संतमहापुरुष

🔔 श्रीरघुनंदन ठाकुर जी की तिरोभाव तिथि पर विशेष श्रीकृष्ण के प्रियनर्म सखा होकर व्रज में श्रीराधामाधव जी की लीला में सहायता करने वाले प्रद्युम्न जी, श्रीचैतन्य लीला में रघुनन्दन बने हैं......... श्रीरघुनंदन जी के पिताजी का नाम श्रीमुकुंद दास है। श्रीमुकुंद दास अपने घर पर भगवान गोपीनाथ जी की सेवा करते थे। एक बार उनको किसी कार्य के लिए बाहर जाना था। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र रघुनन्दन को कहा कि आज तुम गोपीनाथ जी को भोग लगवा देना। रघुनन्दन अभी बचपन की बाल्य अवस्था में थे , सो सरल भाव से गोपीनाथ जी को बोलने लगे खाओ......... लो खाओ .....लो खाओ......गोपीनाथ जी तो प्रेम के वश में हैं ,उन्होंने सारा भोग खा लिया। जब मुकुंद दास जी लौटे और प्रसाद के लिए पूछा तो रघुनंदन जी ने कहा वो तो गोपीनाथ जी सारा खा गए। यह सुनकर मकुन्द जी विस्मित हो गए। फिर किसी और दिन वह रघुनंदन जी को सेवा देकर खुद मंदिर के बाहर छिप गए। इधर बड़ी प्रसन्नता के साथ रघुनंदन जी ने अपने हाथ से गोपीनाथ जी को लड्डू दिया। श्रीगोपीनाथ जी ने जब आधा लड्डू खा लिया तो उसी समय श्री मुकुंद जी कमरे में देखने के लिए आ गए। आधा लड्डू जो बच गया था ,उसे श्रीगोपीनाथ जी ने नहीं खाया। यह देखकर मुकुंद जी प्रेम में विभोर हो गए और अति प्रसन्न होकर रघुनन्दन को गोद में उठा लिया। कौन ऐसा है जो ऐसे परम वैष्णव का यश नही गायेगा।

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🌷 *तर्क का विषय नहीं भगवान* 🌷 *(भगवान की मधुमय लीला)* *🌅अंतर्यामी भगवान तो सर्वत्र हैं, निर्गुण-निराकार हैं, सत्ता-स्फूर्ति देते हैं लेकिन ऐसा भगवान भी चाहिए जो आप न चाहो फिर भी आपकी कोहनी मार के जगा दे, ठेंगा दिखाकर हिला दे, कुछ-न-कुछ करके आपके अंदर छुपा अपना रसीला स्वभाव जगा दे।* *🌹आपको भगवान की यह लीला सुनकर उन पर हँसी आयेगी। तुम्हें खूब पेट भर के हँसना होगा, पेट भर के प्यारे को प्यार करना होगा – ʹमेरे दाता ! कन्हैया ! ओ प्यारे !!…ʹ* *🌹मुजफ्फरनगर (उ.प्र.) में उड़िया बाबा सत्संग कर रहे थे। किसी ब्राह्मण के यहाँ ठहरे थे। उधर आने-जाने वाले एक ठाकुर पर उऩकी नजर पड़ी। वह बाबा के पास आया, वार्तालाप हुआ। वह कट्टर आर्यसमाजी था और माला घुमाता था। दोनों बातें विरुद्ध थीं।* *🌹बाबा ने पूछ लियाः “भाई ! तू तो आर्य समाजी है और माला पर ʹवासुदेवʹ का जप कर रहा है ? आर्यसमाजी लोग तो कृष्ण के नाम पर उनके भक्तों को खरी-खोटी सुनाते हैं और तू ʹૐ नमो भगवते वासुदेवायʹ करता है ?”* *🌹वह बोलाः “मैं भी खूब गालियाँ देता था।”* *🌹“फिर अब कृष्ण की माला क्यों घुमाते हो ?”* *🌹वह पहलवान ठाकुर उड़िया बाबा को बोलता हैः* *🌹बाबा ! मैं आपको आपबीती बताऊँगा न, तो आप भी मेरे पर हँसोगे। पहले 8-10 वर्ष की उम्र में तो मेरे को ऋषि दयानंद के दर्शन हुए थे। उनका ब्रह्मचर्य और सत्यनिष्ठा देखकर मैं तो बन गया आर्यसमाजी ! सुने सुनायें कि श्रीकृष्ण ऐसे हैं – वैसे हैं… ब्रह्मचारी के लिए श्रीकृष्ण की लीलाएँ भौहें चढ़ाने जैसी होती है। तो मैं भी भौहें चढ़ाता रहा, नाक-भौं सिकोड़ता रहा तथा कृष्ण को और कृष्णभक्तों को खरी-खोटी सुनाता रहा। अब भी आर्यसमाजी तो हूँ लेकिन मेरे साथ जो बीती है भगवान करे सबके साथ बीते।