बुद्धि वाला विद्यार्थी भी प्रभु की इस व्याख्या को सुन रहा था। उसने कहा- ‘यह तो सब शास्त्रों में अर्थवाद है। नामकी प्रशंसा में वैसे ही बहुत-सी चढ़ा-बढ़ाकर बातें कह दी हैं। वास्तव में कोरे नाम से कुछ नहीं होता। लोगों की नाम में प्रवृत्ति हो, इसलिये ऐसे वाक्य कह दिये हैं।’ इतना सुनते ही प्रभु ने अपने दोनों कान बंद कर लिये और ‘श्रीहरि’ ‘श्रीहरि’ कहकर वे सभी भक्तों से कहने लगे- ‘भगवन्नाम में अर्थवाद कहने वाले को पातक लगता ही है, सुनने वाले को भी पाप होता है। इसलिये चलो, हम सभी गंगाजी में सचैल स्नान करें, तभी इस भगवन्नाम में अर्थवाद सुनने वाले पाप से मुक्त हो सकेंगे।’ यह कहकर प्रभु भक्तों के सहित गंगास्नान के लिये चले गये। सभी भक्तों ने श्रद्धा-भक्ति के सहित सुरसरि के सुंदर सुशीतल नीर में स्नान किया। स्नान कर लेने के अनन्तर प्रभु ने सभी भक्तों के सम्मुख भक्ति की महिमा का वर्णन किया। प्रभु भक्तों को लक्ष्य करके उन्हें समझाते हुए कहने लगे- ‘भाई! तुम्ही सोचो, जो अखिलकोटि ब्रह्माण्डनायक हैं, जिनके एक-एक रोम-कूप में अंसख्यों ब्रह्माण्ड समा सकते हैं, उन्हें कोई योग के ही द्वारा प्राप्त करना चाहे, तो वे उसके वश में केवल श्वास रोकने से ही कैसे आ सकते हैं! कोई कहे कि हम तत्त्वों की संख्या कर-करके उनका पता लगा लेंगे, तो यह उसकी कोरी मूर्खता है। भला, जो बुद्धि से अतीत हैं, जिनके लिये चारों वेद नेति-नेति कहकर कथन कर रहे हैं उनका ज्ञान सांख्य के द्वारा हो ही कैसे सकता है। अब रही धर्म की बात सो धर्म तो उलटा बंधन का ही हेतु है। धर्म से तो तीनों लोकों के विषय-सुखों की ही प्राप्ति हो सकती है। वह भी एक प्रकार से सुवर्ण की बेड़ी ही है। कोई जप से अथवा केवल त्याग से ही उन्हें प्रसन्न करना चाहे तो वे कैसे प्रसन्न हो सकते हैं? त्याग कोई कर ही क्या सकता है? उनकी कृपा के बिना कुछ भी नहीं हो सकता। भक्ति से हीन होकर जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, दान, अनुष्ठान आदि कैसे भी सत्कर्म क्यों न किये जायँ, सभी व्यर्थ है। इस बात को भगवान से उद्धव से स्वयं ही कहा है- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता॥ इस प्रकार भक्तों को भगवद्भक्ति की शिक्षा देते हुए प्रभु सभी को अपूर्व सुख और आनन्द पहुँचाते हुए नवद्वीप में भाँति-भाँति की लीलाएँ करने लगे। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे"

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पंच कन्या कौन है, क्या है उनकी गाथा, जानिए अहल्या द्रौपदी तारा कुंती मंदोदरी तथा। पंचकन्या: स्मरेतन्नित्यं महापातकनाशम्॥- ब्रह्म पुराण 3.7.219 अर्थात अहिल्या (ऋषि गौतम की पत्नी), द्रौपदी (पांडवों की पत्नी), तारा (वानरराज बाली की पत्नी), कुंती (पांडु की पत्नी) तथा मंदोदरी (रावण की पत्नी)। इन पांच कन्याओं का प्रतिदिन स्मरण करने से सारे पाप धुल जाते हैं। ये पांच स्त्रियां विवाहिता होने पर भी कन्याओं के समान ही पवित्र मानी गई है। 