संतमहापुरुष

जीव गोस्वामी जैसे तीक्ष्ण बुद्धि सम्पन्न और मेधावी थे, वैसे ही सुयोग्य और भारत विख्यात पण्डितों से शास्त्राध्ययन करने का उन्हें सुअवसर प्राप्त हुआ था। सनातन और रूप का पाण्डित्य, कवित्व और भक्ति-शास्त्रों का सम्यक् ज्ञान उन्हें पैतृक सम्पत्ति के समान उनसे उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ था। ग्रन्थ रचना-काल में उनकी सहायता करते समय भक्ति के क्षेत्र में उनके शीर्ष स्थानीय ग्रन्थों का हार्द उन्हें हस्तामलकवत् उपलब्ध हुआ था। उनका जो कार्य बाक़ी रह गया था उसे पूरा करने के लिए वे सब प्रकार से उपयुक्त थे। उनका सारा जीवन बीत गया था कृष्ण-लीला, रसतत्व वैष्णव-आचार और भक्तिपथ में विधि-निषेध सम्बन्धी ग्रन्थों की रचना द्वारा वैष्णवमत की प्रतिष्ठा करने में। पर वैष्णवमत की प्रतिष्ठा दृढ़ रूप से उसकी दार्शनिक भित्ति सुदृढ़ किये बिना नहीं हो सकती थी। इस कार्य के लिए उनके पास अवकाश न रहा। इसलिए उन्होंने यह कार्य सौंपा जीव गोस्वामी को। उन्होंने षट्संदर्भ की रचना कर जिस दक्षता से इसे सम्पन्न किया, उससे वैष्णव धर्म जितना सम्पन्न और सुदृढ़ हुआ, उतना पहले कभी नहीं हुआ था। सन्दर्भों के अतिरिक्त उन्होंने और भी अनेक ग्रन्थों की रचना की, अनेकों का संकलन किया, अनेकों की व्याख्या की। उन सबका न तो मुद्रण हुआ है, न सब उपलब्ध है। कुछ के प्राचीन ग्रन्थों में नाम मात्र देखने को मिलते है। जीव गोस्वामी के शिष्य कृष्णदास अधिकारी उनके ग्रन्थों की एक तालिका छोड़ गये है। जिसके आधार पर नरहरि चक्रवर्ती ने भक्तिरत्नाकर (1/833-842) में एक तालिका प्रस्तुत की है। कृष्णदास ने अपनी तालिका के अन्त में 'इत्यादि' शब्द जोड़ दिया है, जिससे स्पष्ट है कि उस तालिका के अतिरिक्त और भी ग्रन्थ है, जिनका उसमें नाम नहीं है। दो महत्वपूर्ण ग्रन्थ, जिन्हें हम जानते है, उसमें छोड़ दिये गये है। वे हैं 'लघुतोषणी' और 'सर्वसम्वादिनी'। सतीशचन्द्र मित्र ने उपरोक्त तालिका के आधार पर जीव गोस्वामी के ग्रन्थों को इस प्रकार श्रेणी-विभक्त किया है- व्याकरण ग्रन्थ (1) हरिनामामृत व्याकरण, (2) सूत्र-मालिका, (3) धातुसंग्रह। संग्रह और स्तव-ग्रन्थ (1) कृष्णार्च्चादीपिका, (2) गोपाल विरूदावली, (3) श्रीमाधव-महोत्सव, (4) श्रीसंकल्प-कल्पवृक्ष, (5) भावार्थचम्पू, (6) रसामृत शेष, (7) पद्मपुराणोक्त श्रीकृष्ण पद चिह्न और (8) श्रीराधिका कर-पद्म-चिह्न। लीला ग्रन्थ श्रीगोपालचम्पू (पूर्व और उत्तर भाग)। टीका ग्रन्थ (1) ब्रह्मसंहिता की टीका, (2) गोपालतापनी उपनिषद की टीका, (3) भक्तिरसामृतसिन्धु की ('दुर्गम संगमनी') टीका, (4) उज्ज्वल नीलमणि की (लोचन-रोचनी) टीका, (5) योगसारस्तबकी टीका एवं (6) अग्निपुराणोक्त श्रीगायत्री-विवृत्ति व भाष्य। सन्दर्भ व विचार ग्रन्थ (1) तत्व-सन्दर्भ, (2) भगवत-सन्दर्भ (3) परमात्म-सन्दर्भ, (4) श्रीकृष्ण-सन्दर्भ, (5) भक्ति-सन्दर्भ और (6) प्रीति-सन्दर्भ। सर्वसम्वादिनी को पृथक् ग्रन्थ न मानकर प्रथम चार ग्रन्थों की अनुव्याख्या या प्रपूर्ति मानना चाहिए। हम यहाँ जीव गोस्वामी के मुख्य-मुख्य ग्रन्थों का कुछ परिचय देने की चेष्टा करेंगे। हरिनामामृत व्याकरण यह एक अद्भुत ग्रन्थ है। इसका पाठ करते समय पाठकों को हरिनामामृत पान करने का अवसर मिलता है। इसके मंगलाचरण श्लोक में जीव गोस्वामी ने लिखा है कि जिस प्रकार श्री कृष्ण की उपासना करने वाले भक्त हरिनाम की माला की सहायता से नाम जप करते हैं, उसी प्रकार मैंने इस व्याकरण में सूत्रों की सहायता से भगवन नाम का उच्चारण या स्मरण होता है। सकेत, परिहास, पादपूरण या अनायास हरिनाम लेने से भी समस्त पापों का नाश होता है। इसलिए इस व्याकरण का अन्य व्याकरणों की अपेक्षा विशेष महत्व है। 'सूत्रमालिका' और 'धातुसंग्रह' स्वतन्त्र ग्रन्थ न होकर हरिनामामृत व्याकरण के ही दो अध्याय हैं। षट-सन्दर्भ षट् सन्दर्भ के अन्तर्गत पृथक्-पृथक् छय सन्दर्भ हैं- तत्व, भगवत्, परमार्थ, श्रीकृष्ण, भक्ति और प्रीति। इसलिए इसे षट्-सन्दर्भ कहते हैं। यह सभी सन्दर्भ श्रीमद्भागवत की तत्वव्याख्या स्वरूप हैं, इसलिए इन्हें 'भागवत-सन्दर्भ' कहते हैं। ग्रन्थ के मंगलाचरर में जीव गोस्वामी की उक्ति है-"भगवान का तत्व प्रकाशित करने के लिए रूप सनातन ने मुझे इस ग्रन्थ की रचना में प्रवृत्त किया है। वृद्ध वैष्णादि द्वारा रचित ग्रन्थों का उनके किसी दाक्षिणात्य भट्ट बन्धुने सार संकलन कर एक ग्रन्थ प्रणयन किया है, जो कहीं-कहीं खण्डित है, कहीं क्रमानुसार है और कहीं बिना किसी क्रम के। उसी ग्रन्थ की पर्यालोचना कर क्षुद्र जीव ने उसे क्रमानुसार लिखा है।" वृद्धवैष्णवों से जीव गोस्वामी का अभिप्राय श्रीमन्मध्वाचार्य; श्रीधर स्वामी आदि प्राचीन वैष्णवाचार्यों से है और दाक्षिणात्य भट्ट बन्धु से उनका अभिप्राय श्रीपाद गोपालभट्ट गोस्वामी से है, जैसा कि बलदेव विद्याभूषण ने तत्व-सन्दर्भ की टीका में कहा है। इससे स्पष्ट है कि मूल रूप से इस ग्रन्थ का प्रणयन किया श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी ने। उसे पूर्ण कर क्रमबद्ध किया और उसकी पर्यालोचना कर उसे अन्तिम रूप दिया श्रीजीव गोस्वामी ने। श्रीजीव ने प्रत्येक सन्दर्भ के आरम्भ में यह लिखकर इस बात को दोहराया है- तस्याद्यं ग्रन्थालेख्यं क्रान्तव्युत्क्रान्त खण्डितम्। पर्यालाच्यात पर्यायं कृत्वा लिखित जीवक:॥ जीव गोस्वामी द्वारा मंगलाचरण में गोपालभट्ट गोस्वामी का नाम न लिखे जाने और केवल रूप सनातन के बन्धु दाक्षिणात्य भट्ट लिखकर उनका संकेत किये जाने का कारण यह हो सकता है कि उन्होंने दैन्यवश अपना नाम लिखने के लिए जीव गोस्वामी को उसी प्रकार निषेध कर दिया हो, जिस प्रकार उन्होंने चैतन्य-चरितामृत के लेखक को अपने सम्बन्ध में कुछ भी लिखने का निषेध किया था। तत्व-सन्दर्भ इस सम्बन्ध में जीव गोस्वामी ने प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमानादि, जितने भी प्रमाण हैं, उनमें से केवल शब्द प्रमाण को ग्रहण किया है, बाक़ी सबको दोषयुक्त ठहराया है। शब्द प्रमाण में भी श्रीमद्भागवत का श्रेष्ठत्वं सिद्ध किया है। उसे ब्रह्मसूत्र का व्यासदेव द्वारा स्वरचित भाष्य माना है। इसलिए उन्होंने ब्रह्मसूत्र के भाष्य की पृथकरूप से रचना का प्रयोजन अस्वीकार करते हुए भागवत सन्दर्भ की श्रीमद्भागत्के की भाष्यरूप में रचना की है। भागवत सन्दर्भ इस सन्दर्भ में परब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया गया है। परब्रह्म अद्वय है, अर्थात् स्वजातीय, विजातीय और स्वगत भेदरहित है। जीव और जगत् उसी की शक्ति का परिणाम है। उसकी अनन्त शक्तियाँ हैं, जिनमें तीन प्रधान हैं-चित्-शक्ति या स्वरूप-शक्ति, जीव-शक्ति और माया शक्ति। चित्-शक्ति का प्रकाश है उसके धाम, परिकर और लीलादि, जीव-शक्ति का प्रकाश है जीव, और माया-शक्ति का प्रकाश है जगत्। ब्रह्म की स्वरूप शक्ति के विकास-क्रम के अनुसार उसके अनन्त रूप हैं, जिनमें तीन मुख्य हैं-ब्रह्म, परमात्मा और भगवान। ब्रह्म में स्वरूप-शक्ति का न्यूनतम विकास है, केवल उतना ही, जितना सत्तामात्र की रक्षा के लिए आवश्यक है। इसलिए उसे केवल सतरूप कहते हैं। उसमें ऐसा कोई विशेषत्व नहीं, जो अनुभव में आ सके। इसलिए उसे निर्विशेष कहते हैं। परमात्मा में स्वरूप-शक्ति का विकास ब्रह्म की अपेक्षा अधिक है। इसलिए वह मूर्त है। श्रुतियाँ उसे अगुष्ठ-प्रमाण कहती हैं। वह अन्तर्यामी रूप से सब जीवों के अन्त:करण में विद्यमान है। भगवान् में स्वरूप शक्ति का पूर्णतम विकास है। ऐश्वर्य, माधुर्य और सौन्दर्य की उनमें पूर्ण अभिव्यक्ति है। वे रस स्वरूप हैं। उनके भी वासुदेव, राम, नारायण, नृसिंह आदि अनेक रूप हैं, जिनमें उनके ऐश्वर्य, माधुर्यदि के विकासक्रम का तारतम्य है। पर उनका श्रीकृष्ण