* *🌹मैं 23 साल का था तब काशी गया। वहाँ एक ठाकुर साहब थे। मैं तो जाति का ठाकुर हूँ लेकिन वे रियासतों के ठाकुर साहब थे। उनको किसी पहलवान की जरूरत थी। उन्होंने मेरे को अपने पास रख लिया। मुझे काम-धंधा मिल गया। उनके यहाँ श्रीकृष्ण का मंदिर बना हुआ था और पुजारी भी बड़े प्रेम से श्रीकृष्ण की पूजा करते थे। मैं तो ठाकुर साहब के यहाँ काम करता, दिन में तीन बार संध्या करता, यज्ञ-वज्ञ करता और बाद में समय मिले तो बस, कृष्ण और उनके भक्तों को कोसता। रात को आर्यसमाज में जाता और कृष्ण के लिए खरी-खोटी वाला भाषण करता।* *🌹ठाकुर साहब और उनके मंदिर के पुजारी कृष्णभक्त थे। इस कारण मैं पुजारी को भी सुना दिया करता थाः “तुम मूर्ति को मानते हो, पत्थर को मानते हो। यह अंधश्रद्धा है। ईश्वर निराकार है। ये है-वो है…” जो कुछ भी आता, मैं पुजारी जी को भी कोसता, श्रीकृष्ण को भी कोसता लेकिन ठाकुर साहब और पुजारी जी मुझे बड़ा स्नेह करते थे। फिर भी मेरे मन में कृष्णभक्तों के लिए और कृष्ण के लिए नाराजगी के, नफरत के जो संस्कार डाल दिये गये थे, वे उछल-उछल के मुझसे कुछ-की-कुछ बड़बड़ाहट कराते थे। एक शाम को मैंने पुजारी जी को इतना कोसा कि गालियाँ तक दे डालीं। मैंने भगवान के विरुद्ध ऐसी कड़वी बातें कहीं कि पुजारी जी की आँखों से अश्रुधाराएँ बहने लगीं। वे बहुत व्यथित होकर वहाँ से चले गये।* *🌹रात को रोज की तरह मैं जमीन पर सोया था, पुजारी जी तख्त पर सोये थे। अचानक मेरी आँखें खुली और मुझे तख्त के उस तरफ सूर्य का सा प्रकाश दिखा। देखा कि तख्त के पास एक छोरा खड़ा है और उसके शरीर से दिव्य प्रकाश निकल रहा है। मैंने कहाः “तू इधर कहाँ से आया है ? मेरा लौटा-अँगोछा कहाँ है ? जल्दी ले आ !”* *🌹वह बालक 10-12 साल का था और मेरा मजाक उड़ाते हुए हँस रहा था। उसने मुझे ठेंगा दिखाया, ʹले…..ʹ इतने से वह रूका नहीं, फिर जिह्वा भी निकाली, ʹओ….ʹ* *🌹मैं बोलाः “ऐ तू पहलवान ठाकुर के सामने ऐसा करता है ? तू क्या समझता है, अपने को ! हाथ पकड़कर तेरा ठेंगा मसल दूँगा, दिन के तारे दिखा दूँगा।”* *उसने फिर से ठेंगा दिखाया, ʹले…* *🌹मेरे गुस्से का तब कोई नियंत्रक था नहीं। मैं तो स्वभाव से ही गुस्सेबाज था, पहलवान भी था। मैंने कहाः “या तो तू रहेगा या तो मैं रहूँगा। इतनी सुबह-सुबह को न अन्न, न जल और तू ठेंगा दिखाता है ! मेरी बात मानता नहीं, ऊपर से ठेंगा दिखाता है !”* *🌹उसने फिर से ठेंगा दिखाया। मैं उसको पकड़ने ज्यों तख्त के नजदीक गया, त्यों वह तख्त की उस तरफ… वह आगे, मैं पीछे…. तख्त को चक्कर लगाते रहे। वह मेरे हाथ में ही नहीं आवे और मैं कुछ का कुछ बोलूँ। तो पुजारी जी और आसपास के लोग जग गये और पूछने लगेः “अरे पहलवान ! तुमको क्या हुआ है ? अरे ठाकुर ! तुमको क्या हुआ है ?”