🌹जय महाकाल🌹 🌄सुप्रभातम🌄 🗓आज का पञ्चाङ्ग🗓 🌻गुरुवार, २८ जनवरी २०२१🌻 सूर्योदय: 🌄 ०७:२० सूर्यास्त: 🌅 ०५:५१ चन्द्रोदय: 🌝 १७:२२ चन्द्रास्त: 🌜❌❌❌ अयन 🌕 उत्तराणायने (दक्षिणगोलीय) ऋतु: ❄️ शिशिर शक सम्वत: 👉 १९४२ (शर्वरी) विक्रम सम्वत: 👉 २०७७ (प्रमादी) मास 👉 पौष पक्ष 👉 शुक्ल तिथि 👉 पूर्णिमा - ००:४५ तक नक्षत्र 👉 पुष्य - ०३:५१ तक योग 👉 प्रीति - १९:२५ तक प्रथम करण 👉 विष्टि - १३:०५ तक द्वितीय करण 👉 बव - ००:४५ तक 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰️〰️ ॥ गोचर ग्रहा: ॥ 🌖🌗🌖🌗 सूर्य 🌟 मकर चंद्र 🌟 कर्क मंगल 🌟 मेष (उदित, पूर्व, मार्गी) बुध 🌟 कुम्भ (उदय, पश्चिम, मार्गी) गुरु 🌟 मकर (अस्त, पश्चिम, मार्गी) शुक्र 🌟 मकर (उदित, पूर्व, मार्गी) शनि 🌟 मकर (उदय, पूर्व, मार्गी) राहु 🌟 वृष केतु 🌟 वृश्चिक 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 शुभाशुभ मुहूर्त विचार ⏳⏲⏳⏲⏳⏲⏳ 〰〰〰〰〰〰〰 अभिजित मुहूर्त 👉 १२:०९ से १२:५१ अमृत काल 👉 २१:२६ से २३:०२ गुरुपुष्य योग 👉 ०७:१० से ०३:५१ सर्वार्थसिद्धि योग 👉 ०७:१० से ०३:५१ अमृतसिद्धि योग 👉 ०७:१० से ०३:५१ विजय मुहूर्त 👉 १४:१७ से १५:०० गोधूलि मुहूर्त 👉 १७:४० से १८:०४ निशिता मुहूर्त 👉 ००:०३ से ००:५६ राहुकाल 👉 १३:५० से १५:१० राहुवास 👉 दक्षिण यमगण्ड 👉 ०७:१० से ०८:३० होमाहुति 👉 चन्द्र दिशाशूल 👉 दक्षिण अग्निवास 👉 आकाश भद्रावास 👉 मृत्यु - १३:०५ तक चन्द्रवास 👉 उत्तर 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ☄चौघड़िया विचार☄ 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ ॥ दिन का चौघड़िया ॥ १ - शुभ २ - रोग ३ - उद्वेग ४ - चर ५ - लाभ ६ - अमृत ७ - काल ८ - शुभ ॥रात्रि का चौघड़िया॥ १ - अमृत २ - चर ३ - रोग ४ - काल ५ - लाभ ६ - उद्वेग ७ - शुभ ८ - अमृत नोट-- दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 शुभ यात्रा दिशा 🚌🚈🚗⛵🛫 उत्तर-पश्चिम (दही का सेवन कर यात्रा करें) 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 तिथि विशेष 🗓📆🗓📆 〰️〰️〰️〰️ श्री सत्यनारायण (पूर्णिमा) व्रत आदि। 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 आज जन्मे शिशुओं का नामकरण 〰〰〰〰〰〰〰〰〰️〰️ आज ०३:५१ तक जन्मे शिशुओ का नाम पुष्य नक्षत्र के प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ चरण अनुसार क्रमशः (हू, हे, हो, डा) नामाक्षर से तथा इसके बाद जन्मे शिशुओ का नाम आश्लेषा नक्षत्र के प्रथम चरण अनुसार क्रमश (डी) नामाक्षर से रखना शास्त्रसम्मत है। 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 उदय-लग्न मुहूर्त मकर - ०६:२२ से ०८:०३ कुम्भ - ०८:०३ से ०९:२९ मीन - ०९:२९ से १०:५३ मेष - १०:५३ से १२:२६ वृषभ - १२:२६ से १४:२१ मिथुन - १४:२१ से १६:३६ कर्क - १६:३६ से १८:५८ सिंह - १८:५८ से २१:१७ कन्या - २१:१७ से २३:३५ तुला - २३:३५ से ०१:५५ वृश्चिक - ०१:५५ से ०४:१५ धनु - ०४:१५ से ०६:१८ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 पञ्चक रहित मुहूर्त अग्नि पञ्चक - ०७:१० से ०८:०३ शुभ मुहूर्त - ०८:०३ से ०९:२९ रज पञ्चक - ०९:२९ से १०:५३ अग्नि पञ्चक - १०:५३ से १२:२६ शुभ मुहूर्त - १२:२६ से १४:२१ रज पञ्चक - १४:२१ से १६:३६ शुभ मुहूर्त - १६:३६ से १८:५८ चोर पञ्चक - १८:५८ से २१:१७ शुभ मुहूर्त - २१:१७ से २३:३५ रोग पञ्चक - २३:३५ से ००:४५ शुभ मुहूर्त - ००:४५ से ०१:५५ मृत्यु पञ्चक - ०१:५५ से ०३:५१ अग्नि पञ्चक - ०३:५१ से ०४:१५ शुभ मुहूर्त - ०४:१५ से ०६:१८ रज पञ्चक - ०६:१८ से ०७:०९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 आज का राशिफल 🐐🐂💏💮🐅👩 〰️〰️〰️〰️〰️〰️ मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ) आपका आज का दिन मिश्रित फलदायक रहेगा। कार्यो की असफलता अथवा किसी महत्त्वपूर्ण अनुबंध के निरस्त होने से स्वभाव में चिड़चिड़ा पन आ सकता है। वाणी का रूखापन कार्य क्षेत्र एवं घर का वातावरण बिगाड़ेगा। विवेक से कार्य करें दोपहर के बाद किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति से सहयोग मिलने की संभावना है। धन नाश होने के प्रबल योग है इसका भी ध्यान रखें गलत जगह निवेश हो सकता है। स्वास्थ्य में भी उतार चढ़ाव बना रहेगा। वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो) आज का दिन आपको किसी ना किसी रूप में धन अथवा अन्य लाभ कराएगा लेकिन आज भी मन मे चल रही कामना पूर्ति होने में कोई व्यवधान अवश्य आएगा। दिन के आरम्भ में आलसी स्वभाव के कारण दिनचार्य धीमी चलेगी लेकिन मध्यान के समय कही से लाभ की संभावना बनने पर कार्य के प्रति गंभीरता आएगी। कार्य क्षेत्र पर पुरानी योजना से लाभ होगा नए कार्यो में भी निवेश कर सकते है निकट भविष्य में लाभ देगा। महिलाओ की मानसिकता आज सुखोपभोग की रहेगी जिस कारण घर के कार्य अस्त व्यस्त होंगे। आज अचल संपत्ति सम्पति संबंधित अधूरे कार्य को प्रथमिकता दे सफलता की संभावना अधिक है। विपरीत लिंगीय के प्रति शीघ्र आकर्षित हो जाएंगे। मिथुन👫 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा) आज परिस्थियां आपके अनुकूल तो नहीं फिर भी मन को संतोष अवश्य देंगी। सुबह से ही आलस्य प्रमाद में रहेंगे कार्य क्षेत्र को लेकर किसी विशेष सोच में समय खराब होगा मौके की तलाश में रहेंगे परन्तु आज भाग दौड़ से बचने का प्रयास होने वाले लाभ में कमी लाएगा। कार्य क्षेत्र पर मंदी के कारण मन कम ही लगेगा फिर भी संध्या के आसपास कामचलाऊ धन की आमद हो जाएगी। घर मे आपका उदासीन व्यवहार परिजनों को पसंद नही आएगा बड़े बुजुर्गों से मार्गदर्शन के साथ ताने भी सुनने को मिलेंगे। सरकारी क्षेत्र से आज संभावना होने पर भी लाभ नहीं मिल सकेगा। संध्या का समय राहत वाला रहेगा किसी समारोह में सम्मिलित होंगे प्रियजनों से भेंट मन हल्का करेगी। कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) आज दिन का प्रारंभिक भाग सुख-शांति से बितायेंगे। मन खुश रहने से आसपास का वातावरण भी हास्यमय बनाएंगे। मित्र प्रियजनों के साथ भविष्य की योजनाओं पर खुल कर विचार करेंगे। परन्तु दोपहर के समय स्थिति एक दम उलट हो जायेगी। किसी मनोकामना के अपूर्ण रहने से ठेस पहुंचेगी इससे उबरने में भी थोड़ा समय लगेगा। आज स्वभाव में ज्यादा खुलापन भी ना रखें मन का भेद अन्य को देने से हानि भी हो सकती है। परिजनों से लाभ होने की संभावना है। सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे) आज के दिन आपको प्रत्येक कार्य में सावधानी रखने की सलाह है। जल्दबाजी में लिए गए निर्णय के कारण धन के साथ सम्मान की भी हानि हो सकती है। कार्य क्षेत्र पर अप्रिय घटनाओं के कारण दुविधा की स्थिति बनेगी। किसी पारिवारिक सदस्य के गलत आचरण से मन दुखी रहेगा मन में गलत विचार की भरमार रहने से सेहत पर बुरा असर पड़ेगा। सर अथवा अन्य शारीरिक अंग निष्क्रिय होते अनुभव होंगे। धैर्य से समय बिताएं। कन्या👩 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो) आपका आज का दिन सामाजिक कार्यो में समर्पित रहेगा आज आप परोपकार एवं स्वार्थ सिद्धि के बीच उलझे रहेंगे अपने नियत कार्यो में फेरबदल कर मित्र परिचितों के आवश्यक कार्यो में समय देना पड़ेगा लेकिन प्रशंशा की जगह आज अपमान हो सकता है विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र पर विपरीत लिंगीय से सावधानीपूर्वक व्यवहार करें लांक्षन लगने की संभावना है। कार्य व्यवसाय में सहकर्मी अथवा अधीनस्थों के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा जिससे लाभ की संभावना भी आज कम ही रहेगी। आत्मनिर्बर होकर जोभी कार्य करेंगे उसमे आरंभिक परेशानी के बाद आकस्मिक लाभ होने की संभावना है। सेहत भी अकस्मात ही नरम होगी। तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते) आज भी दिन का अधिकांश समय शांति से व्यतीत होगा। थोड़ी आर्थिक परेशानियां रह सकती है परंतु मानसिक रूप से दृढ़ रहेंगे। जिस भी कार्य को करने की ठानेंगे उसे हानि-लाभ की परवाह किये बिना पूर्ण करके छोड़ेंगे। कार्य क्षेत्र पर अन्य व्यक्ति की दखलंदाजी से थोड़ी परेशानी एवं बहस हो सकती है। सामूहिक आयोजन में सम्मिलित होने का अवसर भी मिलेगा। बाहर की अपेक्षा घर में समय बिताना पसंद करेंगे। वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू) आज भी परिस्थितियां आपके अनुकूल रहने से लाभ के कई अवसर मिलेंगे परन्तु अज्ञान की स्थिति अथवा गलत सलाह के कारण लाभ होना संदिग्ध ही रहेगा। बहुप्रतीक्षित अतिमहत्त्वपूर्ण कार्य पूरा होगा। धन लाभ रुक-रुक कर होता रहेगा। घर में सुख के साधनों की वृद्धि होगी इसपर अधिक खर्च भी रहेगा। नए सम्बन्ध बनने से अतिरिक्त आय के मार्ग भी खुलेंगे। पारिवारिक दायित्वों की पूर्ति से आज पीछे नहीं हटेंगे। धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे) आज का दिन विपरीत फल देने वाला रहेगा। स्वयं अथवा किसी पारिवारिक सदस्य के स्वास्थ्य को लेकर चिंता रहेगी दवाओं पर खर्च बढ़ेगा। कार्य क्षेत्र पर भी परिश्रम के अनुसार लाभ मिलेगा नए कार्य के आरम्भ के विचार को टालना पड सकता है। सरकारी कार्यो में भी धन खर्च होने से आर्थिक कारणों से चिंता रहेगी परन्तु मध्यान के आस-पास थोड़े धन की आमद होने से दैनिक कार्य चलते रहेंगे। परिवार में तालमेल बना रहेगा। मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी) आज दिन का पूर्वार्ध आशा से अधिक शुभ रहेगा। आज के दिन आकस्मिक घटनाएं अधिक घटित होंगी चाहे वो आर्थिक या पारिवारिक हों। नौकरी पेशा जातको को भी मेहनत का फल मिलेगा सम्मान में वृद्धि के साथ आय के मार्ग खुलेंगे। बेरोजगारों को थोड़ा प्रयास करने पर रोजगार उपलब्ध हो सकता है। खर्च भी अचानक होने से थोड़ी असहजता रहेगी परन्तु स्थिति पूर्ण रूप से आपके नियंत्रण में ही रहेगी। भाग्योन्नति के योग बनेगे। कुंभ🍯 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा) आज का दिन आपके लिये खर्चीला रहेगा। आपका स्वभाव भी दिखावा पसन्द रहने के कारण आवश्यकता से अधिक खर्च करेंगे। कार्य क्षेत्र पर भाग्य का साथ कम ही मिलेगा मध्यान के बाद लाभ के अवसर मिलेंगे जिन्हें लापरवाही के चलते हाथ से निकाल सकते है। धन की आमद को लेकर आज बेपरवाह रहेंगे फिर भी काम चलाऊ हो ही जायेगी। कोर्ट कचहरी अथवा अन्य सरकारी कार्यो के ऊपर भी खर्च करना पड़ेगा आज जितना हो सके व्यर्थ के खर्च से बचे नही तो बाद में आर्थिक उलझने परेशान करेंगी। नौकरी पेशाओ का अधिकारी वर्ग से अनबन होने की संभावना है जिसका परिणाम बाद में परेशान करेगा जल्दबाजी में कोई निर्णय ना लें। पति-पत्नी में किसी न किसी बात को लेकर मतभेद रहेंगे। मीन🐳 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची) आज आपकी महात्त्वकांक्षाओ की पूर्ती में अड़चने आने से हताश हो सकते है। फिर भी भले-बुरे का विवेक रहने से मानसिक रूप से परेशान नहीं होंगे। कार्य क्षेत्र पर अधिकारी एवं सहकर्मी सहयोग करेंगे निश्चित समय से पहले कार्य पूर्ण कर घरेलु कार्यो में व्यस्त रहेंगे। धार्मिक गतिविधियों में भी सक्रियता दिखाएँगे। आज आप किसी भी प्रकार के अनैतिक कार्यो से खुद को दूर रखने का हर संभव प्रयास करेंगे जिससे सम्मान के पात्र बनेंगे। 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰️

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. संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण पोस्ट - 258 काशी-खण्ड काशीखण्ड-उत्तरार्ध अध्याय - 10 इस अध्याय में:- (काशी के ब्राह्मणों को भगवान् शिव का वरदान तथा काशी क्षेत्र की महिमा) अगस्त्यजी ने पूछा- पडानन! ब्राह्मणों को देखकर भगवान् शंकर ने उनसे क्या कहा? स्कन्दजी बोले- अगस्त्य! जब ब्रह्माजी के गौरव की रक्षा के लिये महादेवजी मन्दराचल को चले गये, तब वहाँ के क्षेत्र संन्यासी पापहीन ब्राह्मण निराश्रय हो गये उन्होंने उस महाक्षेत्र में प्रतिग्रह लेना सदा के लिये बंद कर दिया और अपने दण्डों के अग्रभाग से भूमि खोद खोदकर कन्द-मूल आदि से वे जीवन निर्वाह करने लगे। इस प्रकार धरती खोद-खोदकर उन्होंने एक बड़ी सुन्दर पुष्करिणी तैयार कर दी। उसका नाम हुआ 'दण्डखात' तीर्थ। उस तीर्थ के चारों ओर उन्होंने अनेक बड़े-बड़े शिवलिंग स्थापित किये और भगवान् महेश्वरकी आराधना में तत्पर हो प्रयत्न पूर्वक तपस्या की। वे नित्य ही विभूति धारण करते और रुद्राक्ष की माला पहनते थे। प्रतिदिन शिवलिंग का पूजन और शतरुद्रिय का जप करते थे। मुने ! उन ब्राह्मणों ने जब पुनः देवाधिदेव महादेवजी के शुभागमन का समाचार सुना, तब वे दण्डखात नामक महातीर्थ से उनका दर्शन करने के लिये आये। उनकी संख्या पाँच हजार थी। वे अपने हाथों में नूतन दूर्वादल, आर्द्र अक्षत, फूल, फल और सुगन्धित माला लिये हुए थे और मुख से भगवान् शिव की जय-जयकार बोलते थे। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके मंगलमय वैदिक सूत्रों द्वारा महादेवजी का स्तवन किया। तब भगवान् शंकर ने उन सबको अभय दान देकर प्रसन्नता पूर्वक उनका कुशल-मंगल पूछा। वे ब्राह्मण बोले- नाथ! इस क्षेत्र में निवास करने वाले हम लोगों के लिये सदा ही कुशल है। विशेषत: इस समय, जब कि हमने इन नेत्रों से आपके स्वरूप का प्रत्यक्ष दर्शन किया है, हमारी कुशल के लिये क्या कहना है। आप वही हैं, जिनके स्वरूप को श्रुतियाँ भी यथार्थ रूप से नहीं जानतीं। जो आपके क्षेत्र से विमुख हैं, वे ही सदा के लिये कुशल से वंचित हैं। सर्पों का भुजबन्द धारण करने वाले महादेव! जिनके हृदय में सदैव काशी का चिन्तन होता है उनके ऊपर संसार रूपी सर्प के विष का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। 'काशी' यह दो अक्षरों का मन्त्र गर्भ की रक्षा करने वाली (अथवा गर्भवास से बचाने वाली) मणि है। यह जिसके कण्ठ में स्थित है, उसका अमंगल कैसे हो सकता है? जो प्रतिदिन 'काशी' इस दो अक्षरमयी सुधा का पान करता है, वह जरा आदि छ: भावविका रोंसे रहित देवरूपता की भी उपेक्षा करके साक्षात् अमृत (मोक्ष) रूप हो जाता है। जिसने कानों में अमृत के समान प्रतीत होने वाले 'काशी' इन दो अक्षरों को सुना है, वह फिर कभी गर्भवास की कथा नहीं सुनता। काशी से अन्यत्र रहकर भी जो 'काशी-काशी-काशी' इस प्रकार जप करते हुए जीवन-यापन करता है, उसके आगे मुक्ति सदैव प्रकाशित होती है। भगवन् ! यह काशीपुरी कल्याण स्वरूपा है, आप कल्याण स्वरूप हैं तथा गंगाजी भी कल्याण स्वरूपा हैं। दूसरा कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जहाँ तीन- तीन कल्याण मूर्तियाँ रहती हों। काशी क्षेत्र की भक्ति से परिपूर्ण यह ब्राह्मणों का वचन सुनकर भगवान् शिव बहुत सन्तुष्ट हुए और प्रसन्नचित्त होकर बोले- द्विजवरो ! तुम सब धन्य हो, मैं जानता हूँ, इस क्षेत्र का सेवन करने से तुम विशुद्ध सत्त्वमय हो गये हो, तुममें रजोगुण और तमोगुण का सर्वथा अभाव है। अत एव तुम लोग संसार समुद्र से पार हो गये हो। जो काशीपुरी के भक्त हैं, वे निश्चय ही मेरे भक्त हैं और जीवन्मुक्त हैं। जो पापहीन मानव