रूप ही सर्वक्षेष्ठ है। वे स्वयं, भगवान् हैं। अन्य भगवद्-स्वरूप उनके अंश और कला हैं। परमात्म-सन्दर्भ इसमें परमात्मा के जीव और प्रकृति के साथ सम्बन्ध की आलोचना की गयी है। परमात्मा परब्रह्म का वह अंश है, जिसके द्वारा वह अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की सृष्टि आदि का कार्य करता है और उनमें व्याप्त रहकर उनका संचालन करता हैं परमात्मा का सम्बन्ध केवल जीव शक्ति और माया-शक्ति से है। जीव शक्ति को तटस्था-शक्ति के। जीव इसी शक्ति का परिणाम है। वे उसी प्रकार भगवान् के अंश हैं, जिस प्रकार स्फुलिंग अग्नि के। माया शक्ति को बहिरंगा शक्ति कहते हैं। इसकी परब्रह्म के स्वरूप में स्थिति नहीं है। अचेतन और अन्धकारमय है। इसका भगवान् से उसी प्रकार सम्बन्ध है, जिस प्रकार का धूम्र का अग्नि से। जगत् इसी का परिणाम है। जीव और जगत् का ब्रह्म से अचिंत्य-भेदाभेद का सम्बन्ध है। श्रीकृष्ण-सन्दर्भ- इस सन्दर्भ में जीव गोस्वामी ने श्रीमद् भागवत के 'एते चांशकला पुंस: कृष्णस्तु भगवान् स्वयं' श्लोक के अनुसार सिद्ध किया है कि कृष्ण अवतार नहीं अवतारी हैं अन्य सभी अवतार उनके अंश है। कृष्ण के धाम, परिकर, लीलादि का भी उन्होंने इसमें विस्तार से वर्णन किया है। भगवद्धाम मायातीत है। पर जब भगवान् भूमण्डल पर अवतीर्ण होते हैं, तब पहले उनके धाम का अवतरण होता है। इस प्रकार भगवद्धाम के दो प्रकाश है-प्रकट प्रकाश और अप्रकट प्रकाश। अप्रकट प्रकाश भी दो प्रकार का है-गोलोक अर्थात् वैकुण्ठ के ऊपर स्थित अप्रकट प्रकाश और पृथ्वी पर स्थित अप्रकट प्रकाश। गोलोक के अन्तर्मण्डल को वृन्दावन कहते हैं। भगवान् की लीला भी दो प्रकार की हैं-प्रकट लीला और अप्रकट लीला। जब लीला ब्रह्माण्ड में गोचरीभूत नहीं होती, तब उसे अप्रकटलीला कहते हैं। जब भगवान् की इच्छा से लीला ब्रह्माण्ड में गोचरीभूत होती है, तब उसी लीला को प्रकट लीला कहते है। प्रकट लीला में प्राकृत जगत् के जीवों के समान श्रीकृष्ण का जन्म होता है। जन्म के पश्चात शैशव, वाल्य, कौमार, पोगण्ड और कैशोरावस्था का क्रम चलता है। अप्रकट लीला में कृष्ण नित्य-किशोर है। इसलिए बहुत सी मधुरलीलाएं, जिसका रसास्वादन श्रीकृष्ण को प्रकट लीला में होता है, अप्रकटलीला में सम्भव नहीं है। भगवान् के परिकर दो प्रकार के है- नित्य सिद्ध और साधन-सिद्ध। नित्य सिद्ध परिकर भगवान् या उनकी चिच्छक्ति के ही प्रकाश विशेष हैं उनका सेवाभाव स्वयं सिद्ध है। श्रीकृष्ण के परिकर हैं नन्द-यशोदा, वसुदेव–देवकी, व्रज की गोपियाँ, द्वारका की महिषियाँ, व्रज के गोप और द्वारका-मथुरा के यादवगण। नन्द-यशोदा का श्रीकृष्ण के प्रति वात्सल्यभाव अनादिकाल से स्वयं-सिद्ध है, जन्मजात नहीं। इसी प्रकार अन्य परिकारों का अपना-अपना भाव भी अनादिकाल से स्वयं-सिद्ध है। व्रज के गोप और द्वारका-मथुरा के यादवगण श्रीकृष्ण के आविर्भाव विशेष है। व्रज की गोपियाँ और द्वारका-मथुरा की महिषियाँ स्वरूप-शक्ति की वृत्ति विशेष हैं। स्वरूप-शक्ति की तीन वृत्तियाँ है- संधिनी, संवित और ह्लादिनी, जो क्रमश: भगवान् के सत्, चित् और आनन्द अंशो से सम्बन्धित है। संधिनी से संवित और संवित से ह्लादिनी श्रेष्ठ है। ह्लादिनी की ही वृत्ति है भक्ति और भक्ति की परमधनीभूत मूर्ति हैं राधा। श्रीकृष्ण रसस्वरूप हैं। रस आस्वाद्यं है। जो आस्वाद्य है वही मधुर है। इसलिए रस स्वरूप श्रीकृष्ण माधुर्य स्वरूप हैं। माधुर्य ही उनकी भगवत्ता का सार है। उनका ऐश्वर्य उनके माधुर्य से पूर्णत: आच्छादित है। श्रीकृष्ण का माधुर्य असीम है, राधा का प्रेम असीम है। असीम होते हुए भी कृष्ण का माधुर्य राधा के प्रेम से और राधा का प्रेम कृष्ण के माधुर्य से उच्छवसित होता है। इसीलिए श्रीकृष्ण का माधुर्य असीम होते हुए भी निरन्तर वर्धमान होने के कारण नित्य नवीन है। रस स्वरूप श्रीकृष्ण सर्वोत्कृष्ट भक्ति रस का आस्वादन करने के लिए सब प्रकार से स्वतन्त्र होते हुए भी भक्तों के अधीन हैं। भक्ति-सन्दर्भ इसमें भक्ति के स्वरूप, प्रकार, अंग और गोपानादि का वर्णन किया गया है। भक्ति है ईश्वर में परानुरक्ति। यह जीव की अपनी शक्ति नहीं, भगवान् की ह्लादिनी शक्ति की वृत्ति है। गुणातीत ह्लादिनी शक्ति की वृत्ति होने के कारण यह निर्गुण हैं, प्रपञ्चातीत है, भगवान् इसे जीव के चित्त में निक्षिप्त कर उसे आनन्दित करते हैं और स्वयं भी आनन्दित होते हैं।[1] भक्त्यानन्द भगवान् के स्वरूपानन्द से भी श्रेष्ठ है। भक्ति कर्म, ज्ञान और योग से श्रेष्ठ है। भक्ति की प्रारम्भिक अवस्था में ज्ञान और योग सहायक हैं, क्योंकि वे सांसारिक विषयों की कामना से मुक्त हैं। भक्ति की उच्चतर अवस्था में वे बाधक हैं, क्योंकि मुक्ति की कामना से वे मुक्त नहीं हैं, पर किसी भी अवस्था में वे भक्ति का आवश्यक अंग नहीं है। कर्म, ज्ञान और योग फल की प्राप्ति के लिए भक्ति की अपेक्षा रखते है। भक्ति किसी अन्य साधन की अपेक्षा नहीं रखती। यह परम स्वतन्त्रता है। वर्णाश्रम-धर्म भक्ति का अंग नहीं है। इससे स्वर्ग की प्राप्ति होती है, मुक्ति की नहीं। निष्काम-कर्म से मुक्ति की प्राप्ति होती है, श्रीकृष्ण की प्रेम सेवा की नहीं। कर्म के सम्यक् त्याग में भी भक्ति का आकार ही है, प्राण नहीं। भक्ति का प्राण है आत्यन्ति की श्रद्धा और श्रीकृष्ण की प्रेम सेवा की बलवती लालसा। भगवत्-साक्षात्कार भक्ति से ही होता है, अन्य किसी साधन से नहीं। यदि हृदय में भक्ति न हो और साक्षात्कार हो तो वह साक्षात्कार भी असाक्षात्कार के समान है। उससे भगवान् के माधुर्य का आस्वादन नहीं होता, उसी प्रकार जिस प्रकार पित्त दूषित जिह्ना से मिसरी के मिठास का आस्वादन नहीं होता- "निरूपाधि प्रीत्यास्पदतास्वभावस्य प्रियत्वधर्मानुभवं बिना तु साक्षात्कारोऽप्यासाक्षात्कार एव। माधुर्य बिना दुष्ट जिह्नया खण्डस्येव* भक्ति साधन भी है, साध्य भी। साधन-भक्ति साध्य-भक्ति की अपरिपक्वावस्था है। साधन-भक्ति के चौसठ अंग है, जिनका पर्यवसान नवधा-भक्ति में होता है। नवधा-भक्ति के अंग है-श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्म-निवेदन। इनमें भी नाम कीर्तन सर्वप्रधान है। नाम कीर्तन के बगैर भक्ति का कोई भी अंग पूर्ण नहीं है। भक्ति दो प्रकार की है-वैधी और रागानुगा। वैधी-भक्ति के साधक भजन में प्रवृत्त होते हैं शास्त्र-विधि के भय से और सांसारिक दुखों से परित्राण पाने के उद्देश्य से। रागमार्ग् के साधक भजन में प्रवृत्त होते है। श्रीकृष्ण में राग, प्रीति या आसक्ति के कारण उनकी सेवा के लोभ से। रागानुगा-भक्ति रागात्मिका भक्ति की अनुगता है। रागात्मिका भक्ति के आश्रय हैं नन्द-यशोदा-राधा-ललितादि, जो श्रीकृष्ण की स्वरूप-शक्ति के मूर्त विग्रह हैं और अनादिकाल से व्रजधाम में व्रज-परिकरों के रूप में विराजमान हैं। व्रज में श्रीकृष्ण के परिकर चार प्रकार के हैं-दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर। दास्य, सख्य वात्सल्यभाव के परिकरों की कृष्ण-सेवा उनके सम्बन्ध के अनुरूप होती है। इसलिए वह सम्बन्ध रूपा कहलाती है। परन्तु व्रजसुन्दरियों की रागात्मिका-भक्ति सम्बन्ध की कोई अपेक्षा नहीं रखती। वह एकमात्र श्रीकृष्ण-प्रीति की कामना की अपेक्षा रखती है। इसलिए वह कामरूपा कहलाती है। रागात्मिका-भक्ति के समान रागानुगा भक्ति भी दो प्रकार की है- सम्बन्धानुगा और कामानुगा। कामानुगाओं की कामानुगा भक्ति भी दो प्रकार की है-सम्भोगेच्छामयी और तत्तद्भावेच्छामयी।