* *🌹“मुझे क्या हुआ ? यह कितनी बदमाशी कर रहा है ! आज का छोरा हमारे जैसे पहलवानों के मुँह लगे !”* *“कौन सा छोरा ?”* *🌹“आपको दिखता नहीं ! देखो, पकड़ने जाता हूँ तो भागता है, फिर कोशिश करता हूँ तो भागता है…. इसको पकड़ो ! पकड़ो इसको !!”* *🌹“ठाकुर ! तुमको क्या हो गया है ?”* *🌹“अरे, क्या हो गया उससे पूछो न ! मेरे को ठेंगा दिखाता है। अभी वह ठेंगा पकड़ के ऐसा मसलूँगा, ऊपर फैंकूँगा।”* *🌹मैं उसके पीछे-पीछे दौड़ूँ और चिल्लाऊँ- “वह देखो दौड़ता है।” मैं तख्त के चारों तरफ घूमूँ और वह मुझे ठेंगा दिखाता जाय, किसी को दिखे नहीं। ʹले…ʹ करके कभी जीभ दिखाये, कभी ठेंगा दिखाये। मैं रुकूँ तो वह रुक जाय, मैं भागूँ तो वह भागे। मैं थक गया। आखिर देखा कि वह बालक जा के पुजारी जी की गोद में बैठ गया और अंतर्धान हो गया। उस प्रकाश से सुबह समझकर मैं लोटा-अँगोछा माँग रहा था लेकिन घड़ी देखी तो रात्रि का एक बजा था। ज्यों वह बालक अंतर्धान हुआ त्यों सवेरा रात्रि में बदल गया।* *🌹लोगों ने बोलाः “तू श्रीकृष्ण को कोसता है न ! उन्होंने कृपा करके तुमको यह लीला दिखायी है।”* *🌹“मैं नहीं मानता हूँ ऐसे तुम्हारे गाय चराने वाले को। लीला है, ये है-वो है… तुम भगतड़ों की बातों में मैं आऩे वाला नहीं हूँ। ऐसी बातों से मैं कृष्ण को भगवान नहीं मान सकता। हाँ, अब मैं पुजारी जी को गाली नहीं दूँगा, कृष्ण को भी गाली नहीं दूँगा।”* *🌹कुछ दिन बीते-न-बीते तो ठाकुर साहब का छोरा, जो 3-4 महीने से ननिहाल गया था, मैंने देखा कि वह मंदिर में खड़ा है। वह भी 12-13 साल का ही था।* *🌹मैंने पूछाः “अरे, तू तो ननिहाल में गया था, कब आया ? इधर क्यों खड़ा है ?”* *🌹बालकः “मैं तो कल ही आ गया था।”* *🌹“अरे ! मैं दिन भर तुम्हारे घर में रहता हूँ, कल ही आये तो मेरी आँखों को तुमने क्या पट्टी बाँध दी थी ? आज यहाँ मंदिर में दिखे हो, किसको उल्लू बना रहे हो बेटे !”* *🌹वह बोलाः “बेटे-वेटे क्या ! मैं तो सबका बाप-का-बाप हूँ।”* *🌹“अरे, तू ठाकुर साहब का बेटा है। वे और मैं बराबरी के हैं तो तू मेरे बेटे बराबर है।”* *🌹“धत् तेरे की… तू काहे का मेरा बाप ! मैं बापों का बाप हूँ।”* *🌹“अरे छोरा ! तू क्या बोलता है ! तू चल, मैं तेरी ठाकुर साहब से पिटाई कराता हूँ।”* *🌹“अरे ! तेरा ठाकुर साहब और तू….. क्या पिटाई-पिटाई ? ले….? ठेंगा दिखाया उसने।* *🌹मैं ज्यों उसे पकड़ने गया त्यों छोरा मंदिर में से दौड़ा और ठाकुर साहब के घर में घुस गया।* *🌹“अरे ठाकुर साहब ! देखो, आपका लड़का ननिहाल से आया और मेरा मजाक उड़ाता है। कहाँ गया ?….”* *🌹घर के लोग बोलेः “तुमको क्या हो गया पहलवान ! वह तो 3-4 महीने से ननिहाल गया हुआ है, वह यहाँ कहाँ ?”* *“अभी घर में घुस गया है।”* *“जाओ, तुम्हीं खोज लो।”* *🌹मैंने घर का कोना-कोना छान मारा परंतु छोरा तो दिखे नहीं।