संत_असंतन्हि_कै_असि_करनी।

सरस श्रद्धांजलि --- सरस श्री धाम वृन्दावन में श्रीयुगल नाम की सरसता का रसास्वादन केवल रसिक संत ही करा सकते है | मुझ जैसे अधमाति अधम जीव को मधुरातिमधुर नाम का चस्का लगाने को संत किस युक्ति से कार्य करते है ये चिंतन बुद्धिजीवियों की क्षमता से परे है | कुछ इसी विलक्षण परोपकारी प्रतिभा से सम्पन्न श्रीकीर्तनिया बाबा जी थे | आप का जन्म असम में हुआ और आप श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित होकर विरक्ति के सभी लक्षणों से सुशोभित होकर श्रीधाम वृन्दावन में विराजते थे | आप सरलता और त्याग की मूर्ती थे | सरलता तो सभी प्रकार से सरलता लेकिन सरलता का अर्थ किसी प्रकार से हीनता नहीं जैसा की आजकल माना जाता है | आप सरल थे सरलता से कीर्तन कराते थे लेकिन उस सरल कीर्तन में भी सरसता थी सरसता की हिलोर ह्रदय द्रवित कर देती थी | बलिहार श्रीकीर्तनिया बाबा जी की श्रीचरण रज पर | जब कभी अचानक मिलना होता था तो मुझे तो बहुत सावधान रहना पड़ता था ऐसे मिलते थे जैसे मुझसे काफी छोटे हों | मुझ जैसे अधम जीवो से भी सहज नाम उच्चारण कराने का एक अद्भुत विधान खोज निकाला | आपने देखा होगा कि श्रीधाम वृन्दावन की दीवारों एवं वृक्षों पर श्रीराधा श्रीराधा लिखा रहता था ये दिव्य युक्ति जीव कल्याणार्थ और एतदर्थ परिश्रम सर्व विध श्लाघनीय और वन्दनीय है | आप श्रीनिम्बार्क सम्प्रदाय के सदाचार के साक्षात स्वरूप थे हम सभी को उनके दर्शन मात्र से सदाचार की प्रेरणा मिलती रहती थी | श्रीधाम में रसिक जन के प्रिय श्रीकीर्तनिया बाबा जी निकुंज प्रवेश | हमें कल्याण कारी सरस स्मृतियों के साथ सगौरव बिलखते छोड़ कर | कोटि कोटि नमन

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"सन्त चरित्र" "दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी महाराज" दण्डी स्वामी श्रीकेवलाश्रमजी का जन्म एक अति निर्धन ब्राह्मण-परिवार में कुरुक्षेत्र भूमि के अन्तर्गत जिला जीन्द में रामहृद (रामराय) में हुआ था। वे बाल ब्रह्मचारी और बहुत कम पढ़े-लिखे थे, परंतु संतों के मुख से सुने शास्त्रों पर विश्वास करते थे। ब्रह्मचारी जीवन उन्होंने अपने जन्म-स्थान रामराय में ही माता कृष्णा देवी के आश्रम में बिताया। माताजी के देह त्याग देने के बाद उनको कृष्णाधाम आश्रम रामराय जिला जीन्द हरियाणा की गद्दी पर बिठा दिया गया, परंतु मात्र एक माह के बाद ही वे रात को आश्रम को छोड़ ऋषिकेश में आकर संन्यास लेकर मौन धारण करके रहने लगे। आश्रम के लोग ढूँढ़ते रहे। हरिद्वार में भी उनका कृष्णाधाम आश्रम 'खड़खड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। वहाँ पर उन्होंने देवीस्वरूप शास्त्रीजी को प्रबन्धक बनाया था। शास्त्रीजी ने उनको ढूँढ़ लिया तथा उनसे आग्रह किया, जैसे आप ऋषिकेश में रह रहे हैं, वैसे ही आप अपने आश्रम में रहिये। इसपर वे हरिद्वार आ गये। दुर्भाग्य से देवीस्वरूप शास्त्रीजी का निधन हो गया। शास्त्रीजी के निधन के बाद आश्रम को स्वामी केवलाश्रमजी महाराज को सँभालना पड़ा। वे नित्य-प्रति गंगा-स्नान करते थे। आश्रम के अधिष्ठाता होते हुए भी भिक्षा करके भोजन करते थे। उत्तरी हरिद्वार में उस समय पशु-अस्पताल नहीं था। जिस किसी आश्रम की गाय बीमार हो जाती, वे लोग स्वामीजी को बुलाकर ले जाते। वे गाय के स्वस्थ होने की दवाई एवं टोटके जानते थे। कोई भी व्यक्ति बीमार गाय के उपचार के लिये उन्हें बुलाने आता तो वे भजन छोड़कर तुरन्त उसके साथ चले जाते। एक दिन मैंने कहा, भजन करने के बाद चले जाना। उन्होंने कहा गोसेवा भी भजन ही है। वे आश्रम की गाय स्वयं चराने जाते थे। एक दिन उनको साँप ने काट लिया। आकर कहने लगे साँप ने मुँह लगा दिया। साँप का दोष नहीं था। मेरा ध्यान गाय की तरफ था। मेरा पैर साँप पर पड़ गया। हमने कहा, अस्पताल