शुभ-शनिवार

Neha Sharma, Haryana Feb 15, 2020

जय श्री शनिदेव की जय वीर बजरंग बली की शुभ प्रभात् नमन *क्यों किया था हनुमानजी ने लंका दहन, कारण जानकर हैरान रह जाएंगे!!! 🙏🏻🌹* हनुमानजी के बारे में जितना लिखा या कहा जाए, वह कम है। जब हनुमानजी ने श्रीराम के आदेश पर लंका में प्रवेश किया तो उन्हें कई बाधाओं का सामना करना पड़ा, जैसे विशालकाय समुद्र को पार करते वक्त राक्षसी सुरसा के मुख में से होकर निकलना और फिर लंका के चारों ओर बने सोने के परकोटे को फांदने के बाद लंकिनी नाम की एक राक्षसी को मार देने आदि। लंकिनी को मारने के बाद रावण तक यह खबर पहुंच जाती है कि कोई वानर महल में प्रवेश कर गया है। इसके बाद महल में हनुमानजी विभीषण को रामभक्त जानकर उनसे मुलाकात करते हैं। फिर अक्षय वाटिका में प्रवेश कर माता सीता को राम की दी हुई अंगूठी देते हैं। इसके बाद वे अशोक वाटिका का विध्‍वंस कर देते हैं। इस खबर के फैलने के बाद मेघनाद का पुत्र अक्षय कुमार उन्हें मारने के लिए आता है लेकिन हनुमानजी उसका वध कर देते हैं। यह खबर लगते ही लंका में हाहाकार मच जाता है तब स्वयं मेघनाद ही हनुमानजी को पकड़ने के लिए आता है। मेघनाद हनुमानजी पर कई तरह के अस्त्र-शस्त्र का प्रयोग करता है लेकिन उससे कुछ नहीं होता है। तब अंत में मेघनाद ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है। तब हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि ब्रह्मास्त्र को नहीं मानता हूं तो उसकी अपार महिमा मिट जाएगी। तब हनुमानजी मेघनाद के ब्रह्मास्त्र का सम्मान रखकर वृक्ष से गिर पड़ते हैं। फिर मेघनाद उन्हें नागपाश में बांधकर रावण की सभा में ले जाता है। वहां हनुमानजी हाथ जोड़कर रावण को समझाते हैं कि तू जो कर रहा है, वह सही नहीं है। प्रभु श्रीराम की शरण में आ जा। हर तरह से हनुमानजी रावण को शिक्षा देते हैं लेकिन रावण कहता है- रे दुष्ट! तेरी मृत्यु निकट आ गई है। अधम! मुझे शिक्षा देने चला है। हनुमानजी ने कहा- इससे उलटा ही होगा। यह तेरा मतिभ्रम है, मैंने प्रत्यक्ष जान लिया है। यह सुनकर रावण और कुपित हो जाता है और कहता है- मैं सबको समझाकर कहता हूं कि बंदर की ममता पूंछ पर होती है अत: तेल में कपड़ा डुबोकर इसकी पूंछ में बांधकर फिर आग लगा दो। जब बिना पूंछ का यह बंदर वहां जाएगा, तब यह मूर्ख अपने मालिक को साथ ले आएगा। जिनकी इसने बहुत बड़ाई की है, मैं जरा उनकी प्रभुता तो देखूं! तब हनुमानजी को पकड़कर सभी राक्षस उनकी पूंछ को कपड़े से लपेटने लगते हैं। हनुमानजी अपनी पूंछ को बढ़ाना प्रारंभ करते हैं तो सभी देखते रह जाते हैं। पूंछ के लपेटने में इतना कपड़ा और घी-तेल लगा कि नगर में कपड़ा, घी और तेल ही नहीं रह गया। हनुमानजी ने ऐसा खेल किया कि पूंछ बढ़ गई। नगरवासी लोग तमाशा देखने आए। वे हनुमानजी को पैर से ठोकर मारते हैं और उनकी हंसी करते