इस आनन्दवन में निवास करते हैं, वे निश्चय ही मेरे अन्तःकरण में स्थित होते हैं। जो मेरे क्षेत्र में रहकर मेरी भक्ति करते और मेरे चिह्नों को धारण करते हैं, उन्हीं को मैं उपदेश देता हूँ। काशीवासी ब्राह्मणो! मेरी भक्ति और चिह्न धारण करने वाले तुम सब लोग धन्य हो। तुम्हारे हृदय से न तो मैं दूर हूँ और न यह काशीपुरी ही दूर है। तुम सब लोग मुझसे अपनी रुचि से वर माँगो। ब्राह्मण बोले- उमापते ! महेश्वर! सर्वज्ञ! हमारे लिये यह वर है कि आप भवताप हरने वाली काशीपुरी का कदापि परित्याग न करें यहाँ काशी में ब्राह्मणों के वचन से कभी किसी के ऊपर भी ऐसा कोई शाप न लागू हो जो मोक्ष में विघ्न डालने वाला हो। आपके युगल चरणारविन्दों में हमारी निर्द्न्ध भक्ति बनी रहे। इस शरीर के अन्त तक हमारा निरन्तर काशी में ही निवास बना रहे। और किसी वर से हमें क्या काम है, हमें तो बस यही वर देना चाहिये। आपकी भक्ति से प्रभावित होकर हम लोगों ने आपके प्रतिनिधि स्वरूप जिन लिंगों की स्थापना की है, उन सबमें आपका निरन्तर वास हो। ब्राह्मणों के ये वचन सुनकर शिवजी ने कहा- 'तथास्तु' ऐसा ही हो। इसके सिवा तुम्हें दूसरा वर यह देता हूँ कि तुम सब ब्राह्मणों को यथार्थ ज्ञान प्राप्त होगा। मुक्ति की इच्छा रखने वाले पुरुषों को उत्तरवाहिनी गंगा के सेवन, शिवलिंग का यत्न पूर्वक पूजन, दम (इन्द्रियसंयम), दान और दया, ये सदा ही करने चाहिये। इस क्षेत्र में निवास करने वाले लोगों के लिये यही रहस्य की बात बतायी गयी है। अपनी बुद्धि को दूसरों के हित-चिन्तन में लगाना चाहिये और किसी से भी उद्वेग में डालने वाला वचन नहीं बोलना चाहिये। यहाँ विजय की इच्छा रखने वाले पुरुषों को मन से भी कभी पाप नहीं करना चाहिये, क्योंकि यहाँ का किया हुआ पुण्य और पाप अक्षय होता है। अन्यत्र का किया हुआ पाप काशी में नष्ट होता है, काशी में किया हुआ पाप अन्तर्गृह में नष्ट होता है, किंतु अन्तर्गृह में किया हुआ पाप पैशाच्यनरक की प्राप्ति कराने वाला है। अन्तर्गृह में पाप करने वाला पुरुष यदि काशी से बाहर चला जाता है तो उसे पिशाचनरक की प्राप्ति होती ही है, क्योंकि काशी में किया हुआ पाप कर्म करोड़ों कल्पों में भी शुद्ध नहीं होता। परंतु यदि यहीं उसकी मृत्यु हो तो उसे तीस हजार वर्षों तक रुद्रपिशाच होकर रहना पड़ता है। जो काशी में रहकर सदा पातकों में ही तत्पर रहता है, वह तीस हजार वर्षों तक पिशाचयोनि में रहेगा। उसके बाद फिर यहीं रहते हुए उसे उत्तम ज्ञान की प्राप्ति होगी और उसी ज्ञान से उसे परम उत्तम मोक्ष प्राप्त हो जायगा। इस संसार में सब कुछ अनित्य है और मनुष्य-जन्म अनेक प्रकार के पापों से भरा हुआ है, ऐसा जानकर संसार भय से छुड़ाने वाले अविमुक्त क्षेत्र (काशीधाम) का सदैव सेवन करना चाहिये। ब्राह्मणो ! मेरी भक्ति में तत्पर जो पतिव्रता स्त्रियाँ अविमुक्त क्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होती हैं, वे परम गति को पाती हैं। द्विजवरो! यहाँ प्राण निकलते समय मैं स्वयं हो जीव को तारक ब्रह्म का उपदेश देता हूँ जिससे वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। मुझमें मन लगाये रखने वाला तथा अपने सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें ही समर्पित करने वाला मेरा भक्त इस काशी में जिस प्रकार मोक्ष को प्राप्त होता है वैसा अन्य किसी पुण्य क्षेत्र में नहीं देहधारी जीव की मृत्यु निश्चित है, कर्मों से प्राप्त होने वाली गति भी दुःख रूप ही है तथा प्रत्येक आगन्तुक वस्तु एक-न-एक दिन चली जाने वाली है। ऐसा समझकर काशी की शरण लेनी चाहिये। जो अपने न्यायो पार्जित धन से एक भी काशी वासी पुरुष को तृप्त करता है, उसने मेरे साथ सम्पूर्ण त्रिलोकी को तृप्त कर दिया। धर्म से काशी की रक्षा करने वाले राजर्षि दिवोदास सशरीर मेरे उस लोक को प्राप्त हुए हैं जहाँ से पुन: इस संसार में आना नहीं होता। जो पृथ्वी के अन्तर में रहकर भी मेरे अविमुक्त नामक लिंग का स्मरण करते हैं वे निश्चय ही बड़े-बड़े पापों से भी मुक्त हो जाते हैं। इस क्षेत्र में जिसने भी मेरा दर्शन, स्पर्श और पूजन किया है वह तारक-ज्ञान प्राप्त करके पुन: इस संसार में जन्म नहीं लेता। जो इस तीर्थ में मेरी पूजा करके अन्यत्र कहीं मृत्यु को प्राप्त होता है वह दूसरे जन्म में भी मुझे प्राप्त होकर मुक्त हो जायगा। इस प्रकार ब्राह्मणों के आगे काशीक्षेत्र की महिमा का वर्णन करके महादेवजी उन सब ब्राह्मणों के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये वे ब्राह्मण भी भगवान् शंकर का प्रत्यक्ष दर्शन पाकर प्रसन्नचित्त हो अपने-अपने आश्रम को चले गये। ~~~०~~~ 'ॐ नमः शिवाय'

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मित्रों आज गुरुवार है, आज हम आपको सम्पूर्ण सत्यनारायण व्रत कथा एवं पूजन विधि बतायेगें!!!!!!! सत्यनारायण व्रत कथा और पूजन विधि का वर्णन स्कंद पुराण के रेवाखंड में है। सत्य को नारायण (विष्णु) के रूप में पूजना ही सत्यनारायण की पूजा है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि संसार में एकमात्र नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया है। सत्यनारायण व्रत की सम्पूर्ण कथा पांच अध्यायों में। हम अपने पाठकों के लिए पाँचों अध्याय प्रस्तुत कर रहे है। पहला अध्याय!!!!!!!! श्रीव्यास जी ने कहा – एक समय नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि सभी ऋषियों तथा मुनियों ने पुराणशास्त्र के वेत्ता श्रीसूत जी महाराज से पूछा – महामुने! किस व्रत अथवा तपस्या से मनोवांछित फल प्राप्त होता है, उसे हम सब सुनना चाहते हैं, आप कहें। श्री सूतजी बोले – इसी प्रकार देवर्षि नारदजी के द्वारा भी पूछे जाने पर भगवान कमलापति ने उनसे जैसा कहा था, उसे कह रहा हूं, आप लोग सावधान होकर सुनें। एक समय योगी नारदजी लोगों के कल्याण की कामना से विविध लोकों में भ्रमण करते हुए मृत्युलोक में आये और यहां उन्होंने अपने कर्मफल के अनुसार नाना योनियों में उत्पन्न सभी प्राणियों को अनेक प्रकार के क्लेश दुख भोगते हुए देखा तथा ‘किस उपाय से इनके दुखों का सुनिश्चित रूप से नाश हो सकता है’, ऐसा मन में विचार करके वे विष्णुलोक गये। वहां चार भुजाओं वाले शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा वनमाला से विभूषित शुक्लवर्ण भगवान श्री नारायण का दर्शन कर उन देवाधिदेव की वे स्तुति करने लगे। नारद जी बोले – हे वाणी और मन से परे स्वरूप वाले, अनन्तशक्तिसम्पन्न, आदि-मध्य और अन्त से रहित, निर्गुण और सकल कल्याणमय गुणगणों से सम्पन्न, स्थावर-जंगमात्मक निखिल सृष्टिप्रपंच के कारणभूत तथा भक्तों की पीड़ा नष्ट करने वाले परमात्मन! आपको नमस्कार है। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहां आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउंगा। नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो तो वह सब मैं सुनना चाहता हूं। उसे बतायें। श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूं, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूं। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये। श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है। जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए। केले के फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण अथवा गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए। बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है। दूसरा अध्याय!!!!!!!!! श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भलीभांति विस्तारपूर्वक कहूंगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था। ब्राह्मण प्रिय भगवान ने उस दुखी ब्राह्मण को देखकर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे विप्र! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वीपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं। ब्राह्मण बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र ब्राह्मण हूं और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूं। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये। वृद्ध ब्राह्मण बोला – हे ब्राह्मणदेव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। व्रत के विधान को भी ब्राह्मण से यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध ब्राह्मणरूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ब्राह्मण ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूंगा’ – यह सोचते हुए उस ब्राह्मण को रात में नींद नहीं आयी। अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह ब्राह्मण भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ ब्राह्मण सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया। हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस ब्राह्मण से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है। श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ। इसी बीच एक लकड़हारा वहां आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस ब्राह्मण को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये। विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया। सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूंगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहां धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया। इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूं का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया। उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया। तीसरा अध्याय!!!!!!!! श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और ब्राह्मणों को धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी। राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के लिए अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहां आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूं। राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूं। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूंगा। मुझे भी संतति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही संतति प्राप्त होगी।’ ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से संतति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे संतति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूंगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई। दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चन्द्रम की भांति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भांति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी। तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्टचित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया। उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और पअने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोों राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया। एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहां आ गये जहां वह साधु वणिक था। वहां राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बांधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बांधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया। भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी। कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक ब्राह्मण के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी। माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहां रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – मां! मैंने एक ब्राह्मण के घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें। वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायं। ’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः संतुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूंगा।’ राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बंदी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’ राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके। राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को संतुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया। पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायं।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया। चौथा अध्याय!!!!!!!!!! श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’ तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हंसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये। दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’ दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहां दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा। साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुराा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये। भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की। भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत कोअपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा। उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं। ’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’ माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये। तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी। कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूंगा। सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं। कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’ कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र संतुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया। पांचवा अध्याय!!!!!!!!!! श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूंगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया। एक बाद वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न उसे भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया। पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था। ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ। श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है। दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। हे ब्राह्मणों! इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं। कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें। महान प्रज्ञासम्पन्न शतानन्द नाम के ब्राह्मण सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया। महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर मोक्ष प्राप्त किया। महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया। !!