सम्भोगेच्छामयी भक्ति में श्रीकृष्ण के साथ सम्भोग की इच्छा रहती है। सम्भोग की इच्छा रखने वाले भक्तों को व्रज में व्रजेन्द्रनन्दन की सेवा नहीं मिलती, क्योंकि व्रज में स्वसुख वासना है ही नहीं। उन्हें द्वारका की प्राप्ति होती है। साधन दो प्रकार का है-अन्तर और बाह्य। अन्तर-साधन का सम्बन्ध मन से है, बाह्य-साधन का देह ओर बाह्म इन्द्रियों से। रागानुगा श्रवण अन्तर-साधन प्रधान है। लीला-स्मरण इसका मुख्य अंग है। पर श्रवण कीर्तनादि बाह्म-साधन इसमें उपेक्षनीय नहीं है। बाह्य-साधन से अन्तर साधन की पुष्टि होती है। बाह्य-साधन से यथावस्थित पा0चभौतिक देह से। अन्तर साधन होता है। अन्तश्चिन्तित सिद्ध देह से। प्रीति-सन्दर्भ प्रति सन्दर्भ में परमपुरुषार्थ का निरूपण किया गया है। परमतम पुरुषार्थ है। भगवत् प्रीति। प्रीति शब्द सुख और प्रियता दोनों का व्यञ्जक है। प्रियता में सुख का धर्म विद्यमान है, पर सुख को प्रियता नहीं कहा जा सकता। सुख का तात्पर्य एकमात्र अपने उल्लास से है, प्रियता का तात्पर्य प्रीति के विषय या प्रियजन के उल्लास के कारण अपने हृदय में जो उल्लास होता है उससे है। सुख के मूल मे किसी का आनुकूल्य या सुख विधान करने की स्पृहा नहीं रहती, इसलिए सुख का विषय नहीं होता। प्रियता के मूल में प्रियजन का सुख-विधान करने की स्पृहा रहती है, इसलिए उसका विषय होता है। भगवत् प्रीति की प्रथम अवस्था में देहादि की आसक्ति जाती रहती है। भगवत् प्रीति के पूर्णाविर्भाव में भगवान् में परमावेश और परमानन्द पूर्णता की उत्पत्ति होती है। भक्त के चित्त में आविर्भूता प्रीति उसके चित्त में संस्कार-विशेष उत्पन्न कर उसे क्रमश: रति, प्रेम प्रणय, मान, स्नेह, राग, अनुराग और महाभाव के स्तर तक ले जाती है। रति में उल्लास की अधिकता होती है। रति के उत्पन्न होने पर केवल भगवान् में ही प्रयोजन-बुद्धि होती है। भगवान् के अतिरिक्त और सभी पदार्थ तुच्छ प्रतीत होने लगते है। प्रेम में कृष्ण के प्रति ममता अधिक होती है। प्रेम उत्पन्न होने पर यदि प्रीति भंग होने का कारण भी उपस्थित हो तो उसके स्वरूप में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। ममता किस प्रकार प्रीति को समृद्ध करती है इसका उदाहरण देते हुए मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि ममतायुक्त पालतू मुर्गे को विल्ली के खा जाने से उसके मालिक को जितना दुख होता है, उतना ममता शून्य चूहे को चटक पक्षी के खा जाने से नहीं होता। प्रेम लक्षणा-भक्ति में ममता के आधिक्य के कारण ममता को ही भक्ति कहा गया है। प्रणय में विश्वास की, विश्रंभ की प्रचुरता होती है। प्रणय में सम्भ्रम के लिए स्थान नहीं रहता, क्योंकि इसमें अपने मन, प्राण, बुद्धि, देह परिच्छदादि के प्रिय के मन, प्राण, बुद्धि, देह, परिच्छदादि से अभिन्न होने की बुद्धि होती है। मान में प्रियतातिशय के कारण प्रणय कौटिल्याभासयुक्त वैचित्री धारण करता है। मान उपस्थित होने पर भक्त के प्रणय कोप से भगवान् भी प्रेममय भय को प्राप्त होते है- "यस्मिन जाते श्रीभगवानपि तत्प्रणयकोपात् प्रेममयं भयं भजते।" स्नेह में चित्त अत्यन्त द्रवित होता है। स्नेह के उदय होने पर भगवान् के सम्बन्धाभास में ही महावाष्पादि विकार, प्रिय-दर्शनादि से अतृप्ति और प्रियतम के अनन्त सामर्थ्यवान होते हुए भी किसी के द्वारा उनके अनिष्ट की आशंका का जन्म होता है। राग में स्नेह अतिशय अभिलाषात्मक होता है। राग उत्पन्न होने पर प्रियतम का क्षणिक विरह अत्यन्त असह्य होता है। प्रियतम के संयोग में परम दुख भी सुख रूप में प्रतीत होता है और वियोग में परमसुख भी दुख रूप में प्रतीत होता है। अनुराग की अवस्था में राग प्रिय का नवीन नवीन रूप में अनुभव कराता है और स्वयं भी नवीन-नवीन होता है। अनुराग के उदय होने पर परस्पर का अत्यन्त वशीभाव, प्रेमवैचित्य[2] कृष्ण सम्बन्धी अप्राणी में भी जन्म लेने की लालसा और विच्छेद में अतिशय स्फूर्ति का अनुभव होता है। महाभाव में अनुराग असमोर्द्ध उन्मादक चमत्कारित्व को प्राप्त होता है। इस अवस्था में श्रीकृष्ण के संयोग में पलक का पड़ना भी असह्य हो जाता है और कल्प के बराबर समय क्षणभर जैसा प्रतीत होता है, वियोग में एक क्षण भी कल्प जैसा लगता है। योग-वियोग दोनों अवस्थाओं में महाउद्दीप्त [3] सात्वि भाव उत्पन्न होते है।* प्रीति भगवत् स्वभाव-विशेष की सहायता से प्रीतिमान व्यक्ति में अनुग्राह्याभिमान, अनुग्राहकाभिमान, मित्राभिमान या प्रियाभिमान उत्पन्न करती है। अनुग्राह्याभिमान – विशिष्ट, भक्त भगवान् में ममताहीन होते हैं या ममतावान्। ममताहीन भगवान् को ब्रह्म या परमात्मा के रूप में जानते है। इनकी प्राप्ति ज्ञान-भक्ति कहलाती है। इन्हें शान्त भक्त कहते है। अनुग्राह्याभिमान- विशिष्ट ममतावान् भक्त भगवान् को अपना प्रभु मानते है। इनकी रति दास्य-रति कहलाती है। अनुग्राहकाभिमान- विशिष्ट भक्तों का भगवान् में पुत्रादि-भाव होता है। इनकी रति वात्सल्य-रति कहलाती है। मित्राभिमान भक्त भगवान् को अपना मित्र या सखा मानते है। इनकी रति सख्य रति कहलाती है। प्रियाभिमानि भक्तों में भगवान् के प्रति कान्ताभाव होता है। इनकी रति को मधुरा रति कहते है। शानत, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर पञ्चविध रति को स्थायीभाव कहते हैं। विभाव, अनुभाव सात्विक और व्याभिचारीभाव के सम्मिलन से इनकी रस में परिणति होती है। इसलिए शान्त, दास्य, सख्य,वात्सल्य, मधुर-भेद से रस पञ्चविध है। इसके अतिरिक्त हास्यादि भेद से रस के सात और प्रकार है। शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस उत्तरोत्तर श्रेष्ठ हैं। मधुर-रस सबसे श्रेष्ठ है। मधुर व उज्ज्वल रस में कान्तरूप से स्फूर्तिमान श्रीकृष्ण विषयालम्बन है, उनकी प्रेयसी वर्ग आश्रयालम्बन हैं। कृष्ण-प्रेयसी स्वकीया परकीया भेद से दो प्रकार की हैं। रुक्मिणी आदि स्वीयाकान्ता हैं। श्रीराधादि परमस्वीया होते हुए भी प्रकटलीला में परकीयारूप में प्रतीयमान है। स्वकीया प्रेयसियों में विवाह विधि की अपेक्षा के कारण अनुराग होते हुए भी उतना प्रबल नहीं है, जितना परकीया कान्ताओं में। व्रज-सुन्दरियाँ प्रकटलीला में विवाह-विधि, इहलोक, परलोक और वेदधर्मादि की अपेक्षा न कर केवल श्रीकृष्ण के प्रति अपने अनुराग के वशीभूत हो उन्हें आत्मसमर्पण करती हैं।* व्रजसुन्दरियों का परकीयात्व प्राकृत जगत् के अधर्ममय, घृणित परकीयात्व के समान नहीं है। व्रजसुन्दरीगण श्रीकृष्ण की नित्यप्रेयसी हैं। उनका प्रबलतम अनुराग आस्वादन करने के लिए श्रीकृष्ण अपनी अघटन-घटना-पटीयसी योगमाया शक्ति द्वारा प्रकटलीला में उनकी परकीया नायिका के रूप में प्रतीत कराते हैं। प्रकटलीला में अन्य गोपों के सहित उनका विवाह मायिक होता है। जब वे श्रीकृष्ण के निकट रासादि में जाती है, तब योगमाया के प्रभाव से उनकी योगमाया-कल्पित मूर्ति घर पर रह जाती है। प्राकृत जगत् की व्यभिचारिणी रमणी परपुरुष का संग अपने सुख के लिये करती है। व्रजसुन्दरियों में स्वमुख-वासना का लेश भी नहीं है। श्रीकृष्ण के साथ व्रजसुन्दरियों का सम्बन्ध वैध-अवैध किसी भी जागतिक सम्बन्ध के अनुरूप नहीं है। वह शुद्ध अनुरागमय है। उनके चित और इन्द्रियाँ कृष्णनुराग से विभावित हैं। उनकी सारी चेष्टाएं उस अनुराग की अभिव्यक्ति मात्र हैं और श्रीकृष्ण के सुख के लिए हैं। उनका श्रीकृष्ण के साथ अनुराग-सिद्ध दाम्पत्य है। उज्ज्वल रस में नायक नायिका का सम्भोग काममय नहीं है। कामक्रीड़ा से उनका बाह्य साम्य मात्र है। उसमें आलिंगन, चुम्बनादि की जो बाह्य चेष्टाए हैं वे नृत्यादि की तरह प्रीति के अनुभाव और उसका बाह्य प्रकाश मात्र है। सर्वसम्बादिनी यह भागवत सन्दर्भ के अन्तर्गत प्रथम चार सन्दर्भो की अनुव्याख्या या टीका है। इसे भागवत-सन्दर्भ की प्रपूर्ति कहा गया है, क्योंकि भागवत सन्दर्भ में दार्शनिक सिद्धान्त और शास्त्र-प्रमाण से सम्बन्धित, जो स्थल असम्पूर्ण या अस्पष्ट रह गये, उनकी जीव गोस्वामी ने बहुत से नये शास्त्र-प्रमाण और सिद्धान्त-विचार द्वारा इसमें सम्पूर्ति की है। उसमें उन्होंने