संतमहापुरुष

सुंदर कथा - बाबा श्री गणेशदास जी के शिष्य श्री राजेंद्रदासचार्य जी के श्रीमुख से जैसा सुना वैसा लिख रही हु , लेखन में भूल चूक के लिए क्षमा करे । श्री रामानंदी संप्रदाय के संतों का पंजाब में एक स्थान है – श्री पिण्डोरी धाम । वहां की परंपरा में एक संत हुए है श्री नारायण दास जी महाराज । श्री गुरु परंपरा इस प्रकार है श्री रामानंदाचार्य – श्री अनंतानंदचार्य – श्री कृष्णदास पयहारी – श्री भगवान दास जी – श्री नारायण दास जी । भजन जप साधना आदि के बल से श्री नारायण दास जी दिन दुखी पीड़ित व्यक्तियों को जो भी कहते वो सत्य हो जाता । धीरे धीरे उनके पास आने वालों की भीड़ बढ़ने लगी । यद्यपि नारायण दास जी किसी सिद्धि का प्रयोग नही करते परंतु भगवान के नाम जप के प्रभाव से जो भी उनके पास आता , उसका दुख दूर हो जाता । जब भीड़ बढ़ने लगी तब उनके गुरुदेव श्री भगवान दास जी ने कहा – अधिक भीड़ होने लगी है , यह सब साधु के लिए अच्छा नही है । इन चमत्कारों से भजन साधन मे बाधा उत्पन्न होती है । अब तुम पूर्ण अंतर्मुख हो जाओ, मौन हो जाओ और एकांत में भजन करो । किसी से न कुछ बोलना, न कुछ सुनना, न कोई इशारा करना, केवल रामनाम का मानसिक जप करो । १. बादशाह जहांगीर द्वारा नारायण दास जी को तीक्ष्ण विष पिलाना और श्रीराम नाम की महिमा प्रकट होना – नारायण दास जी तत्काल जडवत हो गए और अंतर्मुख होकर साधना करने लगे । किससे कुछ भिक्षा भी नही मांगते , जो किसीने दे दिया वह प्रसाद समझ कर पा लेते । एक दिन नारायण दास जी बैठ कर साधना कर रहे थे , वहीं से जहांगीर बादशाह अपने सैनिकों के साथ जा रहा था । उसने सैनिको से पूछा कि इस हिंदु फकीर को रास्ते से हटाओ । सैनिको ने नारायण दास जी से हटने को कहा परंतु वे न कुछ बोले न वहां से हिले । बादशाह ने कहा – लगता है यह कोई जासूस है , इसको गिरफ्तार करके साथ ले चलो । बादशाह उनको अपने साथ लाहौर ले गया (वर्तमान पाकिस्तान) और उनसे बहुत पूछा कि तुम कौन हो? कहां से आये हो ? किसके लिए काम करते हो ? वहां क्यों बैठे थे ? बहुत देर तक पूछने पर भी वे कुछ बोले नही । बादशाह को बहुत क्रोध आया और उसने वैद्य को बुलाकर कहां – भयंकर तीक्ष्ण हालाहल विष (जहर) पिलाकर इसको मार दो । वैद्य ने एक प्याले में जहर भरकर उनको पिला दिया पर उनको कुछ हुआ नही । बादशाह ने कहा – और पिलाओ । वैद्य ने दूसरा प्याला जहर पिलाया परंतु नारायण दास जी जैसे थे वैसे ही रहे । ऐसा करते करते बादशाह ने उनको जहर के पांच प्याले पिलाये । बहुत देर तक इंतजार करने पर भी नारायण दास जी मरे नही । बादशाह ने कहा एक और प्याला लाओ परंतु नारायण दास जी सोचने लगे कि पेट तो भर गया और छटा प्याला पिने का मन नही है । इतने में ही उनके गुरुदेव श्री भगवान दास (जो सिद्ध संत थे) जी वहां प्रकट हो गए । वे केवल श्री नारायण दास जी को दिखाई पड़े । उन्होंने कहा – बेटा नारायण ! श्री राम नाम के अमृत का क्या महात्म्य है यह संसार को दिखाने के लिए यह छटा प्याला भी पी जाओ । नारायण दास जी गुरुदेव की आज्ञा मानकर छटा प्याला विष भी पी गए । अब बादशाह का माथा ठनका और उसने कहाँ – यह वैद्य हिंदु है इस कारण से इसने कोई चालाकी की है । इसने विष की जगह साधु को कोई मीठा शर्बत पिलाया है । बादशाह ने वैद्य से कहा कि मैंने तुमसे जहर पिलाने का हुक्म दिया अथवा शर्बत?