संतमहापुरुष

🙌🏼 आज श्रील रूप गोस्वामी जी के तिरोभाव महोत्सव पर विशेष ::: श्रीराधारानी की अनुगता सखियों में प्रधाना श्री ललिता सखी .....श्री ललिता जी की अनुगता मंजरियों में प्रधान श्रीरूप मंजरी के अभिन्न स्वरूप हैं - श्रील रूप गोस्वामी। श्रीरूप गोस्वामी श्रीगौरलीला में षड गोस्वामियों में प्रधान हैं। आप पूर्व बंगाल में कुमारदेव ब्राह्मण के पुत्र के रूप में अवतरित हुए। इनका जन्म 1493 ई (तदनुसार 1415 शक.सं.) को हुआ था। इन्होंने 22 वर्ष की आयु में गृहस्थाश्रम त्याग कर दिया था और51 वर्ष ये ब्रज में ही रहे। इन्होंने श्री सनातन गोस्वामी से दीक्षा ली थी। इन्हें शुद्ध भक्ति सेवा में महारत प्राप्त थी, अतएव इन्हें भक्ति-रसाचार्य कहा जाता है। ये अपने अग्रज श्री सनातन गोस्वामी सहित नवाब हुसैन शाह के दरबार के उच्च पदों का त्याग कर श्रीगौरांग महाप्रभु के भक्ति संकीर्तन में हो लिए थे। भगवान चैतन्य महाप्रभु के चार आदेशों - भगवान श्रीकृष्ण की लीला स्थलियों का पुनरुद्धार, अर्चाविग्रहों की स्थापना तथा उनकी विधिवत पूजा, भक्तिमय शास्त्रों का लेखन, भक्तियोग के नियमों का प्रचार-की पूर्ति के लिए श्रीरूप गोस्वामी तथा श्री सनातन गोस्वामी वृन्दावन गए। सन 1564 ई (तदा० 1486 शक. को श्रावण की शुक्ल द्वादशी) को आज ही के दिन 73 वर्ष की आयु में इन्होंने नित्यलीला में प्रवेश किया। वृंदावन में "श्रीराधा दामोदर मंदिर", श्री रूपगोस्वामी जी सेवाकुंज के अन्तर्गत यहीं भजन कुटी में वास करते थे।मन्दिर के उत्तर भाग में श्रीपाद रूपगोस्वामी की भजन- कुटी और समाधि मन्दिर स्थित है। यहीं पर श्री रूप गोस्वामी ने श्री "भक्तिरसामृत सिन्धु", "उज्जवलनीलमणि " एवं अन्यान्य भक्ति ग्रंथों का संकलन किया। श्री गोविन्द जी के विग्रह का सेवा प्रकाश किस प्रकार होगा, इस चिन्ता में श्रीरूप गोस्वामी श्रीव्रजमण्डल में श्रीगोविन्द देव जी की खोज के लिये गाँव-गाँव और वन-वन में फिरे। ब्रजवासियों के घर-घर में खोजने पर भी कहीं भी गोविन्द देव का दर्शन ना पाकर, धैर्य खोकर एक दिन आप यमुना के किनारे विरह से व्याकुल हृदय से बैठे थे कि ऐसे समय में व्रजवासी का रूप धारण कर के एक व्यक्ति उनके निकट आ उपस्थित हुआ और उसने श्रीरूप गोस्वामी के दुःख का कारण पूछा। श्री रूप गोस्वामी जी ने उनके रूप और वचनों से आकृष्ट होकर हृदय की सारी बात उसके आगे निवेदन कर दी। व्रजवासी श्रीरूप को सान्त्वना देकर बोला, 'चिन्ता का कोई कारण नहीं। श्रीवृन्दावन के गोमाटीला नामक योगपीठ में गोविन्द देव गुप्त रूप से रहते हैं। एक सुलक्षणा गाय प्रतिदिन पूर्वाह्ण के समय, उल्लास से भर कर वहाँ दूध देती है ।' यह कह कर व्रजवासी अन्तर्धान हो गया। 'कृष्ण आये थे, मैं पहचान न पाया' ,यह सोच कर श्री रूप मूर्च्छित हो गये। अन्ततः श्रीरूप ने किसी प्रकार विरह दुःख को संवरण करके व्रजवासियों को गोविन्द देव जी के प्रकट होने के स्थान की बात बताई। व्रजवासियों ने परम उल्लास के साथ गोमाटीला की भूमि की खुदाई की और वहाँ से करोड़ों कामदेवों को मोहित करने वाले व्रजेन्द्रनन्दन श्री गोविन्द देव जी का आविर्भाव हुआ। श्री रूप गोस्वामी को प्राय: हर समय श्रीराधाकृष्ण की मधुरलीलाओं की स्फूर्ति होती रहती थी।