संतमहापुरुष

भजन की महिमा जय श्री राधे यह हमारा स्वभाव है कि जब तक हमें किसी वस्तु की महिमा पता ना चले तब तक हम उधर आकर्षित नहीं होते हैं । हमारा मनुष्य जीवन भजन के लिए ही मिला है कम से कम हम वह लोग जो अपने आपको वैष्णव कहते हैं उनका जीवन तो भजन भक्ति के लिए ही मिला है । अब प्रश्न उठता है इस संसार में सभी लोग तो भजन नहीं कर रहे हैं कोई धन कमा रहा है कोई कामनाओं की पूर्ति में लगा हुआ है कोई भाग दौड़ में लगा हुआ है किसी के पास अकूत संपत्ति है किसी के पास अनेक पुत्र हैं आदि, आदि । लेकिन हम यदि ध्यान से देखें तो इनमे से किसी भी व्यक्ति के चेहरे पर चमक नहीं है प्रसन्नता नहीं है आनंद नहीं है संतोष नहीं है और फल भी कुछ हाथ नहीं पड़ता पुत्र भी यहीं रह जाते हैं धन भी यहीं रह जाता है और रोता पीटता व्यक्ति चला जाता है इसके विपरीत यदि हम सच्चे संत सच्चे भजन कारी वैष्णवों को देखें तो उनका परम धन है नाम उनका परम संतोष है भगवत भजन। उनके चेहरे पर एक चमक है और वह जब जाते हैं तो हंसते हुए जाते हैं उनका यहां पर न था न पड़ा रह जाता है। भजन किया भजन साथ जाता है और यदि थोड़ी हल्की बात भी करें तो बड़े से बड़े धन वाला अधिक से अधिक पुत्रोंवाला अधिक से अधिक यश वाला अधिक से अधिक मानवाला सारे के सारे आकर इन भजन आनंदी संतो के चरणों में शीश नवाते हैं । आखिर क्यों । क्योंकि भजन भक्ति वैष्णवता संत यह सर्वोपरि है और सर्वोपरि इसलिए है कि उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य समझा और उसमें लग गये । उन्होंने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लिया इसीलिए हम सब इनके चरणों में शीश नवाते हैं हम भी प्रयास करें संसार के साथ-साथ संसार में अनासक्त रहते हुए अपने परम लक्ष्य भगवत भजन पर केंद्रित करें । हम कर सकते हैं अनेकों ने किया है तो आप और मैं क्यों नहीं ? समस्त वैष्णव जन को राधा दासी का प्रणाम जय श्री राधे जय निताई

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आज के विचार ( साधू सेवा आवश्यक क्यों ...) सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार .... ( श्रीकबीर दास ) जनकपुर में इन दिनों भक्तमाल की कथा कह रहा हूँ .........बड़ा ही अद्भुत और प्रेमपूर्ण ग्रन्थ है भक्तमाल । भक्तमाल में साधू सेवा पर ज्यादा प्रकाश क्यों डाला गया है ? ये प्रश्न यहाँ के एक साधक का था । हाँ ..........पक्षियों को नित दाना डालो ............आज एक आयेंगें तो कल दो आयेंगें .......ऐसे धीरे धीरे करके कुछ ही दिन में आप पाओगे की आपका आँगन पक्षियों से भर जाएगा .....। पर याद रहे ........इसका अद्भुत फल तो उस समय मिलेगा .....कि एक दिन आकाश में उड़ते हुये कोई हँस आएगा .........और आपके यहाँ दाना चुगेगा ......तब तुम धन्य हो जाओगे । मैने सहजता में ये बात कही थी । पर लॉजिक क्या है इस साधू सेवा का ? साधू की सेवा ? ये साधक नया नया था...इसलिये लॉजिक बताना आवश्यक था इसे । *************************************************** इस कलियुग में ....घोर कलियुग में .......क्या सच्चे साधू हैं ? ये प्रश्न साधक का तो नही था .....पर प्रश्न तो था । और उत्तर देना ही चाहिये .....क्यों की प्रश्न युवा पीढ़ी का है । मुझे तो नही लगता ........कि कोई सच्चा साधू भी है आज के इस समय में ......