वैद्य ने कहा – हुजूर ! यह शर्बत नही है , यह तो भयंकर विष है । बादशाह ने कहाँ – कैसा जहर? छह प्याले पिलाने पर भी यह मरा नही , हमे संदेह है कि यह जहर नलकी है । वैद्य ने कहा – हुजूर , आप किसी पर प्रयोग करके देख लो । सामने जहांगीर बादशाह का हाथी था, उसकी सूंड पर एक बूंद जहर छिडका गया तो वह हाथी तत्काल मर गया । बादशाह कांप गया , उसकी समझ मे आ गया कि यह कोई सिद्ध हिंदु फकीर है । बादशाह ने उनको छोड़ दिया और वे विचरण करते करते पुनः पिण्डोरी धाम आ गए । गुरुजी ने प्रकट होकर उनको हृदय से लगाया और कहां की तुमने श्री राम नाम की महिमा को तुमने प्रत्यक्ष करके दिखाया है , अब मेरी इच्छा है कि तुम आसन ग्रहण करो (महंत बनो) और सबका हित करो । नारायण दास जी ने कहां की हमारे बड़े गुरुभाई श्री महेशदास जी को आसान पर बिठाएं और मैं उनकी सेवा मे रहूंगा । महेशदास जी ने काहाँ की गुरुजी की वाणी जिसके लिए निकल गयी वही आसान पर विराजेंगे । नारायण दास जी यह सुनकर रोने लगे और कहने लगे – ना मैन जप किया ना तप किया , भगवान के नाम का जप भी नही किया और महंती गले पड गयी , पूर्व के किसी पाप का यह परिणाम है । बाबा महेशदास जी ने कहा कि आप पूर्व में जैसे भजन साधन करते थे वैसे ही करते रहे । आपके भजन मे बाधा नही आएगी , सम्पूर्ण सेवा का भार मैं उठाऊंगा । आपके पास किसीको जाने नही दूंगा ,सब समाधान मै करूँगा । गुरुदेव श्री भगवान दास जी ने कहा – महेशदास जी का दर्शन करने के बाद ही लोग तुम्हारा दर्शन करने अंदर आएंगे । ऐसा कहकर गुरुजी अंतर्धान हो गए । (आज भी बाहर बाबा महेशदास जी की गद्दी है । जो आचार्य आसान पर विराजते हैं और वहां कोई समस्या लेकर आता है तो पहले अर्जी बाबा महेशदास जी के पास लगाई जाती है ।) नारायणदास जी पूर्ववत भजन साधन मे लग गए । २. सिद्धों की कुतिया – उधर जहांगीर के मन मे रोज आता था कि पता नही कैसा विचित्र हिंदु फकीर था जो इतने तीक्ष्ण जहर के ६ प्याले पचा गया । उसने बहुत शोध किया और अंत मे यही सोचा कि कुछ लोग नशा बहुत करते है और इस कारण उनका शरीर जहरी हो जाता है, जहर पचाने लायक हो जाता है । कुछ समय बीतने पर एक बार बादशाह जहांगीर पुनः पिण्डोरी आया। उसने बाबा महेशदास जी को देखकर पूछा – बाबा ! कुछ अमल (नशा) करते हो ? बाबा ने कहां – हाँ, अमल करते है । बादशाह बोला – कौनसा अमल करते हो ? बाबा बोले श्री राम नाम का अमल करते है । बादशाह को बात समझ मे आयी नही , उसने सोचा होगा किसी तरह का नशा । उसने कहा – बाबा! आजका अमल पूरा हो गया ? बाबा समझ गए कि बादशाह चमत्कार देखना चाहता है । वहां बाहर एक कुतिया रहती थी, बाबा जो प्रसाद लेते उसी मे थोड़ा सा बचाकर उसको खाने के लिए दे देते। वह कुतिया केवल बाबा का प्रसाद ही पाती थी, बाकी कितनी भी बढ़िया चीज़ कोई देता तो उसकी ओर देखती भी नही । बाबा बोले – हमारे अमल का तो पूछो मत परंतु सामने यह कुतिया बैठी है इसका अमल पूरा नही हुआ । बादशाह बोला – क्या अमल करेगी ? अफीम का अमल करेगी ? उस जमाने मे सैनिको को अफीम खिलाया