संतमहापुरुष

🙌🏻 श्री राधारमण चरण दास बाबा(नवदीप कलकत्ते के नीम तला घाट पर बहुत से मारवाडी एक चिता को घेरे बैठे हैं। लगभग 20 साल की एक सध्वा स्त्री का शव् चिता पर रखा है । उसी समय वहाँ से कुछ दूर एक महापुरुष गंगा में स्वच्छन्द गति से तैर रहे हैं। उनके कुछ शिष्य गंगा में स्नान कर रहे हैं, कुछ घाट पर बैठे हैं। एक शिष्य ने आकर मारवाडियों से कहा -"हमारे गुरुदेव ने कहा है कि जब तक वे न आ जाएँ तब तक आप शव को जलाएँ नहीं " मारवाडियों ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया । वे शव को जलाने की तैयारी मेँ जुट गये, पर एक और अादमी ने आकर उनसे वही बात कहीं । तब वे किंकर्तव्य विमूढ़ हो एक-दूसरे् को देखने लगे । इतने मेँ महापुरुष आ गये । उन्हें देखते ही मारवाडी न जाने कैसे हो गये । उन्होंने जैसे ही कहा- इसे नीचे उतारो," शव को नीचे उतार लिया गया । महापुरुष ने अपने शिष्यों मे से रामदास को उसके सिरहाने, फणि और राधाविनोद को उसके दोनों और बैठाकर नाम करने का आदेश दिया । स्वयं उसके दोनों पैरों के अंगूठे को पकडकर नाम करने लगे । जोर-जोर से 'भज निताई गौर राधेश्याम, जप हरे कृष्ण हरे राम' नाम की ध्वनि गूँज उठी । दर्शकों की भीड लग गयी। विस्मित हो कभी वे महापुरूष के मुख की ओर देखते, कभी शव की ओर । कोई नहीं जानता कि प्रभु की क्या लीला होने वाली है ।आधे घंटे बाद जैसे ही महापुरुष ने स्त्री के अंगूठों को उच्च स्वर से "जय नित्यानन्द ' कहकर झटका दिया, उसने आँखे खोल दीं ! चारों दिशाएँ "हरि बोल" और जय-ध्वनि से गूँज उठी। मारवाडी लोगों की आनन्द की सीमा न रही । वो स्त्री विस्मित भाव से चारों ओर देखने लगी । महापुरुष ने पूछा-"इन सबको पहचानती हो ?" स्त्री ने आँखों से सम्मति सूचक संकेत किया ।तब उन्होंने एक मारवाड़ी से दूध लाने को कहा। वो जल्दी जाकर एक पाव दूध ले आया । महापुरुष के आदेश से थोड़ा-थोड़ा दूध स्त्री को पिलाया गया। वो धीरे-धीरे दूध पीने लगी । इस अभूतपूर्व घटना को देख सभी आश्चर्य-सागर मेँ डूब गये।बिज़ली की तरह यह खबर फैल गयी कि कहीं से एक साधु आया है,जिसने चिता पर से मुर्दे को उतारकर जिला दिया। चारों दिशाओ से लोग दौड़-दोड़कर आने लगे । प्राय: डेढ घण्टे तक यह खेल होता रहा। फिर पता नहीं महापुरुष ने क्या सोचा, उन्होंने चारों ओर देख कर स्त्री के अंगूठे छोड दिये। स्त्री ने धीरे-धीरे आँखें बन्द कर लीं। मारवाडी महापुरुष के चरण पकडकर उसे बचाने के लिए बाबा से प्रार्थना करने लगे। महापुरुष बोले - जिस काम को गौरांग महाप्रभु ने भी नहीं किया उसे करना हम लोगों के लिए ठीक नहीं । वे चाहते तो क्या श्रीवास पण्डित के लड़के को जिन्दा नहीं सकते थे ? पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। विधाता