श्रृंगार🌼

द्वितीय शिक्षापत्र..... ================= प्रभु के दर्शन करो तब एक एक शृंगार की झांकी सावधानी पूर्वक करनी। प्रत्येक शृंगार कोई भाव से बिराजते है। इस प्रकार शृंगार के दर्शन करने से उनमे रहे हुए भावो का दान प्रभु जीव को करते है। इन शृंगार का नित्य स्मरण करने से जीव का लौकिक समाप्त हो जाता है। शृंगार के स्मरण के अनेक विध भाव जागृत होते है। श्री हरिरायजी शृंगार का अर्थ बताते है - 'शृंग' अर्थात गूढ़ भाव और 'र' अर्थात उसमे रहे हुए रस। हृदय मे रहे हुए भगवद् रस ही शृंगार है। शृंगार करने के बाद हाथ मे अत्तर ले कर समर्पण किया जाता है। अत्तर यानि जो अपने तथा प्रभु के बिच का अंतर दूर करता है। दोनो की एक ही गंध कर दे वही अत्तर। या लिये उसे सुगंधि कही जाय। श्रीजी की और उनके सेवक की एक गंध कर दे। जब हम अत्तर समर्पण करे और वह प्रसादी सुगंध अपने भीतर जाये तब अपने भीतर रहे हुए दोष रुपी दुर्गंध दूर हो जाय।

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नगर अधिष्ठात्री माता रूप में, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश, में सई नदी(सहायक), गोमती नदी के तट पर अवस्थित हैं।
माता का श्रृंगार अविस्मरणीय है।
दर्शन हेतु दूर दूर से भक्त जन आते ,मनौती मानते, व पूरी होने पर नारियल-बलि देते,चुनरी,प्रसाद चढ़ाते हैं।...

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🌷 🌱🌿जयश्रीराधे🌿🌱🌷

*।। प्रिय तेरी चितवन ही में टोना ।।*

*।। नित्य सेवा, रसिक दास, राग कल्याण, शयन सन्मुख के पद ।।*

*प्रिय तेरी चितवन ही में टोना ।*
*तन मन धन बिसर्यो जब ही तें, देख्यो स्याम सलोना ॥१॥*

*ढिंग रहबे कु होत विकल मन, भावत नाहि ...

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