जाता था तो साथ मे अफीम की पेटी थी । बाबा महेशदास बोले – हां हां अफीम का अमल करेगी । बादशाह ने कहा – वजीर ! संदूक से अफीम निकाल कर इसको भरपेट अफीम खिलाओ । बाबा ने कहां – खा जाओ अफीम को । वह कुतिया देखते देखते पचास किलो अफीम खा गयी । बादशाह ने कहा कि स्वयं इस कुतिया का वजन २० किलो नही है, वह कहा गयी ५० किलो अफीम । इतना अफीम गया कहाँ? उसने पूछा – बाबा , क्या इसका अमल अभी पूरा नही हुआ ? बाबा बोले – जब पूंछ हिला रही है टैब तक समझना चाहिए कि अमल पूरा नही हुआ । बादशाह बोला और कितना खाएगी ?बाबा बोले -तुझे खा जाएगी, तेरी बादशाहीयत को खा जाएगी , ये सिद्धो की कुतिया है । बादशाह ने अपना ताज उतार का बाबा के चरणों मे रख दिया और बोला – बाबा, आपकी फकीरी के आगे मेरी बादशाहीयत धूल है । बादशाह बोला – बाबा हमे कुछ सेवा दीजिये । बाबा बोले – हम एक लंगोटी के बाबाजी, हमारी क्या सेवा ? इस कुतिया की सेवा करो । बादशाह बोला – कुतिया जितना घूम जाएगी उतनी जमीन संत और गौ सेवा के लिए दे दी जाएगी । वह कुतिया ७०, ००० एकड़ मे दौड़ी । वह सारी जामीन कुतिया को दान में दे दी गयी ।

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भजन की महिमा जय श्री राधे यह हमारा स्वभाव है कि जब तक हमें किसी वस्तु की महिमा पता ना चले तब तक हम उधर आकर्षित नहीं होते हैं । हमारा मनुष्य जीवन भजन के लिए ही मिला है कम से कम हम वह लोग जो अपने आपको वैष्णव कहते हैं उनका जीवन तो भजन भक्ति के लिए ही मिला है । अब प्रश्न उठता है इस संसार में सभी लोग तो भजन नहीं कर रहे हैं कोई धन कमा रहा है कोई कामनाओं की पूर्ति में लगा हुआ है कोई भाग दौड़ में लगा हुआ है किसी के पास अकूत संपत्ति है किसी के पास अनेक पुत्र हैं आदि, आदि । लेकिन हम यदि ध्यान से देखें तो इनमे से किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर चमक नहीं है प्रसन्नता नहीं है आनंद नहीं है संतोष नहीं है और फल भी कुछ हाथ नहीं पड़ता पुत्र भी यहीं रह जाते हैं धन भी यहीं रह जाता है और रोता पीटता व्यक्ति चला जाता है इसके विपरीत यदि हम सच्चे संत सच्चे भजन कारी वैष्णवों को देखें तो उनका परम धन है नाम उनका परम संतोष है भगवत भजन। उनके चेहरे पर एक चमक है और वह जब जाते हैं तो हंसते हुए जाते हैं उनका यहां पर न था न पड़ा रह जाता है। भजन किया भजन साथ जाता है और यदि थोड़ी हल्की बात भी करें तो बड़े से बड़े धन वाला अधिक से अधिक पुत्रोंवाला अधिक से अधिक यश वाला अधिक से अधिक मानवाला सारे के सारे आकर इन भजन आनंदी संतो के चरणों में शीश नवाते हैं । आखिर क्यों । क्योंकि भजन भक्ति वैष्णवता संत यह सर्वोपरि है और सर्वोपरि इसलिए है कि उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य समझा और उसमें लग गये । उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया इसीलिए हम सब इनके चरणों में शीश नवाते हैं हम भी प्रयास करें संसार के साथ-साथ संसार में अनासक्त रहते हुए अपने परम लक्ष्य भगवत भजन पर केंद्रित करें । हम कर सकते हैं अनेकों ने किया है तो आप और मैं क्यों नहीं ? समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का प्रणाम जय श्री राधे जय निताई