हैं। अंत में उनकी पूंछ में आग दी गई तब बंधन से निकलकर हनुमानजी सोने की अटारियों पर जा चढ़े। उनको देखकर राक्षसों की स्त्रियां भयभीत हो गईं। उस समय भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन चलने लगे। हनुमानजी अट्टहास करके गरजे और बढ़कर आकाश से जा लगे। तब वे अपनी जलती हुई पूंछ से दौड़कर एक महल से दूसरे महल पर चढ़कर उनमें आग लगाने लगे। देखते ही देखते नगर जलने लगता है और चारों ओर अफरा-तफरी व चीख-पुकार मच जाती है। पुराणों में लंकादहन के पीछे भी एक ओर रोचक बात जुड़ी है। दरअसल, हनुमानजी शिव अवतार हैं। शिव से ही जुड़ा है यह रोचक प्रसंग। एक बार माता पार्वती की इच्छा पर शिव ने कुबेर से सोने का सुंदर महल का निर्माण करवाया किंतु रावण इस महल की सुंदरता पर मोहित हो गया और वह ब्राह्मण का वेश रखकर शिव के पास गया। उसने महल में प्रवेश के लिए शिव-पार्वती से पूजा कराकर दक्षिणा के रूप में वह महल ही मांग लिया। भक्त को पहचान शिव ने प्रसन्न होकर वह महल दान में दे दिया। दान में महल प्राप्त करने के बाद रावण के मन में विचार आया कि यह महल असल में माता पार्वती के कहने पर बनाया गया इसलिए उनकी सहमति के बिना यह शुभ नहीं होगा। तब उसने शिवजी से माता पार्वती को भी मांग लिया और भोले-भंडारी शिव ने इसे भी स्वीकार कर लिया। जब रावण उस सोने के महल सहित मां पार्वती को ले जाना लगा तब अचंभित और दु:खी माता पार्वती ने विष्णु का स्मरण किया और उन्होंने आकर माता की रक्षा की। जब माता पार्वती अप्रसन्न हो गईं, तो शिव ने अपनी गलती को मानते हुए मां पार्वती को वचन दिया कि त्रेतायुग में मैं वानर रूप में हनुमान का अवतार लूंगा, उस समय तुम मेरी पूंछ बन जाना। जब मैं माता सीता की खोज में इसी सोने के महल यानी लंका जाऊंगा तो तुम पूंछ के रूप में लंका को आग लगाकर रावण को दंडित करना। यही प्रसंग भी शिव के श्री हनुमान अवतार और लंकादहन का एक कारण माना जाता है। [: *🌸शास्त्रों में भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतरण की भविष्यवाणियां 🌸🙏🏻* कलियुग में बुद्धिमान लोग, कृष्ण-नाम के भजन में निरंतर रत रहने वाले अवतार की पूजा संकीर्तन द्वारा करते हैं । यद्यपि वे श्यामवर्ण के नहीं हैं, परन्तु वे स्वयं कृष्ण हैं । – भागवत ११.५.३२ प्रारंभिक लीलाओं में वे स्वर्णिम वर्ण के एक गृहस्थ के रूप में प्रकट होते हैं । उनके प्रत्यंग सुन्दर हैं और चन्दन का लेप लगाये हुए वे तप्तकांचन के समान दिखते हैं । अपनी अंत की लीलाओं में उन्होंने संन्यास स्वीकार किया, एवं वे सौम्य एवं शांत हैं । वे शांति एवं भक्ति के उच्चतम आश्रय हैं क्योंकि वे मायावादी अभक्तों को भी शांत कर देते हैं । – महाभारत (दान-धर्म पर्व, अध्याय १८९) मैं नवद्वीप की पावन भूमि पर माता शचिदेवी के पुत्र के रूप में प्रकट होऊंगा । – कृष्ण यमल तंत्र कलियुग में