1. अहिल्या : देवी अहिल्या की कथा का वर्णन वाल्मीकि रामायण के बालकांड में मिलता है। अहिल्या अत्यंत ही सुंदर, सुशील और पतिव्रता नारी थीं। उनका विवाह ऋषि गौतम से हुआ था। दोनों ही वन में रहकर तपस्या और ध्यान करते थे। शास्त्रों के अनुसार शचिपति इन्द्र ने गौतम की पत्नी अहिल्या के साथ उस वक्त छल से सहवास किया था, जब गौतम ऋषि प्रात: काल स्नान करने के लिए आश्रम से बाहर गए थे। लेकिन जब गौतम मुनि को अनुभव हुआ कि अभी रात्रि शेष है और सुबह होने में समय है, तब वे वापस आश्रम की तरफ लौट चले। मुनि जब आश्रम के पास पहुंचे तब इन्द्र उनके आश्रम से बाहर निकल रहा थे। इन्होंने इन्द्र को पहचान लिया। इन्द्र द्वारा किए गए इस कुकृत्य को जानकर मुनि क्रोधित हो उठे और इन्द्र तथा देवी अहिल्या को शाप दे दिया। देवी अहिल्या द्वारा बार-बार क्षमा-याचना करने और यह कहने पर कि 'इसमें मेरा कोई दोष नहीं है', पर गौतम मुनि ने कहा कि तुम शिला बनकर यहां निवास करोगी। त्रेतायुग में जब भगवान विष्णु राम के रूप में अवतार लेंगे, तब उनके चरण रज से तुम्हारा उद्धार होगा। 2. द्रौपदी : कहते हैं कि द्रौपदी का जन्म यज्ञ से हुआ था इसीलिए उसे याज्ञनी कहा जाता था। द्रौपदी को पंचकन्याओं में शामिल किया गया है। द्रोपदी अत्यंत धीरजवान, पवित्र और महान महिला थी। महाभारत काल में यह 5 पांडवों की पत्नी थी द्रौपदी के चीर हरण प्रकरण में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाई। 3. तारा : तारा एक अप्सरा थी जो समुद्र मंथन के दौरान निकली थी। बाली और सुषेण दोनों ही इसे अपनी पत्नी बनाना चाहते थे। उस वक्त निर्णय हुआ कि जो तारा के वामांग में खड़ा है वह उसका पति और जो दाहिने हाथ की ओर खड़ा है वह उसका पिता होगा। इस तरह बाली का विवाह तारा से हो गया। बाली के वध के बाद उसकी पत्नी तारा को बहुत दुख हुआ। तारा एक अप्सरा थी। बाली को को छल से मारा गया। यह जानकर उनकी पत्नी तारा ने श्रीराम को कोसा और उन्हें एक श्राप दिया। श्राप के अनुसार भगवान राम अपनी पत्नी सीता को पाने के बाद जल्द ही खो देंगे। उसने यह भी कहा कि अगले जन्म में उनकी मृत्यु उसी के पति (बाली) द्वारा हो जाएगी। अगले जन्म में भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया था और उनके इस अवतार का अंत एक शिकारी भील जरा (जो कि बाली का ही दूसरा जन्म था) द्वारा किया गया था। 4. कुंती : यदुवंशी राजा शूरसेन की पृथा नामक कन्या और वसुदेव नामक एक पुत्र था। पृथा नामक कन्या को राजा शूरसेन ने अपनी बुआ के संतानहीन लड़के कुंतीभोज को गोद दे दिया। कुंतीभोज ने इस कन्या का नाम कुंती रखा। इस तरह पृथा अर्थात कुंती अपने असली माता पिता से दूर रही। जैसे दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को अंगदेश के राजा रोमपद को गोद दे किया था। कुंती अपने महल में आए महात्माओं की सेवा करती थी। एक बार वहां ऋषि दुर्वासा भी पधारे। कुंती की सेवा से प्रसन्न होकर