संत_महापुरुष_के_लक्षण

🌿💐🌹🌷🙏🏻🌷🌹💐🌿 परम श्रद्धेय निरंतर वंदनीय संतप्रवर पूज्य पं• श्री गयाप्रसाद जी महाराज के अनमोल वचन- (१) नित्य नियमित भजन करिवे की साधक के जीवन में बहुत ही आवश्यकता है। नित्य नियमित भजन होयवे सो चित्त मे अत्यन्त शांति एवम् प्रसन्नता होंय है । नियम निष्ठापूर्वक भजन होतौ रहै तौ कछु काल में भजन में रूचि स्वतः ही उत्पन्न होयवे लगै है । तथा यदि रुचिपूर्वक नियम सो दीघकाल भजन कियौ जाय तौ -भजन भगवान साधक कूँ पकर लेय है।नियमितता ही भगवान् कौ स्वरूप है । (२) नित्य रात्रि में शयन सो पूर्व यह विचार लेय कि आज भजन में कैसी रूचि रही साथ ही यह प्रतिज्ञा करै कि अगले दिन आज सो हू आधिक भजन में उत्साह रहैगौ । (३)नित्य कौ नियम नित्य ही पूरौ करले , भजन में कबहुँ आलस्य, प्रमाद तथा उपेक्षा न होन पावै । (४) पुण्यन के फलस्वरूप भजन में रूचि बढै है एवम् रस की( उत्तपति) होयवे लगै है । सबसों उत्तम पुण्य है -सब कूँ सुख पहुँचायवे की भावना तथा भजन करवै वारेन की सब प्रकार सों सहायता । (५) भजन में आनन्द मिलै या के ताई उपाय है -अधिक सो अधिक एकान्त में बैठके सब प्रपञ्च से बचके नियम सों भजन करनौ । (६) आयु के साथ -साथ अन्य कार्यन कूँ धीरे-धीरे कम करतौ जाय ,भजन बढ़ातौ जाय । वृद्धावस्था में एकमात्र भजन में ही लग जाय। (७) श्रीभगवत् सेवा के भाव सो एव भगवत् प्रियत जो भी कियौ जाय है वाही कूँ भगवद् भजन कहै हैं ।

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*व्रज के भक्त....* 🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻 *श्री गौरदास बाबा जी* *नंदग्राम के पावन सरोवर के तीर पर श्री सनातन गोस्वामीपाद की भजन-कुटी में श्री गौरदास बाबा जी भजन करते थे।* *वे सिद्ध पुरुष थे।नित्य प्रेम सरोवर के निकट गाजीपुर से फूल चुन लाते,और माला पिरोकर श्रीलाल जी को धारण कराते* *फूल-सेवा द्वारा ही उन्होंने श्री कृष्ण-कृपा लाभ की थी।कृपा-लाभ करने से चार-पांच वर्ष पूर्व ही से वे फूल-सेवा करते आ रहे थे* *आज उन्हें अभिमान हो आया-इतने दिनों से फूल-सेवा करता आ रहा हूँ, फिर भी लाल जी कृपा नही करते।* *उनका ह्रदय कठोर हैं किन्तु वृषभानु नन्दिनी के मन प्राण करुणा द्वारा ही गठित हैं।इतने दिन उनकी सेवा की होती,तो वे अवश्य ही कृपा करती। अब मैं यहाँ न रहूँगा...आज ही बरसाना जी चला जाऊँगा।* *संध्या के समय कथा आदि पीठ पर लाद कर चल पड़े, बरसाना जी की ओर।जब नंदगाँव से एक मील दूर एक मैदान से होकर चल रहे थे...* *बहुत से ग्वाल-बाल गोचरण करा गाँव को लौट रहे थे, एक साँवरे रंग के सुंदर बालक ने उनसे पूछा-बाबा !तू कहाँ जाय ?* *तब बाबा ने उत्तर दिया-लाला !हम बरसाने को जाय हैं, और बाबा के नैन डबडबा आये* *बालक ने रुक कर कुछ व्याकुलता से बाबा की ओर निहारते हुए कहा-बाबा ! मत जा।* *बाबा बोले-न लाला !मैं छः वर्ष यहाँ रहा,मुझे कुछ न मिला।अब और यहाँ रूककर क्या करूँगा.. ??* *बालक ने दोनों हाथ फैलाकर रास्ता रोकते हुए कहा-बाबा मान जा,मत जा।* *बाबा झुँझलाकर बोले-ऐ छोरा !काहे उद्धम करे हैं। रास्ता छोड़ दे मेरा।मोहे जान दे।* *तब बालक ने उच्च स्वर में कहा-बाबा !तू जायेगा, तो मेरी फूल-सेवा कौन करेगा ...??* *बाबा ने आश्चर्य से पलट कर पूछा-कौन हैं रे तू ??तो न वहाँ बालक, न कोई सखा और न ही कोई गैया।