लड्डू_गोपाल_जी_एक_बार_जिस_पर_प्रसन्न_हो_जाएं

*श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि!!!!!!!!*🙏🏻🌹 घर-घर में विराजित श्रीलड्डूगोपाल या गोपालजी ‘योगी जिन्हें ‘आनन्द’ कहते हैं, ऋषि-मुनि ‘परमात्मा’ कहते हैं, संत ‘भगवान’ कहते हैं, उपनिषद् ‘ब्रह्म’ कहते हैं, वैष्णव ‘श्रीकृष्ण’ कहते हैं और माताएं व बहनें प्यार से ‘गोपाल’, ‘लाला’ ‘बालकृष्ण’ या ‘श्रीलड्डूगोपाल’ कहती हैं, वह एक ही तत्त्व है । ये सब अनेक नाम एक ही परब्रह्म के हैं।’ ब्रजमण्डल ही नहीं देश-विदेश के अधिकांश वैष्णवों के घर में भगवान श्रीकृष्ण का बालस्वरूप ‘श्रीलड्डूगोपाल’ या ‘गोपालजी’ के रूप में विराजमान है । स्त्रियां इनकी सेवा-लाड़-मनुहार गोपी या यशोदा के भाव से करती हैं, तो कई लोग श्रीलड्डूगोपाल की सेवा स्वामी, सखा, पुत्र या भाई के भाव से करते हैं । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—‘जो मेरी जिस रूप में आराधना या उपासना करता है, मैं भी उसे उसी रूप में उसी भाव से प्राप्त होता हूँ और उसे संतुष्ट कर देता हूँ।‘ वैष्णवों के कारण ही है भगवान की शोभा भक्ति करने का अर्थ है भगवान की मूर्ति में, भगवान के मंत्र में मन को पिरो देना । भगवान के बालस्वरूप को घर में प्रतिष्ठित कर देने के बाद उन्हें घर का स्वामी मानते हुए घर का प्रत्येक काम उन्हीं की प्रसन्नता के लिए करना भक्ति है । मीराबाई के लिए कहा जाता है कि वह अपने गोपाल का सुन्दर श्रृंगार करतीं और उनके सम्मुख कीर्तन व नृत्य करती थीं । भगवान को श्रृंगार की जरुरत नहीं है । श्रृंगार से भगवान की शोभा नहीं बढ़ती वरन् आभूषणों की शोभा भगवान के पहनने से बढ़ती है । साधक जितने समय तक भगवान का श्रृंगार करता है उसकी आंखें व मन भगवान पर ही टिकी रहती हैं जिससे उसका मन शुद्ध होता है और भगवान से प्रेम बढ़ता है । बालकृष्ण के स्वरूप के श्रृंगार में आंखें फंस जाएं तो मनुष्य की नैया पार हो जाती है । विदुरजी और विदुरानी प्रतिदिन बालकृष्ण का तीन घंटे तक ध्यान फिर पुष्पों से श्रृंगार करते थे । वे विष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करते हुए भगवान के श्रीचरणों में तुलसी अर्पित करते थे । कीर्तन से बालकृष्ण को प्रसन्न करके भगवान की कथा भगवान को ही सुनाते थे । बालकृष्ण का दर्शन करते हुए उनकी आंखों में आंसू बहने लगते व शरीर में रोमांच होने लगता था । इस प्रकार सेवा, ध्यान, जप, कीर्तन, कथा आदि में निमग्न रहकर वे मन को भगवान से दूर जाने ही नहीं देते थे । विदुर-विदुरानी की भक्ति से आकर्षित होकर द्वारिकानाथ उनके घर खिंचे चले आए व उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिए । श्रीलड्डूगोपाल की पूजा की सरल विधि प्रभु सेवा को खरच न लागे । अपनों जन्म सुफल कर मूरख क्यों डरपे जो अभागे ।। उदर भरन को करी रसोइ सोइ भोग धरे । महाप्रसाद होय घटे न किनको अपनो उदर भरे ।। मीठो जल पीवन को लावे तामें झारी भरे । अंग ढांकनकूं चहिये कपड़ा तामें साज करे ।। जो मन होय उदार तुमारो वैभव कछु बढ़ावो । नहिं तो मोरचंद्रिका गुंजा यह सिंगार धरावो ।। अत्तर फूल फल जो कछु उत्तम प्रभु पहिलेहि धरावो । जो मन चले वस्तु उत्तम पे प्रभु को धर सब खावो ।। कर सम्बन्ध स्वामी सेवक को चल मारग की रीति । पूरन प्रभु भाव के भूखे देखें अंतर की प्रीति ।। यामें कहा घट जाय तिहारो घर की घर में रहिहे । वल्लभदास होय गति अपनी भलो भलो जग कहिहे।। इस पद में यह बताया गया है कि ठाकुरजी (व्रज में श्रीलड्डूगोपाल को ठाकुरजी कहते हैं) की सेवा में कोई अलग से खर्च नहीं होता है । वे अभागे हैं जो खर्चे के डर से उनकी पूजा नहीं करते और अपना जन्म सफल करने से वंचित रह जाते हैं । घर के सदस्यों के लिए जो भोजन बने उसी से पहिले ठाकुरजी को भोग लगा दो, वह महाप्रसाद बन जाएगा किन्तु उसमें से एक किनका भी कम नहीं होगा । घर में अपने पीने के लिए जो जल है, उसी से ठाकुरजी के पीने के लिए झारी भर दो । अपने शरीर को ढकने के लिए आप वस्त्र लाते हैं, उसी से उनका पीताम्बर बना दो । यदि श्रद्धा और सामर्थ्य हो तो कुछ वैभव (सोना-चांदी के श्रृंगार) की वस्तुएं उनके लिए ले आओ, नहीं तो केवल मोरमुकुट और गुंजामाला से भी ठाकुरजी प्रसन्न हो जाते हैं । इत्र, फल-फूल घर में हों तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण कर दो । अगर तुम्हारा मन कुछ अच्छा खाने को करे तो पहिले ठाकुरजी को अर्पण करके खाओ । ठाकुरजी के साथ स्वामी का सम्बन्ध रखते हुए उन्हीं के बताए मार्ग पर चलें । वे तो केवल भाव के भूखे हैं और साधक के मन के भाव ही देखते हैं । इस तरह ठाकुरजी की सेवा करने से कुछ घटता भी नहीं, सब कुछ घर का घर में ही रहता है और मनुष्य का लोक-परलोक दोनों सुधर जाते हैं । श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के विशेष उपाय बालरूप श्रीलड्डूगोपाल से जैसा प्रेम आप करेंगें, उससे हजारगुना प्रेम वह आपके साथ करेंगे । जो श्रीलड्डूगोपाल की सेवा-ध्यान में तन्मय रहता है उसके ऊपर संसार के सुख-दु:ख का प्रभाव नहीं पड़ता है । उसके अनेक जन्मों के पाप एक ही जन्म में जल जाते हैं और दारिद्रय दूर होकर घर में स्थिर लक्ष्मी का वास होता है क्योंकि श्रीलड्डूगोपाल का एक नाम है—‘भक्तदारिद्रयदमनो’ । श्रीलड्डूगोपाल को प्रसन्न करने के लिए उनकी सेवा इस प्रकार कर— —शंख में जल भरकर ‘ॐ नमो नारायणाय’ या ‘गोपीजनवल्लभाय नम:’ या ‘श्रीकृष्णाय नम:’ का उच्चारण करते हुए बालकृष्ण को नहलाना चाहिए । इससे मनुष्य के सारे पाप दूर हो जाते हैं। —संभव हो तो प्रतिदिन अन्यथा द्वादशी और पूर्णिमा को श्रीलड्डूगोपाल को गाय के दूध से स्नान कराकर चंदन अर्पित करना चाहिए। —स्कन्दपुराण के अनुसार प्रतिदिन प्रात:काल में जो श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री, दूध-दही व तुलसी की मंजरियां, चंदन का इत्र व कमल का पुष्प अर्पण कर प्रसन्न करता है, वह इस लोक में समस्त वैभव प्राप्त करके मृत्यु के बाद उनके परम धाम को प्राप्त करता है। —भगवान बालकृष्ण को श्यामा तुलसी की श्याम मंजरी अति प्रिय है । —श्रीलड्डूगोपाल की सेवा करने वाले वैष्णव को गले में तुलसी की कण्ठी पहननी चाहिए । गले में तुलसी माला धारण करने