चलो। जहाँ सर्प ने काटा था, वहाँ नीला एवं बहुत बड़ा निशान पड़ गया था। कहा-ठीक हो जायगा। चिन्ता ना करो, बहुत आग्रह करने पर भी अस्पताल नहीं गये। कहने लगे, 'अभी मेरी मृत्यु नहीं है। तुम चिन्ता न करो'। कभी भी हमने उनको क्रोध आदि करते हुए नहीं देखा। गंगा-स्नान, गो-सेवा, भजन उनके नित्य के कार्य थे। आश्रम में अनेक दण्डी स्वामी महात्मा रहते थे। उनमें बहुत-से अतिवृद्ध महात्मा भी थे। वे उनकी नित्य-प्रति स्वयं सेवा करते थे। बीमार होने पर सभी महात्माओं की स्वयं सेवा करते थे। वर्ष १९८७ में श्रीस्वामीजी हरियाणा गये थे। वहाँ एक पागल कुत्ते ने काट लिया। उनको अस्पताल लेकर में गये, वहाँ पर संयोग से कुत्ते के काटने के उपचार सम्बन्धी इंजेक्शन नहीं मिले। दुबारा बहुत प्रयास किया गया, पर वे अस्पताल नहीं गये। कहा-यदि प्रभु चाहते तो मैं अस्पताल गया था। इंजेक्शन मिल जाता, उनकी अब यही इच्छा है। वे जीवन में बीमार पड़ते तो कभी दवाई नहीं लेते। अपने-आप ही काढ़ा आदि बनाकर पी लेते थे। दवाई कभी नहीं ली। महीनों के बाद मैं हरियाणा से आया था। जैसे मेरी आवाज सुनी, कमरे से बाहर आकर कहने लगे-भाई, आज जितनी दवाई देनी है, दे दे। जिस डॉक्टर को दिखाना हो दिखा ले। नहीं तो कहेगा कि स्वामीजी को दवाई दिला देते तो बच जाते। अब तू अपने मन की कर ले। उस समय आश्रम में गाड़ी नहीं थी। हम टैम्पो करके उनको जी०डी० अस्पताल में ले गये। डॉक्टर ने देखते ही कह दिया पागल कुत्ते के काटने से होने वाली बीमारी हो गयी है। अब ये बच नहीं सकते। हम वापस आश्रम में ले आये और सबसे पीछे के कमरे में लिटा दिया। सभी आश्रम वाले पता लगते ही आ गये। उनके प्रति सभी लोग श्रद्धा रखते थे। तीन-चार आश्रमवालों ने अपने स्तर से तीन-चार डॉक्टर, जो उस समय बहुत प्रसिद्ध थे, बुला लिये। सभी डॉक्टरों ने एक मत से कहा ये ७२ घण्टे तड़पेगे, दीवारों पर सिर पारेंगे, काटने दौड़ेंगे, जिसको भी इनके नाखून लार या दाँत लगा जायगा, वे भी ऐसे ही मरेंगे। अतः तुरन्त इनको जी०डी० अस्पतालय दाखिल कराओ। जब डॉक्टर लोग इस प्रकार की बात कर रहे थे, तो श्रीस्वामी जी ने एक छात्र को भेजकर मुझे बुलवाया तथा कहा- भाई, इन डॉक्टरों की बातों में नहीं आना, मेरे कारण आश्रय में कोई हानि नहीं होगी। मुझे सायं ०५ बजे तक जीना है। अगर तेरा दिल मानता है तो मुझको आश्रय में ही मरने दें, नहीं तो मेरे को गंगाजी के किनारे डाल दो। अस्पताल नहीं भेजना। वे मात्र 'ओम् ओम् ' बोल रहे थे। जब उनको बहुत अधिक कष्ट होता था तो 'ओम् ओम्' करके दीवार की तरफ मुख कर लेते, फिर दर्द कम होते ही 'ओम-ओम' करके मुँह इधर कर लेते। डॉक्टरों ने कहा था कि पानी देखते ही बेहोश हो जायेंगे, परंतु उन्होंने एक कमण्डलु गंगाजल पीया उसी दिन परम पूज्य शंकराचार्य दण्डी स्वामी माधवाश्रमजी महाराज हरिद्वार में भागवत की कथा कर रहे थे। वे भी इनके अन्तिम दर्शनों के लिये आये और उन्होंने कथा में कह दिया ओ समाज के लोगों! अगर तुम्हें भजन का प्रभाव देखना है तो कृष्णाधाम आश्रम खड़खड़ी हरिद्वार में चले जाओ। अगर ये बीमारी तुम किसी को भी होती तो तड़पते, रोते, बिलखते, परंतु एक सन्त इस बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं। सिवाय 'ओम्' के एक शब्द नहीं बोल रहे। शंकराचार्यजी के इतना कहने के बाद कृष्णाधाम में मेला लग गया। हजारों लोग आते उनके दर्शन करके चले जाते, उनका कमरा अन्तिम समय तक खुला रहा। दो महात्मा उनकी सेवा के लिये उनके पास रहे, जो लोग आ रहे थे। उनके पैर छूकर जाते, उनसे किसी को भय नहीं लगा और ना ही वे 'ओम् ओम् के सिवाय कुछ बोले और उन्होंने आने-जाने वालो का ध्यान भी नहीं किया। उस समय मेरठ से पं० फूलचन्दजी आये हुए थे। उनको बुलाकर कहने लगे पण्डितजी मुहूर्त देखो। पण्डितजी ने कहा-किसी विषय का मुहूर्त देखूँ ? कहने लगे, मेरा मुहूर्त