सखी

. "श्री राधाजी की सखी सेवा" आज निकुंज में रास विहार की तैयारी चल रही थी सभी मंजरियों ने रासमंडल को अत्यंत सुन्दर सजा दिया प्रिया-प्रियतम सभी सखियों के साथ रासमंडल में पधारी। प्रिया प्रियतम ने कहा कि आज सभी सखियाँ नृत्य करें प्रिया प्रियतम के सुख की बात थी तो प्रिया जी के संकेत होते हैं सभी मंजरियाँ वाद्य यंत्र बजाने लगी और सारी सखियाँ अनुपम मधुर नृत्य करने लगी। सभी सखियों कभी गोलाकार आकृति में कभी चतुर्भुजा कार आकृति में नृत्य करने लगी नृत्य की शैली और भंगिमा बहुत सुन्दर थी। सब का मन मोह लिया प्रिया जी अनुपम सुन्दर नृत्य देख कर अत्यंत प्रसन्न हुई। यह नृत्य दो दंड अर्थात 48 मिनट चला, निकुंज में समय का माप दंड से किया जाता है -1 दंड मतलव= 24 मिनिट। अब सारी सखियां नृत्य को विराम देकर प्रिया जू के समीप बैठ जाती है और प्रिया जी की कृपा भरी मधुर मुस्कान को निहारती हैं कि आज हमारे नृत्य से प्रिया जी कितनी प्रसन्न हैं। कुछ समय बाद जब सब सखियाँ और मंजरियाँ सो जाती हैं तब प्रिया जी चुपचाप से अपनी निकुंज से उठती हैं। आज प्रिया जी के मन में सभी सखियों की सेवा की भावना उदित हुई। शयन कक्ष में पश्चिम की ओर एक खिड़की है प्रिया जी उस खिड़की से बाहर निकल कर आती हैं। प्रिया जी ने ललिता जी का रूप धरा, मोर पंख रूपी वस्त्र धारण किए और सबसे पहले सुदेवी के कुंज में प्रवेश करती हैं। सुदेवी के पास जाती हैं सुदेवी जी ने पूछा- कौन हो ? राधा रानी ने ललिता जी के रुप में कहा मैं ललिता हूँ। सुदेवी जी ने पूछा इस समय कैसे आना हुआ ? राधा जी ने कहा :- आज तुम नृत्य करते-करते बहुत थक गई हो इसीलिए मैं तुम्हारे पैर दबाने आई हूँ जिससे तुम्हारी थकान दूर हो जाए। सुदेवी ने कहा यह उचित नहीं है, आप हमसे बड़ी हैं। तब ललिता रूपी प्रिया जी ने कहा :- शोर मत करो चुपचाप लेटी रहो, मैं थोड़ी देर ही पैर दबाऊँगी। सुदेवी जी मौन हो जाती हैं। ललिता रूपी प्रियाजी पैर दबाती हैं थोड़ी देर में ही सुदेवी जी की थकान दूर हो जाती है। इस प्रकार श्री राधा रानी ललिता रूप में हर एक कुंज में जाती हैं और सभी सखियों की चरण सेवा करती हैं। अंत में जब ललिता जी के कुंज में आती है, तब प्रिया जी ने अपने को तुंगविद्या के रूप में सिंगार किया और कुंज में प्रवेश किया ललिता जी ने पूछा कौन हो ? प्रिया जी ने तुंगविद्या रूप में कहा कि मैं तुंगविद्या हूँ, ललिता जी ने पूछा इतनी रात में क्यों आई हो ? तो तुंगविद्या जी ने कहा-आप नृत्य करते-करते थक गई हैं इसीलिए आपके चरण दबाने आई हूँ। तब ललिता जी ने कहा :- ठीक है ! तब प्रिया जी ने ललिता जी के चरण सेवा की। थोड़ी देर में ललिता जी को बहुत आराम मिला और फिर सो गईं। अगले दिन प्रातःकाल स्नान से निवृत होकर सभी सखियाँ ललिता जी के पास जाती हैं और कहती हैं कि आपने रात में जो सेवा की थी, ऐसा करना उचित नहीं है हमें बहुत