दुर्वासा ने कहा, 'पुत्री! मैं तुम्हारी सेवा से अत्यंत प्रसन्न हुआ हूं अतः तुझे एक ऐसा मंत्र देता हूं जिसके प्रयोग से तू जिस देवता का स्मरण करेगी वह तत्काल तेरे समक्ष प्रकट होकर तेरी मनोकामना पूर्ण करेगा।' इस तरह कुंती को एक अद्भुत मंत्र मिल गया। कुंती का विवाह हस्तिनापुर के राजा पांडु से हुआ था। कर्ण सहित कुंती के युधिष्ठिर, अर्जुन और भीम नामक तीन और पुत्र थे। नकुल और सहदेव पांडु की दूसरी पत्नी माद्री के पुत्र थे। 5. मंदोदरी : पंच कन्याओं में से एक मंदोदरी को चिर कुमारी के नाम से भी जाना जाता है। मंदोदरी राक्षसराज मयासुर की पुत्री थीं। रावण की पत्नी मंदोदरी की मां हेमा एक अप्सरा थी। अप्सरा की पुत्री होने की वजह से मंदोदरी बेहद खूबसूरत थी, साथ ही वह आधी दानव भी थी। भगवान शिव के वरदान के कारण ही मंदोदरी का विवाह रावण से हुआ था। मंदोदरी ने भगवान शंकर से वरदान मांगा था कि उनका पति धरती पर सबसे विद्वान ओर शक्तिशाली हो। मंदोदरी से रावण को जो पुत्र मिले उनके नाम हैं- मेघनाद, महोदर, प्रहस्त, विरुपाक,विरु अजित कुमार पान्डेय एकौनी वालें

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जानिए, पांच पतिव्रता और महान महिलाएं.. चिंता की बात है कि शिव-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण के मुल्क में ऐसी लड़कियां ढूंढना अब मुश्किल होता जा रहा है जिनकी नजरों में विवाह पूर्व-पश्चात दूसरों से यौन संबंध बनाना अनैतिक और संस्कृति के खिलाफ है। पाश्चात्य सोच का परिणाम भविष्य में इस देश को तोड़ देगा। स्त्री का पतिव्रता होना आज के युग में दुर्लभ हो चला है। एक ही पति या पत्नी धर्म का पालन करना हिन्दू धर्म के कर्तव्यों में शामिल है। धर्म, समाज और सभ्यता को बचाए रखने के लिए स्त्री का पवित्र रहना जरूरी है, क्योंकि स्त्री इन सभी के केंद्र में है। यूं तो भारत में हजारों ऐसी महिलाएं हुई हैं जिनकी पवित्रता और पतिव्रता पालन की मिसाल दी जाती है, लेकिन उनमें से भी कुछ ऐसी हैं, जो इतिहास का अमिट हिस्सा बन चुकी हैं। यहां प्रस्तुत हैं पांच महान पतिव्रता नारियां। इसमें पांचवें नंबर की स्त्री के बारे में आप जानकर हैरान रह जाएंगे। अगले पन्ने पर पढ़ें, पहली पवित्र महिला... 1. अनुसूया : पतिव्रता देवियों में अनुसूया का स्थान सबसे ऊँचा है। वे अत्रि-ऋषि की पत्‍‌नी थीं। एक बार सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा में यह विवाद छिड़ा कि सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता कौन है? अंत में तय यही हुआ कि अत्रि पत्‍‌नी अनुसूया ही सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता हैं। इस बात की परीक्षा लेने के लिए अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनुसूया के आश्रम में ब्राह्मण के भेष में भिक्षा माँगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे। तब अनुसूया ने अपने सतीत्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रता का उपदेश दिया था। अगले पन्ने पर पढ़ें, दूसरी पवित्र महिला... 