के लिखे विधान को नष्ट करने से मर्यादा नष्ट होती है और यह निताई चांद को पसन्द नहीं । मृत शरीर में प्राणों का संचार हो सकता है, यह निताई चाँद ने दिखा दिया । "नाम" के लिये तो यह बहुत सामान्य बात है । जिस काम को नामी भी नहीं कर सकते, वह नाम के आभास मात्र से सहज में हो जाता है । एकमात्र नाम में विश्वास हो जाय तो फिर कुछ बाकी नहीं रहता । नाम की कृपा के बिना न प्रेम मिलता है, न भाव राज्य में प्रवेश है। प्रत्यक्ष देखे बिना जीव को दृढ विश्वास नहीं होता, तभी प्रभु ने यह खेल किया । इस प्रकार के उपदेश वाक्यों से सभी को संन्तुष्ट कर और पुन: गंगा स्नान कर महापुरुष ने वहां से प्रस्थान किया । वह महापुरुष थे बड़े बाबा (श्री राधारमण चरण दास बाबा जी)। 🙌🏻 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏻

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. "सच्चाई का फल" किसी नगर में एक बूढ़ा चोर रहता था। सोलह वर्षीय उसका एक लड़का भी था। चोर जब ज्यादा बूढ़ा हो गया तो अपने बेटे को चोरी की विद्या सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में वह लड़का चोरी विद्या में प्रवीण हो गया। दोनों बाप बेटा आराम से जीवन व्यतीत करने लगे। एक दिन चोर ने अपने बेटे से कहा-- ”देखो बेटा, साधु-संतों की बात कभी नहीं सुननी चाहिए। अगर कहीं कोई महात्मा उपदेश देता हो तो अपने कानों में उंगली डालकर वहाँ से भाग जाना, समझे ! ”हां बापू, समझ गया!“ एक दिन लड़के ने सोचा, क्यों न आज राजा के घर पर ही हाथ साफ कर दूँ। ऐसा सोचकर उधर ही चल पड़ा। थोड़ी दूर जाने के बाद उसने देखा कि रास्ते में बगल में कुछ लोग एकत्र होकर खड़े हैं। उसने एक आते हुए व्यक्ति से पूछा,-- ”उस स्थान पर इतने लोग क्यों एकत्र हुए हैं ?“ उस आदमी ने उत्तर दिया- ”वहां एक महात्मा उपदेश दे रहे हैं !“ यह सुनकर उसका माथा ठनका। ‘इसका उपदेश नहीं सुनूँगा ऐसा सोचकर अपने कानों में उंगली डालकर वह वहाँ से भाग निकला। जैसे ही वह भीड़ के निकट पहुँचा एक पत्थर से ठोकर लगी और वह गिर गया। उस समय महात्मा जी कह रहे थे, ”कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जिसका नमक खाएँ उसका कभी बुरा नहीं सोचना चाहिए। ऐसा करने वाले को भगवान सदा सुखी बनाए रखते हैं।“ ये दो बातें उसके कान में पड़ीं। वह झटपट उठा और कान बंद कर राजा के महल की ओर चल दिया। महल पहुंचकर जैसे ही अंदर जाना चाहा कि उसे वहाँ बैठे पहरेदार ने टोका,- ”अरे कहां जाते हो ? तुम कौन हो ?“ उसे महात्मा का उपदेश याद आया, ‘झूठ नहीं बोलना चाहिए।’ चोर ने सोचा, आज सच ही बोल कर देखें। उसने उत्तर दिया- ”मैं चोर हूँ, चोरी करने जा रहा हूँ।“ ”अच्छा जाओ।