विवेकानंद जयंती

Santosh Hariharan Jan 12, 2020

*स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन की एक घटना-* बात उस समय की है जब स्वामी विवेकानंद जी अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्वधर्म सम्मेलन में जाने को थे और स्वामी रामकृष्ण जी का स्वर्गवास हो गया था। स्वामी जी माँ शारदा से आशीर्वाद लेने गए तो माँ शारदा उस समय अपने रसोई में भोजन बना रहीं थीं। विवेकानन्द ने कहा कि- "माँ..! मैं अमेरीका जा रहा हूँ, मुझे आशीर्वाद दें।" तो माँ शारदा ने पूछा- "किसलिए जा रहे हो?" तो विवेकानन्द ने कहा कि- "प्रेम का संदेश पहुंचाने।" तो माँ शारदा ने कहा - "अच्छा ..! वाह..!! वह छुरी (चाकू) जो पड़ी है, वह उठा कर मुझे जरा देना तो।" स्वामी विवेकानन्द ने छुरी सहज ही उठा कर दे दी। उनकी कल्पना में भी यह नहीं था कि मेरे आशीर्वाद का और छुरी के देने-उठाने से कोई संबंध है या मेरे आशीर्वाद मांगने का इससे कोई संबंध हो सकता है। लेकिन विवेकानन्द ने फलक छुरी का हाथ में पकड़ा और छुरी की मुठिया माँ शारदा की तरफ किया। माँ शारदा ने हँसकर वह छुरी रखी और कहा कि- "मेरा आशीर्वाद है, जाओ..!! तुमसे किसी का अहित नहीं होगा।" तब विवेकानंद को एकदम खयाल आया और उन्होंने पूछा- " माँ !! मेरे छुरी उठाकर देने से कोई सम्बन्ध था क्या ? तो माँ शारदा ने कहा- "निश्चित ! क्योंकि तुम जो करते हो उसमें तुम मौजूद हो। मैं देखती थी कि तुम छुरी का फलक(धार) मेरी तरफ पकड़ाते हो या तुम खुद पकड़ते हो। क्योंकि जिस आदमी के मन में प्रेम हो, वह छुरी का फलक खुद पकड़ेगा कि- कहीं दूसरे को चोट न लग जाए।" अब यह बहुत हैरानी की बात है -आमतौर से ही किसी भी आदमी को हम छुरी उठाने को कहेंगे तो वह फलक हमारी तरफ करेगा और डंडा अपने हाथ में पकड़ेगा। यह बिलकुल सहज है, शायद खयाल में भी उसे नहीं आएगा और ना ही हमें खयाल में आएगा। लेकिन उस आदमी के बाबत खबर मिल रही है। उसके इस छोटे से कृत्य में, इस छुरी के उठाने में भी वह पूरा मौजूद है। ध्यान रहे कि हमारे छोटे से छोटे कृत्य में भी हम पूरे मौजूद होते हैं-पूरे के पूरे ! उसमें जरा सा भी हिस्सा हमारा पीछे नहीं रह जाता। आँख के एक छोटे से इशारे में और हाथ के उठने और गिरने में भी हम पूरे मौजूद होते हैं। हमारा सब छोटे से छोटा काम भी हमारे पूरे व्यक्तित्व को समाहित रखता है। इसलिए क्या बाहर है, और क्या भीतर है ! यह छुरी उठाना तो बाहर है, कैसे उठाना है, यह आदमी के भीतर है। 🙏🙏

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