* *बाबा के प्राण रो दिये ।हा कृष्ण !हा कृष्ण !कह रोते-चीखते भूमि पर लोटने लगे। चेतना खो बैठे और फिर चेतना आने पर...हा कृष्ण !हाय रे छलिया !कृपा भी की, तो छल से।* *यदि कुछ देर दर्शन दे देते,तो तुम्हारी कृपा का भण्डार कम हो जाता क्या ?? पर नही दीनवत्सल !तुम्हारा नही,यह मेरा ही दोष हैं।* *इस नराधम में यह योग्यता ही कहाँ,जो तुम्हे पहचान पाता ?वह प्रेम और भक्ति ही कहाँ ? जिसके कारण तुम रुकने को बाध्य होते।* *उधर पुजारी जी को आदेश हुआ-देखो, गौरदास मेरी फूल-सेवा न छोड़े। मैं किसी और की फूल-सेवा स्वीकार नही करूँगा।* *कैसे मान लूँ की...तू पल पल में शामिल नहीं....कैसे मान लूँ की...तू हर चीज़ में हाज़िर नहीं....कैसे मान लूँ की...तुझे मेरी परवाह नहीं..कैसे मान लूँ की तू दूर है पास नहीं..देर मैने ही लगाईं...पहचानने में मेरे ईश्वर वरना तूने जो दिया* *उसका तो कोई हिसाब ही नहीं...जैसे जैसे मैं सर को झुकाता चला गया..वैसे वैसे तू मुझे उठाता चला गया....* *गोविंद*🙏🏻🙏🏻🙏🏻

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. "सन्त की सादगी" एक बार सन्त दादू जंगल में विश्राम कर रहे थे। उनके दर्शन के लिए लोग वहाँ भी आने लगे। नगर के एक कोतवाल ने जब उनकी महिमा सुनी, तो वह भी अपने अश्व पर आरूढ़ हो उनके दर्शन को निकला। मार्ग में उसे लंगोटी धारण किया हुआ एक कृशकाय व्यक्ति जंगल साफ करता दिखाई दिया। कोतवाल ने उससे पूछा, "ऐ भिखारी ! क्या तू जानता है कि यहाँ कोई सन्त दादू रहते हैंं ?" उस व्यक्ति ने उसकी ओर देखा मात्र और अपने काम में लग गया। उसे चुपचाप देख कोतवाल ने पुनः प्रश्न किया, किन्तु उसे कोई उत्तर न देते देख वह गुस्सा हो गया और उसे चाबुक से मारते हुए बोला, "तू गूँगा है क्या ? मैं तुमसे पूछ रहा हूँ और तू उसका जबाब भी नहींं देता !" जब उसके शरीर से खून निकलता दिखाई दिया, तो उसे दया आयी और मारना बन्द किया। इतने में एक व्यक्ति वहाँ से गुजरा। उससे भी कोतवाल ने वही प्रश्न किया। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "ये जो मार्ग के काँटे साफ कर रहे हैंं, यही तो सन्त दादू हैंं।" अब तो कोतवाल की ऐसी दशा हो गयी कि काटो तो खून ही नहींं। वह उनके पैरों पर गिर पड़ा और उनसे क्षमा माँगी। तब सन्त दादू बोले, "कोई भी ग्राहक बाजार में जब घड़ा खरीदने जाता है, तो पहले ठोंक - पीटकर ही तो उसकी जाँच करता है। तुम्हें भी शायद मुझे गुरू बनाना था, इसलिए मुझे ठोंका - पीटा है, सो इसमें क्षमा काहे की ?" "जय जय श्री राधे" *******************************************

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आज श्री प्रबोधानन्द सरस्वती पाद जी के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष ::: प्रबुद्ध जी जिनका दीक्षा के बाद नाम प्रकाशानंद सरस्वती हुआ और फिर महाप्रभु जी की कृपा प्राप्त कर प्रबोधानंद सरस्वती नाम से विख्यात हुए। शैशव काल से ही यह न्याय, व्याकरण , दर्शन अलंकार, नाट्य , संगीत , नृत्य एवम् कला में प्रवीण थे। वे श्रीगोपाल भट्ट जी के चाचा और अध्यापक भी थे । गोपाल भट्ट जी 8 ही वर्ष के थे जब उनके चाचा विरक्त हो कर काशी की ओर चल पड़े। वहाँ जाकर अद्वैतवाद में दीक्षित हो कर प्रबुद्ध प्रकाशानंद सरस्वती के रूप में विख्यात हो कर उसी मठ के आचार्य के