2. द्रौपदी : द्रौपदी को कौन नहीं जानता। पांच पांडवों की पत्नी द्रौपदी को सती के साथ ही पांच कुंवारी कन्याओं में भी शामिल किया जाता है। द्रौपदी के पिता पांचाल नरेश राजा ध्रुपद थे। एक प्रतियोगिता के दौरान अर्जुन ने द्रौपदी को जीत लिया था। लेकिन जब अर्जुन उन्हें लेकर घर पहुंचे तो उन्होंने द्वार पर से ही अपनी माता को पुकारकर कहा कि आइए बाहर देखिए मैं आपके लिए क्या लाया हूं। पांडव द्रौपदी को साथ लेकर माता कुंती के पास पहुंचे और द्वार से ही अर्जुन ने पुकारकर अपनी माता से कहा, 'माते! आज हम लोग आपके लिए एक अद्भुत भिक्षा लेकर आए हैं।' इस पर कुंती ने भीतर से ही कहा, 'पुत्रों! तुम लोग आपस में मिल-बांट उसका उपभोग कर लो।' बाद में यह ज्ञात होने पर कि भिक्षा वधू के रूप में हैं, कुंती को अत्यंत दुख हुआ किंतु माता के वचनों को सत्य सिद्ध करने के लिए द्रौपदी ने पाँचों पांडवों को पति के रूप में स्वीकार कर लिया। अगले पन्ने पर पढ़ें, तीसरी पवित्र महिला... 3. सुलक्षणा : रावण के पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) की पत्नी सुलक्षणा थीं जिसे सुलोचना भी कहा जाता था। इन्हें भी पांच सतियों में शामिल किया गया है। रामायण अनुसार लक्ष्मण मूर्च्छा के बाद अगले दिन जब दोबारा लंकापति रावण ने मेघनाद को ही युद्ध की बागडोर सौंपी तो मेघनाद की पत्‍‌नी सुलोचना ने उसे युद्ध में जाने से मना किया, लेकिन मेघनाद ने उसकी एक न सुनी और युद्ध में लड़ते हुए मेघनाद की जान गई। जिस पर उसकी पत्‍‌नी भी मेघनाद के साथ ही सती हो गई। अगले पन्ने पर पढ़ें, चौथी पवित्र महिला... 4. सावित्री : महाभारत अनुसार सावित्री राजर्षि अश्वपति की पुत्री थी। उनके पति का नाम सत्यवान था, जो वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। सावित्री के पति सत्यवान की मृत्यु के बाद, सावित्री ने अपनी तपस्या के बल पर सत्यवान को पुनर्जीवित कर लिया था। इनके नाम से वट सावित्री नामक व्रत प्रचलित है, जो महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती हैं। यह व्रत गृहस्थ जीवन के मुख्य आधार पति-पत्नी को दीर्घायु, पुत्र, सौभाग्य, धन-समृद्धि से भरता है। अगले पन्ने पर पढ़ें, पांचवीं पवित्र महिला... 5. मंदोदरी : क्या किसी को मालूम है कि रावण की पत्नी कितनी पवित्र और महान थी? वह पवित्र और महान ही नहीं थीं, जगप्रसिद्ध भी थीं। कई कलाओं में कौशल और बुद्धिमान पत्नी होने के बावजूद रावण ने अपनी पत्नी की कभी नहीं सुनी। मंदोदरी रामायण के पात्र, लंकापति रावण की पत्नी थी। हेमा अप्सरा से उत्पन्न रावण की पटरानी, जो मेघनाद की माता तथा मयासुर की कन्या थी। वे रावण को सदा अच्छी सलाह देती थीं और कहा जाता है कि अपने पति के मनोरंजनार्थ इसी ने शतरंज के खेल का प्रारंभ किया था। इसकी गणना भी पंचकन्याओं में है।

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