* *🌹घर के लोगों ने कहाः “तुमको श्रीकृष्ण अपनी माया दिखा रहे हैं। तुम जिनको गालियाँ देते थे, वे गाली देने वाले का भी भला चाहते हैं। शिशुपाल ने 100-100 गालियाँ दीं तो भी उसको सदगति दे दी। कंस भी कुछ-का-कुछ बोलता था तो भी उसकी सदगति की। पूतना ने जहर पिलाया तो भी उसकी सदगति की। धेनुकासुर, बकासुर, शकटासुर, अघासुर जो मारने आये थे उनको मोक्ष दे दिया तो तुमको कैसे छोड़ेंगे ? भगवान को रीझ भजो या खीझ, वे तो प्रेमस्वरूप हैं। वे ठाकुर जी तुम्हें प्रेम की अठखेलियाँ करके सुधारना चाहते हैं।”* *🌹“अरे, छोड़ो ये सब भक्तों की बातें ! मैं ऐसे मानने वाला नहीं हूँ।”* *🌹लोग बोलेः “ठाकुर ! अभी तक तुमको भगवान की लीला समझ में नहीं आयी ?”* *🌹वह पहलवान उड़िया बाबा को बोलता हैः बाबा जी ! मैं इतने कट्टर संस्कारवाला था कि ऐसे चमत्कार देखने के बाद भी मैंने खरी-खोटी सुना दी थीः “अरे, तुम्हारा भगवान-वगवान क्या है ये ? गायें चराये, गोपियों के आगे नाचे…. कृष्ण के भक्त और कृष्ण – सब बेवकूफी की बातें हैं। तीसरी बार अच्छी तरह से दिखे तब कहीं मैं मानने की सोचूँगा।”* *🌹इस बात को 21 दिन बीत गये। 22 वें दिन मंदिर में फिर से वही छोरा दिखा। मैंने कहाः “अरे, उस दिन घर में भाग गया था फिर कहाँ चला गया था ? और तूने तो बोला था कि ʹमैं कल ही आया था।ʹ फिर पता चला की तुम आये ही नहीं थे, ननिहाल में थे।”* *🌹छोरा बोलाः “पहलवान ! तुझे पता नहीं है, खेल-खेल में हम ऐसा सब कुछ करते हैं।”* *🌹“तो पहली बार तुम्हीं आये और दूसरी बार भी तुम्हीं आये थे।”* *🌹“हाँ, खेल-खेल में हम सब करते हैं। खेल-खेल में यह मजाक चलता रहता है।”* *🌹“अच्छा, तो तुमने मेरे को मजाक का विषय बना रखा है !”* *🌹“और क्या ! जब तक तू नहीं मानेगा तब तक तेरे से मजाक कर-करके मनवाऊँगा बेटे ! तू क्या समझता है ! ठाकुर है, पहलवान है तो तेरे अहं का है। मेरी दुनिया में तो तेरे जैसे कई नचाता रहता हूँ।”* *🌹“तू इतना छोटा छोरा और कुछ-का-कुछ बोलता है ! तुझे कोई बोलनेवाला नहीं है ?”* *🌹“अरे, सबको बोलने की सत्ता मैं देता हूँ, मेरे को बोलने वाला कौन होगा ! सबकी बुद्धि का अधिष्ठान मैं हूँ।”* *🌹“बड़े बुद्धि के अधिष्ठान हो ! गायें तो चराते थे ! लोग भले ʹकृष्ण-कन्हैया लाल की जयʹ बोलते हैं लेकिन मैं तुमको ऐसा कोई मानने वाला नहीं हूँ। तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हो ?”* *🌹“अरे ! जो मेरे पीछे पड़ता है मैं उसके पीछे पड़ता हूँ। तुम विरोध से पीछे पड़ते हो, कोई भावना से पीछे पड़ता है। जो भावना से पीछे पड़ता है उसको मैं रस देता हूँ और तुम्हारे जैसे को नचा-नचाकर, जरा चरपरा दे के भी पीछे पड़ता हूँ।”* *“क्या मतलब ?”* *🌹“सारे मतलब काल्पनिक होते हैं।”* *🌹“तुम मेरे से आखिर क्या मनवाना चाहते हो ?”* *🌹“हम मनवाना क्या चाहते हैं ! तुम लोग जिसको गाली देते हो, ऐसा है-वैसा है… कहते हो, उसको तुम जानते हो ? तुम अपने को ही नहीं जानते हो। सुन-सुन के अपने को मान लिया ठाकुर। जरा-सी मांसपेशियाँ बढ़ाकर मान लिया पहलवान। ʹमैं बच्चा हूँ, मैं जवान हूँ, मैं दुःखी हूँ, मैं सुखी हूँ……ʹ – इन सब कल्पनाओं में तो जिंदगी तबाह हो गयी। तुम कौन हो ? अपने को तो जानते नहीं, मेरे को क्या खाक जानोगे ?”