“ उसने सोचा राजमहल का नौकर होगा। मजाक कर रहा है। चोर सच बोलकर राजमहल में प्रवेश कर गया। एक कमरे में घुसा। वहाँ ढे़र सारा पैसा तथा जेवर देख उसका मन खुशी से भर गया। एक थैले में सब धन भर लिया और दूसरे कमरे में घुसा, वहाँ रसोई घर था। अनेक प्रकार का भोजन वहाँ रखा था। वह खाना खाने लगा। खाना खाने के बाद वह थैला उठाकर चलने लगा कि तभी फिर महात्मा का उपदेश याद आया, ‘जिसका नमक खाओ, उसका बुरा मत सोचो।’ उसने अपने मन में कहा, ‘खाना खाया उसमें नमक भी था। इसका बुरा नहीं सोचना चाहिए।’ इतना सोचकर, थैला वहीं रख वह वापस चल पड़ा। पहरेदार ने फिर पूछा-- ”क्या हुआ, चोरी क्यों नहीं की ?“ देखिए जिसका नमक खाया है, उसका बुरा नहीं सोचना चाहिए। मैंने राजा का नमक खाया है, इसलिए चोरी का माल नहीं लाया। वहीं रसोई घर में छोड़ आया।“ इतना कहकर वह वहाँ से चल पड़ा। उधर रसोइए ने शोर मचाया- ”पकड़ो, पकड़ों चोर भागा जा रहा है।“ पहरेदार ने चोर को पकड़कर दरबार में उपस्थित किया। राजा के पूछने पर उसने बताया कि एक महात्मा के द्वारा दिए गए उपदेश के मुताबिक मैंने पहरेदार के पूछने पर अपने को चोर बताया क्योंकि मैं चोरी करने आया था। आपका धन चुराया लेकिन आपका खाना भी खाया, जिसमें नमक मिला था। इसीलिए आपके प्रति बुरा व्यवहार नहीं किया और धन छोड़ दिया। उसके उत्तर पर राजा बहुत खुश हुआ और उसे अपने दरबार में नौकरी दे दी। वह दो-चार दिन घर नहीं गया तो उसके बाप को चिंता हुई कि बेटा पकड़ लिया गया- लेकिन चार दिन के बाद लड़का आया तो बाप अचंभित रह गया अपने बेटे को अच्छे वस्त्रों में देखकर। लड़का बोला- ”बापू जी, आप तो कहते थे कि किसी साधु संत की बात मत सुनो, लेकिन मैंने एक महात्मा के दो शब्द सुने और उसी के मुताबिक काम किया तो देखिए सच्चाई का फल। सच्चे संत की वाणी में अमृत बरसता है, आवश्यकता आचरण में उतारने की है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ********************************************

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चला आळंदीला जाऊ। ज्ञानेश्‍वर डोळा पाहू ।। तीर्थयात्रे सुखे जाऊ । वाचे विठ्ठलाचे नाव घेऊ ।। संता संगे सेऊ । वासुदेव धनिवरी ।। आळंदीत कार्तिकी यात्रेस प्रारंभ ः गुरु हैबतराव बाबांच्या पायरीचे पूजन एम. डी. पाखरे आळंदी – संतश्रेष्ठ श्री ज्ञानेश्‍वर महाराजांच्या संजीवन समाधी सोहळ्यास बुधवार (दि. 22) पासून प्रारंभ झाला. प्रथापरंपरेनुसार पालखी सोहळ्याचे जनक गुरू हैबतराव बाबा यांचे वंशज बाळासाहेब निवृत्ती आरफळकर-पवार व राजेंद्र आरफळकर-पवार यांच्या हस्ते बुधवारी सकाळी साडेनऊ वाजता “पुंडलिक वरदे हरी विठ्ठल’च्या गजरात मुख्य महाद्वारातून मंदिरात प्रवेश करतानाची पहिली मानाची गुरु हैबतराव बाबांच्या पायरीचे पूजन करण्यात आले. मानकऱ्यांच्या दिंडीतील अभंग