हरि_विष्णु_जी

🌷 *पुरूरवा की तपस्या* 🌷 🌅सूतजी बोले- 'तपोधनो! एक समय महातेजस्वी मार्कण्डेयमुनि तीर्थ यात्रा का फल पाकर नर्मदा के तट पर बैठे हुए थे। वहीं उनका दर्शन करने के लिये बहुत-से ऋषि-महर्षि आये। पुलस्त्य, वसिष्ठ, पुलह, क्रतु, भृगु, अत्रि, मरीचि, भारद्वाज, काश्यप, मनु, यम, अङ्गिरा, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, शम्बकाव्य (शुक्राचार्य), कात्यायन मुनि, गौतम, शंख, लिखित, दक्ष, कात्यायन, जामदग्न्य, याज्ञवल्क्य, ऋष्यश्रृंग, विभाण्डक, गर्ग, शौनक, दाल्भ्य, व्यास, उद्दालक, शुक, नारद, पर्वत, दुर्वासा, उग्रतापस, शाकल्य, गालव, जाबालि, मुद्गल और कौशिक-कुलोत्पन्न विश्वामित्र आदि देवसम्मानित महर्षि तथा धर्म, शतानन्द, वैशम्पायन, वैष्णव, शाकलायन, वार्धक्य, जुहुति, आवसु, भूमण्डल-निवासी महात्मा बालखिल्य आदि भी वहाँ उपस्थित हुए। उसी समय तीर्थ यात्रा का फल सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर वेदवेत्ता एवं ज्ञानी ब्राह्मणों तथा अपनी प्रिया द्रौपदी के साथ नर्मदातट पर मार्कण्डेय मुनि के आश्रम पर आये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने भाइयों सहित तीन बार मुनि की परिक्रमा की और उन्हें साष्टांग प्रणाम करके बैठ गये। राजा को बैठा देख महामुनि मार्कण्डेय बोले- 'नृपश्रेष्ठ! भाइयों और ब्राह्मणों के साथ कुशल से तो हो न ?' युधिष्ठिर ने हँसकर कहा- 'मुने ! आज आपके चरणारविन्दों का दर्शन पाकर मैं कृतकृत्य हो गया। मेरे अन्त:करण का मल नष्ट हो गया। तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली गंगा, यमुना और सरस्वती, गंगाद्वार, हिमालय, कुब्जार्क, ब्रह्मयोनि, उग्रतीर्थ, कनखल, केदार, भैरवक्षेत्र, नैमिषारण्य, गया, कुरुक्षेत्र, पुष्कर इत्यादि पवित्र तीर्थों को छोड़कर आप किस प्रयोजन से केवल महानदी नर्मदा का ही सेवन करते हैं, इस बात को हम सब लोग सुनना चाहते हैं। आप कृपा करके इस रहस्य को बतावें।' मार्कण्डेयजी बोले- 'राजन्! पूर्वकाल की बात है, चन्द्रवंश में पुरूरवा नाम से विख्यात एक चक्रवर्ती राजा हुए थे। वे स्वर्गलोक का शासन करने वाले इन्द्र की भाँति समूची पृथ्वी का पालन करते थे। एक समय राज सभा में उन नृपश्रेष्ठ ने बड़े-बूढ़े ब्राह्मणों से पूछा- 'विप्रवरो! पापमोहित मनुष्य किस उपाय से यज्ञ आदि कर्मों के बिना ही स्वर्गलोक को प्राप्त हुए हैं और हो सकते हैं, बताइये। ब्राह्मणों ने कहा- 'महाराज ! नर्मदा नदी सम्पूर्ण लोकों को पवित्र करने वाली हैं। वे सम्पूर्ण विश्व का पाप हरण करने में समर्थ हैं। उन्हें स्वर्ग लोक से आप इस पृथ्वी पर उतारें। अपने मन को वश में रखने वाले उन ब्राह्मणों का यह वचन सुनकर राजा पुरूरवा ने कन्द, मूल, फल, शाक और जल का आहार करके निर्मल अन्त:करण से महादेवजी की आराधना की। तब महादेवजी ने प्रसन्न होकर कहा- 'बेटा! वर माँगो। मैं तुम्हें तुम्हारी इच्छा के अनुसार वस्तु प्रदान करूँगा।' पुरूरवा