* *🌹मैं उनके सामने देखता रहा और उऩ्होंने मेरी आँखों में झाँका।* *🌹उड़िया बाबा को गदगद कंठ से वह ठाकुर बता रहा है कि जब तीसरी बार उस बालक ने मेरी आँखों में झाँका तब से वह मेरे से दूर नहीं होता है। बालक तो अंतर्धान हो गया लेकिन मैं पुजारी जी के चरणों में गिर पड़ा। पुजारी जी ने मेरे को गले लगाया और मंत्र दियाः ૐ नमो भगवते वासुदेवाय। तब से मैं आर्यसमाजी होने पर भी श्रीकृष्ण का भक्त हूँ। तीन-तीन बार श्रीकृष्ण आये और मुझ जैसे कट्टर विरोधी, गाली देने वाले को भी दंड के बदले तोहफा देकर गये।* *🌹भावग्रही जनार्दनः। भगवान तर्क का विषय नहीं हैं। सारे तर्क जिनसे प्रकाशित होते हैं वे अंतर्यामी भगवान हैं और सर्वव्यापक भी हैं। अंतःकरण में हैं तो अंतर्यामी कहलाते हैं और तत्त्व रूप से ही सर्वव्यापक हैं, निराकार भगवान हैं। रसौ वै सः। परमात्मा रसस्वरूप हैं। जीवन में अगर प्रेमरस नहीं है तो आदमी नीरस होता है। श्रीकृष्ण रस बाँटने के लिए अवतरित हुए हैं। वे रस-अवतार, प्रेमावतार हैं, न चाहो तो आपको प्रेम-प्रसाद से छका देते हैं।* 💖 *जय जय राधे रमण...* ♥ ☘ *हरि बोल......* ☘ 🌹 *हरि बोल.....* 🙏🏻🌹 🌹 *༺꧁ Զเधॆ कृष्णा जी ꧂༻*🙏🏻

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🙌🏼आज *श्रील लोकनाथ गोस्वामी* पाद के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष ::: श्रीलोकनाथ गोस्वामी का जन्म श्रीअद्वैताचार्य जी के शिष्य श्री पद्मनाभ भट्टाचार्य एवं सीता देवी के पुत्र के रूप में बांग्लादेश के जैसोर के ग्राम में सं. १५४० में हुआ था।पिताजी से ही व्याकरण आदि का अध्ययन करके ग्रंथो के अध्ययन के लिये शांतिपुर निवासी श्री अद्वैताचार्य जी की पाठशाला में गए। श्री गौरांग महाप्रभु जी का अध्ययन भी वहीं चल रहा था अतः प्रथम मिलन वही हुआ। श्रीलोकनाथ गोस्वामी गृहस्थ आश्रम त्यागकर जब श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले तो उन्होंने कहा कि मैं स्वयं भी संन्यास लेकर वृन्दावन जाने वाला हूँ । महाप्रभु से अनेक निर्देश लेकर लोकनाथ गोस्वामी भारी मन से वृन्दावन की ओर चले । वृन्दावन पहुँच कर लोकनाथ गोस्वामी को महाप्रभु से विरह सताने लगा तो वे उनसे मिलने निकल पड़े । उन्हें पता चला कि महाप्रभु संन्यास लेकर पुरी से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकले हैं तो वे भी पीछे पीछे चल पड़े । जब वे वहां पहुंचे तो उन्हें पता लगा कि महाप्रभु वृन्दावन की ओर गए हैं, तब लोकनाथ गोस्वामी ने वृन्दावन का रुख किया । वृन्दावन पहुँच कर पता चला कि महाप्रभु प्रयाग चले गए हैं तब इन्होने भी प्रयाग की ओर प्रस्थान करने का मन बनाया । परन्तु महाप्रभु में स्वप्न में आकर उन्हें यूँ ही इधर उधर भटकने के लिए मना कर दिया और आज्ञा दी कि वे ब्रज की सीमा से बाहर न जाएँ। जब आप व्रज-मण्डल के खदिर वन में आए, वहाँ छत्रवन के समीप उमराओ गाँव