का अर्थ है कि यह शरीर कृष्णार्पण कर दिया है, यह शरीर अब परमात्मा का हुआ । —श्रीलड्डूगोपाल को माखन-मिश्री अत्यन्त प्रिय है । माखन दूध का सारतत्त्व है । बालकृष्ण की सेवा करने वाले वैष्णव सार-भोगी बनते हैं । —भगवान को अर्पित भोग की वस्तु में तुलसी रखते हैं, तब वह वस्तु कृष्णार्पण होती है । जिस घर में भगवान को भोग लगाया जाता है उस घर में लक्ष्मीजी और अन्नपूर्णा अखण्डरूप से विराजमान रहती हैं । उस पवित्र अन्न को खाने से मनुष्य की बुद्धि सात्विक रहती है और शरीर में रोग उत्पन्न नहीं होते हैं । —श्रीलड्डूगोपाल का प्रिय मन्त्र दामोदर-मन्त्र है—‘श्रीदामोदराय नम:’ । इस मन्त्र को दामोदरमास (कार्तिक मास) में करने से भगवान बालगोपाल शीघ्र ही प्रसन्न होकर सिद्धि प्रदान करते हैं । भगवान का कथन है कि अपने दामोदर नाम से मुझे ऐसी प्रसन्नता होती है जिसकी कहीं तुलना नहीं है । —श्रीलड्डूगोपाल की पूजा करने वाले वैष्णवों को प्रतिदिन गोपालसहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए । इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्ध का प्रतिदिन पाठ (चाहे एक श्लोक का ही क्यों न हो) और गीता का पाठ भी बालकृष्ण को बहुत प्रिय है । —श्रीलड्डूगोपाल की प्रतिदिन प्रदक्षिणा व साष्टांग प्रणाम करने से भी उनकी कृपा शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है । —श्रीगोपालजी के सहस्त्रों नामों में से कुछ नाम हैं–’नित्योत्सवो नित्यसौख्यो, नित्यश्रीर्नित्यमंगल:।’ (श्रीगोपालसहस्त्रनाम) अर्थात् वे नित्य उत्सवमय, सदा सुखसौख्यमय, शोभामय और मंगलमय हैं । श्रीकृष्ण के लिए माता यशोदा नित्य ही उत्सव मनाती थीं । बालकृष्ण ने जब पहली बार करवट ली तो उस दिन माता ने कटि-परिवर्तन उत्सव मनाया था और गरीब ग्वालों और गोपियों की पूजाकर उन्हें दान दिया था । इसी कारण व्रजमण्डल में भगवान श्रीकृष्ण के नित्य कोई-न-कोई उत्सव होते रहते हैं । घर में ठाकुरजी को प्रतिष्ठित करने के बाद जब भी संभव हो, उनकी प्रसन्नता के लिए उत्सव किए जाने चाहिए । उत्सव भगवान को स्मरण करने और जगत को भुलाने के लिए हैं । उत्सव के दिन भूख-प्यास भुलाई जाती है, देह का बोध भुलाया जाता है । उत्सव में धन गौण है, मन मुख्य है । विभिन्न उत्सवों पर भगवान को ऋतु अनुकूल सुन्दर पोशाक व श्रृंगार धारण कराकर दर्पण दिखाना चाहिए क्योंकि बालकृष्ण अपने रूप पर ही मोहित होकर रीझ जाते हैं । बच्चे की भांति उन्हें सुन्दर खिलौने—गाय, मोर, हंस, बतख, झुनझना, फिरकनी, गेंद-बल्ला, झूला आदि सजाकर प्रसन्न करना चाहिए । —श्रीलड्डूगोपाल को प्रतिदिन कोमल नर्म बिस्तर पर शयन करानी चाहिए । प्रेम-बंधन से ही बंधते हैं भगवान!!!!!!!! यदि वैष्णव भगवान की अपेक्षा जगत से अधिक प्रेम करता है तो यह बात ठाकुरजी को नहीं सुहाती । वे सोचते हैं प्रेम करने योग्य मैं हूँ, यह मुझे क्यों नहीं भजता ? मनुष्य जब भगवान का नाम-जप-सेवा-अर्चना करता है, तो उन्हें उसके योगक्षेम की चिन्ता होती है । ‘मैं भगवान का हूँ और भगवान मेरे हैं’—ऐसा भाव रखकर जो बालगोपाल की सेवा करते हैं तथा भगवान के सिवाय किसी और वस्तु की कामना नहीं करते हैं, उन्हें भगवान अपने स्वरूप का दर्शन कराकर अपने धाम में भेज देते हैं।