बोले- 'महादेव! आप समस्त लोकों के हित के लिये नर्मदा नदी को पृथ्वी पर उतारिये। आज लाख योजन का विशाल जम्बूद्वीप निराधार हो रहा है। न देवता तृप्त होते हैं, न पितर और न मनुष्यों को ही तृप्ति हो रही है।' महादेवजी ने कहा- 'राजन् ! तुम तो अयाच्य वस्तु की याचना करते हो। ऐसा वर तो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। नर्मदा को छोड़कर दूसरा जो कुछ भी वर माँगो, मैं दूँगा।' पुरूरवा बोले- 'महादेव! मैं प्राण जाने पर भी दूसरा वर नहीं माँगूँगा।' राजा का यह निश्चय जानकर तथा उग्र तपस्या-द्वारा उनके किये हुए साधन को देखकर महादेवजी ने नर्मदा को आज्ञा दी- 'सुरेश्वरि! तुम पृथ्वी पर उतरो और पुरूरवा की तपस्या के फल से मृत्युलोक के हित का साधन करो।' नर्मदा ने कहा- 'महेश्वर ! मैं बिना किसी आधार के स्वर्गलोक से पृथ्वी पर कैसे जाऊँगी?' नर्मदा की यह बात सुनकर देवाधिदेव महादेवजी ने आठ पर्वतों को बुलाया और उन सबसे पूछा- 'तुममें से नर्मदा नदी को धारण करने में कौन समर्थ है?' तब विन्ध्यगिरि ने कहा- 'सुरेश्वर ! आपके प्रसाद से मेरा पुत्र नर्मदा को धारण करने में समर्थ है। उसका नाम पर्यक है।' तत्पश्चात् महादेवजी की आज्ञा मिलने पर पर्यंकने कहा- 'महेश्वर ! आपके प्रसाद से मैं नर्मदा नदी को धारण करूँगा।' तदनन्तर नर्मदादेवी पर्यकगिरि के शिखर पर स्थित होकर उतरीं। उनकी जलराशि के वेग पूर्वक भ्रमण से पर्वत, वन और काननों सहित समस्त पृथ्वी जल से आप्लावित हो उठी। सम्पूर्ण जगत् अकाल में ही प्रलय काल से ग्रस्त हो गया तब सम्पूर्ण देवताओं ने मेकलकन्या नर्मदा की स्तुति की और कहा- 'कल्याणि ! तुम मर्यादा धारण करो। किसी नियत सीमा में स्थित रहो और इस प्रकार विश्व के लिये हितकारिणी बनो।' देवताओं के इस प्रकार प्रार्थना करने पर महादेवजी की आज्ञा से नर्मदादेवी ने पुन: अपने रूप को संकुचित कर लिया। अब वे संवृतरूप से बहने लगीं। उस समय नर्मदाजी ने पुरूरवा से कहा- 'वत्स! तुम अपने हाथ से मेरे जल का स्पर्श करो।' उनकी आज्ञा पाकर पुरूरवा ने उनके जल का स्पर्श एवं आचमन करके पितरों का तिल और नर्मदा-जल से तर्पण किया। उस जल से तर्पण करने पर राजा के समस्त पितर उस परम पद को प्राप्त हो गये, जो देवताओं के लिये भी दुर्लभ है। समस्त चराचर जगत् सब ओर से पवित्र हो गया। वे देश, पर्वत, ग्राम और आश्रम भी पवित्र हैं, जहाँ नर्मदाजी विद्यमान हैं। सरस्वती का जल तीन दिन में पवित्र करता है। यमुना-जल सात दिन में पावन बनाता है, गंगा-जल स्नान करने पर तत्काल पवित्र करता है, परंतु नर्मदा नदी दर्शन मात्र से ही मनुष्यों को पवित्र कर देती है। नर्मदा के संगम में जहाँ-कहीं भी स्नान, दान, जप, होम, वेदपाठ, पितृपूजन, देवाराधन, मन्त्रोपदेश, संन्यास और देहत्याग आदि जो कुछ भी किया जाता है, उसके फल का अन्त नहीं है। वैशाख, माघ अथवा कार्तिक की पूर्णिमा को, विषुवयोग में, संक्रान्ति के समय, व्यतीपात और वैधृतियोग