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आज के विचार ( साधू सेवा आवश्यक क्यों ...) सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार .... ( श्रीकबीर दास ) जनकपुर में इन दिनों भक्तमाल की कथा कह रहा हूँ .........बड़ा ही अद्भुत और प्रेमपूर्ण ग्रन्थ है भक्तमाल । भक्तमाल में साधू सेवा पर ज्यादा प्रकाश क्यों डाला गया है ? ये प्रश्न यहाँ के एक साधक का था । हाँ ..........पक्षियों को नित दाना डालो ............आज एक आयेंगें तो कल दो आयेंगें .......ऐसे धीरे धीरे करके कुछ ही दिन में आप पाओगे की आपका आँगन पक्षियों से भर जाएगा .....। पर याद रहे ........इसका अद्भुत फल तो उस समय मिलेगा .....कि एक दिन आकाश में उड़ते हुये कोई हँस आएगा .........और आपके यहाँ दाना चुगेगा ......तब तुम धन्य हो जाओगे । मैने सहजता में ये बात कही थी । पर लॉजिक क्या है इस साधू सेवा का ? साधू की सेवा ? ये साधक नया नया था...इसलिये लॉजिक बताना आवश्यक था इसे । *************************************************** इस कलियुग में ....घोर कलियुग में .......क्या सच्चे साधू हैं ? ये प्रश्न साधक का तो नही था .....पर प्रश्न तो था । और उत्तर देना ही चाहिये .....क्यों की प्रश्न युवा पीढ़ी का है । मुझे तो नही लगता ........कि कोई सच्चा साधू भी है आज के इस समय में ......उसनें कई नाम गिनाये भी ......जो साधू भेष में असाधु थे । एक प्रश्न ये भी था ......इस प्रश्न का उल्लेख करना भी ठीक रहेगा । पर ये प्रश्न उच्चकोटि के साधक का था ......जो अच्छी स्थिति को पा चुके थे ............। साधना करते हुए ............हमारा शरीर छूट गया ......साधना पूर्ण नही हुयी थी ..........कुछ दिन और अगर हमारा शरीर रहता .....तो साधना पूरी हो जाती ......पर हमारे शरीर नें हमारा साथ छोड़ दिया । अब दूसरा शरीर हमें मिला .............पर हमारा मार्ग दर्शन करनें वाला उस समय हमें कौन मिलेगा ? अभी ही कलियुग आगया है ..........अच्छे साधू मिलनें कठिन हो गए हैं ......पर हमारा जब दूसरा जन्म होगा ......तब तो हो सकता है ......कोई भी न हो ......उस घोर कलिकाल में हमारी साधना को कौन आगे बढ़ानें की प्रेरणा देगा ........आप इसके बारे में हमें कुछ बताइये । ये प्रश्न था एक वयोवृद्ध का....जो इस समय दिल्ली में निवास करते हैं....और यदा कदा मुझ से वृन्दावन में भी आकर मिलते रहते हैं । ****************************************************** एक बात याद रखिये .................... आग लगी आकाश में झर झर गिरे अंगार सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार । ये दोहा सन्त श्री कबीर दास जी महाराज का है .....और शत प्रतिशत सत्य है .........। आपको क्या लगता है ..........नकारात्मकता से भरे लोगों से ये जगत चल रहा है ? राग द्वेष से भरे हुए लोगों के कारण ये संसार चल रहा है ? अरे ! विशुद्ध सकारात्मकता और प्रेमपूर्ण हृदय वाले लोग अगर न हों .......तो आपको लगता है ये संसार रह पाता ? विचार कीजिये........मैने उन्हें इंटरनेट के माध्यम से समझाया था। हाँ .......मै मानता हूँ ............कि संख्या कम होगी ..........