संत_महापुरुष_के_लक्षण

संत स्मरण परम पूज्य देवाचार्य श्री मलूक पीठाधीश्वर महाराज के गीता भवन ऋषिकेश में हुए प्रवचन से साभार कराची में दवे परिवार था बड़े पुत्र वासुदेव और छोटे कन्हैया । वासुदेव बचपन से ही भजन में लगे रहे । विवाह का प्रसंग आया तो कहा कि शरीर तो भजन के लिए मिला है । भोजन के लिए बुलाया जाए तो डकार लेने लगते थे कहते थे पेट भरा है । इस तरह भजन में आनंद लेते थे । उन्हें बिल्कुल भी शरीर की सुध बुध नहीं रहती थी। भोजन का ग्रास मुख् की जगह कान में ले जाते थे । इस प्रेम आनंद में डूबे होने के कारण उनकी माताजी को अपने हाथ से भोजन कराना पड़ता था । भजन करने के लिए श्मशान में चले जाया करते थे कहते की मृत्यु के निकट भजन अच्छा बनता है । घर में तो सब लोगों को भव रोग लगा है हमें वहां हमें भी भव रोग लग जाएगा । दवे जी के परिवार में एक छोटे पुत्र भी थे उनका नाम कन्हैया था । कराची से घर से चलकर वृंदावन के लिए निकल पड़े प्राचीन समय की बात है । घर पर बोला कि तीर्थ यात्रा पर जाएंगे चलते चलते अक्षय तृतीया के दिन श्रीधाम वृंदावन पहुंचे । वहाँ दर्शन आदि करके सोरोजी धाम में गए । भजन किया और बोले कि हम इस शरीर में हम इस शरीर से परिवार की सेवा नहीं कर सके अब हमारा समय पूरा हो चुका श्री ठाकुर जी विमान पर बैठे हैं और हमें बुला रहे हैं । ऐसा कहकर शरीर छोड़ दिया । इसी तरह एक और संत का स्मरण करते हुए महाराज जी ने बताया कि विदिशा में एक महात्मा रामचरितमानस का सत्संग कराते थे । केवल मानस की चौपाई और अर्थ पढ़कर सुनाने को कहते थे और कोई बात नहीं करते थे । एक बार किसी सत्संगी के साथ उनका छोटा पुत्र 1 दिन सत्संग में आ पहुंचा । उसकी चंचलता से सबका ध्यान भंग होता देखकर महात्मा जी ने पूछा ,-- किसका बच्चा है? उसके पिता ने सहज भाव से कह दिया - आपका ही है । महात्मा जी ने बच्चे से कहा ठीक से बैठ और सत्संग करने लगे । समाप्ति पर जब उस बच्चे का पिता उसे लेकर जाने लगा , तब महात्मा जी ने बच्चे का हाथ पकड़ लिया और बोले यह नहीं जाएगा , तुमने कहा यह हमारा है तो यही रहेगा। पिता बोले यह तो कहने की बात थी कोई सचमुच आपका बच्चा थोड़े ही हो गया । महात्मा बोले बस यही फर्क है भीतर से सारे संबंधों को नकली समझो और असली का अभिनय करते रहो तो बेड़ा पार हो जाएगा । गीता प्रेस के द्वारा प्रकाशित मासिक पत्रिका कल्याण 11; 93 से

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📿संत - स्वभाव 🙇🏻‍♂️ एक संत कपड़े सीकर अपना निर्वाह करते थे। एक ऐसा व्यक्ति उस नगर में था जो बहुत कपड़े सिलवाता था और उनसे ही सिलवाता था, लेकिन सदा सिलाई के रूप में खोटे सिक्के ही देता था। संत चुपचाप उसके सिक्के ले लेते थे। एक बार वे संत कहीं बाहर गये थे। उनकी दुकान पर उनका सेवक था। वह व्यक्ति सिलाई देने आया। सेवक ने सिक्का देखा और लौटा दिया। महोदय ! 'यह सिक्का खोटा है दूसरा दीजिए।' संत लौटे तो सेवक ने कहा, 'अमुक व्यक्ति खोटे सिक्के देकर मुझे ठगने आया था।' संत बोले, 'तुमने सिक्का ले क्यों नहीं लिया। वह तो सदा मुझे खोटे सिक्के ही देता है और उन्हें लेकर में भूमि में गाड़ देता हूं। मैं नहीं लूं तो कोई दूसरा व्यक्ति ठगा जाएंगा।'