में, अमावास्या में, तिथि की हानि और वृद्धि के दिन, मन्वादि युगादि और कल्पादि तिथियों में, माता-पिता के क्षयाह में नर्मदा-तटवर्ती ॐकार भृगुक्षेत्र तथा विशेषत: संगम में जो सहस्त्र, शत अथवा एक गोदान एवं सम्पूर्ण महादान करता है तथा जो श्रेष्ठ मनुष्य नर्मदा में स्नान, दान, जप, होम और पूजन आदि करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है। युधिष्ठिर ! मनुष्य नर्मदा में जहाँ-जहाँ स्नान करता है, वहीं-वहीं उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रात:काल उठकर नर्मदा का कीर्तन करता है, उसका सात जन्मों का किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है तथा जहाँ संगम और बाणलिंग से युक्त नर्मदा नदी स्थित है, वहाँ स्नान करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञ का फल पाता और अन्त में शिवधाम को जाता है। 🍁💦🙏Զเधे👣Զเधे🙏🏻💦🍁 *☘🌷!! हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे !!💖* *☘💞हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे !!🌹💐* ÷सदैव जपिए एवँ प्रसन्न रहिए÷ *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🌸

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भगवान किसी का गर्व नहीं चलने देते चाहे वह उनका कितना प्रिय ही क्यों न हो! गरुड़ पक्षी और नागों में बड़ी शत्रुता थी. शेषनाग का पुत्र मणिनाग बड़ा बलशाली था. नागों में उसकी शक्ति की बड़ी चर्चा थी लेकिन फिर भी उसे गरूड़ों का भय बना रहता था. इस भय से मुक्ति पाने के लिए उसने शिवजी को तप से प्रसन्न किया. शिवजी ने मणिनाग से वरदान मांगने को कहा. उसने गरूड़ के भय से मुक्ति का वरदान मांगा. शिवजी ने उसे गरूड़ जाति के भय से मुक्त रहने का वरदान दिया. अब मणिनाग निश्चिंत हो चुका था. शिवजी के वरदान से उसे इतनी हिम्मत मिल गई थी कि वह क्षीर सागर के समीप भी जाने लगा था जहां गरूड़ निवास करते थे. एक दिन गरूड़ ने मणिनाग को क्षीर सागर के समीप देखा तो क्रोधित हो गए. उन्होंने सोचा संसार के सारे नाग उनसे डरते हैं लेकिन यह नाग निर्भय होकर घूमता हुआ मुझे चुनौती दे रहा है. क्रोध में गरूड़ ने मणिनाग को अपने पंजों में दबोचा और उसे अपने घर के कोने में बांधकर फेंक आए. शिवजी के वरदान के बाद भी गरूड़ सता रहे हैं, यह सोचकर मणिनाग अपनी किस्मत को कोसता रोने लगा. भक्त के संकट की बात भगवान तक पहुंची. उन्होंने नंदी को कहा- मणिनाग गरूड़ के घर में बंदी है. तुम विष्णुजी के पास जाओ मेरी ओर से अनुरोध करो कि वह गरूड़ को समझाएं और मणिनाथ को मुक्ति दिलाएं. श्रीहरि ने गरूड़ को मणिनाथ को छोड़ने का आदेश दिया. लेकिन गरूड़ को इससे बड़ा दुख हुआ. उसे लगा कि अगर इस तरह छोड़ दिया जाए तो नागों का गरूड़ जाति से भय समाप्त हो जाएगा. उसने श्रीहरि से कहा- यह कैसी विचित्र बात है. स्वामी तो सेवकों को दिया करते हैं, आप उलटा मांग रहे हैं. आपके लिए तो सब अर्पित है लेकिन मेरे