पहले तो जो कोई उनके पास आता भजन-साधन में अपनी कुछ समस्याएं लेकर, वे बड़े ध्यान से उसकी बात सुनते और उसकी शंकाओं का समाधान करते पर अब लीला स्फूर्ति के भाव में इतना डूब जाने के कारण उन्हें किसी के आने-जाने का पता भी न चलता। एक बार श्री कृष्णदास नाम के एक विशिष्ट वैष्णव-भक्त, जो पैर से लंगड़े थे, उनके पास आए, उस समय श्रीरूप श्रीराधाकृष्ण की एक दिव्य लीला के दर्शन कर रहे थे जिसमें श्रीराधा एक वृक्ष की डाल से पुष्प तोड़ने की चेष्टा कर रही थीं पर डाल कुछ ऊँची थी इसलिए प्रिया जी उचक-उचक कर उसे पकड़ना चाह रही थीं, पर वह हाथ में नहीं आ रही थी। इस दृश्य को श्यामसुन्दर दूर से देख रहे थे, वे चुपके से आए और श्रीराधारानी के पीछे से डाल को पकड़कर धीरे-धीरे इतना नीचा कर दिया कि डाल उनकी पकड़ में आ जाय। प्रिया जी ने जैसे ही डाल पकड़ी श्यामसुन्दर ने उसे छोड़ दिया, श्रीराधारानी वृक्ष से लटक कर रह गयीं। लीला में यह देख श्रीरूप गोस्वामी को हंसी आ गयी। श्रीकृष्णदास समझे कि वे उनका लंगड़ापन देखकर हंस रहे हैं इसलिए क्रुद्ध हो वे तत्काल वहाँ से चले गये पर श्रीरूप गोस्वामी को इसका कुछ भी पता नहीं था। अकस्मात श्रीरूप की लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी।वे बहुत चेष्टा करते तो भी लीला-दर्शन बिना उनके प्राण छटपटाने लगे पर इसका कारण वे न समझ सके। श्रीसनातन गोस्वामी के पास जाकर उन्होंने अपनी व्यथा का वर्णन किया और इसका कारण जानना चाहा तो उन्होंने कहा-'तुमसे जाने या अनजाने में कोई वैष्णव-अपराध हुआ हैं, जिसके कारण लीला-स्फूर्ति बन्द हो गयी हैं।जिनके प्रति अपराध हुआ है, उनसे क्षमा मांगने से ही इसका निराकरण हो सकता है।श्रीरूप गोस्वामी ने पूछा- 'जान-बूझकर तो मैंने कोई अपराध किया नहीं, यदि अनजाने में किसी के प्रति कोई अपराध हो गया है तो उसका अनुसन्धान कैसे हो? श्रीसनातन गोस्वामी ने परामर्श दिया-'तुम वैष्णव-सेवा का आयोजन कर स्थानीय सब वैष्णवों को निमन्त्रण दो।यदि कोई वैष्णव निमन्त्रण स्वीकार न करे तो जानना कि उसी के प्रति अपराध हुआ है। श्रीरूप गोस्वामी ने ऐसा ही किया। खंज कृष्णदास बाबा ने निमन्त्रण स्वीकार नहीं किया।जो व्यक्ति निमन्त्रण देने भेजा गया था, उससे उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी के प्रति क्रोध व्यक्त करते हुए उस दिन की घटना का वर्णन किया। श्रीरूप गोस्वामी ने जाकर उनसे क्षमा माँगी और उस दिन की अपनी हंसी का कारण बताने पर बाबा संतुष्ट हुए और श्रीरूप गोस्वामी को लीला-स्फूर्ति फिर से होने लगी। एक समय श्रीसनातन गोस्वामी और श्रीरूप गोस्वामी श्रीराधाकुण्ड की उत्तर-पूर्वी दिशा में श्रीरघुनाथदास गोस्वामी की भजन कुटी के निकट बैठे हुए कृष्ण कथा में विभोर हो रहे थे। श्रीसनातन गोस्वामी ने श्रीरूप गोस्वामी से पूछा - रूप! आजकल क्या लिख रहे हो? श्रील रूप गोस्वामी स्वरचित 'चाटुपुष्पाञ्जलि:' नामक स्तोत्र उनके हाथों में दे दिया।उसका पहला श्लोक था– नव–गोरोचना-गौरीं प्रवेरेन्दीवराम्बराम्। मणि-स्तवक–विद्योति– वेणीव्यालग्ङणाफणां।। श्रीसनातन गोस्वामी ने उसे पढ़कर कहा - रूप! तुमने 'वेणीव्यालग्ङणाफणा' पद के द्वारा श्रीराधिका की लहराती हुई काली बंकिम वेणी की तुलना विषधर काली नागिन से की है। श्रीराधिका तो सर्वगुण सम्पन्न, परम लावण्यवती, सुकोमल एवं परम मधुर श्रीकृष्ण की प्रिया हैं। उनकी सुन्दर वेणी की यह उपमा मुझे रूचिकर प्रतीत नहीं हो रही। श्रीरूप गोस्वामी ने मुस्कुराते हुए नम्रतापूर्वक इसमें संशोधन करने के लिए प्रार्थना की। श्रीसनातन गोस्वामी को उस समय अन्य कोई उपमा न सूझी 'पीछे संशोधन करूँगा' ऐसा कहकर वे इसी विषय की चिन्ता करते हुए वहाँ से विदा हुए। जब वे कुण्ड की पश्चिम दिशा में झूलन तला पर पहुँचे, तो उन्होंने कदम्ब वृक्ष की डालियाँ पर एक सुन्दर झूले पर एक गोपकिशोरी को झूलते हुए देखा। उसकी सहेलियाँ मल्लार राग का गायन करती हुई उसे झुला रही थीं।