है, वहाँ पर श्रीकिशोरी कुण्ड है। आपको भगवद्-प्रेम के अद्भुत भाव हुए श्रीकिशोरी कुण्ड के दर्शन करके। कुछ दिन वहीं निर्जन स्थान पर भजन करते-करते अचानक आपके मन में इच्छा हुई कि आप श्रीराधा-कृष्ण जी के विग्रहों की सेवा करें। जैसे ही इच्छा हुई, तत्क्षण, भगवान स्वयं वहाँ आये, आपको विग्रह (मूर्ति) दिये व कहा कि ये 'राधा-विनोद' हैं। इतना कह कर भगवान अदृश्य हो गये। आप विग्रहों को ऐसे अचानक आया देख कर हैरान रह गये। जब होश सम्भाला तो चिन्ता करने लगे कि इन विग्रहों को कौन दे गया है?तब श्रीराधा-विनोद जी के विग्रह हँसे व आप पर मधुर नज़र डालते हुये बोले - मैं इसी उमराओ गाँव के किशोरी कुण्ड के किनारे रहता हूँ। तुम्हारी व्याकुलता देखकर मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आया हूँ -- मुझे और कौन लायेगा? अब मुझे भूख लगी है। शीघ्र भोजन खिलाओ। यह सुनकर आप के दोनों नेत्रों से आँसु बहने लगे। तब आपने स्वयं खाना बनाकर, श्रीराधा-विनोद जी को परितृप्ति के साथ भोजन कराया व बाद में पुष्प शैया बनाकर उनको सुलाया। नये पत्तों द्वारा आपने ठाकुर को हवा की व मन लगाकर ठाकुर के चरणों की सेवा की। आपने मन और प्राण भगवान के चरणों में समर्पित कर दिये। इनकी प्रतिज्ञा थी मैं कभी भी कुटिया एवं शिष्य नही बनाऊंगा। अतः ठाकुरजी को लता कुंजो एवं वृक्षो के नीचे ही विराजमान कर लाड लड़ाते।अंत में श्रीनरोत्तम दास ठाकुरजी की गुरु सेवा व निष्ठा देख अपना प्रण भुलाकर उनको अपने एकमात्र शिष्य रूप में अंगीकार किया। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी अर्थात आज ही के दिन श्रील लोकनाथ गोस्वामी नित्य लीला में प्रविष्ट हो गए । नित्यलीला में आप *श्रीमंजुला मंजरी* हैं तथा प्रिया-प्रियतम के वस्त्रो को संभालकर रखना एवं उनको धारण करवाना आपकी निकुंज में प्रधान सेवा है। श्रीवृन्दावन में *श्रीराधा-गोकुलानन्द* मन्दिर में आपका समाधि मन्दिर है। श्रीलोकनाथ गोस्वामी जी द्वारा सेवित श्रीराधा-विनोद जी के विग्रह भी श्रीगोकुलानन्द मन्दिर में सेवित हैं। 🙌🏼जय जय राधाविनोद राधाविनोद राधे, लोकनाथेर प्राणधन हे। 🙌🏼 *श्रील लोकनाथ गोस्वामी जी की जय* !!!!! 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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🙌🏼 आज श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी पाद के तिरोभाव महा-महोत्सव पर विशेष ::: श्रीगौड़ीय षड् गोस्वामियों में श्री गोपालभट्ट गोस्वामी अन्यतम हैं।ब्रजलीला में आप श्री अंनग मञ्जरी हैं। *अनंगमंजरी ललिता देवी और विशेष रूप से विशाखा जी की अति प्रिया हैं।* गौरलीला में श्रीअनंगमंजरी श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी नाम से अवतरित हैं। कोई इन्हें श्रीगुणमञ्जरी भी कहते हैं- अंनग मञ्जरी यासीत् साद्य गोपाल भटटक:।। भटट गोस्वामिनं केचिदाहु: श्रीगुणमञ्जरी।। श्रीरंग क्षेत्र में कावेरी के कूल स्थित बेलगुण्डि ग्राम में श्री-सम्प्रदायी श्रीवैंकट भट्ट के घर संवत् 1557 में आपका आविभार्व हुआ।