तो ५ बजे का है। इससे पहले मरने का मुहूर्त बनता हो तो मैं पहले चला जाऊँ। जागेराम शास्त्री बहुत दुखी हो रहा है। पण्डितजी कुछ नहीं बोले, रोने लग गये, ठीक ५ बजे एक सन्त आये। वे आकर रोने लगे। स्वामी जी कहने लगे, सन्तजी! क्यों रोते हो, मुझे कहने लगे तेरे आश्रम में सन्तजी आये हैं। इसको दूध पिला। यह कहकर फिर 'ओम ओम' कहने लगे। इतने में सन्त को गेट तक छोड़कर आया। उस समय उनके पास दण्डी स्वामी श्रीमुरारी आश्रम तथा दण्डी स्वामी श्रीरामानन्द आश्रम सेवा में थे। स्वामी जी के कहने पर उन्होंने उन्हें नीचे आसन बिछाकर बैठाया। पद्मासन उन्होंने स्वयं लगा लिया। जब कमण्डलु से उनको गंगाजल पिला रहे थे तब मैंने कहा-नीचे क्यों बैठाया ? अभी मैं पूरा बोल भी नहीं पाया कि उन्होंने 'ओम ओम्' का उच्चारण किया और गंगाजल मुख में लेते ही उन्होंने प्राण छोड़ दिये। स्वामी मुरारी आश्रमजी कहने लगे-ये तो सदा के लिये ही बैठ गये। उस समय तक तीनों डॉक्टर आश्रम में ही थे। डॉक्टरों ने स्वयं कहा कि ये हमारे मेडिकल साइंस के एकदम विपरीत अद्भुत घटना घटी है। एक डॉक्टर बंगाली सिपाहा नाम से थे। कहने लगे-मैंने जीवन में ऐसी घटना कभी नहीं देखी। तीनों डॉक्टरों ने स्वामीजी के शरीर को प्रणाम किया। उस घटना से यह सिद्ध होता है। कर्म के भोग तो हर हालत में सभी महापुरुषों को भोगने पड़ते हैं। कुत्ते का काटना तथा वह बीमारी होना तो कर्म के भोग निश्चित थे। परंतु गौसेवा, श्रीगंगासेवा, सन्त सेवा, भगवद्धजन डॉक्टरों के अनुसार मेडिकल साइंस को मात दे सकते हैं। आज श्रीदण्डी स्वामी केवलाश्रमजी महाराज के मात्र आशीर्वाद से कृष्णाधाम अन्नक्षेत्र में सैकड़ों महात्मा और जरूरतमन्द निशुल्क भोजन करते हैं। दान देने वाले भी स्वतः आते हैं और खाने वाले भी स्वत: आते हैं। यह भगवान् के भजन, गोसेवा, गंगासेवा, सन्तसेवा का अनुपम प्रभाव है। ----------:::×:::---------- -श्रीआगेरामजी शास्त्री पत्रिका: कल्याण (९३।८) गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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"सन्त की आश्चर्य-कहानी" किसी नगर में राजकन्या का विवाह था, मंगल के बाजे बज रहे थे। उसी नगर में एक सिद्ध महात्मा रहते थे। महात्मा बाजों की आवाज सुनकर दरबार में गये। राजा से यह मालूम होने पर कि राजकन्या का विवाह हैं, उन्होंने कन्या को देखना चाहा। राजा ने कन्या को बुलाया। राजकन्या ने आकर महात्मा के चरणों में प्रणाम किया। महात्मा ने न मालूम किस अभिप्राय से उसको नखशिख देखकर राजासे कहा-'इस लड़की का हमसे विवाह कर दो।' राजा तो सुनते ही सहम गया; बुद्धिमान् था, महल में जाकर एक जोड़ी बहुमूल्य मोती लाया। मोती का आकार मुर्गीके अण्डे-जितना था और उनसे शारदीय पूर्णिमा के चन्द्रमा की-सी ज्योति छिटक रही थी। राजा ने नम्रता से कहा-'भगवन् ! हमारे कुल की रीति है-जो इस तरह के १०८ मोतियों का हार कन्या को देता है, उसी से हम कन्या का विवाह करते हैं।' महात्मा ने निर्विकार चित्त से, पर उत्साह से कहा-हाँ, हाँ, तुम्हारी कुल की प्रथा तो पूरी होनी ही चाहिये। ये दोनों मोती के दाने मुझे दे दो, इसी नमूने के एक सौ आठ मोती मैं ला देता हूँ। परन्तु खबरदार ! तब तक लड़की को किसी दूसरी से ब्याह न देना।' राजा ने सोचा था, महात्मा मोती की बात सुनकर निराश हो लौट जायँगे; परन्तु यहाँ तो दूसरी ही बात हो गयी। राजा जानता था-महात्मा ऊँचे दर्जे के सिद्ध पुरुष हैं, उनकी आज्ञा न मानने से अमंगल हो सकता है; अतएव राजा ने दोनों मोती उनको दे दिये और कहा-'भगवन् ! आगे लग्न नहीं है, आप जल्दी लौटियेगा।' राजा ने सौचा, 'ऐसे मोती कहीं मिलेंगे नहीं; महात्मा सच्चे पुरुष हैं, लौट ही आयेंगे। तब लड़की का विवाह निर्दिष्ट राजकुमार के साथ कर दिया जायगा।' राजा ने विवाह स्थगित कर दिया। महात्मा मोती के