इस समय ऐसे प्रेमपूर्ण हृदय वाले साधुओं की ..........पर आप ये नही कह सकते कि...... हैं ही नहीं ........अगर नही होते ना .......तो याद रखिये ये जगत खतम हो जाता .............निस्वार्थ प्रेम वाले मानव अगर नही रहेंगें इस जगत में ......तो ये जगत रहेगा ही नही । मैने कहा .....अब आप सोच रहे होंगें.....हमें क्यों नही मिलते ऐसे लोग ? तो प्रभु ! मै तो इतना ही कहूँगा कि आपनें खोजा ही नही होगा । मै कहता हूँ .............आज के समय में मैने ऐसे ऐसे महात्माओं के दर्शन किये हैं ...........जिनके सामनें ईश्वर साकार होकर बातें करता है .....आप विश्वास करेंगें ? मैने ऐसे ऐसे सन्तों के दर्शन किये हैं ...........जो रामकृष्ण परमहंस की तरह सिद्ध हैं.....और उनके हाथों से ईश्वर भोग को स्वीकार करते हैं । खोजनें पर ही वस्तु मिलती है .......ये बात आप मानते हैं या नही ? मैने उनसे पूछा । उन्होंने मेरी बात स्वीकार की .........। ******************************************************* ईश्वर की व्यवस्था अधूरी नही है ........पूर्ण है । आपको पता है ........चाहे कितना भी घोर कलियुग आजाये .......पर हर गाँव में ...............एक ऐसी चेतना रहती ही है ......जो उस परमसत्ता से संचालित होती है ................और उस चेतना का यही कार्य है कि ....जो अच्छे अच्छे सकारात्मक प्रेमपूर्ण हृदय वाले हैं .....उनको इस कलियुग के ताप से बचाना......और उन्हें सही दिशा देना । ऐसी चेतना हर गाँव में होती ही है ..........उस दिव्य चेतना को हम लोग साधू कहते हैं .......या सन्त कहते हैं । इनका कार्य होता है ...............जो सच्चे हृदय के लोग हैं .....उनकी देख रेख करना ............उनके हृदय में और सकारात्मक भाव को भरना .......और सबके प्रति अच्छी सोच को विकसित करके ..........उस परमसत्ता की ओर उन्हें बढ़ाना । ऐसे लोग इसी कार्य के लिए आस्तित्व द्वारा निर्धारित होते हैं । इनका और कोई कार्य होता नही है .................... ऐसे लोग फिर शरीर छोड़ दें तो ? कोई बात नही ......आस्तित्व दूसरों को भेज देता है ..........उसके पास कमी तो है नही ऐसे सन्तों और साधुओं की ...........मैने कहा । अब बताइये .............ऐसे साधुओं की सेवा अगर आपके द्वारा होती है .....तो ये अच्छा है या बुरा है ? ऐसे निस्वार्थ जन की सेवा आपके द्वारा होती है .....तो आस्तित्व आप पर प्रसन्न होगा .....या नाराज होगा .....? विचार कीजिये । आपको नही लगता .............ऐसे साधुओं की सेवा करना ही आपका परम धर्म है .....! नही नही .....आप जिनका नाम लेकर मुझे कह रहे हैं ...........कि आजकल के ये साधू ............तो मित्र ! मै उन्हें साधू मान ही नही रहा । साधू तो न अपनी ऊर्जा आश्रम बनानें में व्यय करेगा ......न हॉस्पिटल खोलनें में ........न कोई और सामाजिक कार्यों में उलझेगा .....। उसका काम तो बस इतना ही होगा .......सकारात्मकता ऊर्जा को इस जगत के आबोहवा में फैलाना ..........निस्वार्थ प्रेम द्वारा सबको शान्ति की राह बताना ..........। अब ऐसे व्यक्ति की सेवा आपको अगर मिल जाए ......( वैसे तो मिलनी मुश्किल है ....क्यों की ऐसे लोग सेवा लेते भी तो नही हैं ) तो आप धन्य हैं .......आपका धन या तन से की गयी सेवा आपको वो दे सकती है ......जिसके बारे में आपनें सोचा भी नही होगा । अब आप कहेंगें कि मै साधू सेवा क्यों करूँ ? मेरी बात समझ तो गए ना आप ? मैने उनसे पूछा । हाँ ...यही है सच्ची सेवा.....जो समाज में निस्वार्थ प्रेम को फैला रहा है ...उसकी सेवा .......। उन्होंने मेरी बात स्वीकार की.........साधू की सेवा करनी ही चाहिये । आप क्या कहोगे ? साधकों ! Harisharan

