‎श्रीराम‬

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Jaipanday Panday Nov 19, 2019

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हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। 🚩🚩श्रीराम जी और सुग्रीव की मित्रता🚩🚩 और हनुमान जी प्रभु श्रीराम और भइया लक्ष्मण को ऋष्यमूक पर्वत पर एक कन्दरा यानि गुफा मे लेकर आये हैं, और सुग्रीव प्रभु श्रीराम जी के चरणों में मस्तक नवाकर आदर सहित मिले। और भइया लक्ष्मण से गले लगा लिया। फिर सुग्रीव ने जामवन्त, नल-नील आदि से परिचय कराया और श्रीराम जी और सुग्रीव की मित्रता हुई तब हनुमान जी ने दोनों ओर की सब कथा सुनाई, और जनक दुलारी सीता जी का हरण सुन सुग्रीव आदि के नेत्रों में जल भर आया, सुग्रीव कहने लगा- हे नाथ! मिथिलेशकुमारी जानकी जी अवश्य मिल जाएँगी। हे नाथ! एक बार मैं यहाँ मंत्रियों के साथ बैठा हुआ कुछ विचार कर रहा था। उसी समय विलाप करती हुई एक स्त्री को आकाश मार्ग से जाते देखा था, हमें देखकर उन्होंने 'राम! राम! हा राम!' पुकारकर वस्त्र मे कुछ गहने बांधकर गिरा दिया था। और सुग्रीव ने उस वस्त्र और गहनों को दिखाया। और उस वस्त्र को देखते ही श्रीराम जी ने वस्त्र को हृदय से लगा लिया प्रभु की आँखें डबडबा गईं हाँ प्रभु श्रीराम जी की आँखें भर आयीं, और यह देख भइया लक्ष्मण फफककर रो पड़े और अपना यानि स्वयं को दोष देकर कहने लगे, "भैय्या! इन आभूषणों में से न तो मैं हाथों के कंगनों को पहचानता हूँ, न गले के हार को और न ही मस्तक के किसी अन्य आभूषणों को पहचानता हूँ। क्योंकि मैंने आज तक सीता जी के हाथों और मुख की ओर कभी दृष्टि नहीं डाली। हाँ, उनके चरणों की नित्य वन्दना करता रहा हूँ, इसलिये इन नूपुरों को अवश्य पहचानता हूँ, ये नूपुर उन्हीं के हैं।" सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुनिए। मन में धीरज लाइए। मैं सब प्रकार से आपकी सेवा करूँगा, चाहे जो भी उपाय करना पड़े, यह सुनते ही कृपा के समुद्र श्रीराम जी मित्र सुग्रीव के वचन सुनकर हर्षित हुए। और बोले- हे सुग्रीव! मुझे बताओ, तुम वन में किस कारण रहते हो? तब सुग्रीव ने कहा- हे नाथ! बालि और मैं दो भाई हैं, हम दोनों में ऐसी प्रीति थी कि वर्णन नहीं की जा सकता। और पूरी कथा कह सुनाई, उसने मुझे शत्रु के समान मारा और मेरी स्त्री को भी छीन लिया। हे कृपालु रघुवीर! मैं उसके भय से यहाँ रहता हूँ वह शाप के कारण यहाँ नहीं आता, तो भी मैं मन में भयभीत रहता हूँ। मित्र का दुःख सुनकर दीनों पर दया करने वाले श्रीराम जी की दोनों विशाल भुजाएँ फड़क उठीं, श्रीराम जी ने अग्नि के साक्षी मानकर प्रतिज्ञा की और कहने लगे, मित्र सुग्रीव! सुनो, मैं एक ही बाण से बालि को मार डालूँगा। ब्रह्मा और रुद्र की शरण में जाने पर भी उसके प्राण नही बचेंगे, हे सखा! मेरे बल पर अब तुम चिंता छोड़ दो। मैं सब प्रकार से तुम्हारी सहायता करूँगा। सुग्रीव ने कहा- हे रघुवीर! सुनिए, बालि बहुत बलवान् और है, वरदान स्वरुप शत्रु के सामने आने या जाने पर शत्रु की आधी शक्ति उसमे आ जाती है वह अधिक बलवान हो जाता है उसे परास्त करना मुश्किल हो जाता है,और फिर सुग्रीव ने श्रीराम जी को दुंदुभि राक्षस की हड्डियाँ का अस्थिपंजर यानि कंकाल ढ़ांचा और ताड़ के सात वृक्ष दिखलाए। तभी जामवन्त जी कहने लगे, हे प्रभु बालि ने दुंदुभि के मृत शरीर को चार कोस दूर फेंक दिया था और ये ताड़ के सात वृक्षों को बालि सात तीर से भेद सकता है। तभी भइया लक्ष्मण बोल पड़े, बस इतना ही, और श्रीराम जी आगे बढ़े और अपने पैर के नख यानि ठोकर से जैसे ही दुंदुभि के कंकाल को छुआ तो वह कंकाल आकाश मे सबकी आँखों से ओझल हो गया यानि वो तर गया -हाँ वर्षों से पड़ा दुंदुभि का कंकाल प्रभु के पैरों के नख मात्र से छूते ही वह तर गया। और तभी अन्तर्यामी श्यामसुन्दर प्रभु श्रीराम ने एक ही बाण का संघान कर ताड़ के सातों वृक्षों को काट दिया ढहा दिया। श्रीराम जी का अपरिमित बल देखकर सुग्रीव की प्रीति बढ़ गई और उन्हें विश्वास हो गया कि ये बालि का वध अवश्य करेंगें। सुग्रीव बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाने लगे। प्रभु को पहचानकर सुग्रीव मन में हर्षित होने लगे, और जब ज्ञान उत्पन्न हुआ तब वे ये वचन बोले कि हे नाथ! आपकी कृपा से अब मेरा मन स्थिर हो गया। सुख, संपत्ति, परिवार और बड़ाई सबको त्यागकर मैं आपकी सेवा ही करूँगा। सुग्रीव कहने लगा- हे कोशलाधीश श्रीराम जी! बालि तो मेरा परम हितकारी है, उसकी ही कृपा से भय, शोक, और ताप का नाश करने वाले आप मुझे मिले और हे प्रभो अब तो इस प्रकार कृपा कीजिए कि सब छोड़कर दिन-रात मैं आपका भजन ही करूँ। ऐसा कहकर प्रभु श्रीराम जी के चरणो में दंडवत प्रणाम किया है ,और प्रभु जी ने सुग्रीव को उठाकर ह्दय से लगा लिया। 🚩🚩बोलिऐ- सियावर रामचन्द्र की जै ....🚩🚩

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