दाने झोली में डालकर चल दिये। तीन दिन हो गये। महात्मा समुद्र के किनारे बैठे कमण्डलु भर-भर समुद्र का जल बाहर उलीच रहे हैं। उन्हें खाना-पीना-सोना कुछ भी स्मरण नहीं है। न थकावट है न विषाद है; न निराशा है न विराम है। एक लगन से कार्य चल रहा है। महात्मा की अमोघ क्रिया से प्रकृति में हलचल मची। अन्तर्जगत् में क्षोभ उत्पन्न हो गया। समुद्र देव ब्राह्मण का रूप धरकर बाहर आये। पूछा, 'भगवन् ! यह क्या कर रहे हैं ? समाधि से जगे हुए की भाँति उनकी ओर देखकर सहज सरलता से महात्मा बोले-एक सौ आठ मोती के दाने चाहिये। समुद्र में पानी नहीं रहेगा, तब मोती मिल जायँगे।' ब्राह्मण ने कहा-'समुद्र क्या इसी तरह से और इतना जल्दी बिना पानी का हो जायगा?' ‘हाँ, हाँ, हो क्यों नहीं जायगा। पानी तो उलीच ही रहे हैं, दो दिन आगे-पीछे होगा। अपने को कौन-सी जल्दी पड़ी है।' 'अगर समुद्र आपको मोती दे दे तो ?' ‘तो फिर क्या हमारा समुद्र से कोई वैर है जो हम उसे बिना पानी का बनायेंगे?' ‘अच्छा, तो लीजिये। समुद्र की एक तरंग आयी और मोतियों का ढेर लग गया। महात्मा ने झोली से दोनों मोती निकाले। उनसे ठीक मिला-मिलाकर १०८ मोती चुनकर झोली में डाल लिये और चलने के लिये उठ खड़े हुए! ब्राह्मण-वेशधारी समुद्र ने कहा, 'भगवन् ! कुछ मोती और ले जाइये न ?' महात्मा बोले-'हमें संग्रह थोड़े ही करने हैं। जरूरत थीं, उतने ले लिये। अब हम व्यर्थ बोझ क्यों ढोयें।' महात्मा ने आकर राजा को बुलाया और पहले के दो दाने समेत १०८ मुर्गी के अण्डे-जैसे पूनम के चाँद-से चमकते मोती के दाने राजा के सामने रख दिये। राजा आश्चर्यचकित हो गया। महात्मा के परम सिद्ध होने का उसे पूर्ण विश्वास हो गया। उसने सोचा, 'ऐसे विलक्षण शक्तिशाली पुरुष से लड़की का विवाह करने में लड़की को तो किसी दु:ख की सम्भावना है नहीं। परन्तु इनसे कुछ काम और क्यों न ले लिया जाय।' राजा की एक दूसरे बड़े राजा से शत्रुता थी; वह राजा तो मर गया था, उसका छोटा कुमार था। इसने सोचा, 'शत्रु का बीज भी अच्छा नहीं; महात्मा के हाथों यह कण्टक दूर हो जाय तो अच्छा।' यह सोचकर राजा ने कहा-'भगवन् ! मोती तो बड़े अच्छे आप ले आये। एक काम और है, अमुक राज्य के राजकुमार का सिर आने पर लड़की का ब्याह होगा, ऐसा प्रण है। अतएव यदि हो सके तो आप इसके लिये चेष्टा करें।' महात्मा ने कहा-'अरे, इसमें कौन बड़ी बात है, अभी जाता हूँ। महात्माजी उस राज्य में गये। राजमाता से मिले। राजमाता ने महात्मा का नाम सुन रखा था, इससे उसने बड़ी अच्छी आवभगत की। इन्होंने कहा-‘माई ! हम तो एक काम से आये हैं, तुम्हारे कुमार का हमें सिर चाहिये। हमने एक राजा से कहा था- अपनी कन्या का ब्याह हमसे कर दो; उसने कहा है कि अमुक राजकुमार का सिर ला देंगे, तब विवाह होगा। अत: तुम हमें अपने लड़के का सिर दे दो।' एकलौता लड़का था और वही राज्य का अधिकारी था। महात्मा के वचन सुनकर राजमाता के प्राण सूख गये। परन्तु हृदय में श्रद्धा थी; उसको विश्वास था कि सच्चे महात्मा से किसी का कोई अकल्याण नहीं हो सकता। उसने कहा-'भगवन् ! लड़के का सिर मैं कैसे उतारूँ। आप इस लडके को ही ले जाइये।' महात्मा बोले-'यह और अच्छी बात है; उसने तो सिर ही माँगा था, हम तो पूरा ले जाते हैं। फिर सिर उतारकर हमें क्या करना है।' ‘भगवन् ! इसे मैं आपके हाथों में सौंप रही हूँ।' ‘हाँ, हाँ, भगवान् सब मंगल करेंगे।' राजकुमार को लेकर महात्मा अपनी नगरी में लौटे और राजमहल में जाकर बोले-'लो, यह समूचा राजकुमार ! अब पहले विवाह करो; खबरदार ! जब तक विवाह न हो, लड़के को छूना मत।' राजा ने आनन्द-मग्न होकर कहा-'ठीक है, भगवन् ! ऐसा ही होगा।' महात्मा ने कहा-'तो बस, अब देर न करो!' विवाहमण्डप रचा हुआ था ही। चौकी बिछायी गयी। महात्माजी दूल्हा बने। कन्या आयी। कन्या को महात्माजी ने एक बार नखशिख देखा। अकस्मात् बोल उठे-'अरे ! उस राजकुमारको तो यहाँ बुलाओ!' राजकुमार बुलाया गया। महात्मा ने उसे कन्या के बगल में खड़ा कर दिया। फिर दोनों को एक बार नखशिख देखकर बोले-'भई ! जोड़ी तो यही सुन्दर है। राजा ! बस, अभी इस राजकुमार से राजकुमारी का ब्याह कर दो। खबरदार, जो जरा भी चीं-चपट की।' राजा नहीं न कर सका। राजकुमारी का विवाह शत्रु राजकुमार से हो गया। महात्मा के विचित्र आचरण का रहस्य अब राजा की समझ में आया, राजा का मन पलट गया। शत्रु मित्र हो गया! महात्मा अपनी कुटिया पर जाकर पूर्ववत् धूनी तापने लगे। इस कहानी से यह मालूम हो गया कि सन्त पुरुष की क्रियाएँ किसी अज्ञात उद्देश्य से बड़ी विलक्षण हुआ करती हैं, उनकी क्रियाओं से उनकी स्थिति का पता लगाना बहुत ही कठिन होता है। तथापि आजकल के जमाने में जहाँ लोग नाना प्रकार से ठगे जा रहे हैं। विशेष सावधानी रखना ही उत्तम हैं। श्रद्धा और सेवा करके सत्संग करना चाहिये और जिन सन्त पुरुष के संग से अपने में दैवी सम्पदा की वृद्धि, भगवान् की ओर चित्तवृत्तियों का प्रवाह, शान्ति और आनन्द की वृद्धि प्रतीत हो, उन्हीं को सन्त मानकर उनसे विशेष लाभ उठाना चाहिये। अपनी बुद्धि जिनको सन्त स्वीकार न करे, उनकी निन्दा तो नहीं करनी चाहिये; परन्तु अपने उनसे कोई गुरु-शिष्य का सम्बन्ध नहीं रखना चाहिये। निन्दा तो इसलिये नहीं कि प्रथम तो किसी की भी निन्दा करना ही बहुत बुरा है; दूसरे, हम सन्त का बाहरी आचरण से निर्णय भी नहीं कर सकते। और गुरु-शिष्य का सम्बन्ध इसलिये नहीं कि श्रद्धारहित और दोषबुद्धियुक्त ऐसे सम्बन्ध से कोई लाभ नहीं होता। ---------:::×:::----------- - श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' "जय जय श्री राधे" *******************************************

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(श्री श्री हरेराम बाबा जी ) श्री जगदगुरु द्वाराचार्य मलूक पीठाधीश्वर श्री राजेंद्रदासचार्य जी महाराज के श्रीमुख से दास ने श्री हरेराम बाबा का चरित्र सुना वह लिख रहा हूँ – संतो की चरण रज मस्तक पर धारण करके और आप सभी भक्तों की चरण वंदना करके, श्री हरेराम बाबा जी का चरित्र लिख रहा हूं। हो सकता है मेरे सुनने में कुछ कम ज्यादा हुआ हो, कोई त्रुटि हो तो क्षमा चाहता हूँ । श्री गणेशदास भक्तमाली जी गोवर्धन में लक्षमण मंदिर में विराजते थे । वहां के पुजारी श्री रामचंद्रदास जी गिरिराज की परिक्रमा करने नित्य जाते । एक दिन परिक्रमा करते करते आन्योर ग्राम में लुकलुक दाऊजी नामक स्थान के पास कुंज लताओं में उन्हें एक विलक्षण व्यक्ति दिखाई पड़े । उनके नेत्रों से अविरल जल बह रहा था , उनके सम्पूर्ण शरीर पर ब्रज रज लगी हुई थी और मुख से झाग निकल रहा था । थोड़ी देर पुजारी रामचन्द्रदास जी वही ठहर गए । कुछ देर में उनका शरीर पुनः सामान्य स्तिथि पर आने लगा । वे महामंत्र का उच्चारण करने लगे – हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।। पुजारी जी समझ गए की यह कोई महान सिद्ध संत है । उन्होंने उनका नाम पूछा तो कह दिया की प्रेम से सब उन्हें हरेराम बाबा ही कहते है । पुजारी जी उनको लक्ष्मण मंदिर में , श्री गणेशदास भक्तमाली जी के पास ले गए । धीरे धीरे दोनों संतो में हरिचर्चा बढ़ने लगी और स्नेह हो गया । श्री हरिराम बाबा भी साथ ही रहने लगे । श्री हरेराम बाबा ने १२ वर्ष केवल गिरिराज जी की परिक्रमा की । उनके पास ४ लकड़ी के टुकड़े थे जिन्हें वो करताल की तरह उपयोग में लाते थे। उसी को बजा बजा कर महामंत्र का अहर्निश १२ वर्षो तक जप करते करते श्री गिरिराज जी की परिक्रमा करते रहे । जब नींद लगती वही सो जाते, जब नींद खुलती तब पुनः परिक्रमा में लग जाते थे । नित्य वृन्दावन की परिक्रमा और यमुना जल पान , यमुना जी स्नान उनका नियम था । बाद में बाबा श्री सुदामाकुटी मे विराजमान हुए । १. श्री