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🍃 आज आश्विन शुक्ल दशमी को जगद्गुरु श्री मध्वाचार्यपाद (1238- 1317 ) का आविर्भाव दिवस है । 🍃 बड़ी सूरमाकुञ्ज वृन्दावन में विविध आयोजनों के साथ उत्सव मनाया जा रहा है ।। 💐 इनका संक्षिप्त चरित्र नीचे प्रस्तुत किया गया है -- श्रीमन्माध्वाचार्य जी का जन्म उडिपी से तीन मील दूर उत्तरी कन्नड़ में सन १२३८ में आज ही के दिन विजयदशमी को हुआ। केवल ५ वर्ष की आयु में ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की एवं १२ वर्ष की आयु में सन्यास लेकर मोह के बंधनों से मुक्त होकर भक्ति पथ की ओर अग्रसर हुए।आपके पिताजी का नाम श्रीमध्वगेह भट्ट व माताजी का नाम श्रीमती वेदविद्या था। पवनदेव के प्रथम अवतार हैं श्रीहनुमान जी, द्वितीय अवतार हैं श्रीभीमसेन व तृतीय अवतार हुए श्रीमाध्वाचार्य जी। एक बार बचपन में आपने अपने पिताजी से कहा कि श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित यह विचार कि जीव ही ब्रह्म है तथा भगवान निराकार-निर्विशेष हैं, बिल्कुल गलत है । मैं, श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित इस मायावाद के मत का खण्डन करूँगा। आपके पिताजी, ज्यादा वृद्ध होने के कारण, हाथ में छड़ी लेकर चलते थे। उन्होंने कहा, ' बेटा ! श्रीशंकराचार्य जी का सिद्धान्त पूरे भारत में फैला हुआ है, और उसका सब सम्मान करते हैं। उनका सिद्धान्त कोई खण्डित कर दे, ऐसा योग्य व्यक्ति कोई नज़र में नहीं आता। जैसे मेरे हाथ की छड़ी, हरा-भरा पेड़ नहीं बन सकती, उसी प्रकार श्रीशंकराचार्य जी के सिद्धान्त को कोई काट नहीं सकता।' आपने साथ ही कहा, ' हे पिताजी, यदि कोई आपके हाथ की छड़ी को वृक्ष में बदल दे, तो क्या आप मान लेंगे कि श्रीशंकराचार्य जी के सिद्धान्त को काटा जा सकता है?' पिताजी को कुछ न बोलता देख, आपने पिताजी से उनकी छड़ी ली और छड़ी बाहर आँगन में ज़मीन में गाड़ दी । आप ने कहा, ' हे छड़ी, अगर मैं श्रीशंकराचार्य जी के मत को खण्डित कर दूँगा तो तुम अभी हरे-भरे पेड़ के रूप में परिवर्तित हो जाओ।' दोनों के देखते ही देखते, वो छड़ी बढ़ने लगी। उसका तना मोटा होता गया, पत्ते आने लगे, फल भी लग गये। कुछ ही समय में वहाँ छड़ी के स्थान पर एक हरा-भरा वृक्ष था। आपके पिताजी ने यह देख कर आपको अपने समीप बुलाया व पीठ थपथपाते हुए कहा,' हाँ, श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित मायावाद का खण्डन अब सम्भव लगता है।' आपके पिताजी ने मान लिया कि उनका पुत्र साधारण मनुष्य नहीं है। आगे चल कर आपने मायावाद को काटने के लिये उसमें 100 दोष गिनाये व 'मायावाद-शतदूषणी' नामक ग्रन्थ भी लिखा।

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