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लड्डू गोपाल जी की लीला जिस किसी भी भक्त के घर में लड्डू गोपाल जी विराजमान रहते हैं, वह सभी भक्त तन मन से उनकी सेवा करते है। जितना भी सम्भव हो सकता है उतना प्रयास उनके लिए करते है। गोपाल जी के प्रत्येक भक्त के मन में उनके लिए अपार प्रेम का भण्डार होता है , सभी की यही कामना होती है कि लड्डू गोपाल जी उन पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखें। लड्डू गोपाल का प्रेम और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त हर सम्भव प्रयास करते है। कोई उनके लिए सुन्दर सुन्दर वस्त्र बनाता है, कोई सुन्दर आसन, कोई सुन्दर सजावट करता है, कोई सुन्दर श्रंगार, कोई स्वादिष्ट भोग तैयार करने में जुटा रहता है तो कोई उनके लिए सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को जुटाने में तत्पर रहता है। सबके अपने अपने भाव होते है और सब अपने भाव के अनुरूप अपने लड्डू जी के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को प्रकट करते है। भक्तों के यही भाव लड्डू गोपाल जी को बहुत प्रिय लगते है, वह अपने भक्तो कि उनके प्रति की गई चेष्टाओं को मौनभाव से देखते है और उसका आनन्द लेते है। किन्तु उनके भक्तो की उनसे एक बड़ी शिकायत सदा बनी रहती है कि लड्डू गोपाल जी उनको अपनी लीला नहीं दिखाते। ऐसा नही है कि गोपाल जी अपनी लीला नहीं दिखाते वह तो नित प्रति अपनी लीला करते ही रहते है। यह तो उनके भक्तो का प्रेम भाव ही है जो उनकी इस लीला को ना समझ कर उनको प्रत्यक्ष रूप में देखना चाहते है और उसके लिए इतने लालायित और बेचैन रहते हैं कि वह गोपाल जी की उनके घर में होने वाली लीला को नही समझ पाते। यदि लड्डू गोपाल जी के भक्त अपने जीवन और अपने घर का एक सूक्ष्म विश्लेष्ण करें तो निश्चित ही यह जान पाएंगे कि लड्डू गोपाल जी के घर में प्रवेश के बाद से उनके जीवन में, उनके घर में कितना परिवर्तन आया है। उनके जीवन में दैनिक रूप से कितना परिवर्तन हुआ है, उनके स्वाभाव में उनके विचारों में कितना परिवर्तनहु आ है, उनके घर के वातावरण में कितना परिवर्तन हुआ है। वास्तव में प्रतिदिन धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन हमारे दैनिक जीवन का अंग बन जाते हैं जिस कारण यह हमारी दृष्टि में नहीं आ पाते किन्तु यदि सूक्ष्मता से इस विषय पर चिन्तन किया जाये तो बहुत कुछ सत्य हम देख पाएंगे। यदि लड्डू गोपाल जी की लीला देखना ही चाहते है तो एक उत्तम मार्ग आप सभी भक्तजनों के लिए बता रहे हैं। लड्डू गोपाल जी की लीला देखने कि लालसा यदि मन में है तो रात्री में शयन के समय जब तक निद्रा ना आये तब तक लड्डू गोपाल जी का ही स्मरण करते रहिए, किसी भी अन्य विषय पर विचार मत कीजिये और मन में यह धारणा पक्की कर लीजिये कि आज मेरे गोपाल मुझको दर्शन अवश्य देंगे, बस इस विचार को मन में धारण करके निद्रा आने तक उनका स्मरण करते रहिए।