वेद, वेदान्त, न्याय, मीमांसा, सांख्य, पातञ्जल, स्मृति, तन्त्र, पुराण, निरूक्त, व्याकरण प्रभृति सर्वशास्त्रों का मन्थन कर सर्वसम्वादपूर्ण, अति सारगर्भ वैष्णव-सिद्धान्त-समूह समाविष्ट कर रखा है। सम्भवत: इसीलिए इसका नाम सर्वसम्वादिनी रखा है। यह ग्रन्थ मूलग्रन्थ भागवत सन्दर्भ से भी अधिक महत्व का है। संक्षेपवैष्णवतोषणी सनातन गोस्वामी की श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध पर लिखी वैष्णवतोषणी टीका से यह संक्षिप्तिकृत है। इसके पृथक् रूप से लिखे जाने के वाद सनातन गोस्वामी की टीका का नाम हुआ वृहद्वैष्णतवोषणी और इसका नाम हुआ लघुवैष्णवतोषणी या संक्षिप्त-वैष्णवतोषणी। इसके उपसंहार में दिये गये श्लोक के अनुसार इसकी रचना 1582 ई॰ में समाप्त की गयी। क्रम-सन्दर्भ यह जीव गोस्वामी द्वारा की गयी समग्र श्रीमद्भागवत की टीका है। सर्वसम्वादिनी में क्रम-सन्दर्भ का उल्लेख है। और वैष्णवतोषणी में सर्वसम्वादिनी का। इससे प्रमाणित है कि क्रम-सन्दर्भ की रचना वैष्णवतोषणी के पूर्व अर्थात् सन् 1582 से पूर्व हुई। गोपालचम्पू गोपालचम्पू जीव गोस्वामी के शेष जीवन की विशेष कृति और भागवत-सन्दर्भ के समान उनके जीवन का प्रमुख कीर्तिस्तम्भ है। यह पूर्व और उत्तर दो विशाल खण्डों में विभक्त है। पूर्व खण्ड में श्रीमद्भागवत के आधार पर श्रीकृष्ण की बाल्यलीला का और उत्तर खण्ड में मथुरा और द्वारका लीला का वर्णन है। चम्पू-काव्य के अनुसार इसमें गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग किया गया है। यद्यपि इसका मूल आधार है श्रीमद्भागवत में वर्णित वृन्दावन-मथुरा-द्वारका लीला, इसमें उन लीलाओं के विस्तृत वर्णन के साथ-साथ अनेक नई लीलाओं का भी वर्णन है, जिनका श्रीमद्भागवत में परीक्षित को सुनाई गयी सात दिन की कथा में समावेश सम्भव नहीं था। इसमें श्रीकृष्ण की प्रकट और अप्रकट लीलाओं का सुन्दर सम्मिश्रण है। इसकी एक असाधारण विशेषता यह है कि यह लीला ही नहीं, कवित्त और दार्शनिक सिद्धान्त की दृष्टि से भी परिपूर्ण है। श्रीकृष्णदास कविराज ने चैतन्य-चरितामृत में इसके सम्बन्ध में लिखा है- श्रीगोपालचम्पू नामे ग्रन्थ महाशूर। नित्यलीला स्थापना जाहे ब्रजरसपूर॥* अर्थात् श्रीगोपालचम्पू नामक ग्रन्थ महासूर है। भाषा, काव्य, सिद्धान्त आदि की दृष्टि से यह महागम्भीर और सबको पराजित करने वाला है। इसमें अप्रकट प्रकाश का वर्णन होते हुए भी व्रजरस, अर्थात् भौम वृन्दावन को प्रधानता की स्थापना की गयी है। भौम वृन्दावन की प्रकटलीला के सर्वोत्कर्षमयी होने का कारण है योगमाया द्वारा श्रीकृष्ण की स्वरूपशक्ति, उनकी परम स्वीया कान्तागण की परकीया-अभिमानिनी रूप में प्रतीति करा श्रीकृष्ण को परमास्वाद्य परकीया-रस का आस्वादन कराना। यह रस परमोज्ज्वल और सर्वथा अनवद्य है। इस रूप में इसका प्रतिपादन श्रीमद्भागवत में रासलीला के उपसंहार में परीक्षित-शुक सम्वाद में स्पष्टरूप से किया गया है। जीवगोस्वामी ने इस ग्रन्थ में परकीया-रस का ही प्रतिपादन किया है। पर उत्तर चम्पू के पैंतीस वें पूरण में उन्होंने श्रीराधा-माधव-विवाह-प्रसंग का वर्णन किया है। इसके कारण कुछ लोगों की धारणा है कि उन्होंने प्रकटलीला में परकीयत्व का स्वकीयात्व में पर्यवसान किया है और स्वकीया का सिद्धान्त ही उनका हार्द है। पर यह भ्रान्ति छत्तीसवें पूरण में राधा-माधव की कुछ उक्तियों से दूर हो जाती है, जिनसे स्पष्ट है कि परकीया लीला में ही रस की सम्यक् पुष्टि होती है। ग्रन्थ में इसकी रचनाकाल के सम्बन्ध में जो उल्लेख है उसके अनुसार पूर्वचम्पू की रचना समाप्त हुई सन् 1588 में और उत्तर चम्पूकी सन् 1590 में। माधव-महोत्सव इस ग्रन्थ में श्रीराधा के वृन्दावन में राज्याभिषेक की कहानी कही गयी है। पद्म पुराण पाताल खण्ड में "वृन्दावनाधिपत्यञ्ज तत्तं तस्यै" और मत्स्यपुराण में "राधा वृन्दावने वने" वाक्यों में राधाभिषेक का इंगित किया गया है। वृहद्गौतमीय तन्त्र में भी राधा को वृन्दावनधीश्वरी का पद दिया गया है। श्रीजीव ने इन वाक्यों को सूत्र रूप में ग्रहणकर रूप गोस्वामी के आदेश से इस काव्य की रचना की है। शब्द- विन्यास अलंकार-छटा, छन्द वैचित्री, भाव प्रस्त्रवण और रसमयता आदि सभी दृष्टि से यह ग्रन्थ अद्वितीय है। यद्यपि जीव गोस्वामी ने इसे 'काव्य खण्ड' कहा है, विद्वानों ने इसमें महाकाव्य के सभी गुण देखकर इसे 'महाकाव्य की संज्ञा देने में संकोच नहीं किया है। जीव गोस्वामी ने स्वयं इसका रचनाकाल शकाब्द 1477 अर्थात् सन् 1555 लिखा है। ग्रन्थ-प्रचार अब राशि-राशि गौड़ीय-वैष्णव ग्रन्थों की रचना हो चुकी थी। भक्तिरस और सिद्धान्त सम्बन्धी प्रचुर-ग्रन्थों की रचना श्रीरूप और श्रीसनातन पहले ही कर चुके थे। दार्शनिक-सिद्धान्त सम्बन्धी जिन ग्रन्थों की अभी भी कमी थी। स्वरूप दामोदर और मुरारी गुप्त ने महाप्रभु के चरित्र से सम्बन्धित घटनाओं को सूत्ररूप में लिख रखा था। यह ग्रन्थ स्वरूप दामोदर और मुरारी गुप्त के कड़चा के नाम से प्रसिद्ध थे। पर यह संस्कृत में थे और इतने संक्षिप्त थे कि सर्वसाधारण की इनके द्वारा तृप्ति होना सम्भव नहीं था। महाप्रभु के अंतरंग भक्त श्रीनरहरि सरकार ठाकुर ने भाषा में उनके एक सरस चरित्र की आवश्यकता का विशेषरूप से अनुभव किया था और उसके लिखे जाने की भविष्यवाणी इन शब्दों में की थी- गौरलीला दरशने, इच्छा बड़ हय मने, भाषाय लिखिया सब राखि। मुञी अति अधम, लिखिते ना जानि क्रम, केमन करिया ताहा लिखि॥ ए ग्रन्थ लिखिबे जे, एखनो जन्मे नाइ से, जन्मिते विलम्ब आछे बहु। भाषाय रचना हैले, बुझिबे लोक सकले, कबे वा0छा पुराबेन पहुँ॥ -गौरलीला के दर्शन कर इच्छा होती है कि उसे भाषा में लिख रखूँ। पर मैं अधम। लिखने का क्रम मुझे आता नहीं, लिखूँ कैसे? जो लिखेगा, उसका जन्म अभी नहीं हुआ, उसके प्रकट होने में विलम्ब है। जब भाषा में इस ग्रन्थ की रचना हो जाएगी, तब सब लोग उसे समझ सकेंगे। हा, नाथा! कब मेरी यह वांछा पूर्ण होगी?" नरहरि सरकार की वांछा की पूर्ति का समय भी अब आ गया। श्रीवृन्दावनदास ने "चैतन्य-मंगल" नाम के ग्रन्थ की रचना की। इसका बंगला भाषा में आदि चरित-ग्रन्थ के रूप में सम्मान हुआ। कृष्ण-लीला पर जिस प्रकार श्रीमद्भागवत सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है, उसी प्रकार चैतन्य-लीला पर यह एक श्रेष्ठ ग्रन्थ के रूप में पूजा जाने लगा। इसीलिए श्रीजीवादि वृन्दावन के प्रमुख गोस्वामीगणों ने इसका नाम बदल कर रखा "चैतन्य-भागवत"। इसी समय (सन् 1575 में) लोचनदास ने "चैतन्य-मंगल" नाम का एक और ग्रन्थ लिखा। उसका उतना आदर नहीं हुआ, जितना चैतन्य-भागवत का। पर चैतन्य-भागवत में चैतन्य महाप्रभु की अन्त्य-लीला का वर्णन नहीं था। यह कमी भक्तों को असह्य हुई। उन्होंने मिलकर कृष्णदास कविराज गोस्वामी से चैतन्य महाप्रभु की शेष लीला वर्णन करने का आग्रह किया। कृष्ण दास उस समय बहुत वृद्ध थे और सब तरह से इस कार्य के लिए उपयुक्त होते हुए भी शरीर से लाचार थे। पर वे सभी वैष्णवों के प्रेमपूर्ण आग्रह की अवहेलना न कर सके। श्रीजीव गोस्वामी, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, श्रीलोकनाथ गोस्वामी और श्रीभूगर्भ गोस्वामी का आशीर्वाद ले वे इस पुनीत कार्य में जुट गये। कई वर्ष के लगातार परिश्रम के पश्चात सन् 1581 में उन्होंने चैतन्य-चरितामृत ग्रन्थ समाप्त किया। इस ग्रन्थ को बंगला साहित्य में वही स्थान प्राप्त हैं, जो हिन्दी में रामचरितमानस को। गौड़ीय गोस्वामीगण ने वेद, वेदान्त, श्रुति, स्मृति, पुराणादि शास्त्रों के विशाल समुद्र का मन्थन कर जिस अमृत का निष्कासन किया था, उसका कलश अब पूरा भर चुका था। आवश्यकता थी पिपासुजनों में उसके वितरण की। यह कार्य इतना आसान नहीं था। यह ऐसे लोगों के द्वारा ही हो सकता था, जो स्वयं शास्त्रों के मर्मज्ञ हों, असाधारण भक्ति भाव-सम्पन्न हों, और जो महाप्रभु का प्रियकार्य जान इसे अपना जीवन समर्पित कर सकें। महाप्रभु की इच्छा से ऐसे तीन महापुरुषों का आगमन वृन्दावन में पहले ही हो चुका था। ये थे श्रीनिवासचार्य प्रभु, ठाकुर नरोत्तमदास व श्रीश्यामानन्द, जो रूप-सनातन के अप्राकटय के कुछ ही दिन बाद वृन्दावन आये थे। इन्हें श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्य का परवर्ती अवतार कहा जाता है। प्रेमविलास में पद है- नित्यानन्द छिल जेइ नरोत्तम हइला सेइ, श्रीचैतन्य हइल श्रीनिवास। श्रीअद्वैत जारे कय श्यामानन्द तिहों हय, ऐसे हइला तिनेर प्रकाश॥