हरेराम बाबा की प्रेम अवस्था – श्री हरेराम बाबा जब महामंत्र का कीर्तन करते – हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।। तब उनको प्रेम आवेश होता और भगवान की साक्षात अनुभूति होती थी । एक नीलवर्ण की कांति (प्रकाश) दिखाई पड़ती और उसीमे श्रीकृष्ण का दर्शन उनको होता । उसीको पकड़ने के लिए बाबा उसके पीछे पीछे भागते और फिर कुछ देर बाद उन्हें मूर्छा आ जाती । उनका शरीर कांपने लगता और बाद मे साधारण स्तिथि हो जाती । एक बार बाबा श्री गणेशदास जी, पुजारी श्री रामचंद्रदास जी और श्री हरेराम बाबा यह ३ संत पैदल जगन्नाथ पूरी दर्शन करने के लिए निकले । रास्ते मे कीर्तन करते करते श्री हरेराम बाबा को प्रेमावेश हुआ और पास ही के एक गन्ने के सघन खेत को ३ मील तक चिरते हुए वे पार हो गए । सम्पूर्ण शरूर रक्त से भर गया , घंटो मूर्छित अवस्था मे रहे । ऐसा रास्ते मे के बार हुआ और बहुत दिनों के बाद वे संत जगन्नाथ पूरी पहुंचे । २. भक्त भूरामल और उसकी पत्नी को वरदान देना – जयपुर मे एक भूरामल बजाज नाम के व्यापारी रहते थे जो बाबा के शिष्य भी थे। एक बार उन्होंने अपने ३ मंजिला मकान की छत पर कीर्तन का आयोजन करवाया । अनेक सत्संगी भक्त और संतो को बुलाया, बाबा को भी कीर्तन में बुलाया । बाबा ने कहा की छतपर कीर्तन करना ठीक बात नही है , पता नही कब प्रेमावेश आ जाए और सब लोगो को परेशानी हो जाए । अच्छा होगा की नीचे आंगन मे ही कीर्तन हो । भूरामल सेठ ने कहा की महाराज आप केवल कोने मे बैठे रहना ,अब इंतजाम हो गया है । भूरामल के आग्रह करने से बाबा कीर्तन मे बैठ गए । कीर्तन शुरू हुआ – हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे । हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।। परंतु कुछ देर बाद उनसे रहा नही गया, वे कीर्तन मे इतने लीन हो गए की नृत्य करते करते वे दौड़ पड़े और छतसे नीचे जा गिरे । सब लोग नीचे भागे और बाबा को उठाया, कुछ देर मूर्छा रही । बाबा के एक हाथ मे ज्यादा चोट लगी थी जिस कारण भूरामल बहुत दुखे हुए की हमने बाबा की आज्ञा का उल्लंघन किया । भूरामल ने अपने घर पर राखकर उनकी बहुत अच्छी प्रकार लंबे समय तक सेवा की । एक दिन श्रीहरेराम बाबा प्रसन्न होकर बोले – भूरामल बच्चा ! मै तेरे ऊपर बहुत प्रसन्न हूं ,कुछ मांग ले । भूरामल ने कहा – बाबा,मेरी यही इच्छा है की मेरा शरीर भगवान का भजन करते हुए छुटे और मुझे भगवान के नित्य धाम की प्राप्ति हो । बाबा ने कहा – ठीक है बच्चा ! ऐसा ही होगा । तू अकेला ही नही अपितु तेरी पत्नी भी तेरे साथ भजन करते करते भगवान के धाम को जाएगी । इस घटना के कुछ समय बाद, एक दिन बाबा श्री गणेशदास , पुजारी श्रीरामचंद्रदास जी और श्री हरेराम बाबा – ये ३ संत जयपुर के पास गलता आश्रम पर प्रातः काल स्नान कर रहे थे । श्री हरेराम बाबा पहले स्नान कर और तिलक स्वरूप करके माला जपने लगे , उसी समय श्रीहरेराम बाबा सहसा उठे और दोनों हाथ उठा कर आशिर्वाद देकर बोले – बहुत अच्छे भूरामल बच्चा ! धाम को पधारो और ठाकुर जी को मेरी ओर से भी प्रणाम कर देना । बाबा गणेशदास जी और पुजारी जी ने पूछा – बाबा! आप ये आकाश की ओर देखकर किससे बातें कर रहे थे ? श्री हरेराम बाबा ने कहा की क्या तुमने देखा नही -भूरामल उसकी पत्नी के सहित विमान मे बैठकर वैकुंठ को जा रहा है , उसीको आशीर्वाद देकर भगवान को प्रणाम करने को कह रहा था । थोड़ी ही देर बाद भूरामल सेठ के घर का एक सेवक आया और उसने बताया की कुछ देर पहले भूरामल सेठ और उसकी पत्नी का भजन करते करते शरीर छूट गया है । ३. एक चुड़ैल सहित अन्य प्रेतों का उद्धार – श्री हरेराम बाबा राजस्थान के पाली जिले मे स्थित मुंडारा गांव मे एक खेत के पास झोंपडा बना कर निवास करते थे । एक दिन गांव के एक व्यक्ति के घर मे भूत प्रेतों का उपद्रव हो गया ।