रूप में हज़ारो छात्रो को सांख्य आदि का उपदेश देने लगे। एक बार प्रकाशानंद जी वेदांताचार्य वासुदेव सार्वभौम से मिलने नवद्वीप आए। नवद्वीपधाम न्याय- वेदान्त अध्यापन का प्रमुख केंद्र था। उस समय श्री गौरांग का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध था , सभी छात्र इनकी प्रशंसा करते । प्रकाशानंद जी भी इनसे मिलने के लिए उत्कंठित हो उठे। वे इनसे मिलने पहुँचे तो कमर पर पट्टवस्त्र, हाथो में कनक कंगन श्री चरणों में नूपुर, मालती माला और मुकूट धारण किये अपने ही नाम का उच्चारण कर नाच रहे थे। यह देख कर प्रकाशानंद जी का मन घृणा से भर गया कि इतना बड़ा विद्वान और ऐसे कर्म। प्रकाशानंद जी व्याकुल हो गये और पुनः काशी की और चल पड़े। प्रकाशानन्द जी ने संन्यास तो लिया परन्तु अपने पांडित्य के अहंकार को भुला न सके।उनके एक मात्र वंशधर गोपालभट्ट जी थे । जब उन्हें पता चला कि गोपाल भट्ट जी पर चैतन्य महाप्रभुजी का प्रभाव है और वे ज्ञानमार्ग से भक्तिमार्ग के पथिक बन चुके है तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को पत्र लिखा जिसमें संन्यास का उपदेश था। चैतन्य महाप्रभु जी ने पत्र पढ़ा और उसके उत्तर में लिखा : स्वयं काशीपति विश्वनाथ जिनकी आराधना करते है, जिसका नाम निस्तारक तारक के रूप में प्रसिद्ध है अतः सखे ! श्रीपाद ! श्री कृष्ण के उस मोक्षदायक श्री चरणों का आश्रय लो। प्रकाशानन्द जी मायावादी सन्यासी थे। शिव के अतिरिक्त किसी अन्य देव की उपासना उन्हें रुचिकर नहीं थी। प्रकाशानन्द जी का क्रोध चरम सीमा पर जा पहुँचा उन्होंने उनके उत्तर को व्यंग्य रूप में लिया। उन्होंने हर तरफ महाप्रभु जी की निंदा करना आरम्भ कर दिया। उधर महाप्रभुजी के ह्रदय में वृन्दावन धाम दर्शन की लालसा बढ़ती जा रही थी । एक दिन महाप्रभुजी वृन्दावन की ओर निकल पड़े। वृन्दावन मार्ग के मध्य काशी पड़ता था। काशी पहुँचकर महाप्रभु का शोर हर तरफ फैलने लगा। हरि नाम ध्वनि काशी के कण कण में गूँज उठी। प्रकाशानंद जी से मिले बिना ही महाप्रभु वृन्दावन की ओर अग्रसर हो गए। वृन्दावन माधुरी का आस्वादन कर प्रभु नीलाचल की ओर जाते हुए फिर काशी की ओर निकले । इस बार श्री सनातन गोस्वामी जी भी उनके साथ ही थे। फिर काशी में उनका शोर हुआ और अंत में वो दिन आया जब प्रकाशानंद जी का महाप्रभु से मिलना हुआ। महाप्रभु जी के एक ब्राह्मण भक्त ने अपने निवास पर एक ब्राह्मण भोज रखा। वहाँ पर प्रकाशानन्द जी भी पधारे। काशी का एक विशाल सन्यासी वर्ग वहां उपस्थित था। सामने ही सर्वश्रेष्ठ सिंहासन पर प्रकाशानंद जी विराजित थे। शास्त्रार्थ चल रहा था। अचानक सम्पूर्ण सन्यासी वर्ग उठ खड़ा हुआ। सामने से तेजोमय प्रकाश को चहुँ और बिखेरते हुए श्री मन्महाप्रभु अपने चार भक्तों के साथ हरिनाम अमृत रस सुधा को प्रवाहित करते हुए आये और एक संकुचित स्थान पर बैठ गए। नवद्वीप बिहारी, प्रेमरस संचारी की इस माधुर्य मूर्ति को देख कर प्रकाशानंद जी व्याकुल हो उठे।