विविध देवतांच्या आरत्या व देवा ब्राह्मणांच्या साक्षीने माउलींच्या 724व्या संजीवन समाधी सोहळ्यास प्रारंभ करण्यात करण्यात आला. पायरी पूजनप्रसंगी समस्त आरपळकर कुटुंबीय, देवसंस्थानचे प्रमुख विश्‍वस्त ऍड. विकास ढगे पाटील, विश्‍वस्त अभय टिळक, डॉ. अजित कुलकर्णी, माउलींचे चोपदार हभप कृष्णराव चोपदार, भाऊसाहेब फुरसुंगीकर, आळंदी पोलीस ठाण्याचे वरिष्ठ पोलीस निरीक्षक रवींद्र चौधर, पोलीस निरीक्षक प्रकाश जाधव, डी. डी. भोसले पाटील, ज्ञानेश्‍वर शिक्षण संस्थेचे सचिव अजित वडगावकर, संस्थानचे व्यवस्थापक ज्ञानेश्‍वर वीर, श्रीधर सरनाईक, नगरसेवक संतोष गावडे, पोलीस नाईक, मच्छिंद्र शेंडे, मारुती महाराज कोकाटे, मानकरी दिनेश कुऱ्हाडे, बाळासाहेब कुऱ्हाडे, राहुल चिताळकर, माउली गुळुंजकर यांच्यासह भाविक उपस्थित होते. पायरी पूजनाप्रसंगी मंत्रोपचार व धार्मिक विधी मोरेश्‍वर जोशी व इतर ब्रह्मवृंदानी केले. पहाटे पवमान अभिषेक व दुधआरती, सकाळी भाविकांच्या महापूजा हे नित्य कार्यक्रम उरकल्यानंतर सकाळी साडेनऊ वाजता मुख्य महाद्वारासमोर असलेल्या हैबतबाबांच्या पायरीचे पूजन विधीवत मंत्रोपचार करत हैबत बाबांचे वंशज पालखी सोहळा मालक बाळासाहेब आरफळकर-पवार, राजेंद्र आरपळकर व राजेंद्र आरफळकर यांच्या वतीने नारळ-प्रसादाचे वाटप काण्यात आले. दरम्यान, रात्री धूप आरती व हभप योगीराज ठाकूर, बाबासाहेब आजरेकर यांच्या तर्फे कीर्तनसेवा, रात्री 10 ते पहाटे 4 पर्यंत हैबतबाबा पायरी समोर हभप वासकर महाराज, मारुतीबुवा कराडकर, हैबतबाबा आरफळकर यांच्यातर्फे हरिजागर आदी धार्मिक कार्यक्रमांनी सोहळ्याच्या पहिल्या दिवसाची सांगता झाली. भाविकांच्या दिंड्यांचा ओघ सुरू संतश्रेष्ठ श्री ज्ञानेश्‍वर महाराज यांचा संजीवन समाधी सोहळा प्रत्यक्ष नेत्रसुखाने अनुभवण्यासाठी राज्याच्या कानाकोपऱ्यातून भाविकांच्या दिंड्यांचा ओघ सुरू झाला असून, अवघी अलंकापुरीच भक्‍तीरसात चिंब होऊ लागली आहे. त्यादृष्टीने सर्व यंत्रणा भाविकांच्या सुख-सुविधेसाठी सज्ज झाल्या आहेत. आजपासून आळंदीतील विविध मठ, मंदिरे, धर्मशाळांमध्ये व मोकळ्या जागेत राहुट्या उभारून सर्वत्र अखंड हरिनाम सप्ताहास सुरूवात झाली असल्याने पुढील सहा दिवस अलंकापुरीच हरिनामाच्या गजरात चिंब न्हाऊन निघणार आहे. आजचे धार्मिक कार्यक्रम गुरूवार (दि.21) रोजी पहाटे पवमान अभिषेक व दुधआरती,भाविकांच्या महापूजा, दुपारी महानैवेद्य, सायंकाळी हभप बाबासाहेब देहूकर यांच्यातर्फे कीर्तनसेवा, रात्री धूपआरती व त्यानंतर रात्री 9 ते 11 वासकर महाराज यांच्यातर्फे कीर्तनसेवा असे कार्यक्रम होणार आहेत. जय श्री कृष्ण जय श्री राम जय श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज 👑

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