संकोच हुआ है। आपसे निवेदन है कि भविष्य ऐसी सेवा न करें। तब ललिता जी ने कहा :- मैंने कौन सी सेवा की है ? तब सखियों ने कहा - कल रात आपने हम सभी सखियों के चरण सेवा की थी जिससे हमें आराम मिले। आप हमसे बड़े हैं। हमें आपसे सेवा लेने में बहुत संकोच आता है। तब ललिता जी ने कहा कि मैंने तो कोई सेवा नहीं की। मेरे पास तो स्वयं तुंगविद्या चरण दबाने आई थी। मैं तो किसी कुंज में नहीं गई। तब सभी सखियों समझ गयीं। जरुर प्रिया जु ने आज हमारी सेवा की। सभी सखियों को बहुत संकोच हुआ सभी प्रिया जू के पास गई और बोली प्रिया जी यह क्या है कल आपने हमारी चरण सेवा की। प्रिया जी बोली :- तुम सब मेरी प्राण-प्रिय सखियाँ हो। तुम मेरी और श्याम सुन्दर की कितनी सेवा करती हो। कल मेरे मन में भी तुम्हारी सेवा का भाव आया। तो मैंने ही सभी सखियों की चरणों की सेवा की। प्रिया जी ने कहा तुम सब मेरी हमेशा प्रसन्नता चाहती हो ना ? सभी सखियों ने कहा कि हाँ। तो प्रिया जी ने कहा कि मैं इस सेवा करके अति प्रसन्न हूँ, मुझे अपनी प्राण प्रिय सखियों की सेवा का अवसर मिला। तब सभी सखियाँ प्रिया जी की प्रसन्नता देख कर अति प्रसन्न हुई। श्रीप्रिया जू का अपनी सखियों के प्रति सेवा भाव कितना मधुर है। स्वामिनी होकर भी सखियो की सेवा करती हैं। कितना उदार, कितना कोमल ह्रदय है, करुणामयी किशोरी जू का। प्रिया जू इस सेवा भाव पर बलिहार जायें। प्रिया जू को अति प्रसन्न देख कर सभी सखियाँ भी अति प्रसन्न हुई। ----------:::×::::---------- "जय जय श्री राधे" *******************************************

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।। श्री रंगदेवी जी प्रागट्योत्सव की मंगल बधाई ।। रंगदेवी सखियन सरनाम | पुंडरीक – किंजल्क बरन तनु, लखि लाजत शत काम | पहिरे वसन जपा कुसुमन रँग, सोहति अति अभिराम | विविध भाँति भूषण पहिरावति, नित प्रति श्यामा – श्याम | परम चतुर श्रृंगार – कला महँ, नहिं पटतर कोउ बाम | रहति ‘कृपालु’ निकुंजविहारिणि, संगहिँ आठों याम || भावार्थ – रंगदेवी सखि समस्त सखियों में प्रख्यात सखी हैं | इनके शरीर का रंग कमल के केशर के समान है एवं इनकी रूपमाधुरी से सैकड़ों कामदेव लज्जित होते हैं | यह इन्द्रवधूटी के रंग के अत्यन्त ही सुन्दर कपड़े पहनती हैं | यह नित्यप्रति प्रिया – प्रियतम को अनेक प्रकार के गहने पहनाती हैं, एवं श्रृंगार करने की कला में इनकी समानता की चतुर गोपी और कोई नहीं है | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि यह सदा किशोरी जी के साथ रहती हैं | "श्री रंगदेवी सखी" पिता- वीरभानु गोप, माता- सुर्यवती, गांव- डभारा, जन्म- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी रंगदेवी सखी- रंगदेवी जी प्यारी जी की वेणी गूंथना श्रंगार करना ओर प्यारी जी के नैनो मे काजल लगाती है। रंगदेवी सखी गुलाबी साडी पहनती है ,वैसे तो सखियॉं तरह-तरह के रंगों की साडियां पहने होती है । युगल के विविध आभूषणो को सावधानी पूर्वक संजो कर रखती है , ह्रदय मे गाढी प्रिति लिये सारी आभूषण सदा सेवा मे लेकर खडी रहती है । इनके अंगों की कान्ति पद्मपराग (कमल-केसर) के समान है और ये जवाकुसुम रंग की साड़ी धारण करती हैं। ये नित्य श्रीराधा के हाथों और चरणों में अत्यन्त सुन्दर जावक (महावर) लगाती हैं। व्रतों व त्यौहारों में आस्था रखने वाली अत्यन्त सुन्दर रंगदेवी सखी सभी कलाओं में निपुण हैं। इनके अंगों की कान्ति पद्मपराग (कमल-केसर) के समान है और ये जवाकुसुम रंग की साड़ी धारण करती हैं। ये नित्य श्रीराधा के हाथों और चरणों में अत्यन्त सुन्दर जावक (महावर) लगाती हैं। व्रतों व त्यौहारों में आस्था रखने वाली अत्यन्त सुन्दर रंगदेवी सखी सभी कलाओं में निपुण हैं। नित्य लगाती रुचि कर-चरणों में यावक अतिशय अभिराम। आस्था अति त्यौहार-व्रतों में कला-कुशल शुचि शोभाधाम।। युग्मा$ड़्घ्रिचिन्तनरतां प्रियरंगदेवीं, दिव्यां सरोजनयनां नवमेघवर्णाम्। मन्दस्मितां कनकचामरमादधानां, वृंदावनाधिपसखीं रसदां भजामि।। जिनका वर्ण नवमेघ के समान है, जिनके नेत्र कमल के सदृश हैं और मंदहास्ह युक्त , स्वर्ण की डंडी वाले चंवर को धारण किए हुए हैं , श्रीयुगल प्रिया-प्रियतम के चरणारविन्दों के चिंतन में तत्पर श्री वृंदावनाधीश्वर की सखी श्रीरंगदेवीजी का हम भजन स्मरण करते हैं।।

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।। श्री विशाखा सखी प्रागट्योत्सव की मंगल बधाई ।। विशाखा सखि, सखियन सरदार | दामिनि – दुति सम गौर कलेवर, दमकत सुषमा सार | पहिरे वसन मनोहर सोहति, तारागन अनुहार | रंग बिरंगे वसन पिन्हावति, सदा युगल सरकार | जनु प्रतिबिंब संग श्यामा के, रात दिवस इकसार | जानत सबै ‘कृपालु’ रीति – रस, प्यारी सों अति प्यार || भावार्थ – विशाखा सखी सब सखियों की सरदार के समान हैं | उनका गोरा शरीर बिजली के समान चमकता रहता है | नीले आसमान के तारों से युक्त रंग का कपड़ा पहनती है | प्रिया – प्रियतम को रंग – बिरंगे कपड़े पहनाती हैं | रात – दिन किशोरी जी के साथ परछाई के समान रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि ये प्रेम – रस की समस्त रीतियों को जानती हैं तथा किशोरी जी से अधिक प्यार करती हैं | "श्री विशाखा सखी" पिता- सुभानु गोप, माता- देवदानी, गांव- आजनोख (अंजन वन), जन्म- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष नवमी विशाखा सखी-ये गौरांगी रंग की है। ठाकुर जी को सुदंर-सुदंर चुटकुले सुनाकर हँसाती है। ये सखी सुगन्धित द्रव्यों से बने चन्दन का लेप करती है। विशाखा सखी प्रिया-प्रियतम को सुख देने मे लगी रहती है । प्यारी जी के अंगों का स्पर्श पाकर सखिया बहुत सुख प्राप्त करती है । यह सखी श्री श्यामा जी के नित्य सानिध्य में रहने वाली स्वामिनी की प्रिय सखी है । विविध रंगों के वस्त्रो का प्रिति-पूर्वक चयन करके प्रिया जू को धारण कराती है , ये छाया की तरह उनके साथ रहते हुए उनके हित की बाते करती हैं । सरलार्थ से इनके विषय में निम्न बातें ज्ञात होती हैं : (1) ये सब सखियों की सरदार के समान हैं और इनका गोरा रंग बिजली के समान चमकता रहता है। (2) नीले आसमान के तारों से युक्त रंग के वस्त्र धारण करती है। (3) श्री विशाखा जी की सेवा श्री राधाकृष्ण के वस्त्र व आभूषण की है। ये प्रिया-प्रियतम को रंग-बिरंगे कपड़े पहनाती है। (4) रात-दिन किशोरी जी के साथ परछाई के समान रहती है। (5) ये प्रेम रस की समस्त रीतियों को जानती हैं तथा किशोरी जी से अधिक प्यार करती है। (6) कर्पूर आदि सुगन्धित द्रव्य से विलोन प्रस्तुत कर प्रिया-प्रियतम के श्रीअंगों को विलेपित करने की विशेष सेवा इनके अधिकार में है। (7) इनका प्रिय वाद्य यंत्र है मृदंग तथा इन्हें सारंग राग अत्यंत प्रिय है। (8) निकुंज लीला में इनकी आयु 14 वर्ष, 2 महीने, 15 दिनों की रहती है। (9) प्रिया-प्रियतम की सेवा में इनकी प्रधान 3 सहायिकायें हैं : मधुमतिमंजरी, रसमंजरी एवं गुणमंजरी (10) माधवी, मालती, चंद्ररेखिका, कुंजरी, हरिणी, चपला, सुरभि, शुभानना - इनकी 8 सखियाँ है। (11) जिस क्षण भानुकिशोरी श्रीराधा जी का आविर्भाव हुआ है, उसी क्षण ये भी आविर्भूत हुई है। (12) इनके पिता महान विद्वान है, ये भी पूर्ण विदुषी है, इनका परामर्श कभी विफल नहीं होता। (13) ये अत्यंत परिहास-कुशल हैं. प्रिया-प्रियतम के मिलन की विविध युक्तियाँ, नव-नव रसास्वादन के उपाय सोचती रहती है। (14) वस्त्र की सँभाल रखने वाली जो सखियाँ एवं दासियाँ है, पुष्पलतावल्लरी-वृक्षावली पर वृन्दादेवी की जिन-जिन सखियों का अधिकार है, वे सभी इनके आदेश से ही काम करती है। (15) श्री गौर लीला में ये श्री राय रामानन्द जी हैं। इनका भाव स्वाधीन भर्तृका या अधिक मध्या नायिका के रूप में है। सौदामिनी निचयचारुरुचिपरिकां, तारावली ललितकान्तिमनोज्ञ चेलाम्। श्रीराधिके!तव विचित्र गुणानुरूपां, सदगन्ध चन्दन रतां कलये विशाखाम्।। जिनकी अंग कांति विद्युत-पुंज की भांति मनोहर है,तारों के समान सुन्दर कान्ति युक्त मनोहर वस्त्र जो धारण कर रही हैं, हे राधिके!आपके सदृश विचित्र गुणशालिनी हैं एवं जो आपकी सदगन्ध-चन्दन सेवा में निरत रहती हैं, उन श्री विशाखा जी को मैं प्रणाम करती हूँ। विशाखा सखी के अंगों की कान्ति सौदामिनी (आकाशीय बिजली) की तरह है। उनकी साड़ी ऐसे झिलमिल करती है मानो आकाश से समस्त तारागण आकर उसमें सिमट गए हों। वे श्रीराधा को कर्पूर-चन्दनयुक्त सुगन्धित अंगराग लगाती हैं व उनके श्रीअंग में सुन्दर पत्रावली (बेल-बूटे) बनाती हैं। कर्पूरादि सुगन्ध-द्रव्य युत लेपन करती सुन्दर अंग। बूटे-बेल बनाती, रचती चित्र विविध रुचि अंग-प्रत्यंग।।

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