* श्रीनिवास बंगाल के काटोया नगर निकट चाकन्दी ग्राम के श्रीचैतन्यदास के पुत्र थे। महाप्रभु के आशीर्वाद से उनकी पत्नी श्रीलक्ष्मीप्रिया के गर्भ से उनका जन्म हुआ था (सन् 1518)। महाप्रभु के ही समान उनकी चम्पकगौर अंगकान्ति और भुवनमोहन मूर्ति थी और उन्हीं के समान उनका कृष्ण प्रेम था। 14/15 वर्ष की आयु में वे नीलाचल गये महाप्रभु के दर्शन करने। मार्ग में ही थे, जब महाप्रभु का अन्तर्धान हो गया। शोकोन्मत्त और मृतप्राय अवस्था में उन्होंने नीलाचल में महाप्रभु के अभिन्न कलेवर गदाधर पण्डित की शरण ली। गदाधर पण्डित के पास श्रीमद्भागवत का अध्ययन करना चाहा। पर गदाधर पण्डित के पास जो भागवत ग्रन्थ था, उसके अक्षर उनके अश्रुजल से मिट चुके थे। उनकी आज्ञा से श्रीनिवास भागवत की दूसरी प्रति लेने श्रीखण्ड गये। ग्रन्थ लेकर लौटते समय उन्हें पथ में सम्वाद मिला कि गदाधर पण्डित अप्रकट हो गये। रोते रोते लौट पड़े। नवद्वीप गये नित्यानन्दप्रभु और अद्वैताचार्यप्रभु के दर्शन करने। वे भी उनके नवद्वीप पहुँचने के पूर्व नित्यधाम को जा चुके थे। उन्होंने नवद्वीप में चैतन्यमहाप्रभु की पत्नी विष्णुप्रिया, शान्तिपुर में अद्वैताचार्य की पत्नी सीता देवी और खड़दह में नित्यानछ की पत्नी जाह्नवा ठाकुरानी के दर्शन किये। सबने अपने प्रबोध वाक्यों से उन्हें सान्त्वना दी और वृन्दावन जाने की अनुमति। प्रेमविह्नल अवस्था में उन्मत्त की तरह पदयात्रा करते हुए वे वृन्दावन के लिए चल पड़े, वहाँ सनातन और रूपादि के दर्शन की हृदय में साध लेकर। पर उनकी साध क्या पूरी होनी थी? सनातन और रूप भी उनके वृन्दावन पहुँचने के पूर्व अप्रकट हो चुके थे, जैसे इन सबने श्रीनिवास को दर्शन न देकर और उनके प्रेमपयोधि में बार-बार उफान लाकर उसे चरम सीमा तक पहुँचा देने की ठान रखी हो। उन्होंने जब से नीलाचल की यात्रा आरम्भ की उनके अश्रु बहते ही रहे, जैसे उनका देह विधाता ने अश्रुओं का ही बनाया हो। रोते-रोते उन्होंने वृन्दावन जाकर जीव गोस्वामी का आश्रय लिया। जीव गोस्वामी ने उन्हें गोपालभट्ट गोस्वामी से दीक्षित करवाकर धन्य किया। कुछ दिन बाद राजकुमार नरोत्तम आये। ये उत्तरी बंगाल के गरानहाटी परगना के कायस्थ ज़मीदार राजाकृष्णनन्द राय के एकमात्र उत्तराधिकारी थे। कृष्ण प्रेम में पागल हो घर से निकल आये थे। वृन्दावन में ये जीव गोस्वामी का आश्रय लेकर लोकनाथ गोस्वामी की तनमन से सेवा करने लगे। अपनी सेवा से उन्हें प्रसन्न कर उनके एकमात्र शिष्य हुए। श्यामानन्द भी इसी समय आये। ये उड़ीसा के अन्तर्गत धारेन्दाबाहादुरपुर ग्राम के सद्गोप जाति के एक दरिद्र व्यक्ति के पुत्र थे। बाल्याकाल से ही बड़े कृष्ण-भक्त थे और इनका जीवन बड़े दुख में बीता था। इसलिए इनका नाम पड़ गया था दुखी कृष्णदास। जीव गोस्वामी ने दीक्षा देकर इनका नाम रखा श्यामानन्द। यह तीनों जीव गोस्वामी के निकट शास्त्राध्ययन करने लगे। उन्होंने ही श्रीनिवास को 'आचार्य' की उपाधि दी और उन्हीं के कारण नरोत्तम 'ठाकुर महाशय' के नाम से पुकारे जाने लगे। तीनों एक ही भाव के भावुक युवक होने के कारण ऐसे धुलमिल गये, जैसे वे एक ही आत्मा के तीन प्रकाश हों। तीनों बहुत दिन तक कभी वृन्दावन में, कभी नन्दग्राम, जावट, बरसानादि में कृष्णलीला का अभिनय कर ब्रजवासियों को लीलारस का आस्वादन कराते रहे और स्वयं उसका आस्वादन कर अन्मत्त होते रहें उसी क्रीड़ाकौतुक के बीच एक दिन जब सब भक्तवृन्दा गोविन्ददेव के मन्दिर में भागवत कथा सुनने के लिए एकत्र थे, गोस्वामीगण ने इन तीनों को बुला गौड़ देश में जाकर गौड़ीय ग्रन्थों और उनमें वर्णित विशुद्ध भागवत धर्म का प्रचार करने का आदेश किया। उसी समय गोविन्ददेव के गले से पुष्पमाला टूट कर नीचे गिर पड़ी, जैसे गोविन्ददेव के गले से पुष्पमाला टूटकर नीचे गिर पड़ी, जैसे गोविन्द देव ने भी तत्काल गोस्वामियों के आदेश की पुष्टि कर दी। गोविन्ददेव की जय-जयकार होने लगी। हर्ष और उल्लास से उस वातारण में सबकी दृष्टि इन तीनों में वरिष्ठ श्रीनिवासाचार्य के ऊपर केन्द्रित थी। वे उत्सुकता से उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा कर रहे थे। श्रीनिवासाचार्य बड़े धर्मसंकट में पड़ गये। वे न व्रज छोड़ सकते थे, न गुरुजनों और गोविन्ददेव की आज्ञा का उल्लंघन कर सकते थे। अन्त में उन्हें स्वीकृति देनी पड़ी। इस योजना के पीछे हाथ श्रीजीव गोस्वामी का था। वे अपना मनोरथ सफल होते देख बहुत प्रसन्न हुए और इन तीनों को ग्रन्थराशि के साथ गौड़ भेजने की व्यवस्था करने लगे। उन्होंने अपने भक्तों की सहायता से राजधानी से राजपत्र मँगवाया, जिसमें इन लोगों के ग्रन्थों के साथ वृन्दावन से झाड़िखण्ड होकर जाजपुर जाने की राजाज्ञा थी। दो बैलगाड़ियों की व्यवस्था की, एक श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द के लिए और एक ग्रन्थों के लिए। दस अस्त्रधारी प्रहरियों की व्यवस्था की उनके साथ जाने के लिए। रूप, सनातन, जीव आदि के ग्रन्थ यत्नपूर्वक बांध-बांधकर एक बड़े काष्ठ के बक्स में रखे गये। तीन महाजनों से मार्ग व्यय के लिए आवश्यक धनराशि स्वीकार की गयी। जाने के लिए तिथि निश्चय की गयी अग्रहण मास की शुक्ला पंचवी। उस दिन गोविन्ददेव के मन्दिर के सामने दोनों बैलगाड़ियाँ आकर खड़ी हुई। ग्रन्थों का सन्दूक एक गाड़ी पर यत्नपूर्वक चढ़ाया गया। दूसरी पर श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द को बैठना था। पर उन्हें विदा करने आये थे श्रीजीव, गोपालभट्ट, लोकनाथ, भूगर्भ, राधव पण्डित, यादवाचार्य, परमानन्द भट्टाचार्य, मधु पण्डित, कृष्णदास कविराज, द्विज हरिदास, पंडुरीकाक्ष प्रभृति। व्रजवासियों की भीड़ भी उन्हें विदा करने गोविन्ददेव के मन्दिर पर उमड़ पड़ी थी। इनमें से बहुतों को उनके साथ पैदल मथुरा तक जाना था। इसलिए श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द भी गोविन्ददेव को दण्डवत् प्रणाम कर पैदल ही मथुरा की ओर चल पड़े। हरिनाम की मंगलध्वनि के साथ शोभा यात्रा मथुरा पहुँची। दूसरे दिन श्रीजीव आदि को दण्डवत् कर तीनों ने उनसे विदा ली। श्रीजीव, गोपालभट्ट, लोकनाथ आदि ने एक एक कर आलिंगन के साथ अपने प्रेमाश्रुओं से अभिषकित करते हुए आशीर्वाद देकर उन्हें विदा किया। वे राजपथ से चलते-चलते आगरा होते हुए इटावा पहुँचे। इटावा में राजपथ छोड़कर झाड़िखण्ड के वनपथ से विष्णुपुर राज्य की सीमापर पहुँचे। विष्णुपुर के राजा वीर हाम्वीर की अद्भुत प्रकृति थी। धर्मपरायण और कथा-कीर्तन के प्रेमी होते हुए भी वे लुटेरे थे। अपनी प्रजा का पुत्रवत् पालन करते थे, पर देश की सीमा के बाहर लूट-पाट मचाया करते थे। प्रेमविलास में वर्णन है कि वे दिन में पुराण पाइ करते और रात में चोरी-डकैती- "दिवाय पुराण पाठ, राते चुरि डकैति। पुत्र सम पाले प्रजा, देशेर ना करे क्षति॥" उन्हें सम्वाद मिला कि उनके राज्य की उत्तर-पश्चिम सीमा से कुछ सशस्त्र प्रहरियों के साथ एक रत्नभरी गाड़ी जा रही है। उन्होंने उसी समय सैनिकों को आदेश दिया-"दो सौ सिपाही जाकर उसे लूट लो। पर देखो किसी को जान से न मारना- दुइ रात लोक लइया करह गमन। प्राने नाहि मारिबा आनिबे सब धन॥"