श्रीमन्महाप्रभु श्रीकृष्ण चैतन्यदेव संवत् 1568 में दक्षिण यात्रा करते हुए रंग क्षेत्र में पधारे।वहां श्रीरंगनाथ दर्शन करके आप प्रेमाविष्ट हो उठे और नृत्य-पूर्वक नाम संकीर्तन करने लगे।श्रीवेंकटभटट जी ने श्रीमन्महाप्रभु के वहाँ दर्शन किए एंव उनके आजानुलम्बित परम भाव-माधुर्यमय विग्रह के दर्शन कर अति प्रभावित हुए।उनके चरणों में पड़कर उन्हें अपने घर भिक्षा करने की प्रार्थना की।प्रभु ने उन्हें परम वैष्णव जानकर उनका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया।भिक्षा ग्रहण करने के बाद अनेक काल तक श्रीकृष्ण-कथा में दोनों भाव-विभोर हो उठे। चातुर्मास्य आया, श्रीवैंकट जी ने श्रीमन्महाप्रभु के चरणों में विनम्र प्रार्थना क़ी - प्रभो ! आप कृपा कर चातुर्मास्य पर्यन्त मेरे घर में ही निवास कीजिये और श्रीकृष्ण-कथा कह कर मेरा निस्तार कीजिए।श्रीमन्महाप्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और चार मास वहाँ रहे। नित्य कावेरी स्नान, श्रीरंग दर्शन और प्रेमावेश में संकीर्तन गान करते।कोटि-कोटि लोग वहाँ श्रीमन्महाप्रभु के दर्शन कर श्रीकृष्णनाम-प्रेम में उन्मत्त हो उठे। श्रीवैंकटभट्ट के घर में प्रभु-वास के समय श्रीगोपालभट्ट जी 11 वर्ष के बालक थे।उन दिनों इन्हें श्रीमन्महाप्रभु की हर प्रकार की सेवा का सौभाग्य प्राप्त हुआ।उनका उचिछष्ट प्रसाद भी इन्हें प्राप्त होता।श्रीमहाप्रभु जी भी श्रीगोपाल जी से अत्यधिक स्नेह करते।इस प्रकार इन्होंने उनकी असीम कृपा प्राप्त की। भक्ति रत्नाकर से यह जाना जाता है कि श्रीमन्महाप्रभु की सेवा का इन्होंने सौभाग्य प्राप्त किया और प्रभु ने यह भी कृपादेश दिया कि गोपाल ! तुम श्रीवृन्दावन चले जाना।वहाँ श्रीरूप-सनातन के निकट रहकर भजन-साधन कर तुम्हें कृष्ण-प्राप्ति होगी। श्रीमन्महाप्रभु के चले जाने के बाद श्रीगोपालभटट् जी ने पिता के छोटे भाई (चाचा जी) श्रीप्रबुद्ध जी(श्री प्रबोधानन्द जी)से दीक्षा ग्रहण की और शास्त्र अध्ययन करने लगे।कुछ दिन बाद श्रीप्रबुद्ध जी संसार से विरक्त होकर काशी चले गए।वे शंकरभाष्य से प्रभावित होकर मायावादी श्रीप्रकाशानंद सरस्वती नाम से प्रसिद्ध हुए।आगे चल कर उन्हीं का उद्धार कर श्रीमन्महाप्रभु जी ने पुनः श्रीप्रबोधानन्द नाम प्रदान कर उन्हेँ श्रीवृन्दावन जाने का आदेश दिया। श्रीगोपालभटट् गौर-प्रेम में उन्मत्त हो श्रीवृन्दावन जाने के लिए उत्कण्ठित रहने लगे।दिन-रात हा गौर ! हा कृष्ण ! पुकार-पुकार कर वृन्दावन के लिए व्याकुल रहने लगे।अश्रु पुलकादि सात्त्विक भावों से विभूषित हो उठते।अन्त में अपने माता-पिता के देहावसान के बाद श्रीभटट् जी सब कुछ परित्याग कर वृन्दावन की ओर चल पड़े। यहाँ श्रीरूप-श्रीसनातन गोस्वामी के चरणों में आकर प्रणिपात किया।दोनों ने श्रीगोपाल को सप्रेम आंलिगन किया और अपने पास आश्रय दिया। आप कुछ दिन श्रीराधाकुण्ड-श्यामकुण्ड के बीच केलि कदम्ब के नीचे वास करने के बाद जावट के पास किशोरी-कुण्ड पर भजन-साधन करते रहे।