जब संकीर्तन आंदोलन का उदघाटन होगा तब मैं सचिदेवी के पुत्र के रूप में अवतरित होऊंगा । – वायु पुराण कभी कभी मैं स्वयं एक भक्त के वेश में उस धरातल पर प्रकट होता हूँ । विशेष रूप से कलियुग में मैं सची देवी के पुत्र के रूप में संकीर्तन आंदोलन आरम्भ करने के लिए प्रकट होता हूँ । – ब्रह्म यमल तंत्र हे महेश्वरी ! स्वयं परम पुरुष श्री कृष्ण, जो राधारानी के प्राण एवं जगत के सृष्टिकर्ता, पालक एवं विध्वंसक हैं, गौर के रूप में प्रकट होते हैं । – अनंत संहिता परम पुरुषोत्तम भगवान, परम भोक्ता, गोविन्द जिनका रूप दिव्य है, जो त्रिगुणातीत हैं, जो सभी जीवों के हृदय में विद्यमान सर्व्यापक परमात्मा हैं, वे कलियुग में दोबारा प्रकट होंगे । परम-भक्त के रूप में, परम पुरुषोत्तम भगवान गोलोक वृन्दावन के समान, गंगा के तट पर नवद्वीप में द्विभुज सुवर्णमय रूप ग्रहण करेंगे । वे विश्वभर में शुद्ध-भक्ति का प्रचार करेंगे। – चैतन्य उपनिषद ५ कलियुग की प्रथम संध्या में परम पुरुषोत्तम भगवान सुवर्णमय रूप ग्रहण करेंगे । सर्प्रथम वे लक्ष्मी के पति होंगे तत्पश्चात वे संन्यासी होंगे जो जगन्नाथ पुरी में निवास करेंगे । – गरुड़ पुराण कमल रूपी नगर के मध्य में स्थित मायापुर नामक एक स्थान है और मायापुर के मध्य में एक स्थान है, अंतर्द्विप। यह परम पुरुषोत्तम भगवान, श्री चैतन्य का निवास स्थान है। – छान्दोग्य उपनिषद कलियुग के प्रारम्भ में, मैं अपने सम्पूर्ण एवं वास्तविक आध्यात्मिक स्वरूप में, नवद्वीप-मायापुर में सचिदेवी का पुत्र बनूँगा । – गरुड़ पुराण परम पुरुषोत्तम भगवान इस संसार में दोबारा प्रकट होंगे । उनका नाम श्री कृष्ण चैतन्य होगा और वे भगवान के पवित्र नामों के कीर्तन का प्रचार करेंगे । – देवी पुराण परम पुरुषोत्तम भगवान कलियुग में दोबारा प्रकट होंगे । उनका रूप स्वर्णिम होगा, वे भगवान के पवित्र नाम कीर्तन में आनंद लेंगे और उनका नाम चैतन्य होगा। – नृसिंह पुराण कलियुग के प्रथम संध्या में मैं गंगा के एक मनोरम तट पर प्रकट होऊंगा । मैं सचिदेवी का पुत्र कहलाऊंगा और मेरा वर्ण सुनहरा होगा । -पद्म पुराण कलियुग में मैं भगवान् के भक्त के वेश में प्रकट होऊंगा और सभी जीवों का उद्धार करूँगा । – नारद पुराण पृथ्वी पर कलियुग की प्रथम संध्या में, गंगा के तट पर मैं अपना नित्य सुवर्णमय रूप प्रकाशित करूँगा । – ब्रम्हा पुराण इस समय मेरा नाम कृष्ण चैतन्य, गौरांग, गौरचंद्र, सचिसुत, महाप्रभु, गौर एवं गौरहरि होगा । इन नामों का कीर्तन करके मेरे प्रति भक्ति विकसित करेंगे । – अनन्त संहिता

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white beauty Feb 15, 2020

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Sunil Jhunjhunwala Nov 2, 2018

Good Morning : Sunil Jhunjhunwala

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