श्रीकृष्ण

Neetu koshik Aug 26, 2019

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#कृष्ण_जन्माष्टमी_विशेष . जब द्रौपदी महावीरों की सभा में निस्सहाय खड़ी थी भीष्म - हो तो ग़लत रहा है पर पत्नी पर पति का अधिकार तो सिद्ध है। द्रोण - राजा का आदेश ब्रह्म का विधान है। कर्ण - दासी का मान या अपमान कैसा? विदुर - मैं इस सभा का त्याग करता हूँ। धृतराष्ट्र - क्या करूँ, दुर्योधन हठ नहीं छोड़ता। कृष्ण (हज़ार कोस दूर किसी युद्ध में) - आज दुर्योधन, दुशासन, शकुनि, कर्ण, भीष्म, द्रोण और हर कुरु योद्धा की हत्या की घोषणा करता हूँ। भगवान कभी मनुष्य रूप में आते हैं ऐसा मैं कभी नहीं समझ पाया ! कृष्ण जीवन में हों तो ईश्वर के अवतार की आवश्यकता भी नहीं। जब जब रीति और धर्म के रूढ़ि अर्थों में फँस कर द्रौपदी कुरुओं की सभा में खड़ी कर दी जाएगी, तब तब रूढ़िवादी ढकोसलों की चिता जलाई जाएगी। और भगवान श्री कृष्ण हमें रास्ता दिखाएँगे। कृष्ण जन्माष्टमी पर यही संदेश है। कोई धर्म माता के वस्त्र से पवित्र नहीं। कोई पैग़म्बर माता के पैरों की ख़ाक भी नहीं। बात जब माता के सम्मान की हो तब सब कुछ छोड़ कर दुर्योधनों के शिरच्छेद करना ही एक मात्र धर्म है। कृष्ण से बड़ा विद्वान कोई नहीं था, विधूर भी नहीं, अर्जुन को दिया उपदेश आज भी उठाकर देख लीजिए सृष्टि उसी से चल रही है । जड़े वही हैं । धर्म क्या होता है कृष्ण से बेहतर कौन बता सकता हैं । जय जय ।। जय श्री कृष्णा

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सुनो कृष्ण ! प्रशंसक हूँ तुम्हारी इसमें कोई संदेह नहीं। तुम्हारे रूप, यौवन, प्रेम और सोलह कलाओं पर मोहित, तुम्हारे नटखटपन और बाल सुलभता के मोहपाश में बंधी हुई, तुम्हारे विराट, असीम स्वरूप के समक्ष नतमस्तक। अनुयाई भी हूँ तुम्हारे उस 'परम ज्ञान' की जहाँ तुम 'चरम भोग' में लिप्त रहकर भी 'महायोगी' होना सिखाते हो परंतु..... दिल से एक बात कहूँ अगर अन्यथा न लो तो..... यदि मिलता मुझे चयन का अधिकार तो मैं तुम्हें मित्र बनाती प्रेमी नहीं क्योंकि तुम्हें प्रेम में छोड़ देने की आदत है। मित्र तुम अद्भुत हो। मित्रता में सर्वस्व वारते हो परंतु प्रेम में तुम ले लेते हो सर्वस्व। मित्र के चरणों को आँसुओं से धोने वाले तुम, डुबो देते हो उसे पूरा का पूरा आँसुओं में जो प्रेम कर बैठे तुमसे। मित्र को तुम दे देते हो तीनों लोक और जिससे प्रेम करते हो उसे देते हो बस बांसुरी की टूटी हुई कुछ तानें। तुम प्रेम के देवता सही मगर अच्छे प्रेमी नहीं तुम, प्रेम निभाते नहीं तुम.... इसलिए यदि चुनना होता मुझे तुम्हारा 'कुछ' बनना तो मित्र बनती तुम्हारी प्रेमिका नहीं...., सुदामा बन जाती....., राधा नहीं।

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OM PRAKASH CHOUBEY Aug 26, 2019

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