श्रीपाद रूप-सनातन ने नीलाचल में श्रीमन्महाप्रभु को पत्र द्वारा श्रीगोपालभट्ट जी के वृन्दावन आने की सूचना भेजी।श्रीमहाप्रभु जी अति प्रसन्न हुए एवं वहाँ से अपनी डोर, कोपीन, बहिर्वास व आसन श्रीगोपाल भट्ट के लिए प्रसाद रूप में भेजा जो आज भी श्रीराधारमण जी के मन्दिर में दर्शनीय हैं। कुछ समय के बाद आप उत्तर-भारत में शुद्ध भक्ति का प्रचार-प्रसार करने के लिए यात्रा पर निकले।गण्डकी नदी पर एक दिन स्नान कर रहे थे।सूर्योपासना के लिए ज्यों ही आपने अञ्जलि में जल लिया तो एक अदभुत सुन्दर दामोदर शालिग्राम शिला आप की अञ्जलि में आ गई।इसी प्रकार दूसरी बार अञ्जलि में छोटी-बड़ी बारह शालिग्राम शिलाएँ आई।आप उन्हें लेकर ब्रज में लौट आए।यहाँ केशीघाट के निकट यमुना किनारे आप अति भाव-विभोर होकर शालिग्राम की पूजा करने लगे। वृन्दावन यात्रा करते हुए एक सेठ जी ने वृन्दावनस्थ तत्कालीन समस्त श्रीविग्रहों के लिए अनेक प्रकार के बहुमूल्य वस्त्र-आभूषण आदि भेंट किए। श्रीगोपाल भटट् जी को उसने वस्त्र-भूषण दिये, परन्तु श्रीशालिग्राम जी को कैसे वे धारण करायें।यह बात सोचते-सोचते आपको रात भर नींद नहीं आई। *प्रात: काल जब वह उठे तो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा, जब उन्होंने देखा कि श्री शालिग्राम जी त्रिभंग ललित द्विभुज मुरलीधर मधुर मूर्ति श्रीव्रजकिशोर श्याम रूप में विराजमान है। श्री गोस्वामी ने भावविभोर होकर वस्त्रालंकार विभूषित कर अपने आराध्य का अनूठा श्रृंगार किया श्री रूप सनातन आदि गुरुजनों को बुलाया और श्रीराधारमणलाल का प्राकटय महोत्सव श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया।* यही श्रीराधारमण लाल जी का विग्रह आज श्रीराधारमण देव मंदिर में गोस्वामी समाज द्वारा सेवित है और इन्ही के साथ श्रीगोपाल भट्ट जी के द्वारा सेवित अन्य शालिग्राम शिलाएं भी मन्दिर में स्थापित हैं ।1599 की वैशाख पूर्णिमा को शालिग्राम शिला से श्रीराधारमण जी प्रकट हुए।श्रीराधारमण जी का श्री विग्रह वैसे तो सिर्फ द्वादश अंगुल का है, तब भी इनके दर्शन बड़े ही मनोहारी हैं। श्रीराधारमण विग्रह का श्री मुखारविन्द "गोविन्द देव जी" के समान, वक्षस्थल "श्री गोपीनाथ" के समान तथा चरणकमल "मदनमोहन जी" के समान हैं। इनके दर्शनों से तीनों विग्रहों के दर्शन का फल एक साथ प्राप्त होता है। इस प्रकार अनेक वैष्णव ग्रन्थ प्रणयन में सहायक होकर एंव श्रीमन्महाप्रभु के भक्तिरस सिद्वान्तों के प्रचार-प्रसार के लिये अनेक व्यक्तियों को दीक्षा-शिक्षा के द्वारा कृपापात्र बनाकर संवत् 1643 की श्रावण कृष्ण पञ्चमी अर्थात आज ही के दिन आप नित्य-लीला में प्रविष्ट हो गए।श्रीराधारमण घेरा में इनके परमाराध्य श्री श्रीराधारमण लाल जी के प्राकट्य-स्थल के पाश्र्व में इनकी पावन समाधि का दर्शन अब उपलब्ध है। 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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