श्री सत्यनारायण व्रत कथा सम्पूर्ण!! सत्यनारायण पूजन सामग्री !!!!!!!! सत्यनारायण पूजा में केले के पत्ते व फल के अलावा पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यकता होती जिनसे भगवान की पूजा होती है। सत्यनारायण की पूजा के लिए दूध, मधु, केला, गंगाजल, तुलसी पत्ता, मेवा मिलाकर पंचामृत तैयार किया जाता है जो भगवान को काफी पसंद है। इन्हें प्रसाद के तर पर फल, मिष्टान के अलावा आटे को भून कर उसमें चीनी मिलाकर एक प्रसाद बनता है, वह भी भोग लगता है। सत्यनारायण पूजन विधि !!!!!!!!! जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए। पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना बनाएं और उस पर पूजा की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएं। इस चौकी पर ठाकुर जी और श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें फिर इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की। इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी माता की और अंत में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें। पूजा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करें। पुरोहित जी को दक्षिणा एवं वस्त्र दे व भोजन कराएं। पुराहित जी के भोजन के पश्चात उनसे आशीर्वाद लेकर आप स्वयं भोजन करें।

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. ॥हरि ॐ तत्सत्॥ श्रीमद्भागवत-कथा श्रीमद्भागवत-महापुराण पोस्ट - 107 स्कन्ध - 05 अध्याय - 08 इस अध्याय में:- भरत जी का मृग के मोह में फँसकर मृगयोनि में जन्म लेना श्रीशुकदेव जी कहते हैं- एक बार भरत जी गण्डकी में स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौचादि अन्य आवश्यक कृत्यों से निवृत्त हो प्रणव का जप करते हुए तीन मुहूर्त तक नदी की धारा के पास बैठे रहे। राजन्! इसी समय एक हरिनी प्यास से व्याकुल हो जल पीने के लिये अकेली ही उस नदी के तीर पर आयी। अभी वह जल पी ही रही थी कि पास ही गरजते हुए सिंह की लोक भयंकर दहाड़ सुनायी पड़ी। हरिन जाति तो स्वभाव से ही डरपोक होती है। वह पहले ही चौकन्नी होकर इधर-उधर देखती जाती थी। अब ज्यों ही उसके कान में वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंह के डर के मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गये। प्यास अभी बुझी न थी, किन्तु अब प्राणों पर आ बनी थी। इसलिये उसने भयवश एकाकी नदी पार करने के लिये छलाँग मारी। उसके पेट में गर्भ था, अतः उछलते समय अत्यन्त भय के कारण उसका गर्भ अपने स्थान से हटकर योनिद्वार से निकलकर नदी के प्रवाह में गिर गया। वह कृष्णमृगपत्नी अकस्मात् गर्भ के गिर जाने, लम्बी छलाँग मारने तथा सिंह से डरी होने के कारण बहुत पीड़ित हो गयी थी। अब अपने झुंड से भी उसका बिछोह हो गया, इसलिये वह किसी गुफा में जा पड़ी और वहीं मर गयी। राजर्षि भरत ने देखा कि बेचारा हरिनी का बच्चा, अपने बन्धुओं से बिछुड़कर नदी के प्रवाह में बह रहा है। इससे उन्हें उस पर बड़ी दया आयी और वे आत्मीय के समान उस मातृहीन बच्चे को अपने आश्रम पर ले आये। उस मृगछौने के प्रति भरत जी की ममता उत्तरोत्तर बढ़ती ही गयी। वे नित्य उसके खाने-पीने का प्रबन्ध करने, व्याघ्रादि से बचाने, लाड़-लड़ाने और पुचकारने आदि की चिंता में ही डूबे रहने लगे। कुछ ही दिनों में उनके यम-नियम और भगवत्पूजा आदि आवश्यक कृत्य एक-एक करके छूटने लगे और अंत में सभी छूट गए। उन्हें ऐसा विचार रहने लगा- ‘अहो! कैसे खेद की बात है! इस बेचारे दीन मृगछौने को कालचक्र के वेग ने अपने झुंड, सुहृद् और बन्धुओं से दूर करके मेरी शरण में पहुँचा दिया है। यह मुझे ही अपना माता-पिता, भाई-बन्धु और यूथ के साथी-संगी समझता है। इसे मेरे सिवा और किसी का पता नहीं है और मुझमें इसका विश्वास भी बहुत है। मैं भी शरणागत की उपेक्षा करने में जो दोष हैं, उन्हें जानता हूँ। इसलिये मुझे अब अपने इस आश्रित का सब प्रकार की दोष बुद्धि छोड़कर अच्छी तरह पालन-पोषण और प्यार-दुलार करना चाहिये। निश्चय ही शान्त-स्वभाव और दीनों की रक्षा करने वाले परोपकारी सज्जन ऐसे शरणागत की रक्षा के लिये अपने बड़े-से-बड़े स्वार्थ की भी परवाह नहीं करते’। इस प्रकार उस हरिन के बच्चे में आसक्ति बढ़ जाने से बैठते, सोते, टहलते, ठहरते और भोजन करते समय भी उनका चित्त उसके स्नेहपाश में बँधा रहता था। जब उन्हें कुश, पुष्प, समिधा, पत्र और फल-मूलादि लाने होते तो भेड़ियों और कुत्तों के भय से उसे वे साथ लेकर ही वन में जाते। मार्ग में जहाँ-तहाँ कोमल घास आदि को देखकर मुग्धभाव से वह हरिणशावक अटक जाता तो वे अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय से दयावश उसे अपने कंधे पर चढ़ा लेते। इसी प्रकार कभी गोद में लेकर और कभी छाती से लगाकर उसका दुलार करने में भी उन्हें बड़ा सुख मिलता। नित्य-नैमित्तिक कर्मों को करते समय भी राजराजेश्वर भरत बीच-बीच में उठ-उठकर उस मृग बालक को देखते और जब उस पर उनकी दृष्टि पड़ती, तभी उनके चित्त को शान्ति मिलती। उस समय उसके लिये मंगलकामना करते हुए वे कहने लगते- ‘बेटा! तेरा सर्वत्र कल्याण हो। कभी यदि वह दिखायी न देता तो जिसका धन लुट गया हो, उस दीन मनुष्य के समान उनका चित्त अत्यन्त उद्विग्न हो जाता और फिर वे उस हरिनी के बच्चे के विरह से व्याकुल एवं सन्तप्त हो करुणावश अत्यन्त उत्कण्ठित एवं मोहविष्ट हो जाते तथा शोकमग्न होकर इस प्रकार कहने लगते- ‘अहो! क्या कहा जाये? क्या वह मातृहीन दीन मृगशावक दुष्ट बहेलिये की-सी बुद्धि वाले मुझ पुण्यहीन अनार्य का विश्वास करके और मुझे अपना मानकर मेरे किये हुए अपराधों को सत्पुरुषों के समान भूलकर फिर लौट आयेगा? क्या मैं उसे फिर इस आश्रम के उपवन में भगवान् की कृपा से सुरक्षित रहकर निर्विघ्न हरी-हरी दूब चरते देखूँगा? ऐसा न हो कि कोई भेड़िया, कुत्ता गोल बाँधकर विचरने वाले सूकरादि अथवा अकेले घूमने वाले व्याघ्रादि ही उसे खा जायें। अरे! सम्पूर्ण जगत् की कुशल के लिये प्रकट होने वाले वेदत्रयीरूप भगवान् सूर्य अस्त होना चाहते हैं; किन्तु अभी तक वह मृगी की धरोहर लौटकर नहीं आयी। क्या वह हरिण राजकुमार मुझ पुण्यहीन के पास आकर अपनी भाँति-भाँति की मृगशावकोचित मनोहर एवं दर्शनीय क्रीड़ाओं से अपने स्वजनों का शोक दूर करते हुए मुझे आनन्दित करेगा? अहो! जब कभी मैं प्रणयकोप से खेल में झूठ-मूठ समाधि के बहाने आँखें मूँदकर बैठ जाता, तब वह चकित चित्त से मेरे पास आकर जलबिन्दु के समान कोमल और नन्हें-नन्हें सींगों की नोक से किस प्रकार मेरे अंगों को खुजलाने लगता था। मैं कभी कुशों पर हवन सामग्री रख देता और वह उन्हें दाँतों से खींचकर अपवित्र कर देता तो मेरे डाँटने-डपटने पर वह अत्यन्त भयभीत होकर उसी समय सारी उछल-कूद छोड़ देता और ऋषिकुमार के समान अपनी समस्त इन्द्रियों को रोककर चुपचाप बैठ जाता था’। [फिर पृथ्वी पर उस मृगशावक के खुर के चिह्न देखकर कहने लगते-] ‘अहो! इस तपस्विनी धरती ने ऐसा कौन-सा तप किया है जो उस अतिविनीत कृष्णसार किशोर के छोटे-छोटे सुन्दर, सुखकारी और सुकोमल खुरों वाले चरणों के चिह्नों से मुझे, जो मैं अपना मृगधन लुट जाने से अत्यन्त व्याकुल और दीन हो रहा हूँ, उस द्रव्य की प्राप्ति का मार्ग दिखा रही है और स्वयं अपने शरीर को भी सर्वत्र उन पदचिह्नों से