शत्रु को मुक्त करने की बात मुझे उचित नहीं लगती. श्रीहरि ने कहा- महादेव की ऐसी इच्छा है और मणिनाथ निर्दोष है. उसे बंदी बनाने का क्या मतलब? गरूड़ बिदक गया. उसने कहा नागों औऱ गरूड़ के बीच पुरानी शत्रुता है जैसे देवों और दैत्यों के बीच है. मेरी ही शक्ति के सामर्थ्य से आपने कई बार दानवों को जीता है. आपके कहने से शत्रु को मुक्त करना क्या निर्बलता का प्रतीक नहीं होगा. श्रीहरि हंसे. उन्होंने कहा- मैं मानता हूं कि मेरी बुद्धि बिगड़ गई है. आपकी ही शक्ति के दम पर मैंने असुरों को जीता है. आप मेरी इस कानी अंगुली के द्वारा मुझे सब स्मरण कराइए. यह कहकर प्रभु ने अपनी अंगुली गरूड़ पर रख दी. श्रीहरि के अंगुली रखते ही गरूड़ को लगा कि सारे संसार का बोझ उस पर आ गया है. उसकी स्मरण शक्ति खत्म हो गई है. वह कराहता हुआ श्रीहरि को पुकारने लगा. गरूड़ ने प्रार्थना की- प्रभु मुझसे भूल हो गई. मैं आपका अपराधी हूं. मुझे माफ करके मेरे प्राणों की रक्षा करें. लक्ष्मीजी को गरूड़ पर दया आ गई. वह उसे लेकर श्रीहरि के पास गईं. श्रीहरि ने कहा- इसे तो भगवान शिव ही माफी दे सकते हैं. गरूड़ शिवजी के पास पहुंचा. उसकी दशा देखकर उन्हें दया आ गई. शिवजी ने उसे कहा कि गोदावरी जाकर स्नान करो और फिर वहां भगवान को याद कर प्रायश्चित करो. गरूड़ ने भक्तिभाव से पूजा की और अपने पाप से छुटकारा पाया. इसी स्थान को गरूड़तीर्थ के नाम से जाना जाता है. यहां स्नानकर प्रभु को स्मरण करने से मन के बुरे विचार धुल जाते हैं। ।। जय श्री हरि ।। ~~~~~~~~~ 🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺🌿🌺

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मीराबाई के इतिहास के अनसुलझे रहस्य ... हमे आजतक मीराबाई को भक्तिचरित्र के रूप में विख्यात किया गया है, जबकि मीराबाई एक भक्त होने से साथ साथ उससे भी कहीं अधिक थी ... संभवतः मध्यकाल की धर्मस्थापको में से एक .... मीराबाई वैष्णव थी, भगवान श्रीकृष्ण की आजीवन भक्ति उन्होंने की ... मीराबाई ने विकट सल्तनत काल मे बंगाल एवं गुजरात की यात्रा की, एवं वैष्णव धर्म का प्रचार किया, यह कम बड़ी बात नही थी । आज सीरिया में जाकर कोई हिन्दू धर्म का प्रचार करें, यह जितनी भयँकर दुःसाहस वाली बात है, महिमामयी देवी मीराबाई ने ऐसा ही दुःसाहस किया था, जो वैष्णव धर्म के शत्रु बने हुए थे, उनके गढ़ में घुसकर वैष्णवधर्म का प्रचार किया ... मीराबाई के सम्बंध में जोधपुर के मुंशी देवीप्रसाद जी ने इतिहास लिखना चाहा, ओर " #मीराबाई_का_जीवन_चरित्र" नाम से इतिहास लिखा भी .... यह जीवन चरित्र विक्रम संवत १६५० में #मुज्जफरपुर के #नारायण_प्रेस में छप गया है । मेवाड़ के महकमे तवारीख में भी जो महामहोपाध्याय कविराजा #श्यामलदासजी के अधिकार में था उनके पास मीराबाई का पूरा हाल मोजूद नहीं है।। १ दफै कविराजा साहिब से भी मैंने बहुत सी पूछताछ की, थी जिसका जवाब उन्होंने सिर्फ इतना दिया कि "मीरांबाई का कोई सही हाल सिवाय इसके हम को मालूम न हुआ कि वे रावदूदा जी के पोते मेड़तिया राठोड़ रतनसिंघ की बेटी थीं और महाराणा सांगाजी के कंवर भोजराज को ब्याही गई थीं जिनका इन्तकाल महाराणा की जिंदगी में हो गया था और मोरांबाई के पास साध संत बहुत आते थे इसलिये #राणा_विक्रमजीत उनको तंग करते थे " । कविराजाजी के मरे पीछे उनके असिस्टेंट पण्डित गौरीशंकर ओझा जी से महीने तक लिखा पढ़ी होती रही तो उन्होंने मी यही लिखा कि "मौखिक हाल जियादातर तो किस्सा कहानी है और वह सब जगह मशहूर है मीराबाई महाराणां सांगा के दूसरे बेटे भोजराज की राणी और मेड़ते के #रावदूदाजी के बेटे रतनसिह की बेटी थीं महाराणा सांगाजी का देहान्त संबत १५८४ में हुआ उससे कुछ पहिले भोजराज गुजरगये थे मीराबाई राणारतनसिंघ ( सं ० १५८८ ) के राज तक तो जिंदा थीं महाराणा उदैसिंघजी ( सं०१५६२-१६२८ ) के राजमेंमरी ये रणछोरजीकी पूरी भक्त थीं साधों और सन्तोंका निहायत ही सतकार करती थों जिससे महाराणा रतनसिंह सखत नाराज रहते थे और बहुत दुःख देते थे।। यह बात मीराबाई की कविता से भी जाहिर है ॥" यह हाल " मीराबाई के जीवन चरित्र में " जोधपुर के इतिहासकार " मुंशी देवी प्रसाद जी" ने लिखा है । गुजरात की कुछ पुस्तको में हाल लिखा है, की मीराबाई 1576 ईस्वी तक जीवित थी .... मुंशी देवीप्रसाद जी ने यहां एक तरह से अपनी हताशा जाहिर की है, उनके मुताबिक मेवाड़ के पास मीराबाई का कोई इतिहास ही मौजूद नही है । श्यामलदास के पास मीराबाई का इतिहास नही होना मामूली बात नही है .. श्यामलदास कर्नल टॉड का असिस्टेंट थे, कर्नल टॉड ने तो मीराबाई को महाराणा कुम्भा की पत्नी बता दिया था ... जिसे आम जनता ने ही रिजेक्ट कर दिया, हो सकता है, इसी कारण श्यामलदासजी को भी यह इतिहास रिजेक्ट करना पड़ा । लकीन मीराबाई के सम्बन्ध में कोई भी दस्तावेज मेवाड़ के पास नही था । ऐसा स्वयं मेवाड़ के इतिहासकारो का कहना है ... इसी कारण हमें जयपुर परिवार के इतिहास पर गौर करना चाहिए, क्यो की जब 1521-1576 ईस्वी के बीच में हुई मीराबाई जी का इतिहास ही मौजूद नही है, जो मेवाड़ ही नही, भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण शख्सियत थी ... उनका इतिहास नही होने का अर्थ बहुत गंभीर है ... इसका अर्थ यह है, की हमारे पास जितना भी इतिहास है, वह मात्र तुकबंदी है ।। अगर सही बैठ गई तो ठीक, वरना दूसरा मत लाकर अलग सिद्धांत खड़ा कर देंगे । आपने इतिहास में अक्सर पढ़ा ही होगा :- फलाने इतिहासकार के अनुसार यह राजा थे दूसरे फलाने इतिहासकार के अनुसार राजा दूसरे थे इतिहासकारो द्वारा कभी जाति बदलना, तो कभी धर्म, तो कभी कभी सीधा का सीधा राष्ट्र ही ... हिन्दुस्तान में शायद ही कोई ऐसी बस्ती होगी कि जहां किसी पुरुष या देवी की जिव्हा पर मीराबाई का नाम न आता हो और विरला ही कोई मन्दिर होगा कि जहाँ उनके बनाए हुए भजन और हरिजस न गाये जाते हों लेकिन इस पर भी उनका असली हाल लोगों