* दूसरे दिन सन्ध्या समय श्रीनिवासादि भक्तगण गोपालपुर ग्राम पहुँच कर विश्राम कर रहे थे। रात्रि पर्यन्त कृष्ण कथा कहते-कहते वे सो गये। उसी समय सिपाही आकर सन्दूक उठा ले गये। प्रहरी दो सौ सशस्त्र सिपाहियों के सामने कुछ न कर सके। श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द रोते-रोते पागल हो गये। ग्रन्थों में तो उनके प्राण ही बस रहे थे। ग्रन्थों के लूटे जाने पर वे जैसे प्राणहारा हो गये। श्रीनिवास ने पत्र लिखकर यह दु:सम्वाद जीव गोस्वामी को भिजवाया। पत्र पढ़ते ही उनके दुख की सीमा न रही। लोकनाथ, गोपालभट्ट आदि पर भी विषाद की कालिमा छा गयीं पर सबसे अधिक मर्माहत हुए राधाकुण्डवासी कृष्णदास कविराज। उन्होंने प्राण विसर्जन कर देने का संकल्प किया। एक दिन राधाकुण्ड के तीर पर बैठे रोते-रोते उसमें कूद पड़े। भक्तों ने उन्हें निकाल कर किसी प्रकार उनके प्राण की रक्षा की।[4] जीव गोस्वामी मन ही मन सोचने लगे कि लुटेरे उन ग्रन्थों का क्या करेंगे। निश्चय ही यह घटना प्रभु की किसी लीलाविशेष की पूर्व सूचना है, जिसका रहस्य पीछे खुलने को है। वे कालान्तर में कोई नयी सूचना प्राप्त करने की उत्सुकता से प्रतीक्षा करने लगे। इधर श्रीनिवासाचार्य ने अपने दोनों साथियों से कहा-"तुम्हें दोनों को गोस्वामीगण ने वैष्णव-धर्म के प्रचार का कार्य सौपा है, मुझे मुख्य रूप से ग्रन्थों के प्रचार का। इसलिए तुम दोनों गौड़ जाकर अपना कार्य आरम्भ करो। मैं यहाँ रूक कर ग्रन्थों की खोज करूँगा। यदि ग्रन्थ न मिले तो प्राण त्याग दूँगा।" नरोत्तम और श्यामानन्द बड़ी विषम स्थिति में पड़ गये। वे न तो प्राण से भी अधिक प्रिय अपने वरिष्ठ साथी को छोड़कर जा सकते थे, न उसकी और वृन्दावन के गोस्वामीगण की आज्ञा का उल्लंघन कर सकते थे। अन्त में महाप्रभु की इच्छा जान उन्होंने उनके प्रिय कार्य के लिए गौड़ जाने का निश्चय किया। श्रीनिवासाचार्य प्रभु को वही छोड़ उन्होंने उनके चरणों में प्रणाम कर रोते रोते गौड़ के लिए प्रस्थान किया। श्रीनिवासाचार्य सर्वस्व लुट जाने के पश्चात एक उन्मत्त व्यक्ति की तरह घूम-फिरकर ग्रन्थ-रत्नों की खोज करने लगे। देउली ग्राम के कृष्णवल्लभ नाम के एक ब्राह्मण से उन्हें पता चला कि बीरहाम्बीर के राजमहल में नित्य सन्ध्या समय श्रीमद्भागवत पुराण का पाठ होता है। इससे उन्हें उस पथ का संकेत मिला, जिस पर चलकर ग्रन्थों की खोज ख़बर पाने की कुछ सम्भावना हो सकती थी। वे कृष्णवल्लभ के साथ राजमहल गये पाठ सुनने। रासपञ्चाध्यायी का पाठ चल रहा था। पाठक उलटी-सीधी व्याख्या कर रहे थे। श्रीनिवासाचार्य से किसी एक अंश की व्याख्या का प्रतिवाद किये बिना न रहा गया। उनके मुख से सही व्याख्या सुन सब चमत्कृत रह गये। तब राजा वीर हाम्बीर ने उनसे पाठ करने का आग्रह किया सुयोग पा दूसरे दिन से श्रीनिवासाचार्य पाठ करने लगे। श्रीनिवासाचार्य के मुख से रासपञ्चाध्यायी की असाधारण पांडित्यपूर्ण रस मयी व्याख्या सुन राजा समेत सब दस्यु सरदारों का पाषाण से भी अधिक कठोर हृदय पिघल गया। सभास्थल उनके नेत्रजल से परिपूर्ण हो गया। उन्होंने श्रीमद्भागवत की ऐसी रसमयी व्याख्या पहले कभी नहीं सुनी थी। पाठ के पश्चात वीरहाम्बीर की श्रीनिवासाचार्य से जो बात हुई, उससे ग्रन्थों की चोरो का रहस्य खुल गया। वीरहाम्बीर ने श्रीनिवासाचार्य को ग्रन्थ ही नहीं लौटाए, अपने आपको भी उनके चरणों में समर्पित कर दिया। वे और उनकी प्रजा के अनेक लोग उनसे दीक्षा ग्रहण कर धन्य हुए।[5] विष्णुपुर में भक्ति की गंगा वह निकली। जगह-जगह मन्दिरों का निर्माण हुआ। घर-घर में कृष्ण पूजा और चैतन्य-पूजा का विस्तार हुआ। घर-घर में गौड़ीय ग्रन्थों का पाठ होने लगा, विष्णुपुर गौड़ीय वैष्णव धर्म के प्रचार का प्रमुख केन्द्र बन गया। श्रीसतीशन्द्र मित्र ने लिखा है कि आज भी विष्णुपुर में चैतन्य-चरितामृत आदि ग्रन्थों की जितनी प्राचीन लिपियाँ मिलती हैं, उतनी अन्यत्र कहीं नहीं मिलती।* श्रीनिवासाचार्य ने ग्रन्थों के उद्धार की कहानी जीव गोस्वामी को लिख भेजी। पत्र के साथ वीर हाम्बीर ने ठाकुर सेवा के हेतु एक बैलगाड़ी में फलमूलादि नाना प्रकार की खाद्य सामग्री भेजी। पत्र प्राप्त कर जीव गोस्वामी के हृदय में आनन्द न समा सका। उन्होंने ग्रन्थों की चोरी में प्रभु के किसी गूढ़ उद्देश्य की जो कल्पना की थी, उसके रहस्य का उद्घाटन हो गया। एक कौपीनधारी वैष्णव के द्वारा ग्रन्थों के प्रचार का कार्य बिना वीरहाम्मीर जैसे भक्तिमान राजा के अर्थ और शक्ति की सहायता के सम्भव नहीं था। इसीलिए प्रभु ने यह लीला रची थी। अब प्रचार कार्य सुविधापूर्वक चलते रहने के लिए सब व्यवस्था अपने आप हो गयी। श्रीनिवास राजगुरु रूप से सम्मानित हो ग्रन्थ लेकर गौड़ देश में याजिग्राम पहुँचे। राजगुरु रूप से उन्हें अर्थ की कोई कमी नहीं थी। उनकी अध्यक्षता में खेतरी में एक विराट् उत्सव मनाया गया। बंगाल, बिहार, उड़ीसा और मनीपुर तक के भक्तों ने उसमें योगदान किया। इसके पश्चात संगठित और सुव्यवस्थित रूप से सारा काम चलने लगा। श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द ने गाँव-गाँव में प्रचार कर गौड़ से लेकर नीलाचल तक और पूर्व में मनीपुर तक सारे प्रदेश को नवधर्म का प्रचार कर भक्तिसिक्त कर दिया। गौड़, आसाम और मणिपुर कों नरोत्तम ने विशेषरूप से अपने प्रचार का क्षेत्र बनाया और उड़ीसा में श्यामानन्द प्रचार का संचालन करते रहे वृन्दावन से श्रीजीव। उनके साथ पत्र-व्यवहार बराबर होता रहा। जिन नये-नये ग्रन्थों का प्रणयन होता, उन्हें वे गौड़ भेजते रहते। जिन ग्रन्थों की गौड़ में रचना होती, उन्हें स्वीकृति के लिए उनके पास भेजा जाता। उनकी स्वीकृति प्राप्त करने पर या उनके आदेशानुसार ग्रन्थों के संशोधित होने पर ही उनका प्रचार किया जाता। जो भी उत्सव, अनुष्ठान आदि होते, उनकी सूचना उन्हें भेजी जाती। किसी विशेष परिस्थिति में मार्ग-दर्शन के लिए उनसे प्रार्थना की जाती। वृन्दावन की दूरी और अपनी व्यस्तता के कारण श्रीनिवास, नरोत्तम और श्यामानन्द का बार-बार वृन्दावन जाना सम्भव नहीं था। फिर भी श्रीनिवासाचार्य दो बार और श्यामानन्द एक बार और वृन्दावन जा सके। तिरोभाव महाप्रभु का शेष कार्य, जो रूप सनातन जीव गोस्वामी के लिए छोड़ गये थे, अब पूरा हो चुका। उसके साथ ही जीव गोस्वामी का जीवन काल भी पूरा हुआ। सन् 1608 के पौष मास की शुक्ला तृतीया के दिन उनका तिरोभाव हुआ। राधादामोदर के मन्दिर के प्रांगण में उनकी समाधि रखी गयी [6] जब तक भारत के वैष्णव-धर्म की विजयपता का फहराती रहेगी, जब तक सर्व सिद्धान्त सार, सर्वशास्त्र-शिरोमणि श्रीमद्भागवत के भक्ति सिद्धान्त और दर्शन की आलोचना होती रहेगी, तब तक विश्व के आकाश पर श्रीजीव गोस्वामी की उज्ज्वल कीर्ति छायी रहेगी। टीका टिप्पणी और संदर्भ ↑ "भक्तिर्हि भक्तकोटि प्रविष्टतदाद्रीभावयितृतच्छक्ति विशेष इति विवृतं विवरिष्यते च"-भगवान की जो शक्ति में प्रविष्ट होकर आद्रिभाव उत्पन्न करती है, वही भक्ति नाम से पहले पुकारी गयी है। (भ0स0 180) ↑ प्रिय व्यक्ति के निकट होने पर भी अतिशय प्रेम के कारण प्रिय से विच्छेद के भय से जो आर्ति उत्पन्न होती है, उसे प्रेम-वैचित्य कहते हैं। ↑ अश्रु-कम्पादि आठ प्रकार के सात्विकभाव जब परमोत्कर्ष को प्राप्त हो एक साथ उदय होते हैं, तो उसे सुदीप्त या महाउद्दीप्त सात्विकभाव कहते हैं। ↑ नित्यानन्ददास के प्रेम-विलास' में उल्लेख है कि राधाकुण्ड में कूदने के साथ ही कृष्णदास कविराज के प्राण निकल गये। यदुनन्दनदास के 'कर्णनाद' नामक ग्रन्थ में उल्लेख है कि उस समय उनकी मृत्यु नहीं हुईं। कर्णानन्द ग्रन्थ की रचना हुई ग्रन्थों की लूट के 26 वर्ष बाद सन् 1607 में। प्रेमविलास की रचना हुई उससे 7 