विभूषित कर स्वर्ग और अपवर्ग के इच्छुक द्विजों के लिये यज्ञस्थल[1] बना रही है। (चन्द्रमा में मृग का-सा श्याम चिह्न देख उसे अपना ही मृग मानकर कहने लगते-) ‘अहो! जिसकी माता सिंह के भय से मर गयी थी, आज वही मृगशिशु अपने आश्रम से बिछुड़ गया है। अतः उसे अनाथ देखकर क्या ये दीनवत्सल भगवान् नक्षत्रनाथ दयावश उसकी रक्षा कर रहे हैं? [फिर उसकी शीतल किरणों से आह्लादित होकर कहने लगते-] ‘अथवा अपने पुत्रों के वियोगरूप दावानलरूप विषम ज्वाला से हृदयकमल दग्ध हो जाने के कारण मैंने एक मृग बालक का सहारा लिया था। अब उसके चले जाने से फिर मेरा हृदय जलने लगा है; इसलिये ये अपनी शीतल, शान्त, स्नेहपूर्ण और वदनसलिलरूपा अमृतमयी किरणों से मुझे शान्त कर रहे हैं’। राजन्! इस प्रकार जिनका पूरा होना सर्वथा असम्भव था, उन विविध मनोरथों से भरत का चित्त व्याकुल रहने लगा। अपने मृगशावक के रूप में प्रतीत होने वाले प्रारब्ध कर्म के कारण तपस्वी भरत जी भगवदाराधनरूप कर्म एवं योगानुष्ठान से च्युत हो गये। नहीं तो, जिन्होंने मोक्ष मार्ग में साक्षात् विघ्नरूप समझकर अपने ही हृदय से उत्पन्न दुस्त्यज पुत्रादि को भी त्याग दिया था, उन्हीं की अन्यजातीय हरिणशिशु में ऐसी आसक्ति कैसे हो सकती थी। इस प्रकार राजर्षि भरत विघ्नों के वशीभूत होकर योग साधन से भ्रष्ट हो गये और उस मृगछौने के पालन-पोषण और लाड़-प्यार में ही लगे रहकर आत्मस्वरूप को भूल गये। इसी समय जिसका टलना अत्यन्त कठिन है, वह प्रबल वेगशाली कराल काल, चूहे के बिल में जैसे सर्प घुस आये, उसी प्रकार उनके सिर पर चढ़ आया। उस समय भी वह हरिणशावक उनके पास बैठा पुत्र के समान शोकातुर हो रहा था। वे उसे इस स्थिति में देख रहे थे और उनका चित्त उसी में लग रहा था। इस प्रकार की आसक्ति में ही मृग के साथ उनका शरीर भी छूट गया। तदनन्तर उन्हें अन्तकाल की भावना के अनुसार अन्य साधारण पुरुषों के समान मृग शरीर ही मिला। किन्तु उनकी साधना पूरी थी, इससे उनकी पूर्वजन्म की स्मृति नष्ट नहीं हुई। उस योनि में भी पूर्वजन्म की भगवदाराधना के प्रभाव से अपने मृगरूप होने का कारण जानकार वे अत्यन्त पश्चाताप करते हुए कहने लगे- ‘अहो! बड़े खेद की बात है, मैं संयमशील महानुभावों के मार्ग से पतित हो गया। मैंने तो धैर्यपूर्वक सब प्रकार की आसक्ति छोड़कर एकान्त और पवित्र वन का आश्रय लिया था। वहाँ रहकर जिस चित्त को मैंने सर्वभूतात्मा श्रीवासुदेव में, निरन्तर उन्हीं के गुणों का श्रवण, मनन और संकीर्तन करके तथा प्रत्येक पल को उन्हीं की आराधना और स्मरणादि से सफल करके, स्थिर भाव से पूर्णतया लगा दिया था, मुझ अज्ञानी का वही मन अकस्मात् एक नन्हें-से हरिणशिशु के पीछे अपने लक्ष्य से च्युत हो गया। इस प्रकार मृग बने हुए राजर्षि भरत के हृदय में जो वैराग्य-भावना जाग्रत् हुई, उसे छिपाये रखकर उन्होंने अपनी माता मृगी को त्याग दिया और अपनी जन्मभूमि कालंजर पर्वत से वे फिर शान्त स्वभाव मुनियों के प्रिय उसी शालग्राम तीर्थ में, जो भगवान् का क्षेत्र है, पुलस्त्य और पुलह ऋषि के आश्रम पर चले आये। वहाँ रहकर भी वे काल की ही प्रतीक्षा करने लगे। आसक्ति से उन्हें बड़ा भय लगने लगा था। बस, अकेले रहकर वे सूखे पत्ते, घास और झाड़ियों द्वारा निर्वाह करते मृगयोनि की प्राप्ति कराने वाला प्रारब्ध के क्षय की बाट देखते रहे। अन्त में उन्होंने अपने शरीर का आधा भाग गण्डकी के जल में डुबाये रखकर उस मृग शरीर को छोड़ दिया। ~~~०~~~ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे। हे नाथ नारायण वासुदेवाय॥ "जय जय श्री हरि"

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. श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली पोस्ट - 080 हाहाकार हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज। दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम्॥ निद्रा में पड़ी हुई विष्णुप्रिया जी ने करवट बदलीं। सहसा वे चौक पड़ीं और जल्दी से उठकर बैठ गयीं। मानो उनके ऊपर चौडे़ मैदान में बिजली गिर पड़ी हो, अथवा सोते समय किसी ने उनका सर्वस्व हरण कर लिया हो। वे भूली-सी, पगली-सी, बेसुधि-सी, आँखों को मलती हुई चारों ओर देखने लगीं। उन्हें जागते हुए भी स्वप्न का-सा अनुभव होने लगा। वे अपने हाथों से प्रभु की शय्या को टटोलने लगीं, किंतु अब वहाँ था ही क्या! शुक तो पिंजड़ा परित्याग करके वनवासी बन गया। अपने प्राणनाथ का पंलग पर न पाकर विष्णुप्रिया जी ने जोरों के साथ चीत्कार मारी और ‘हा नाथ! हा प्राणप्यारे! मुझ दु:खिनी को इस प्रकार धोखा देकर चले गये।’ यह कहते-कहते जोरों से नीचे गिर पड़ीं और ऊपर से गिरते ही बेसूधि हो गयीं। उनके क्रन्दन की ध्वनि शचीमाता के कानों में पड़ी। उनकी उस करुणक्रन्दन से बेहोशी दूर हुई। वहीं पड़े-पड़े उन्होंने कहा- ‘बेटी! बेटी! क्या मैं सचमूच लुट गयी? क्या मेरा इकलौता बेटा मुझे धोखा देकर चला गया? क्या वह मेरी आँखों का तारा निकलकर मुझ विधवा को इस वृद्धावस्था में अन्धी बना गया? मेरी आँखों के दो तारे थे। एक के निकल जाने पर सोचती थी, एक आँख से ही काम चला लूंगी। आज तो दूसरा भी निकल गया। अब मुझ अन्धी को संसार सूना-ही-सूना दिखायी पड़ेगा। अब मुझ अन्धी की लाठी कौन पकडे़गा? बेटी! विष्णुप्रिया! बोलती क्यों नहीं? क्या निमाई सचमुच चला गया?’ विष्णुप्रिया बेहोश थीं, उनके मुख में से आवाज ही नहीं निकलती थी। वे सास की बातों को न सूनती हुई जोरों से रुदन करने लगीं। दु:खिनी माता उठी और लड़खड़ाती हुई प्रभु के शयन-भवन में पहुँची। वहाँ उसने प्रभु के पलंग को सूना देखा। विष्णुप्रिया नीचे पड़ी हुई रुदन कर रही थीं। माता की अधीरता का ठिकाना नहीं रहा। वे जोरों से रुदन करने लगीं- ‘बेटा निमाई! तू कहाँ चला गया? अरे, अपनी इस बूढ़ी माता को इस तरह धोखा मत दे। बेटा! तू कहाँ छिप गया है, मुझे अपनी सूरत तो दिखा जा। बेटा! तू रोज प्रात:काल मुझे उठकर प्रणाम किया करता था। आज मैं कितनी देर से खड़ी हूँ, उठकर प्रणाम क्यों नहीं करता!’ इतना कहकर माता दीपक को उठाकर घर के चारों ओर देखने लगी। मानो मेरा निमाई यहीं कहीं छिपा बैठा होगा। माता पलंग के नीचे देख रही थीं। बिछौना को बार-बार टटोलतीं, मानो निमाई इसी में छिप गया। वृद्धा माता के दु:ख के कारण काँपते हुए हाँथों से दीपक नीचे गिर पड़ा और वे भी विष्णुप्रिया के पास ही बेहोश होकर गिर पड़ीं और फिर उठकर चलने को तैयार हुईं और कहती जाती थीं- ‘मैं तो वहीं जाऊंगी जहाँ मेरा निमाई होगा। मैं तो अपने निमाई को ढुंढ़ूगी, वह यदि मिल गया तो उसके साथ रहूंगी, नहीं तो गंगा जी में कूदकर प्राण दे दूंगी।’ यह कहकर वे दरवाजे की ओर जाने लगीं। विष्णुप्रिया जी भी अब होश में आ गयीं और वे भी माता के वस्त्र को पकड़कर जिस प्रकार गौ के पीछे उसकी बछिया चलती है, उसी प्रकार चलने लगीं। वृद्धा माता द्वार पर भी नहीं पहुँचने पायीं कि बीच में ही मूर्च्छित होकर गिर पड़ीं। इतने में ही कुछ भक्त उषा-स्नान करके प्रभु के दशनों के लिये आ गये। द्वार पर माता को बेहोश पड़े देखकर भक्त समझ गये कि महाप्रभु आज जरूर चले गये। इतने में ही नित्यानन्द, गदाधर, मुकुन्द, चन्द्रशेखर आचार्य तथा श्रीवास आदि सभी भक्त वहाँ आ गये। माता को और विष्णुप्रिया को इस प्रकार विलाप करते देखकर भक्त उन्हें भाँति-भाँति से समझा-समझाकर आश्वासन देने लगे। श्रीवास ने माता से कहा- ‘माता! तुम सोच मत करो। तुम्हारा निमाई तुमसे जरूर मिलेगा। तुम्हारा पुत्र इतना कठोर नहीं है।’ माता संज्ञा शून्य-सी पड़ी हुई थी। नित्यानन्द जी ने माता के अपने हाथ से उठाया। उनके सम्पूर्ण शरीर में लगी हुई धूलि को अपने वस्त्र से पोंछा और उसे धैर्य दिलाते हुए वे कहने लगे- ‘माता! तुम इतना शोक मत करो। हमारा हृदय फटा जाता है। हम तुम्हारे दूसरे पुत्र हैं। हम तुमसे शपथपूर्वक कहते हैं, तुम्हारा निमाई जहाँ भी कहीं होगा, वहीं से लाकर हम उसे तुमसे मिला देंगे। हम अभी जाते हैं।’ नित्यानन्द जी की बात सुनकर माता ने कुछ धैर्य धारण किया। उन्होंने रोते-रोते कहा- ‘बेटा! मैं निमाई बिना जीवित न रह सकूंगी। तुम कहीं से भी उसे ढ़ूंढ़कर ले आ। नहीं तो मैं विष खाकर या गंगा जी में कूदकर अपने प्राणों को परित्याग कर दूंगी।’ नित्यानन्द जी ने कहा- ‘माँ! इस प्रकार के तुम्हारे रुदन को देखकर हमारी छाती फटती है। तुम धैर्य धरो। हम अभी जाते हैं।’ यह कहकर नित्यानन्द जी ने श्रीवास पण्डित को तो माता तथा विष्णुप्रिया जी की देख-रेख के लिये वहीं छोड़ा। वे जानते थे कि प्रभु कटवा (कण्टक नगर) में स्वामी केशव भारती से संन्यास लेने की बात कर रहे थे, अत: नित्यानन्द जी अपने साथ वक्रेश्वर, गदाधर, मुकुन्द और चन्द्रशेखर आचार्य को लेकर गंगा पर करके कटवाकी ही ओर चल पड़े। श्रीकृष्ण! गोविन्द! हरे मुरारे! हे नाथ! नारायण! वासुदेव! ----------:::×:::---------- - प्रभुदत्त ब्रह्मचारी श्री श्रीचैतन्य चरित्रावली (123) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे"

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पुण्य कमाने के महीने माघ मास का महत्व जानिए अजित कुमार पान्डेय एकौनी वालें हिन्दू पंचांग के चंद्रमास के अनुसार वर्ष का ग्यारहवां महीना है माघ। पौष के बाद माघ माह प्रारंभ होता है। पुराणों में माघ मास के महात्म्य का वर्णन मिलता है। इसका नाम माघ इसलिए रखा गया क्योंकि यह मघा नक्षत्रयुक्त पूर्णिमा से प्रारंभ होता है। चंद्रमास के महीने के नाम नक्षत्रों पर ही आधारित है, जैसे पौष का पुष्य नक्षत्र से संबंध है। पद्म पुराण में माघ मास में कल्पवास के दौरान स्नान, दान और तप के माहात्म्य के विस्तार से वर्णन मिलता है। इसके अलावा माघ में ब्रह्मवैवर्तपुराण की कथा सुनने के महत्व का वर्णन भी मिलता है। माघ महीने की शुक्ल पंचमी से वसंत ऋतु का आरंभ होता है और तिल चतुर्थी, रथसप्तमी, भीष्माष्टमी आदि व्रत प्रारंभ होते हैं। माघ शुक्ल चतुर्थी को उमा चतुर्थी कहता जाता है। शुक्ल सप्तमी को व्रत का अनुष्ठान होता है। माघ कृष्ण द्वादशी को यम ने तिलों का निर्माण किया और दशरथ ने उन्हें पृथ्वी पर लाकर खेतों में बोया था। अतएव मनुष्यों को उस दिन उपवास रखकर तिलों का दान कर तिलों को ही खाना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा होती है। 'माघे निमग्नाः सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति।' 'प्रीतये वासुदेवस्य सर्वपापानुत्तये। माघ स्नानं प्रकुर्वीत स्वर्गलाभाय मानवः॥' पुराणों के अनुसार इस मास में शीतल जल के भीतर डुबकी लगाने वाले मनुष्य पापमुक्त हो स्वर्ग लोक में जाते हैं। पद्मपुराण में अनुसार माघ मास में पूजा करने से भी भगवान श्रीहरि को उतनी प्रसन्नता नहीं होती, जितनी कि माघ महीने में स्नान मात्र से होती है। इसलिए सभी पापों से मुक्ति और भगवान वासुदेव की प्रीति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक मनुष्य को माघ स्नान करना चाहिए। माघमासे गमिष्यन्ति गंगायमुनसंगमे। ब्रह्माविष्णु महादेवरुद्रादित्यमरूद्गणा:।। माघ मास में प्रयाग संगम तट पर कल्पवास करने का विधान है। साथ ही माघ मास की अमावास्या को प्रयागराज में स्नान से अनंत पुण्य प्राप्त होते हैं। वह सब पापों से मुक्त होकर स्वर्ग में जाता है क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, रुद्र, आदित्य तथा मरूद्गण माघ मास में प्रयागराज के लिए यमुना के संगम पर गमन करते हैं। अजित कुमार पान्डेय एकौनी वालें

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जानिए कब से शुरू हो रहा है माघ माह, जानें इस कथा से इस महीने का महत्व माघ मास 29 जनवरी से शुरू हो रहा है. हिंदू धर्म इस माह का बहुत महत्व है. हिंदू पंचाग के अनुसार, यह 11वां महीना होता है. इस महीने धर्मिक कार्य ज्यादा होते हैं. जैसे पवित्र नदियों में स्नान और दान करना महत्व बहुत है. ऐसी मान्यता है कि अगर व्यक्ति माघ माह के महीने में किसी पवित्र नदी में स्नान करता है तो उसके पापों का नाश हो जाता है. जानते है इस कथा इस महीने में स्नान और दान का महत्व.... कथा - प्राचीन काल में नर्मदा तट पर शुभव्रत नामक ब्राह्मण निवास करते थे. वे सभी वेद शास्त्रों के अच्छे ज्ञाता थे. किंतु उनका स्वभाव धन संग्रह करने का अधिक था. उन्होंने धन तो बहुत एकत्रित किया. वृद्घावस्था के दौरान उन्हें अनेक रोगों ने घेर लिया. तब उन्हें ज्ञान हुआ कि मैंने पूरा जीवन धन कमाने में लगा दिया अब परलोक सुधारना चाहिए. वह परलोक सुधारने के लिए चिंतातुर हो गए. अचानक उन्हें एक श्लोक याद आया जिसमें माघ मास के स्नान की विशेषता बताई गई थी. उन्होंने माघ स्नान का संकल्प लिया और 'माघे निमग्ना: सलिले सुशीते विमुक्तपापास्त्रिदिवं प्रयान्ति..' इसी श्लोक के आधार पर नर्मदा में स्नान करने लगे. नौ दिनों तक प्रात: नर्मदा में जल स्नान किया और दसवें दिन स्नान के बाद उन्होंने अपना शरीर त्याग दिया. शुभव्रत ने जीवन भर कोई अच्छा कार्य नहीं किया था लेकिन माघ मास में स्नान करके पश्चाताप करने से उनका मन निर्मल हो गया. माघ मास के स्नान करने से उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई. इस तरह जीवन के अंतिम क्षणों में उनका कल्याण हो गया.

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🌹काली हल्दी के सौभाग्यवर्धक प्रयोग 🌹 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ हिन्दू धर्म में धन और ऐश्वर्य की देवी विष्णुपत्नी महालक्ष्मी है । लक्ष्मी की प्रसन्नता से धनवान होने के लिए तंत्र विज्ञान में बहुत से सरल प्रयोग बताये गये है । इन में से एक प्रयोग है रसोई में प्राय: मसालों के रुप में उपयोग आने वाली हल्दी से धन प्राप्ति का रास्ता । हर व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में हल्दी का उपयोग किसी न किसी रुप में करता ही है। भोजन,चोट लगने, मांगलिक कार्य, पूजा-अर्चना में हल्दी का उपयोग किया जाता है। अक्सर हम हल्दी की पीली और नारंगी रंग गांठ देखते हैं। किंतु इन्हीं हल्दी की गांठों में संयोग से कभी-कभी काले रंग की गांठ भी पैदा हो जाती है। लेकिन जानकारी के अभाव में हम उसे खराब मानकर अलग कर देते हैं, फेक देते है। जबकि तंत्र विज्ञान के अनुसार यह काली हल्दी की गांठ ही धन का खजाना माना जाता है। जिसकी विधिवत साधना से अपार धन-संपदा पाई जा सकती है। हल्दी को संस्कृत में हरिद्रा भी कहा जाता है। तंत्र विद्या में लक्ष्मी प्राप्ति के इस प्रयोग को साधना कहा जाता है। तंत्र विज्ञान में काली हल्दी बहुत अनमोल, अद्भुत और देवीय गुणों वाली मानी जाती है। हालांकि इसका रंग-रुप भद्दा और अनाकर्षक होता है, किंतु धन प्राप्ति की दृष्टि से बहुत प्रभावकारी मानी गई है। अगर संयोग से आपको काली हल्दी मिल जाए तो आप स्वयं को सौभाग्यशाली मानें उसे अपने देवालय में विष्णु-लक्ष्मी प्रतिमा के समीप रखें और विधिवत पूजा करें। माना जाता है कि इसके रखने मात्र से ही घर में सुख-शांति आने लगती है। काली हल्दी की गांठ को चांदी के साथ या किसी भी सिक्के के साथ एक स्वच्छ और नए वस्त्र में बांधकर अन्य देव प्रतिमाओं के साथ पूजा करें। इस पोटली को गृहस्थ अपने घर की तिजोरी और व्यापारी अपने गल्ले में रख दें। ऐसा करने पर धनोपार्जन में आने वाली बाधा दूर होती है और अद्भूत धनलाभ होता है। तंत्र विज्ञान में काली हल्दी की गांठ या हरिद्रा तंत्र की सिद्धी के लिए पूजा विधान, नियम बताए गए हैं। धन प्राप्ति के लिए हल्दी की काली गांठ यानि हरिद्रा तंत्र की साधना शुक्ल या कृष्ण पक्ष की किसी भी अष्टमी से शुरु की जा सकती है । इसके लिए पूजा सूर्योदय के समय ही की जाती है। 