को बहुत ही कम मालूम है जो न मालूम होने के बराबर है और जो कुछ भक्तमाल वगैरा में लिखा है वह तवारीखी सबूत और तवारीखी दुनियां से बहुत दूर पड़ा हुआ है जिसका सबब यही है कि जिन लोगों ने लिखा है उनकी ग़रज़ तवारीखी तहकीकात से नहीं थी उनका मतलब तो भगवत् भगतों के चरित्र लिखने से था सो उन्होंने उसको हाथ से नहीं जाने दिया जो बात उन्होंने सुनी या उनके जान्ने में ठीक मालूम हुई वह लिख ली.. इसी तरह कर्नल टॉड ने भी सुनी सुनाई और अटकल पच्चू बातों पर भरोसा करके मीराबाई को राणा कुंभाजी की राणी लिखने में गलती की है इससे जियादा गलत बात बाबू कारत्तिक प्रसाद ने मीराबाई के जीवन चरित्र में यह लिखी है कि मेड़ते के राठोड़ सरदार जैमलकी कन्या मीराबाई ने सं०१४७५ में जन्म लिया था मगर इस ज़माने में की असली बातों की छानबीन जियादा होती है बात २ में हिन्दी की चिंदी निकाली और बाल की खाल खेंची जाती है ऐसी वैसी बातों से तसल्ली नहीं होती और जो तहक़ीक़ात की जावे तो जरूर कुछ न कुछ फ़र्क निकलता है .... और उसी वक्त बहुत सी असली बातें भी ज़ाहिर हो जाती हैं ॥ मीराबाई अपनी बंगाल यात्रा के बाद आमेर पधारी थी ... ओर आमेर से वह गुजरात गयी थी ... आमेर में उन्होंने आमेर को दिव्यवाणी सुनाई होगी, या वरदान दिया होगा, इसी कारण मीराबाई के गिरधर आज भी आमेर में है ... एवं आमेर के राजा मानसिंहजी ने मीराबाई का एक महान मंदिर भी बनवाया, जिसे जगतशिरोमणि मंदिर के नाम से जाना जाता है, यहां श्रीहरि की वही मूर्ति है, जिसकी पूजा मीराबाई करती थी .... मीराबाई ने ही आमेर के संकेत दिया था, की इसी समयकाल में आपको तुलसीदास जी नाम के महात्मा मिलेंगे ,जो रामकथा को जन जन की भाषा मे लिखकर प्रचारित करेंगे ।। क्रमशः .... चित्र - जगतशिरोमणि मंदिर , आमेर यह मंदिर आमेर के महाराजा मानसिंह जी के कार्यकाल में बना था । यह मंदिर मीराबाई एवं श्रीहरि को समर्पित है । 🌿📿🌺🌿📿🌺🌿📿🌺🌿📿🌺🌿📿🌺

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Neha Sharma, Haryana Mar 18, 2021

*ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः*🙏*शुभ प्रभात् नमन* *"पंचामृत और चरणामृत में क्या अंतर है..? *मंदिर में या फिर घर/मंदिर पर जब भी कोई पूजन होती है, तो चरणामृत या पंचामृत दिया हैं। मगर हम में से ऐसे कई लोग इसकी महिमा और इसके बनने की प्रक्रिया को नहीं जानते होंगे। *चरणामृत का अर्थ होता है भगवान के चरणों का अमृत और पंचामृत का अर्थ पांच अमृत यानि पांच पवित्र वस्तुओं से बना। दोनों को ही पीने से व्यक्ति के भीतर जहां सकारात्मक भावों की उत्पत्ति होती है, *चरणामृत क्या है.?? *शास्त्रों में कहा गया है..... *अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्। *विष्णो पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।। *अर्थात् : *भगवान विष्णु के चरणों का अमृतरूपी जल सभी तरह के पापों का नाश करने वाला है। यह औषधि के समान है। जो