वर्ष पूर्व सन् 1600 में। इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि प्रेमविलास का मत ही ठीक है। पर वृन्दावन शोध-संस्थान को जो जीव गोस्वामी की संकल्पपत्री पससद्ध प्राप्त हुई है उस पर तारीख पड़ी है सम्वत् 1663 (सन् 1606)। उसकी पीठ पर जो परपिष्टलिपि है उस पर तारीख है सम्वत् 1665 (सन् 1608)। उस पर श्रीकृष्णदास कविराज के साक्षी रूप में हस्ताक्षर हैं। इससे श्रीकृष्णदास कविराज का सन् 1608 तक प्रकट रहना सिद्ध है। ↑ दीक्षा के पश्चात श्रीनिवासाचार्य ने वीरहाम्वीर का नाम रखा 'हरिचरणदास'। पीछे जीव गोस्वामी ने उनका नाम रखा 'चैतन्यदास'। वीरहाम्वीर के पुराण-पाठक ने भी श्रीनिवासाचार्य से दीक्षा ली और उनका नाम हुआ 'व्यासाचार्य'। ↑ डा॰ सुशीलकुमार देने History of Sanskrit Poetics (p. 256) में, नगेन्द्रनाथ बसु ने विश्वकोष (पृ0 109) में और हरिलाला चट्टोपाध्याय ने वैष्णव इतिहास (पृ0 63) में जीव गोस्वामी का तिरोभाव सन् 1618 में लिखा है। श्रीसतीशचन्द्र मित्र ने सप्त-गोस्वामी ग्रन्थ (पृ0 258) में उनका तिरोभाव सन् 1590 में लिखा है। पर वृन्दावन शोध-संस्थान में सुरक्षित जीव स्वामी की 'संकल्पपत्री' (Will) की परशिष्ट लिपि (Post script verso) जो अन्त समय में संकल्पपत्र में जोड़े गये अंश (Codicil) के रूप में है, सन् 1608 की है। इससे स्पष्ट है कि उनका तिरोभाव सन् 1608 में हुआ।

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*भाईजी का नोहरा जहां प्रतिदिन सत्संग हुआ करता था, एक स्वच्छता करने एक गरीब ब्राह्मणी आती थी।* बुढ़िया की मृत्यु के समय: भाईजी इस बुढ़िया की हाथ की नाड़ी थामे हंस रहे थे। भाईजी की यह हंसी भी अपार कृपामयी थी। भगवद्भक्त शिरोमणि भाईजी के नोहरे की झाड़ू-बुहारी सेवा करने मात्र से वह बुढ़िया निहाल हो गई। उसका मानव-देह धारण करना सफल हो गया था। *बुढ़िया ने प्रतिदिन महाप्रेमीशिरोमणि भाईजी की चरणरज से अपने को पवित्र किया था*। अतः वह परम कृतकृत्य हुई, भाईजी के ही रूप में भगवान के दर्शन करती हुई, निष्कंटक भगवद्धाम को गयी। केडियाजी! इस बुढ़िया ने मेरी आंखे खोल दी। वह मुझे कहा करती थी कि बाबा! नदी में तैरनेवाले मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक बात होती है-हाथों और पैरों से नदी के जल को फैंकते जाना। जो निरन्तर जल को काट नहीं सकता, वह नया तैरनेवाला नदी के पार नहीं जा सकता। इसी प्रकार इस महाभयावनी दुस्तर माया-नदी को तैरकर जो उस पार भगवतलोक को जाना चाहते हैं उन्हें अहंकार और विषयाशक्ति रूपी जल को बराबर अलग फैंकते रहना चाहिए। जो अहंकार और आसक्ति दूर नहीं फेंक सकता, वह इस मायानदी के जल में रमकर अतल तल में डूब जाएगा। परन्तु इस मायानदी में इतने भीषण भंवर पड़ते हैं कि हाथ-पैर मारते रहने पर भी उनके थक जाने की अथवा श्वास टूट जाने की संभावना बहुत ही अधिक रहती है। अतएव बीच-बीच मे बाबा! आलम्बन, कोई (आसरा) सहारा चाहिए, जहां कुछ देर ठहरकर कोई विश्राम करले। *इन भाईजी जैसे संतो की चरणरज के सहारे से (बल से) मुझे तो तैरना पड़ा ही नहीं। मैं तो इन महापुरुष की कृपा-रूपी सुदृढ़ नाव पर सवार होकर अनायास ही भवसागर से तर गयी।* बुढ़िया के भाव यही थे, यद्यपि यह भाषा मेरे द्वारा परिशुद्ध की गयी है। *महाभाव दिनमणि*

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🍃 आज गौड़ीय वैष्णवाचार्य रसिक कुल मुकुटमणि श्री रूपकवीश्वर गोस्वामी जी महाराज ( 1624 - 1684 ) की तिरोभाव महोत्सव है । 🍃 बड़ी सूरमाकुञ्ज वृन्दावन में विविध आयोजनों के साथ उत्सव मनाया जा रहा है ।। 💐 इनका संक्षिप्त चरित्र नीचे प्रस्तुत किया गया है -- श्रीरूपकवीश्वर गोस्वामी जी ने अपनी विद्वता एवं अमृतमयी वाणी के द्वारा जगत में कृष्ण भक्ति का प्रचार किया । पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के अंतर्गत सैदाबाद ग्राम में इनका जन्म हुआ । सोलह वर्ष की आयु में ब्रज धाम आकर श्रीमुकुंददास जी से दीक्षा एवं वेष ग्रहण किया । ग्रंथों का अध्ययन करके जगत विद्वान की उपाधि से अलंकृत हुए । अनेक नगरों में मंदिर बनवाकर श्रीविग्रह की प्राण प्रतिस्ठा करवाई । जयपुर में स्वकीया - परकीया भाव के विषय मे विवाद हुआ जिसमें इन्होंने अपनी विद्वता से सभी विद्वानों को सन्तुष्ट किया, इसलिए जयपुर नरेश ने इन्हें 'सूरमा' की उपाधि प्रदान की । श्री रूपकवीश्वर जी अपने श्री गुरुदेव भगवान की प्राणभरी सेवा करते थे । गोस्वामी श्रीमुकुंददास जी अति वृद्ध हो चुके थे । अब स्वयं श्री राधानयनानंदजी की सेवा सुचारु रूप से नहीं कर पा रहे, रूपकवीश्वर जी की तीव्र भजन निष्ठा तथा गाढ़ानुराग देखकर उन्हें अपने प्राणाराध्य श्री राधानयनानंदजी की सेवा सौंप दी । श्रीगुरुसेवा के साथ भगवद सेवा प्राप्त करके रूपकवीश्वर जी प्रेम में विभोर हो गये । ये नित्य छः घड़ी रात्रि रहते उठकर अपनी स्नानादि नित्य क्रिया कर लेते । तत्पश्चात श्री गुरुजी को पाद संवाहन करते हुए जगाकर शौच को ले जाते अपने हाथों से अंगमार्जन तथा स्नानादि कराते। प्रतिदिन दोनों संध्या गुरु की सात बार परिक्रमा लगाते एवं 100 बार साष्टांग प्रणाम करते। भगवद बुद्धि से श्री गुरुदेव भगवान की परम भक्तिभाव पूर्वक सेवा करते । साथ - साथ चलती श्री राधानयनानंद जी की प्रेमभरी सेवा ।। रूपकवीश्वर जी नगर नगर में भक्ति का प्रचार करते रहे। महाप्रभुजी की सभी लीला स्थलियों के दर्शन के पश्चात नयनानंद जी के आग्रह पर ' थुरिया ' नामक ग्राम में रुक गये। विजयादशमी के पूर्व नवमी के दिन अपने अंतरंग शिष्यों से बोले - कल हम वृन्दावन जायेंगे। इस रहस्य को किसी ने नहीं समझा। उस दिन उपवास रहकर रात्रि में थोड़ा सा दूध प्रसाद पीकर संकीर्तन करते रहे । प्रातःकाल होते ही संकीर्तन के बीच में से अचानक अंतर्धान हो गये। उसी रात स्वप्न में शिष्यों से कहा - ' में वृन्दावन की नित्य निकुंज में आ गया हूँ तुम दुःखी मत हो '। उसी दिन वृन्दावन में सन्तों ने सूरमाकुंज में उन्हें बैठे भजन करते हुए देखा ।

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पूरा नाम सनातन गोस्वामी जन्म 1488 ई. मृत्यु 1558 ई. अभिभावक कुमारदेव (पिता), मुकुन्ददेव (पितामह) कर्म भूमि वृन्दावन (मथुरा) मुख्य रचनाएँ 'श्रीकृष्णलीलास्तव', 'वैष्णवतोषिणी', 'श्री बृहत भागवतामृत', 'हरिभक्तिविलास' तथा 'भक्तिरसामृतसिंधु' आदि की रचना की। प्रसिद्धि सन्त, कृष्ण-भक्त विशेष योगदान वृन्दावनधाम का पहला 'मदनमोहन जी मन्दिर' सनातन गोस्वामी ने ही स्थापित किया था, उसकी सेवा भी वे स्वयं करते थे। नागरिकता भारतीय संबंधित लेख चैतन्य महाप्रभु, रूप गोस्वामी, चैतन्य सम्प्रदाय, वैष्णव सम्प्रदाय, वृन्दावनदास ठाकुर, कृष्णदास कविराज, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी अन्य जानकारी सनातन ने भक्ति सिद्धान्त, वृन्दादेवी मन्दिर तथा श्रीविग्रह की स्थापना की तथा वैष्णव-स्मृति ग्रन्थ का संकलन कर वैष्णव सदाचार का प्रचार किया। वृन्दावन पहँचकर सनातन ने अपनी अंतरंग साधना के साथ महाप्रभु द्वारा निर्दिष्ट 'लीलातीर्थ उद्धार', 'कृष्ण-भक्ति प्रचार' और 'कृष्ण-विग्रह-प्रकाश' आदि का कार्य भी आरम्भ किया। सनातन गोस्वामी (1488-1558 ई.) चैतन्य महाप्रभु के प्रमुख शिष्य थे। उन्होंने 'गौड़ीय वैष्णव भक्ति सम्प्रदाय' के अनेकों ग्रन्थों की रचना की थी। अपने भाई रूप गोस्वामी सहित वृन्दावन के छ: प्रभावशाली गोस्वामियों में वे सबसे ज्येष्ठ थे। परिचय सनातन गोस्वामी कर्णाट श्रेणीय पंचद्रविड़ भारद्वाज गोत्रीय यजुर्वेदी ब्राह्मण थे। इनके पूर्वज कर्णाट राजवंश के थे और सर्वज्ञ के पुत्र रूपेश्वर बंगाल में आकर गंगा नदी के तट पर स्थित बारीसाल में बस गए। इनके पौत्र मुकुंददेव बंगाल के नवाब के दरबार में राजकर्मचारी नियत हुए तथा गौड़ के पास रामकेलि ग्राम में रहने लगे। इनके पुत्र कुमारदेव तीन पुत्रों अमरदेव, संतोषदेव तथा वल्लभ को छोड़कर युवावस्था ही में परलोक सिधार गए, जिससे मुकुंददेव ने तीनों पौत्रों का पालन कर उन्हें उचित शिक्षा दिलाई। इन्हीं तीनों को श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रमश: 'सनातन', 'रूप' तथा 'अनुपम' नाम दिया। जन्मतिथि सनातन गोस्वामी की जन्मतिथि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ कहना सम्भव नहीं जान पड़ता। डा. दीनेशचन्द्र सेन ने उनका जन्म सन् 1492 में बताया है।