👉 हरिद्रा तंत्र की नियम-संयम से साधना व्रती को मनोवांछित और अनपेक्षित धनलाभ होता है। रुका धन प्राप्त हो जाता है। परिवार में सुख-समृद्धि आती है। इस तरह एक हरिद्रा यानि हल्दी घर की दरिद्रता को दूर कर देती है। 👉 पूर्वी मनोगत और गहन अध्ययनों से पता चला है की काली हल्दी बंगाल में चमत्कारी औषधियों के उपयोगों के कारण बहुत उपयोग में लायी जाती है । साधक इसे माता काली जी की पूजा करने में भी प्रयोग करते है । यह घर में बुरी शक्तियों को प्रवेश नहीं करने देती है । इसको ज्यादा बाधायों का नाश करने में उपयोग किया जाता है । 👉 यदि परिवार में कोई व्यक्ति निरन्तर अस्वस्थ्य रहता है, तो पहले गुरूवार को आटे के दो पेड़े बनाकर उस में गीली चने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी सी पिसी काली हल्दी को दबाकर रोगी व्यक्ति के उपर से 7 बार उवार कर गाय को खिला दें । यह उपाय लगातार 3 गुरूवार करने से आश्चर्यजनक लाभ मिलता है । 👉 यदि किसी व्यक्ति या बच्चे को नजर लग गयी है, तो काले कपड़े में काली हल्दी को बांधकर 7 बार उपर से उतार कर बहते हुये जल में प्रवाहित कर दें । इस से नजर से मुक्ति मिलेगी । 👉 शुक्लपक्ष के प्रथम गुरूवार से नियमित रूप से काली हल्दी पीसकर तिलक लगाने से गुरू और शनी दोनों ग्रह शुभ फल देने लगेंगे । यदि किसी के पास धन आता तो बहुत किन्तु टिकता नहीं है, उन्हे यह उपाय अवश्य करना चाहिए । 👉 शुक्लपक्ष के प्रथम शुक्रवार को चांदी की डिब्बी में काली हल्दी, नागकेशर व सिन्दूर को साथ में काली हल्दी रखकर मां लक्ष्मी के चरणों से स्पर्श करवा कर धन रखने के स्थान पर रख दें । यह उपाय करने से धन रूकने लगेगा । 👉 यदि आपके व्यवसाय में निरन्तर गिरावट आ रही है, तो शुक्ल पक्ष के प्रथम गुरूवार को पीले कपड़े में काली हल्दी, 11 अभिमंत्रित गोमती चक्र, चांदी का सिक्का व 11 अभिमंत्रित धनदायक कौड़ियां बांधकर 108 बार “ऊँ नमो भगवते वासुदेव नमः ” का जाप कर धन रखने के स्थान पर रखने से व्यवसाय में प्रगतिशीलता आ जाती है । 👉 यदि आपका व्यवसाय मशीनों से सम्बन्धित है, और आये दिन कोई मॅहगी मशीन आपकी खराब हो जाती है । तो आप काली हल्दी को पीसकर केशर व गंगा जल मिलाकर प्रथम बुधवार को उस मशीन पर स्वास्तिक बना दें । यह उपाय करने से मशीन जल्दी खराब नहीं होगी । 👉 दीपावली के दिन पीले वस्त्रों में काली हल्दी के साथ एक चांदी का सिक्का रखकर धन रखने के स्थान पर रख देने से वर्ष भर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है । 👉 यदि कोई व्यक्ति मिर्गी या पागलपन से पीडि़त हो तो किसी अच्छे मूहूर्त में काली हल्दी को कटोरी में रखकर लोबान की धूप दिखाकर शुद्ध करें । तत्पश्चात एक टुकड़ें में छेद कर धागे की मद्द से उसके गले में पहना दें और नियमित रूप से कटोरी की थोड़ी सी हल्दी का चूर्ण ताजे पानी से सेंवन कराते रहें । इस से आप को अवश्य लाभ मिलेगा। 👉 शुभ दिन में गुरु पुष्य या रवि पुष्य नक्षत्र हो । राहुकाल न हो, शुभ घड़ी में काली हल्दी को लाएँ । इसे शुद्ध जल से भीगे कपड़े से पोंछकर लोबान की धूप की धुनी में शुद्ध कर लें व कपड़े में लपेटकर रख दें । आवश्यकता होने पर इसका एक माशा चूर्ण ताजे पानी के साथ सेवन कराये व एक छोटा टुकड़ा काटकर धागे में पिरोकर रोगी के गले या भुजा में बाँध दें। इस प्रकार उन्माद, मिर्गी, भ्रांति और अनिन्द्रा जैसे मानसिक रोगों मे बहुत लाभ होता है। 👉 गुरु पुष्य नक्षत्र में काली हल्दी को सिंदूर में रखकर लाल वस्त्र में लपेटकर धूप आदि देकर कुछ सिक्कों के साथ बाँधकर बक्से या तिजोरी में रख दें तो धनवृद्धि होने लगती है। 👉 काली हल्दी, श्वेतार्क मूल, रक्त चन्दन और हनुमान मंदिर या काली मंदिर में हुए हवन की विभूति गोमूत्र में मिलाकर लेप बनायें और उससे घर के मुख्या द्वार और सभी प्रवेश के दरवाजों के ऊपर स्वास्तिक का चिन्ह बनायें । इससे किसी भी प्रकार की बुरी नज़र, टोना टोटका या बाधा आपके घर में प्रवेश नहीं कर सकेंगे । - जिस व्यक्ति को बुरी नजर लगी हो या बार बार लगती हो या अक्सर बीमार रहता हो तो काली हल्दी, श्वेतार्क मूल, रक्त चन्दन और हनुमान मंदिर या काली मंदिर में हुए हवन की विभूति गोमूत्र में मिलाकर मिश्रण का तिलक माथे कंठ व् ह्रदय पर करे तो सुरक्षित रहता है। 👉 काली हल्दी का चूर्ण दूध में भिगोकर चेहरे और शरीर पर लेप करने से सौन्दर्य की वृद्धि होती है। 👉 मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए तंत्र शास्त्र में हरिद्रा तंत्र में चर्चा की गयी है । कहते हैं, इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन-धान्य की वर्षा करती हैं । हरिद्रा यानी काली हल्दी खाने के काम में नहीं आती, पर चोट लगने और दूसरे औषधीय गुणों में इसे महत्व दिया जाता है । यदि किसी को इस काली हल्दी की गांठ प्राप्त हो, तो उसे पूजा घर में रख दें । मान्यता है कि यह जहां भी होती है, सहज ही वहां श्री-समृद्धि का आगमन होने लगता है । हरिद्रा तंत्र को नए कपड़े में अक्षत और चांदी के टुकड़े अथवा किसी सिक्के के साथ रखकर गांठ बांध दें । और धूप-दीप से पूजा करके गल्ले या बक्से में रख दें, तो आश्चर्यजनक आर्थिक लाभ होने लगता है । लेकिन इसको घर में रखने से पहले अभिमंत्रित भी कर लें, तभी इसका विशेष प्रभाव दिखता है । 👉 हरिद्रा तंत्र के लिए साधना विधि महीने की किसी भी अष्टमी से इस पूजा को शुरू कर सकते हैं । इस दिन प्रात: उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठ जाएं । तत्पश्चात् काली हल्दी की गांठ को धूप-दीप देकर नमस्कार करें । फिर उगते हुए सूर्यको नमस्कार करें और 108 बार ‘‘ॐ ह्रीं सूर्याय नम: मंत्र का जाप करे ।’ इसके बाद स्थापित काली हल्दी की पूजा करें । पूरे दिन व्रत रखें और फलाहार करें । यथाशक्ति दान-पुण्य भी करें । हरिद्रा तंत्र की साधना में यह तथ्य स्मरण रखना चाहिए कि इसके साधक के लिए मूली, गाजर और जिमींकंद का प्रयोग वर्जित है । इस प्रयोग को विधिपूर्वक करने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं । घर में बरकत होती है। 👉 चंदन की भाँति काली हल्दी का तिलक लगाएँ । यदि अपनी कनिष्ठा उँगली का रक्त भी मिला दिया जाए तो प्रभाव में वृद्धि होगी । यह तिलक लगाने वाला सबका प्यारा होता है । सामने वाले को आकर्षित करता है। 👉 काली हल्दी रोली तुलसी की मंजरी को समरूप आंवले के रस में पीस कर जिसके भी सअम्मुख जायेंगे वो स्वतः आपके अनुरूप कार्य करेगा। 👉 काली हल्दी, श्वेतार्क मूल, श्वेत चन्दन, गोरोचन, पान और हरसिंगार की जड़ पीस कर एक चाँदी की डिब्बी में लेप बनाकर रख लें । जिसे वश में करना हो उसके सम्मुख आने से पूर्व इसका तिलक धारण कर लें । इस प्रकार कि तिलक लगाने के बाद आपको सर्व प्रथम देखे । 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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