उसनें कई नाम गिनाये भी ......जो साधू भेष में असाधु थे । एक प्रश्न ये भी था ......इस प्रश्न का उल्लेख करना भी ठीक रहेगा । पर ये प्रश्न उच्चकोटि के साधक का था ......जो अच्छी स्थिति को पा चुके थे ............। साधना करते हुए ............हमारा शरीर छूट गया ......साधना पूर्ण नही हुयी थी ..........कुछ दिन और अगर हमारा शरीर रहता .....तो साधना पूरी हो जाती ......पर हमारे शरीर नें हमारा साथ छोड़ दिया । अब दूसरा शरीर हमें मिला .............पर हमारा मार्ग दर्शन करनें वाला उस समय हमें कौन मिलेगा ? अभी ही कलियुग आगया है ..........अच्छे साधू मिलनें कठिन हो गए हैं ......पर हमारा जब दूसरा जन्म होगा ......तब तो हो सकता है ......कोई भी न हो ......उस घोर कलिकाल में हमारी साधना को कौन आगे बढ़ानें की प्रेरणा देगा ........आप इसके बारे में हमें कुछ बताइये । ये प्रश्न था एक वयोवृद्ध का....जो इस समय दिल्ली में निवास करते हैं....और यदा कदा मुझ से वृन्दावन में भी आकर मिलते रहते हैं । ****************************************************** एक बात याद रखिये .................... आग लगी आकाश में झर झर गिरे अंगार सन्त न होते जगत में तो जल जाता संसार । ये दोहा सन्त श्री कबीर दास जी महाराज का है .....और शत प्रतिशत सत्य है .........। आपको क्या लगता है ..........नकारात्मकता से भरे लोगों से ये जगत चल रहा है ? राग द्वेष से भरे हुए लोगों के कारण ये संसार चल रहा है ? अरे ! विशुद्ध सकारात्मकता और प्रेमपूर्ण हृदय वाले लोग अगर न हों .......तो आपको लगता है ये संसार रह पाता ? विचार कीजिये........मैने उन्हें इंटरनेट के माध्यम से समझाया था। हाँ .......मै मानता हूँ ............कि संख्या कम होगी ..........इस समय ऐसे प्रेमपूर्ण हृदय वाले साधुओं की ..........पर आप ये नही कह सकते कि...... हैं ही नहीं ........अगर नही होते ना .......तो याद रखिये ये जगत खतम हो जाता .............निस्वार्थ प्रेम वाले मानव अगर नही रहेंगें इस जगत में ......तो ये जगत रहेगा ही नही । मैने कहा .....अब आप सोच रहे होंगें.....हमें क्यों नही मिलते ऐसे लोग ? तो प्रभु ! मै तो इतना ही कहूँगा कि आपनें खोजा ही नही होगा । मै कहता हूँ .............आज के समय में मैने ऐसे ऐसे महात्माओं के दर्शन किये हैं ...........जिनके सामनें ईश्वर साकार होकर बातें करता है .....आप विश्वास करेंगें ? मैने ऐसे ऐसे सन्तों के दर्शन किये हैं ...........जो रामकृष्ण परमहंस की तरह सिद्ध हैं.....और उनके हाथों से ईश्वर भोग को स्वीकार करते हैं । खोजनें पर ही वस्तु मिलती है .......ये बात आप मानते हैं या नही ? मैने उनसे पूछा । उन्होंने मेरी बात स्वीकार की .........। ******************************************************* ईश्वर की व्यवस्था अधूरी नही है ........पूर्ण है । आपको पता है ........चाहे कितना भी घोर कलियुग आजाये .......पर हर गाँव में ...............एक ऐसी चेतना रहती ही है ......जो उस परमसत्ता से संचालित होती है ................और उस चेतना का यही कार्य है कि ....जो अच्छे अच्छे सकारात्मक प्रेमपूर्ण हृदय वाले हैं .....उनको इस कलियुग के ताप से बचाना......और उन्हें सही दिशा देना । ऐसी चेतना हर गाँव में होती ही है ..........उस दिव्य चेतना को हम लोग साधू कहते हैं .......