[1] और भी कई विद्वानों ने डा. सेन का अनुसरण करते हुए उनका जन्म सन् 1492 या उसके आस-पास बताया। पर डा. सतीशचन्द्र मित्र ने उनका जन्म सन् 1465 (सं0 1522) में लिखा हैं। यही ठीक जान पड़ता है, क्योंकि महाप्रभु जब रामकेलि गये, उस समय सनातन गोस्वामी हुसैनशाह के प्रधानमन्त्री थे। महाप्रभु की आयु उस समय 28/29 वर्ष की थी। महाप्रभु का आविर्भाव हुआ 1486 में। वे रामकेलि गये सन्न्यास के पंचम वर्ष सन् 1514 या 1515 में। इस हिसाब से सनातन गोस्वामी की आयु डा. सेन के मत के अनुसार उस समय 23 वर्ष की होती। रामकेलि में महाप्रभु से मिलने के कई वर्ष पूर्व वे प्रधानमन्त्री हुए होंगे।[2] उस समय उनकी आयु केवल 18/19 वर्ष की या उससे कम होगी और रूप गोस्वामी की उससे भी कम, जो विश्वास करने योग्य नहीं। यदि उनका जन्म मित्र महाशय के अनुसार सन् 1465 में माना जाय, तो उनकी उम्र रामकेलि में महाप्रभु से उनके मिलने के समय 49।50 की होती है, जो प्रधानमन्त्री पद के लिए ठीक लगती है। शिक्षा सनातन गोस्वामी के पितामह मुकुन्ददेव दीर्घकाल से गौड़ राज्य में किसी उच्च पद पर आसीन थे। वे रामकेलि में रहते थे। उनके पुत्र श्रीकुमार देव बाकलाचन्द्र द्वीप में रहते थे। कुमारदेव के देहावसान के पश्चात मुकुन्ददेव श्रीरूप-सनातन आदि को रामकेलि ले आये। उन्होंने रूप-सनातन की शिक्षा की सुव्यवस्था की। उन्हें प्रारम्भिक शिक्षा दिलायी रामभद्र वाणीविलास नामक एक पंडित से। उसके पश्चात उन्हें भेज दिया नवद्वीप, जो उस समय शिक्षा का सबसे बड़ा केन्द्र था। वहाँ कुछ दिन प्रसिद्ध नैयायिक श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य से न्याय-शास्त्र की शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात वे उनके छोटे भाई विद्यावाचस्पति[3] की टोल में पढ़ने लगे। विभिन्न भाषाओं और शास्त्रों के अध्ययन में तत्पर रहते हुए भी सनातन गोस्वामी प्रारम्भ से ही श्रीमद्भागवत में विशेष रुचि रखते थे। श्रीजीव गोस्वामी ने लघुवैष्णवतोषणी के अन्त में दी हुई। वंशपरिचायिका में उल्लेख किया है कि उन्हें बाल्यावस्था में स्वप्न में एक ब्राह्मण द्वारा श्रीमद्भागवत की एक प्रति प्राप्त हुई थी और प्रभात होने पर उसी ब्राह्मण ने वही प्रति उन्हें भेंट की थी। तभी से वे नियमित रूप से श्रीमद्भागवत का पाठ किया करते थे। महाप्रभु से मिलन सनातन गोस्वामी का महाप्रभु से मिलन काशी में हुआ। जब वे काशी पहुँचे, तब उन्हें सुसंवाद मिला कि महाप्रभु वृन्दावन से लौटकर कुछ दिनों से काशी में चन्द्रशेखर आचार्य के घर ठहरे हुए हैं। उनके नृत्य-कीर्तन के कारण काशी में भाव-भक्ति की अपूर्व बाढ़ आयी हुई है। यह सुन उनके आनन्द की सीमा न रही। दूसरे ही क्षण दीन-हीन वेश में वे चन्द्रशेखर आचार्य के दरवाज़े पर उपस्थित हुए। उनके प्राण महाप्रभु के दर्शन के लिये छटपट कर रहे थे, पर वे अपने को दीन और अयोग्य जान भीतर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे। महाप्रभु को अपने प्राण-सनातन के आगमन की ख़बर पड़ गयी। प्राण-प्राण से मिलने को भाग पड़े। उच्च स्वर से 'हरे कृष्ण' हरे कृष्ण' कहते सनातन को उनका मधुर कण्ठस्वर पहचानने में देर न लगी। उन्होंने जैसे ही सिर ऊँचा किया तो देखा कि उनके प्राण धन श्रीगौरांग कनक-कान्ति सी दिव्य छटा विखरते, प्रेमाश्रुपूर्ण नेत्रों से उनकी ओर एकटक निहारते, भाव गदगद कण्ठ से मेरे सनातन! मेरे प्राण! कहते, दोनों भुजायें पसारे उन्हें आलिंगन करने उनकी ओर बढ़े आ रहे हैं! सनातन चिरअपराधी की तरह उनके चरणों में लोट गये। उन्होंने झट उठाकर हृदय से लगाना चाहा। पर सनातन छिटककर अलग जा खड़े हुये और हाथ जोड़कर कातर स्वर कहने लगे-'प्रभु, मैं नीच, पामर, विषयी, यवनसेवी आपके स्पर्श करने योग्य नहीं। मुझे न छुएँ।" "नहीं, नहीं, सनातन। दैन्य रहने दो। तुम्हारे दैन्य से मेरी छाती फटती है। तुम अपने भक्तिबल से ब्रह्मांड तक को पवित्र करने की शक्ति रखते हो। मुझे भी अपना स्पर्श प्राप्त कर धन्य होने दो।" कहते-कहते महाप्रभु ने सनातन को अपनी भुजाओं में भर नेत्रों के प्रेमजल से अभिषिक्त कर दिया। चन्द्रशेखर से महाप्रभु ने कहा सनातन का क्षौर करा उनका दरवेश-वेश बदलने को। चन्द्रशेखर ने क्षौर और गंगा-स्नान करा उन्हें एक नूतन वस्त्र पहरने को दिया। सनातन ने उसे स्वीकार करते हुए कहा-" यदि मेरा वेश बदलना है तो मुझे अपना व्यवहार किया कोई पुराना वस्त्र देने की कृपा करें।" तब मिश्रजी अपना व्यवहार किया एक पुराना वस्त्र ले आये। सनातन ने उसके दो टुकड़े कर डोर –कौपीन और वर्हिवास के रूप में उसे धारण किया। तभी से गौड़ीय-वैष्णवों में वैराग्य वेश की प्रथा प्रारम्भ हुई। जो अब तक चली आ रही है। वृन्दावन आगमन दो महीने तक सनातन को अपने घनिष्ठ सान्निध्य में रखने के बाद और वैष्णव-सिद्धान्त में निष्णात करने के पश्चात चैतन्य महाप्रभु ने उनसे कहा- "सनातन, कुछ दिन पूर्व मैंने तुम्हारे भाई रूप को प्रयाग में कृष्ण रस का उपदेश कर और उसके प्रचार के लिए शक्ति संचार कर वृन्दावन भेजा है। तुम भी वृन्दावन जाओ। तुम्हें मैं सौंप रहा हूँ चार दायित्वपूर्ण कार्यो का भार। तुम वहाँ जाकर मथुरा मण्डल के लुप्त तीर्थों और लीला स्थलियों का उद्धार करो, शुद्ध भक्ति सिद्धान्त की स्थापना करो, कृष्ण-विग्रह प्रकट करो। और वैष्णव-स्मृति ग्रन्थ का संकलन कर वैष्णव सदाचार का प्रचार करो।" इसके पश्चात कंगालों के ठाकुर परम करुण गौरांग महाप्रभु ने दयाद्र चित्त से, करुणा विगलित स्वर में कहा- "इनके अतिरिक्त एक और भी महत्त्वपूर्ण दायित्व तुम्हें संभालना होगा। मेरे कथा-कंरगधारी कंगाल वैष्णव भक्त, जो वृन्दावन भजन करने जायेगें, उनकी देख-रेख भी तुम्हीं को करनी होगी।" सनातन ने कहा- "प्रभु! यदि मेरे द्वारा यह कार्य कराने हैं, तो मेरे मस्तक पर चरण रख शक्ति संचार करने की कृपा करें।" महाप्रभु ने सनातन के मस्तक पर अपना हस्त कमल रख उन्हें आर्शीवाद दिया। जब महाप्रभु की आज्ञा शिरोधार्य कर सनातन ब्रज जाने के लिये महाप्रभु से विदा हो रहे थे, तब उनके प्राण उनके चरणों से लिपटे थे। वे उन्हें जाने कब दे रहे थे? पैर आगे बढ़ते-बढ़ते पीछे लौट रहे थे। जाते-जाते वे अश्रुपूर्ण नेत्रों से बार-बार महाप्रभु की ओर देख रहे थे और मन ही मन कह रहे थे, न जाने कब फिर उनका भाग्योदय होगा। कब फिर करुणा और प्रेम की उस साक्षात मूर्ति के दर्शन कर वे विरहाग्नि से जर-जर अपने प्राणों को शीतल कर सकेगें। सनातन जब वृन्दावन की ओर चले उसी समय रूप और बल्लभ उनसे मार्ग में मिलने के उद्देश्य से वृन्दावन से प्रयाग की ओर चले। पर दोनों का मिलन न हुआ, क्योंकि सनातन गये राजपथ से, रूप और वल्लभ आये दूसरे पथ से गंगा के किनारे-किनारे। ब्रजधाम पहुँचते ही सनातन गोस्वामी ने पहले सुबुद्धिराय से साक्षात् किया, फिर लोकनाथ गोस्वामी और भूगर्भ पण्डित से, जो महाप्रभु के आदेश से पहले ही ब्रज में आ गये थे। तत्पश्चात उन्होंने यमुना-पुलिन पर 'आदित्य टीला' नाम के निर्जन स्थान में रहकर एकान्त भजन-साधन, त्याग और वैराग्य का जीवन आरम्भ किया।

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