तांत्रिक, पूजा पाठ प्रयोग, ओझा सब ने प्रयास किया , बहुत प्रकार से अन्य उपाय करने पर भी समाधान नही हुआ तब वो पीड़ित व्यक्ति अपने परिवार सहित घर छोड़कर शहर की ओर चलने को तयार हुआ । किसी ने उस व्यक्ति से कहा की श्रीहरेराम बाबा बड़े सिद्ध महात्मा है, यदि वे इस मकान मे रह जाएं तो भूतप्रेत भाग जाएंगे । पीड़ित व्यक्ति बाबा के पास जाकर सत्य बात बोला नही । उसने कह दिया की महाराज आप यहां खेत के पास खुले मे रहते है , ठंड का समय है । हमारा मकान खाली पड़ा है , वहां हमने साफ सफाई कर रखी है और हैम अब शहर जा रहे है अतः आप हमारे मकान मे ही रहो। बाबा बोले ठीक है बच्चा, वहां ठंड भी कम लगेगी । सुबह बाबा अपना कमंडलु, माला और आसान लेकर वहां पहुंचे और भजन मे बैठ गए । जैसे ही संध्याका समय हुआ, प्रेतों का उपद्रव शुरू हो गया । बाबा समझ गए की यहां प्रेतों का निवास है परंतु बाबा शांति से भजन मे लगे रहे । प्रेतों ने बहुत प्रकार से नाच गाना किया और शोर मचाया परंतु बाबा भजन से नही उठे । अंत मे एक चुड़ैल बाबा के सामने आकर खड़ी हो गयी । श्रीहरेराम बाबा उस स्त्री को पहचानते थे , वे बोले – अरे ! तु तो इसी गांव की थी और कुंए मे गिरकर तेरी मृत्यु हो गयी थी । ब्राह्मण परिवार की बहु होने पर भी तुझे प्रेत योनि कैसे प्राप्त हो गयी । उसने बताया की जन्म चाहे कितने ही ऊंचे कुल मे हो जाएं पतन्तु आचरण अच्छा न हो तो अधोगति मे जाना पड़ता है । परपुरुष के संग करने के पाप से मुझे प्रेत बनना पड़ा । मै पातिव्रत का पालन नही कर पाई और बाद मे मैंने आत्महत्या की । मै इस प्रेत योनि मे बडा कष्ट पा रही हूं , आप मेरा उद्धार कीजिये । बाबा बोले यहां और कितने भूतप्रेत है ? उस चुड़ैल ने कहा – हमारी संख्या १५ है । बाबा ने कहा ठीक है मै तुम्हारा उद्धार करने के विषय मे विचार करूँगा । अगले दिन वह फिर आयी और बोली – बाबा हमपर कृपा करो । बाबा थोड़े विनोदी स्वभाव के थे, उन्होंने कहा – बातों से उद्धार होता है क्या? उद्धार तो घी से होता है । हमारा घी समाप्त हो गया है – गौ का घी लाओ , सुखी रोटी भागवान को भोग लगा रहे है । चुड़ैल बोली ठीक है मै अभी घी लेकर आती हूं । गांव में एक यादव परिवार के मुखिया जी रहते थे। वो चुड़ैल जाकर उनके बहु के शरीर पर चढ़ गयी ।अब बहु अजीब अजीब हरकत करने लगी ।एक तंत्र मंत्र करने वाले ओझा को बुलाया गया और जैसे ही उसने मंत्रो का प्रयोग किया तो वह चुड़ैल बोलने लगी – छोडूंगी नही, मै इसको लेकर जाऊंगी । ओझा जी बोले – इसको छोड़ दो , नई नई शादी हुई है इसकी, इसके प्राण क्यो लेना चाहती हो ? चुड़ैल ने कहा – नही मै इसको लेकर जाऊंगी। ओझा ने पूछा – इसको छोड़कर किस प्रकार से जाओगी ? उपाय बताओ । चुड़ैल बोली – गांव मे एक हरेराम बाबा नामक महात्मा है, उनका घी खत्म हो गया है । भगवान को सुखी रोटी का भोग लगा रहे है , उनके पास गाय का घी पहुंचाओ तो मैं इसको छोड़ कर जाऊंगी । मुखिया जी के पास ३ किलो गाय का घी था, वह तुरंत सेवक के हाथ से बाबा के पास भिजवाया । जैसे ही बाबा के पास घी पहुंचा, वह चुड़ैल वापस आ गयी । गांव मे यह बात फैल गयी की यदि बाबा को घी नही दिया तो हमारे घर भी भूतप्रेत भेज देगा । हर दिन बाबा के यहां पाव भर ताजा घी आने लगा । बाबा उससे संत सेवा भी करने लगे- हलवा, पुरी, चावल आदि मे घी का प्रयोग करते ।