चरणामृत का सेवन करता है उसका पुनर्जन्म नहीं होता है। *कैसे बनता चरणामृत..? *तांबे के बर्तन में चरणामृत रूपी जल रखने से उसमें तांबे के औषधीय गुण आ जाते हैं। चरणामृत में तुलसी पत्ता, तिल और दूसरे औषधीय तत्व मिले होते हैं। मंदिर या घर में हमेशा तांबे के लोटे में तुलसी मिला जल रखा ही रहता है। *चरणामृत लेने के नियम...... *चरणामृत ग्रहण करने के बाद बहुत से लोग सिर पर हाथ फेरते हैं, लेकिन शास्त्रीय मत है कि ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे नकारात्मक प्रभाव बढ़ता है। चरणामृत हमेशा दाएं हाथ से लेना चाहिए और *श्रद्घाभक्तिपूर्वक मन को शांत रखकर ग्रहण करना चाहिए। इससे चरणामृत अधिक लाभप्रद होता है। *चरणामृत का लाभ...... *आयुर्वेद की दृष्टि से चरणामृत स्वास्थ्य के लिए बहुत ही अच्छा माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार तांबे में अनेक रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है। यह पौरूष शक्ति को बढ़ाने में भी गुणकारी माना जाता है। तुलसी के रस से कई रोग दूर हो जाते हैं और इसका जल मस्तिष्क को शांति और निश्चिंतता प्रदान करता हैं। स्वास्थ्य लाभ के साथ ही साथ चरणामृत बुद्घि, स्मरण शक्ति को बढ़ाने भी कारगर होता है। *पंचामृत..... *पंचामृत का अर्थ है.... *'पांच अमृत'। दूध, दही, घी, शहद, शक्कर को मिलाकर पंचामृत बनाया जाता है। इसी से भगवान का अभिषेक किया जाता है। पांचों प्रकार के मिश्रण से बनने वाला पंचामृत कई रोगों में लाभ-दायक और मन को शांति प्रदान करने वाला होता है। इसका एक *आध्यात्मिक पहलू भी है। वह यह कि पंचामृत आत्मोन्नति के 5 प्रतीक हैं। जैसे - *दूध - दूध पंचामृत का प्रथम भाग है। यह शुभ्रता का प्रतीक है, अर्थात हमारा जीवन दूध की तरह निष्कलंक होना चाहिए। *दही- दही का गुण है कि यह दूसरों को अपने जैसा बनाता है। दही चढ़ाने का अर्थ यही है कि पहले हम निष्कलंक हो सद्गुण अपनाएं और दूसरों को भी अपने जैसा बनाएं। *घी- घी स्निग्धता और स्नेह का प्रतीक है। सभी से हमारे स्नेहयुक्त संबंध हो, यही भावना है। *शहद- शहद मीठा होने के साथ ही शक्तिशाली भी होता है। निर्बल व्यक्ति जीवन में कुछ नहीं कर सकता, तन और मन से शक्तिशाली व्यक्ति ही सफलता पा सकता है। *शक्कर- शक्कर का गुण है मिठास, शकर चढ़ाने का अर्थ है जीवन में मिठास घोलें। मीठा बोलना सभी को अच्छा लगता है और इससे मधुर व्यवहार बनता है। *उपरोक्त गुणों से हमारे जीवन में सफलता हमारे कदम चूमती है। *पंचामृत के लाभ : पंचामृत का सेवन करने से शरीर पुष्ट और रोगमुक्त रहता है। पंचामृत से जिस तरह हम भगवान को स्नान कराते हैं, ऐसा ही खुद स्नान करने से शरीर की कांति बढ़ती है। पंचामृत उसी मात्रा में सेवन करना चाहिए, जिस मात्रा में किया जाता है। उससे ज्यादा नहीं। *श्री राधेकृष्णा शरणं मम्..... *जय-जय श्री राधेकृष्णा*🙏🌸🙏

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