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. "सन्त गणेशनाथ" छत्रपति शिवाजी महाराज के समय की बात है। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में उज्जैनी के पास एक छोटे ग्राम में गणेशनाथ का जन्म हुआ। यह कुल भगवान् का भक्त था। माता-पिता भगवान की पूजा करते और भगवन्नाम का कीर्तन करते थे। बचपन से ही गणेशनाथ में भक्ति के संस्कार पड़े। माता उन्हें प्रोत्साहित करती और वे तुतलाते हुए भगवान का नाम ले लेकर नाचते। पिता ने भी उन्हें संसार के विषयो में लगने की शिक्षा देने के बदले भगवान का माहात्म्य ही सुनाया था। धन्य हैं वे माता-पिता, जो अपने बालक को विषतुल्य विषय भोगो में नहीं लगाते, बल्कि उसे भगवान के पावन चरणों में लगने की प्रेरणा देते हैं। पिता-माता से गणेशनाथ ने भगवन्नाम कीर्तन का प्रेम और वैराग्य का संस्कार पैतृक धन के रूप में पाया। माता-पिता गणेशनाथ की युवावस्था प्रारम्भ होने के पूर्व ही परलोकवासी हो गये थे। घर मे अकेले गणेशनाथ रह गये। किन्तु उन्हें अब चिन्ता क्या ? हरिनाम का रस उन्हें मिल चुका था। कामिनी काञ्चन का माया जाल उनके चित्त को कभी आकर्षित नहीं कर सका। वे तो अब सत्संग और अखण्ड भजन के लिये उत्सुक हो उठे। उन्होंने एक लंगोटी लगा ली। जाडा हो, गरमी हो या है वर्षा हो, अब उनको दूसरे किसी वस्त्र से काम नहीं था। वे भगवान् का नाम कीर्तन करते, पद गाते आनन्दमय हो नृत्य करने लगते थे। धीरे धीरे वैराग्य बढता ही गया। दिनभर जंगल में जाकर एकान्त में उच्चस्वर से नाम कीर्तन करते और रात्रि को घर लौट आते। रातको गाँव के लोगों को भगवान् की कथा सुनाते। कुछ समय बीतने पर ये गांव छोड़कर पण्ढरपुर चले आये और वहीं श्री कृष्ण का भजन करने लगे। एक बार छत्रपति शिवाजी महाराज पण्ढरपुर पधारे। पण्ढरपुर में उन दिनों अपने वैराग्य तथा संकीर्तन प्रेम के कारण साधु गणेशनाथ प्रसिद्ध को चुके थे। शिवाजी महाराज इनके दर्शन करने गये। उस समय ये कीर्तन करते हुए नृत्य कर रहे थे। बहुत रात बीत गयी, पर इन्हें तो शरीर का पता ही नहीं था। छत्रपति चुपचाप देखते रहे। जब कीर्तन समाप्त हुआ, तब शिवाजी ने इनके चरणोंमें मुकुट रखकर अपने खेमे में रात्रि विश्राम करने की इनसे प्रार्थना की। भक्त बड़े संकोच में पड़ गये। अनेक प्रकार से उन्होंने अस्वीकार करना चाहा, पर शिवाजी महाराज आग्रह करते ही गये। अन्त में उनकी प्रार्थना स्वीकार करके गणेशनाथ बहुत से कंकड़ चुनकर अपने वस्त्र में बाँधने लगे। छत्रपति ने आश्चर्य से पूछा -इनका क्या होगा ? आपने कहा- ये भगवान् का स्मरण दिलायेंगे। राजशिविर में गणेशनाथ जी के सत्कार के लिये सब प्रकार की उत्तम व्यवस्था की गयी। सुन्दर पकवान सोने के थाल में सजाये गये, सुगन्धित जल से उनके चरण धोये स्वयं छत्रपति ने, इत्र आदि उपस्थित किया गया और स्वर्ण के पलंग पर कोमल गद्देके ऊपर फूल बिछाये गये उनको सुलाने के लिये। गणेशनाथ ने यह सब देखा तो सन्न रह गये। जैसे कोई शेर गाय के छोटे बछड़े को उठाकर अपनी मांद में ले जाये और वह बेचारा बछड़ा भय के मारे भागने का रास्ता न पा सके, यही दशा गणेशनाथ की हो गयी। उन्हें भोग के ये सारे पदार्थ जलती हुई अग्नि के समान जान पड़ते थे। किसी प्रकार थोडा सा कुछ खाकर वे विश्राम करने गये। उस फूल बिछी शय्यापर अपने साथ लायी बडी गठरी के कंकडों को बिछाकर उन पर बैठ गये। वे रोते-रोते कहते जाते थे- पाण्डुरंग ! मेरे स्वामी ! तुमने मुझे कहां लाकर डाल दिया ? अवश्य मेरे कपटी ह्रदय में इन भोगो के प्रति कहीं कुछ आसक्ति थी, तभी तो तुमने मुझे यहाँ भेजा है। विट्ठल ! मुझे ये पदार्थ नरक की यन्त्रणा जैसे जान पड़ते हैं। मुझे तो तुम्हारा ही स्मरण चाहिये। किसी प्रकार रात बीती। सवेरे शिवाजी महाराज ने आकर प्रणाम करके पूछा – महाराज ! रात्रि सुख से तो व्यतीत हुई ? गणेशनाथ जी ने उत्तर दिया- जो क्षण विट्ठल का नाम लेने में बीते, वही सफल हुये। आज की रात हरिनाम लेने-में व्यतीत हुई अत: वह सफल हुई। शिवाजी ने जब सन्त के भाव सुने, तब उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे। साधु को आग्रह करके अपने यहाँ ले आने का उन्हें पश्चात्ताप हुआ। उन्होंने चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। साधक के लिये एक सबसे बडा विघ्न है लोक प्रख्याति। प्रतिष्ठा के कारण जितना शीघ्र