कुछ दिन बाद वह चुड़ैल बाबा के पास आकर बोली – बाबा! रोज का घी का प्रबंध तो हो गया , अब हमारा उद्धार करो । बाबा बोले – तुम्हारा उद्धार कैसे होगा ? उसने कहा की हमारे लिए यदि शिवपुराण की कथा हो तब हमारा उद्धार होगा । बाबा ने कहा की ठीक है, जब तुम्हारा उद्धार हो जाए तब हमे अनुभूति करवा कर जाना। बाबा ने पास मेरहने वाले एक ब्राह्मण जनकीप्रसाद चौबे को बुलाया और उनसे बाबा श्री गणेशदास जी के नाम एक पत्र लिखवाया । उसमे घटना लिख दी की इस कार्य के लिए शिवपुराण की कथा करनी है । बाबा गणेशदास की ने कहा की हमने कभी शिवपुराण की कथा तो कही नही परंतु श्री हरेराम बाबा की आज्ञा है तो कथा करेंगे । बाबा श्री गणेशदास जी मथुरा से चलकर हरेराम बाबा के पास आये और प्रातः काल महाराज जी मूल पाठ करते थे और संध्याकाल ५ घंटे कथा कहते थे । कथा के अंतिम दिन एक दिव्य तेज प्रकट हुआ, वे सभी प्रेत दिव्य शरीर धारण करके श्रीहरेराम बाबा के सामने आकर प्रणाम करके बोले – बाबा ! भगवान शिव के गणो का विमान आ गया जी । उनके साथ हम लोग कैलाश को जा रहे है । ४. संतो मे श्रद्धा और भगवत्प्राप्ति का मार्ग – एक बार बाबा गणेशदास जी ने उनका थोड़ा परिचय और कुछ पद एक पुस्तक के रूप में श्री रामानंद पुस्तकालय (सुदामा कुटी ) से प्रकाशित किया । दिल्ली की एक स्त्री ने वह पुस्तक पढ़ी और सोचा कि इस समय भी ऐसे भगवत्प्राप्त संत विराजमान है तो दर्शन करना ही चाहिए । वह स्त्री उस पुस्तक पर पता पढ़ कर सुदामा कुटी पहुंची । वहां उस समय राजेंद्रदास जी एवं कुछ अन्य वैष्णव सेवा मे रहते थे । उस स्त्री ने पूछा की इस पुस्तक मे जिनके पद है, क्या उन संत के दर्शन हो सकते है ? राजेंद्रदास जी ने कहा – बाबा का अब शरीर वृद्ध हो गया है , चल फिर नही पाते है । उस स्त्री ने हरेराम बाबा के विषय मे अधिक जानने की इच्छा प्रकट की । राजेंद्रदास जी ने उनकी कुछ अनुभूतियां सुनायी जिस कारण उस स्त्री की श्रद्धा और अधिक बढ़ गयी । राजेंद्रदास जी ने बाबा से अंदर जाकर कहा की एक भक्तानि दर्शन करने आयी है । श्री हरेराम बाबा बोले – यहां किसीको मत लाओ, मै नंद धड़ंग रहता हूँ । शरीर पर लंगोटी भी होती नही । राजेंद्रदास जी बोले – बाबा ! श्रद्धावान स्त्री है , बहुत दर्शन करने की लालसा है । बाबा ने कहा ठीक है । राजेंद्रदास जी ने श्री हरेराम बाबा के शरीर पर कपड़ा डाल दिया और उस भक्तानि को अंदर लाये । उनसे प्रणाम किया और कुछ सेब और ५१ रुपये भेट मे दिए । बाबा ने उससे पूछा की वो कहा से आयी है , घर मे कौन कौन है आदि सब। उसने घर परिवार का सब हाल सुनाया । अंत मे बाबा ने पूछा की तुम्हारा विवाह हुआ की नही ? उसने कहा की घर परिवार की जिम्मेदारी मुझपर आने की वजह से अब तक विवाह नही हुआ । बाबा बोले – मै अब विवाह के योग्य नही हूँ, मेरा शरीर अब वृद्ध हो गया है । स्त्री बोली – बाबा आप ये कैसी बात कर रहे है , मै आपकी नातिन (पोती) जैसी हूं । आप साधु होकर ये कैसी बात करते है । बाबा बोले – तुम्हे किसने कह दिया की मै साधु हूँ, मै कोई साधु महात्मा नही हूं – मै तो गुंडा और पागल हूं । गुंडा और पागल तो ऐसे बात करता है । वो स्त्री गड़बड़ा कर नाराज होकर भागने लगी, जाते जाते सब मिठाई, सेब, रुपया भी वापस कर दिया । राजेंद्रदास जी ने पूछा – बाबा! वह स्त्री श्रद्धा से आपके पास आयी थी, आपने ऐसे बात करके उसको क्यों सब भेट वापस कर दी । बाबा बोले – मै बूढ़ा हूं परंतु यहां रहने वाले सब संत बूढ़े नही है । विरक्त संतो के यहां अकेले महिलाओं का आना ठीक नही है । बार बार आना जाना शुरू होगा यह अच्छा नही है, मेरी १०० साल के ऊपर उम्र चल रही है । इतने साल रामजी ने माया से बचाये रखा अब बुढापे मे मैं अपने वैराग्य पर कलंक नही लगा सकता । इस तरह की बात करने से वह दोबारा आने का प्रयास नही करेगी । राजेंद्रदासजी ने पूछा – बाबा! अगली बार आ गयी तो ? बाबा बोली अबकी बार आयी तो गाली दूंगा । राजेंद्रदास जी ने पूछा – पुनः गाली खाकर भी आ जाए तो ? बाबा बोले फिर तो डंडा लेकर उसको भगाऊंगा । राजेंद्रदासजी ने पूछा – डंडा के डरसे भी न मानी तो क्या करेंगे बाबा । यह सुनकर बाबा रोने लगे और कहा की – यदि उसकी ऐसी श्रद्धा संतो के चरणों मे है, तो फिर मैं उसको श्रीकृष्ण से मिलने का रास्ता बता दूंगा ।

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