या सन्त कहते हैं । इनका कार्य होता है ...............जो सच्चे हृदय के लोग हैं .....उनकी देख रेख करना ............उनके हृदय में और सकारात्मक भाव को भरना .......और सबके प्रति अच्छी सोच को विकसित करके ..........उस परमसत्ता की ओर उन्हें बढ़ाना । ऐसे लोग इसी कार्य के लिए आस्तित्व द्वारा निर्धारित होते हैं । इनका और कोई कार्य होता नही है .................... ऐसे लोग फिर शरीर छोड़ दें तो ? कोई बात नही ......आस्तित्व दूसरों को भेज देता है ..........उसके पास कमी तो है नही ऐसे सन्तों और साधुओं की ...........मैने कहा । अब बताइये .............ऐसे साधुओं की सेवा अगर आपके द्वारा होती है .....तो ये अच्छा है या बुरा है ? ऐसे निस्वार्थ जन की सेवा आपके द्वारा होती है .....तो आस्तित्व आप पर प्रसन्न होगा .....या नाराज होगा .....? विचार कीजिये । आपको नही लगता .............ऐसे साधुओं की सेवा करना ही आपका परम धर्म है .....! नही नही .....आप जिनका नाम लेकर मुझे कह रहे हैं ...........कि आजकल के ये साधू ............तो मित्र ! मै उन्हें साधू मान ही नही रहा । साधू तो न अपनी ऊर्जा आश्रम बनानें में व्यय करेगा ......न हॉस्पिटल खोलनें में ........न कोई और सामाजिक कार्यों में उलझेगा .....। उसका काम तो बस इतना ही होगा .......सकारात्मकता ऊर्जा को इस जगत के आबोहवा में फैलाना ..........निस्वार्थ प्रेम द्वारा सबको शान्ति की राह बताना ..........। अब ऐसे व्यक्ति की सेवा आपको अगर मिल जाए ......( वैसे तो मिलनी मुश्किल है ....क्यों की ऐसे लोग सेवा लेते भी तो नही हैं ) तो आप धन्य हैं .......आपका धन या तन से की गयी सेवा आपको वो दे सकती है ......जिसके बारे में आपनें सोचा भी नही होगा । अब आप कहेंगें कि मै साधू सेवा क्यों करूँ ? मेरी बात समझ तो गए ना आप ? मैने उनसे पूछा । हाँ ...यही है सच्ची सेवा.....जो समाज में निस्वार्थ प्रेम को फैला रहा है ...उसकी सेवा .......। उन्होंने मेरी बात स्वीकार की.........साधू की सेवा करनी ही चाहिये । आप क्या कहोगे ? साधकों ! Harisharan

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*भाईजी का नोहरा जहां प्रतिदिन सत्संग हुआ करता था, एक स्वच्छता करने एक गरीब ब्राह्मणी आती थी।* बुढ़िया की मृत्यु के समय: भाईजी इस बुढ़िया की हाथ की नाड़ी थामे हंस रहे थे। भाईजी की यह हंसी भी अपार कृपामयी थी। भगवद्भक्त शिरोमणि भाईजी के नोहरे की झाड़ू-बुहारी सेवा करने मात्र से वह बुढ़िया निहाल हो गई। उसका मानव-देह धारण करना सफल हो गया था। *बुढ़िया ने प्रतिदिन महाप्रेमीशिरोमणि भाईजी की चरणरज से अपने को पवित्र किया था*। अतः वह परम कृतकृत्य हुई, भाईजी के ही रूप में भगवान के दर्शन करती हुई, निष्कंटक भगवद्धाम को गयी। केडियाजी! इस बुढ़िया ने मेरी आंखे खोल दी। वह मुझे कहा करती थी कि बाबा! नदी में तैरनेवाले मनुष्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक बात होती है-हाथों और पैरों से नदी के जल को फैंकते जाना। जो निरन्तर जल को काट नहीं सकता, वह नया तैरनेवाला नदी के पार नहीं जा सकता। इसी प्रकार इस महाभयावनी दुस्तर माया-नदी को तैरकर जो उस पार भगवतलोक को जाना चाहते हैं उन्हें अहंकार और विषयाशक्ति रूपी जल को बराबर अलग फैंकते रहना चाहिए। जो अहंकार और आसक्ति दूर नहीं