साधक मोह मे पड़ता है, उतनी शीघ्रता से पतन दूसरे किसी विघ्न से नहीं होता। अतएव साधक को सदा सावधान होकर शूकरो विष्ठा के समान प्रतिष्ठा से दूर रहना चाहिये। गणेशनाथ जी ने देखा कि पंढरपुर में अब लोग मुझें जान गये हैं, अब मनुष्यों की भीड़ मेरे पास एकत्र होने लगी है, तब वे घने जंगल में चले गये। परंतु फूल खिलेगा तो सुगन्धि फैलेगी ही और उससे आकर्षित होकर भौरे भी वहां एकत्र होंगे ही। गणेशनाथ जी में भगवान का जो दिव्य अनुराग प्रकट हुआ था, उससे आकर्षित होकर भगवान् के प्रेमी भक्त वन में भी उनके पास एकत्र होने लगे । गणेशनाथ जी का भगवत् प्रेम ऐसा था कि वे जिसे भी छू देते थे, वही उन्मत्त की भाँति नाचने लगता था। वही भगवन्नाम का कीर्तन करने लगता था। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों से एक बार कहा था- सच्चा भगवद भक्त वह है, जिसके पास जाते ही दूसरे इच्छा न होने पर भी विवश् की भाँति अपने आप भगवान् का नाम लेने लगें। गणेशनाथ जी इसी प्रकार के भगवान् के भक्त थे। श्री गणेशनाथ जी के प्रेम की महिमा अपार है। वे जब भगवान के प्रेम में उन्मत्त होकर पांडुरंग विट्ठल ! पांडुरंग विट्ठल ! विट्ठल रुक्मिणी ! कहकर नृत्य करने लगते थे, तब वहां के सब मनुष्य उनके साथ कीर्तन करने को जैसे विवश हो जाते थे। ऐसे भगवद्भक्त तो नित्य भगवान् को प्राप्त हैं। वे भगवन्मय हैं। उनके स्मरण से, उनके चरित का हदय में चिन्तन करने से मनुष्य के पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और मानुष हृदय में भगवान् का अनुराग जागृत हो जाता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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भजन की महिमा जय श्री राधे यह हमारा स्वभाव है कि जब तक हमें किसी वस्तु की महिमा पता ना चले तब तक हम उधर आकर्षित नहीं होते हैं । हमारा मनुष्य जीवन भजन के लिए ही मिला है कम से कम हम वह लोग जो अपने आपको वैष्णव कहते हैं उनका जीवन तो भजन भक्ति के लिए ही मिला है । अब प्रश्न उठता है इस संसार में सभी लोग तो भजन नहीं कर रहे हैं कोई धन कमा रहा है कोई कामनाओं की पूर्ति में लगा हुआ है कोई भाग दौड़ में लगा हुआ है किसी के पास अकूत संपत्ति है किसी के पास अनेक पुत्र हैं आदि, आदि । लेकिन हम यदि ध्यान से देखें तो इनमे से किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर चमक नहीं है प्रसन्नता नहीं है आनंद नहीं है संतोष नहीं है और फल भी कुछ हाथ नहीं पड़ता पुत्र भी यहीं रह जाते हैं धन भी यहीं रह जाता है और रोता पीटता व्यक्ति चला जाता है इसके विपरीत यदि हम सच्चे संत सच्चे भजन कारी वैष्णवों को देखें तो उनका परम धन है नाम उनका परम संतोष है भगवत भजन। उनके चेहरे पर एक चमक है और वह जब जाते हैं तो हंसते हुए जाते हैं उनका यहां पर न था न पड़ा रह जाता है। भजन किया भजन साथ जाता है और यदि थोड़ी हल्की बात भी करें तो बड़े से बड़े धन वाला अधिक से अधिक पुत्रोंवाला अधिक से अधिक यश वाला अधिक से अधिक मानवाला सारे के सारे आकर इन भजन आनंदी संतो के चरणों में शीश नवाते हैं । आखिर क्यों । क्योंकि भजन भक्ति वैष्णवता संत यह सर्वोपरि है और सर्वोपरि इसलिए है कि उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य समझा और उसमें लग गये । उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया इसीलिए हम सब इनके चरणों में शीश नवाते हैं हम भी प्रयास करें संसार के साथ-साथ संसार में अनासक्त रहते हुए अपने परम लक्ष्य भगवत भजन पर केंद्रित करें । हम कर सकते हैं अनेकों ने किया है तो आप और मैं क्यों नहीं ? समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का प्रणाम जय श्री राधे जय निताई

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