संतवचन

।। श्रीहरि ।। सत्संग की कुछ सार बातें -14- अंतिम १३१. शीघ्र कल्याण चाहनेवाले मनुष्य को परमात्मा की प्राप्ति के सिवा और किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चहिये; क्योंकि इसके सिवा सब इच्छाएँ जन्म-मृत्युरूप संसार-सागर में भरमानेवाली हैं । १३२. परमात्मा की प्राप्ति के लिये मनुष्य को अर्थ और भाव के सहित शास्त्रों का अनुशीलन और एकान्त में बैठकर जप-ध्यान तथा अध्यात्मविषय का विचार नियमपूर्वक नित्य ही करना चाहिये । १३३. अनिच्छा या परेच्छा से होनेवाली घटना को भगवान् का भेजा हुआ पुरस्कार मान लेनेपर काम-क्रोध आदि शत्रु पास नहीं आ सकते, जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धकार नहीं आ सकता । १३४. जीव, ब्रह्म और माया के तत्त्व को समझने के लिये एकान्त में बैठकर विवेक और वैराग्ययुक्त चित्त से नित्यप्रति परमात्मा का चिन्तन करते हुए अध्यात्म-विषय का विचार करना चाहिये । १३५. जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्त्व-रहस्य को जान लिया है, उसके शान्ति और आनन्द की सीमा नहीं रहती । १३६. जो अपने-आपको ईश्वरके अर्पण कर चुका है और ईश्वरपर ही निर्भर है, उसकी सदा-सर्वदा सब प्रकार से ईश्वर रक्षा करता है, इससे वह सदा के लिये निर्भय-पद को प्राप्त हो जाता है । १३७. प्रेमपूर्वक जपसहित भगवान् के ध्यान का अभ्यास, श्रद्धापूर्वक सत्पुरुषोंका संग, विवेकपूर्वक भावसहित सत्-शास्त्रों का स्वाध्याय, दु:खी, अनाथ, पूज्यजन तथा वृद्धों की नि:स्वार्थभाव से सेवा-इनको यदि कर्तव्यबुद्धि से किया जाय तो ये एक-एक साधन शीघ्र कल्याण करनेवाले हैं । १३८. भगवान् बहुत बड़े दयालु और प्रेमी हैं । जो साधक इसका तत्त्व समझ जायगा, वह भगवान् की शरण होकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जायगा । १३९. सर्वत्र भगवद्भाव के समान कोई भाव नहीं है और सर्वत्र भगवद्भाव होने से दुर्गुण और दुराचारों का अत्यन्त अभाव होकर सद्गुण और सदाचार अपने-आप ही आ प्राप्त होते हैं । १४०. वस्तुमात्र को भगवान् का स्वरूप और चेष्टामात्र को भगवान् की लीला समझने से भगवान् का तत्त्व समझ में आ जाता है । 'सत्संग की कुछ सार बातें' पुस्तक से, पुस्तक कोड- 295, पृष्ठ-संख्या- ५८-६३, गीताप्रेस, गोरखपुर ब्रह्मलीन परम श्रद्धेय श्री जयदयाल जी गोयन्दका

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🕉 एक संत के पास 30 सेवक रहते थे एक सेवक ने गुरुजी के आगे अरदास की महाराज जी मेरी बहन की शादी है तो आज एक महीना रह गया है तो मैं दस दिन के लिए वहां जाऊंगा कृपा करें आप भी साथ चले तो अच्छी बात है गुरु जी ने कहा बेटा देखो टाइम बताएगा नहीं तो तेरे को तो हम जानें ही देंगे उस सेवक ने बीच-बीच में इशारा गुरु जी की तरफ किया कि गुरुजी कुछ ना कुछ मेरी मदद कर दे आखिर वह दिन नजदीक आ गया सेवक ने कहा गुरु जी कल सुबह जाऊंगा मैं गुरु जी ने कहा ठीक है बेटा सुबह हो गई जब सेवक जाने लगा तो गुरु जी ने उसे 5 किलो अनार दिए और कहा ले जा बेटा भगवान तेरी बहन की शादी खूब धूमधाम से करें दुनिया याद करें ऐसी शादी तो हमने कभी देखी ही नहीं और साथ में दो सेवक भेज दिये जाओ तुम शादी पूरी करके आ जाना जब सेवक घर से निकले 100 किलोमीटर गए तो मन में आया जिसकी बहन की शादी थी वह सेवक से बोला गुरु जी को पता ही था कि मेरी बहन की शादी है और हमारे पास कुछ भी नहीं है फिर भी गुरु जी ने मेरी मदद नहीं की दो-तीन दिन के बाद वह अपने घर पहुंच गया उसका घर राजस्थान रेतीली इलाके में था वहां कोई फसल नहीं होती थी वहां के राजा की लड़की बीमार हो गई वैद्य ने बताया इस लड़की को अनार के साथ यह दवाई दी जाएगी तो यह लड़की ठीक हो जाए राजा ने मुनादी करवा रखी थी अगर किसी के पास आनार है तो राजाजी उसे बहुत ही इनाम देंगे इधर मुनादी वाले ने आवाज लगाई अगर किसी के पास आनार है तो राजा को जरूरत है जल्दी आ जाओ जब यह आवाज उन सेवकों के कानों में पड़ी वह सेवक उस मुनादी वाले के पास गए हमारे पास आनार है चलो राजा जी के पास राजाजी को अनार दिए गए अनार का जूस निकाला गया लड़की को दवाई दी गई लड़की ठीक-ठाक हो गई राजा जी ने पूछा तुम कहां से आए हो तो उसने सारी हकीकत बता दी राज ने कहा ठीक है तुम्हारी बहन की शादी में करूंगा राजा जी ने हुकुम दिया ऐसी शादी होनी चाहिए कि लोग यह कहे कि यह राजा की लड़की की शादी है सब बारातियों को सोने चांदी गहने के उपहार दिए गए बरात की सेवा बहुत अच्छी हुई लड़की को बहुत सारा धन दिया गया लड़की के मां-बाप को बहुत ही जमीन जायदाद आलीशान मकान बहुत ही पैसे रुपए दिए गए लड़की भी राजी खुशी विदा होकर चली गई अब सेवक सोच रहे हैं कि गुरु की महिमा गुरु ही जाने हम ना जाने क्या-क्या सोच रहे थे गुरु जी के बारे में गुरु जी के वचन थे जा बेटा तेरी बहन की शादी ऐसी होगी दुनिया देखेगी संत वचन हमेशा सच होते हैं शिक्षा संतों के वचन के अंदर ताकत होती है लेकिन हम नहीं समझते जो भी वह वचन निकालते हैं वह सिद्ध हो जाता है हमें संतों के वचनों के ऊपर अमल करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए ना जाने संत मोज में आकर क्या दे दे रंक से राजा बना दे । ।।।। जय सिया राम जी ।।।।