उनके मन से शत्रुता भाव मिटने लगा । वे अपलक दृष्टि से उनको देखते रहे और वह स्वयं को रोक न सके और महाप्रभु जी के पास जाकर बोले - " श्रीपाद! उठिये। आप इस स्थान पर बैठ कर हमे क्यों लज्जित कर रहे हैं ? महाप्रभु जी प्रकाशानंद जी की वाणी सुन कर उठे और दीन भाव से कहने लगे - "इतने बड़े विद्वान समाज में मै ज्ञानहीन भला कैसे बैठ सकता हूँ।" इतना कह कर महाप्रभु पुनः बैठ गए। अब प्रकाशानंद जी से रहा नही गया। हाथ पकड़ कर महाप्रभु जी को अपने समीप उच्च आसन पर बिठाया और कहा- श्रीपाद! आपके मुख की कांति देखकर निश्चय ही ज्ञात होता है कि आप साक्षात नारायण है। पर वेदना तो यह है कि एक ही सम्प्रदाय के होते हुए आप हमसे क्यों नही मिलते। सन्यासियों का मुख़्य कृत्य वेदपाठ है। क्या नाचना गाना हमारे लिए उचित है ? महाप्रभु पुनः कह उठे। "कलियुग के जीवों के लिए हरिनाम एक ऐसा सर्वोत्तम साधन है जो मनुष्य को मायापाश से विमुक्त कर सकता है। हरिनाम बिना जीव की कोई गति नहीं है इसलिए - हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ।। यह सुनकर सन्यासी वर्ग ही नहीं प्रकाशानन्द जी भी चमत्कृत हो उठे। प्रभु ने इस व्याख्या का विस्तार करते हुए कहा कि - "श्रीपाद ! जब मै इस मन्त्र का जाप करता हूँ तब मेरी आँखों से आंसू बहने लगते है मैं स्वतः नाचने और गाने लगता हूँ। " इन वाक्यो को सुनकर प्रकाशानंद जी ने कहा कि " श्रीपाद ! आप वेद अध्ययन क्यों नही करते ? वेद ईश्वरीय वाक्य है इसमें कोई संदेह नही। महाप्रभु जी ने कहा कि " वेद का सार ही है हरिनाम संकीर्तन । इसलिए मै सार का आश्रय लिए हुए हूँ । प्रभु मुझ पर अवश्य कृपा करेंगे ।" इस चर्चा के बाद प्रकाशानंद जी समझ गये कि श्री मन्महाप्रभु जी एक विद्वान मधुरातिमधुर एवम लावण्यमय अवतारी पुरुष हैं। उनके ह्रदय के अन्धकार का आज अवसान हो गया। उनका गर्व नष्ट हो गया एवम् उनका भाव बदल गया । वे महाप्रभु जी के चरणों में गिर पड़े, अश्रुओं की अविरल धारा ने महाप्रभु जी के चरणों को अभिषिक्त कर डाला। महाप्रभुजी ने प्रकाशानन्द जी को उठाकर गले लगाया और कहने लगे -" श्रीपाद ! इतने अधीर न हो। कृष्ण बड़े ही करुणामय है ।" अब तो सर्व सन्यासी वर्ग भी नाच रहा था और गा रहा था। अब काशी नगरी में भी कृष्ण नाम गूंज उठा। प्रकाशानन्द जी अब प्रेम मार्ग के पथिक बन प्रबोधानन्द बन चुके थे। अब प्रभु ने काशी से प्रस्थान किया और श्री मन्महाप्रभु जी का आदेश शिरोधार्य कर उनको नमन कर प्रबोधानन्द जी नीलाचल से नदी पथ द्वारा मथुरा आ गए। वहाँ वे कुछ दिन रह कर श्री वृन्दावन धाम के उस स्थान पर आये जहाँ नागपत्नियों ने श्री कृष्ण से अपने पति के लिए कहा था - " न्यायो हि दंड:कृत किल्विषे अस्मिन् तवावतार: खलनिग्रहाय। " अतः अपने को कालिया नाग के समान पातकी और श्रीगौर को पतितपावन अवतार मान कर वे कालीदह पर निवास करने लगे। श्री वृन्दावन निवास काल में श्री प्रबोधानन्द जी, श्री रूप तथा श्री जीव गोस्वामी के सहयोगी एवं गौरगुण गायक के रूप में माने जाते है। श्री प्रबोधानन्द सरस्वती पाद ने अपूर्व धाम निष्ठात्मक 'श्रीवृन्दावन महिमामृत' एवम, ' श्री राधारससुधानिधि आदि कई अपूर्व ग्रंथो का प्रणयन किया। आप महाप्रभु जी के पार्षद थे एवम् ब्रज लीला में तुंगविद्या सखी हैं । आप सोलहवीं वैक्रमीय के द्वितीय दशक के अंतिम भाग में श्रावण कृष्णा प्रतिप्रदा (आज ही के दिन) को प्रभु गौर गुणगान करते हुये तिरोहित हुए। आज भी प्राचीन कालीदह के समीप आपकी दिव्य समाधि का दर्शन किया जा सकता है। 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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