फेंक सकता, वह इस मायानदी के जल में रमकर अतल तल में डूब जाएगा। परन्तु इस मायानदी में इतने भीषण भंवर पड़ते हैं कि हाथ-पैर मारते रहने पर भी उनके थक जाने की अथवा श्वास टूट जाने की संभावना बहुत ही अधिक रहती है। अतएव बीच-बीच मे बाबा! आलम्बन, कोई (आसरा) सहारा चाहिए, जहां कुछ देर ठहरकर कोई विश्राम करले। *इन भाईजी जैसे संतो की चरणरज के सहारे से (बल से) मुझे तो तैरना पड़ा ही नहीं। मैं तो इन महापुरुष की कृपा-रूपी सुदृढ़ नाव पर सवार होकर अनायास ही भवसागर से तर गयी।* बुढ़िया के भाव यही थे, यद्यपि यह भाषा मेरे द्वारा परिशुद्ध की गयी है। *महाभाव दिनमणि*

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🍃 आज आश्विन शुक्ल दशमी को जगद्गुरु श्री मध्वाचार्यपाद (1238- 1317 ) का आविर्भाव दिवस है । 🍃 बड़ी सूरमाकुञ्ज वृन्दावन में विविध आयोजनों के साथ उत्सव मनाया जा रहा है ।। 💐 इनका संक्षिप्त चरित्र नीचे प्रस्तुत किया गया है -- श्रीमन्माध्वाचार्य जी का जन्म उडिपी से तीन मील दूर उत्तरी कन्नड़ में सन १२३८ में आज ही के दिन विजयदशमी को हुआ। केवल ५ वर्ष की आयु में ही उन्होंने दीक्षा ग्रहण की एवं १२ वर्ष की आयु में सन्यास लेकर मोह के बंधनों से मुक्त होकर भक्ति पथ की ओर अग्रसर हुए।आपके पिताजी का नाम श्रीमध्वगेह भट्ट व माताजी का नाम श्रीमती वेदविद्या था। पवनदेव के प्रथम अवतार हैं श्रीहनुमान जी, द्वितीय अवतार हैं श्रीभीमसेन व तृतीय अवतार हुए श्रीमाध्वाचार्य जी। एक बार बचपन में आपने अपने पिताजी से कहा कि श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित यह विचार कि जीव ही ब्रह्म है तथा भगवान निराकार-निर्विशेष हैं, बिल्कुल गलत है । मैं, श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित इस मायावाद के मत का खण्डन करूँगा। आपके पिताजी, ज्यादा वृद्ध होने के कारण, हाथ में छड़ी लेकर चलते थे। उन्होंने कहा, ' बेटा ! श्रीशंकराचार्य जी का सिद्धान्त पूरे भारत में फैला हुआ है, और उसका सब सम्मान करते हैं। उनका सिद्धान्त कोई खण्डित कर दे, ऐसा योग्य व्यक्ति कोई नज़र में नहीं आता। जैसे मेरे हाथ की छड़ी, हरा-भरा पेड़ नहीं बन सकती, उसी प्रकार श्रीशंकराचार्य जी के सिद्धान्त को कोई काट नहीं सकता।' आपने साथ ही कहा, ' हे पिताजी, यदि कोई आपके हाथ की छड़ी को वृक्ष में बदल दे, तो क्या आप मान लेंगे कि श्रीशंकराचार्य जी के सिद्धान्त को काटा जा सकता है?' पिताजी को कुछ न बोलता देख, आपने पिताजी से उनकी छड़ी ली और छड़ी बाहर आँगन में ज़मीन में गाड़ दी । आप ने कहा, ' हे छड़ी, अगर मैं श्रीशंकराचार्य जी के मत को खण्डित कर दूँगा तो तुम अभी हरे-भरे पेड़ के रूप में परिवर्तित हो जाओ।' दोनों के देखते ही देखते, वो छड़ी बढ़ने लगी। उसका तना मोटा होता गया, पत्ते आने लगे, फल भी लग गये। कुछ ही समय में वहाँ छड़ी के स्थान पर एक हरा-भरा वृक्ष था। आपके पिताजी ने यह देख कर आपको अपने समीप बुलाया व पीठ थपथपाते हुए कहा,' हाँ, श्रीशंकराचार्य जी द्वारा स्थापित मायावाद का खण्डन अब सम्भव लगता है।' आपके पिताजी ने मान लिया कि उनका पुत्र साधारण मनुष्य नहीं है। आगे चल कर आपने मायावाद को काटने के लिये उसमें 100 दोष गिनाये व 'मायावाद-शतदूषणी' नामक ग्रन्थ भी लिखा।

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