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🙏😊देखो रोते तो दोनों हैं, नाम जपने वाले भी, न जपने वाले भी। पर कारण में बड़ा अंतर है। न जपने वाला रोता है कि अगर नाम जप लिया होता तो इतना कष्ट न उठाना पड़ता, और जपने वाला रोता है कि थोड़ा बहुत नाम जपा था, उसका इतना फल मिल रहा है, अगर और जप लेता तो कितना मिल जाता। नामजप की तो इतनी महिमा है। अब विधि- राम, कृष्ण या शिव में से एक इष्ट चुनकर, उनसे एक सम्बंध मान लें। राम चुनें तो "राम", कृष्ण या शिव चुनें तो "ओउम्" जपें। माला से, पहले बोलकर जपें। कुछ देर जपने के बाद, बोलना बंद कर, मन में जपें। ऊब आने लगे तो फिर बोलकर, फिर मन में। जितना हो सके। यह बैठकर भी करना है और चलते फिरते भी। विशेष बात यह है कि नामजप के साथ में, उन "एक" इष्ट के मुखमंडल, माने आँखों, नाक, होठों का ध्यान करते रहें। जैसे तुम अपने दो दिन के बच्चे को गोद में लेकर, लाखों की भीड़ में चलते हों। चलते भी हो, उस बच्चे का ध्यान भी रहता है, वैसे ही नाम भी चलता रहे, रूप ध्यान भी रहता रहे। बस!!! इतनी ही विधि है। अब मन नाम छोड़कर भागे तो भागे, परेशान नहीं होना, बस फिर फिर पकड़ लाओ। नाम भूला, फिर याद आया, तो भूलने पर रोओ मत कि हाय हाय भूल गया, बल्कि याद आने का धन्यवाद करो कि याद आ गया, समझो की भगवान स्वयं ही तुम्हें याद कर रहे हैं, तभी तो तुम्हें नाम पुनः याद आया। अंतिम बात, जिस दिन मन भागकर वापिस आए, और आप देखें कि भीतर तो नाम अपने से चल रहा है। कि अरे!! मेरा ध्यान तो कहीं और था, फिर यह नाम कौन जप रहा था? Hare Krishna 🙏

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सबमें भगवान् को देखना ६६२. प्रश्न- सर्वत्र भगवद्दर्शन कैसे हो? उत्तर- "सब कुछ भगवान् है"--इसपर विश्वास करके व्यवहार में जो भी स्त्री-पुरुष, प्राणी-पदार्थ सामने आये, उन्हें भगवान् के रुपमें देखकर मन-ही मन प्रणाम किया जाय तो थोड़े दिनों में यह वृत्ति हमारे संस्कारगत हो जायेगी और हमें सब समय भगवान् के दर्शन होने लगेंगे। ६६३. प्रश्न- सर्वत्र समभाव से व्याप्त भगवान् या आत्मा को देखनेवाले पुरुष की क्या स्थिति होती है? उत्तर- उस पुरुष की स्थिति नित्य चिदानन्दमय-स्वरुप ही रहती है। वह जन्म-मरण के चक्रसे मुक्त हो जाता है। पुस्तक *क्या, क्यों और कैसे?* गीतावाटिका प्रकाशन लेखक- भाईजी श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार

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