श्रीसनातन गोस्वामी ने उस झूलती हुई किशोरी की लहराती हुई काली वेणी पर लहराती हुई काली नागिन को देखा।वे उसे बचाने के लिए उधर ही दौड़ते हुए पुकारने लगे - लाली! लाली! सावधान तुम्हारी वेणी पर काली नागिन है। किन्तु जब निकट पहुँचे तो देखा कुछ भी नहीं है, वहाँ न किशोरी है, न सखियाँ हैं और न झूला। वे उस दृश्य का स्मरणकर आनन्द से क्रन्दन करने लगे और उल्टे पाँव श्रीरूप गोस्वामी के पास पहुँचे और बोले -रूप! तुम्हारी उपमा सर्वांगसुन्दर है।किशोरीजी ने मुझ पर अनुग्रह कर अपनी बंकिम वेणी का स्वयं ही दर्शन कराया है।उसमें संशोधन की कोई आवश्यकता नहीं है। 🙌🏼 श्रीराधारमण दासी परिकर 🙌🏼

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🔔 श्रील बंशी दास बाबा जी की आज तिरोभाव तिथि है । श्रील वंशीदास बाबा जी अवधूत परमहंस वैष्णव थे । श्रीवंशी दास बाबा जी ने श्रील गौर किशोर दास बाबा जी से बाबा जी वेश लिया था । एक बार की बात है कि एक व्यक्ति प्रतिदिन बाबा जी के पास आता और पूछता कि भगवान की प्राप्ति कैसे होगी ? बाबा जी महाराज चुप ही रहते थे, ज्यादा कुछ नहीं बोलते थे उस व्यक्ति के बार - बार पूछने पर बाबा जी ने सिर्फ इतना ही बोला --- रोना अर्थात् जब तक भगवान के लिए रोना नहीं आएगा तब तक भगवान की कृपा प्राप्त नहीं होगी । श्री वंशीदास बाबा जी महाराज जहां भी कहीं वट वृक्ष देखते थे, उसे वृंदावन का वंशीवट समझ कर उसके नीचे बैठ जाया करते थे । उनके पास कपड़े के दो झोले थे .......एक झोले में वे निताई - गौरांग और दूसरे झोले में श्रीराधा - गोविंद जी की मूर्तियां रखते थे। वे नित्य उनकी पूजा करते थे । झोले से मूर्तियां निकाल कर मन मन में मंत्रादि जप करते हुए भाव के साथ पूजा करने के पश्चात फिर उन मूर्तियों को उन्हीं झोले में रख देते थे । आज ऐसे परमहंस अवधूत वैष्णव की अप्रकट तिथि पर दंडवत प्रणाम करते हुए उनकी कृपा प्रार्थना करते हैं । 👏🏻

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🔔 श्रीरघुनंदन ठाकुर जी की तिरोभाव तिथि पर विशेष श्रीकृष्ण के प्रियनर्म सखा होकर व्रज में श्रीराधामाधव जी की लीला में सहायता करने वाले प्रद्युम्न जी, श्रीचैतन्य लीला में रघुनन्दन बने हैं......... श्रीरघुनंदन जी के पिताजी का नाम श्रीमुकुंद दास है। श्रीमुकुंद दास अपने घर पर भगवान गोपीनाथ जी की सेवा करते थे। एक बार उनको किसी कार्य के लिए बाहर जाना था। इसलिए उन्होंने अपने पुत्र रघुनन्दन को कहा कि आज तुम गोपीनाथ जी को भोग लगवा देना। रघुनन्दन अभी बचपन की बाल्य अवस्था में थे , सो सरल भाव से गोपीनाथ जी को बोलने लगे खाओ......... लो खाओ .....लो खाओ......गोपीनाथ जी तो प्रेम के वश में हैं ,उन्होंने सारा भोग खा लिया। जब मुकुंद दास जी लौटे और प्रसाद के लिए पूछा तो रघुनंदन जी ने कहा वो तो गोपीनाथ जी सारा खा गए। यह सुनकर मकुन्द जी विस्मित हो गए। फिर किसी और दिन वह रघुनंदन जी को सेवा देकर खुद मंदिर के बाहर छिप गए। इधर बड़ी प्रसन्नता के साथ रघुनंदन जी ने अपने हाथ से गोपीनाथ जी को लड्डू दिया। श्रीगोपीनाथ जी ने जब आधा लड्डू खा लिया तो उसी समय श्री मुकुंद जी कमरे में देखने के लिए आ गए। आधा लड्डू जो बच गया था ,उसे श्रीगोपीनाथ जी ने नहीं खाया। यह देखकर मुकुंद जी प्रेम में विभोर हो गए और अति प्रसन्न होकर रघुनन्दन को गोद में उठा लिया। कौन ऐसा है जो ऐसे परम वैष्णव का यश नही गायेगा।

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