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💖🌟🌟💖 जय श्री राधे जय श्री कृष्णा 💖🌟🌟💖 💖🌟एकदम सत्य बात है उन करोड़ो कृष्ण भक्तों द्वारा जो अक्सर ही अपने जीवन में लड्डू गोपाल की नटखट शरारतों के प्रत्यक्ष अनुभव और दर्शन का महा सौभाग्य पाते हैं ! 💖🌟जैसे कोई छोटा मासूम बच्चा हो और उसे आप पीट भी दें, लेकिन फिर थोड़ी देर बाद उसे प्यार से बुलाएँ तो वो आपकी मार को भूलकर आपके पास खिलखिलाते हुए चला आयेगा, उसी तरह से कोई बड़ा पापी भी अगर अच्छा इन्सान बनना चाहता हो तो वो भी प्रेम से लड्डू गोपाल को बार बार बुलाये तो लड्डू गोपाल ठुमुक ठुमुक कर हसतें हुए उसके पास पहुच जायेंगे ! 💖🌟हमारे शास्त्रों में लाड लड़ाने की बड़ी महिमा बताई है | कई लोगों को पता ही नहीं है की लाड लड़ाना कहते किसे है ? लाड लड़ाना वो अति आसान प्रक्रिया है जिससे अनन्त ब्रह्मांडो को जन्म देने वाला, पालने वाला और नष्ट करने वाला परम सत्ता आपके बंधन में बध जाता है ! अब ये आपके ऊपर है की आप उसे किस रिश्ते में बाधना चाहते हैं ! आपको जिस भी रिश्ते में सबसे ज्यादा प्यार महसूस होता हो (चाहे वह बेटा, भाई, भतीजा, भांजा कोई भी रिश्ता हो) उसी रिश्ते से बिना किसी संकोच बाल गोपाल को तुरन्त जोड़ लीजिये और कुछ दिनों तक उस रिश्ते को नियम से निभाइए और फिर चमत्कार देखिये ! कुछ दिन बाद भले ही आप उस रिश्ते को भूल जाय पर लड्डू नहीं भूलेंगे और आपको ये देखकर महान आश्चर्य होगा की अब रिश्ता लड्डू गोपाल खुद निभा रहे है ! 💖🌟लाड लड़ाने में बस यही गहरी मानसिक भावना तो करनी होती है की लड्डू गोपाल अब से हमारे ये (जो रिश्ता आप चाहें) हुए और फिर मन में अन्दर ही अन्दर उनसे वो रिश्ता निभाइए ! मन में भावना करने में दिक्कत आ रही हो तो फिर आप कोई मूर्ति या तस्वीर का सहारा भी ले सकते हैं ! मन में लड्डू गोपाल को खाना खिलाने में एकाग्रता नहीं हो पा रही हो तो आप मूर्ति के सामने भोग लगाईये ! दोनों में कोई अंतर नहीं है | वास्तव में प्रभु सामान के भूखे नहीं, सिर्फ आपके प्रेम के भूखे हैं ! अपनी नौकरी, व्यापार, पढाई को ईमानदारी से निभाते हुए जब भी आपको खाली समय मिले लड्डू गोपाल के साथ ही मन ही मन खेलिए, बातें करिए और वो हर काम करिए जो आपको पसंद हो ! बस इसी तरह खेल खेल में लड्डू गोपाल कब आपके अपने हो जायेंगे, आपको पता ही नहीं चलेगा ! 💖🌟कुछ लोगों को ये सब अन्धविश्वास और समय की बर्बादी लग सकती है पर उन्हें पता नहीं की, यही बाल गोपाल, चैतन्य महाप्रभु की गुरु माता के यहाँ पानी भरना, झाड़ू लगाना, खाना बनाना और बर्तन मांजना सब काम करते थे और यही बाल गोपाल बूढ़े वल्लभाचार्य को रोज सुबह हाथ पकड़ कर लैट्रिन कराने खेत में ले जाते थे और क्या क्या कहे यही बाल गोपाल कभी किसी गरीब भक्त की लड़की की शादी के लिए चुपके से रूपए घर में रख गये तो कभी किसी भक्त को दुश्मनों के जानलेवा हमलों से बचाया, इसी बाल गोपाल ने कितनों को फर्जी मुकदमों से बचाया तो कितनों की सालों पुरानी बिमारियों के दर्द को सेकंडों में लेकर भागा, यही बाल गोपाल है जो एक्सीडेंट में अपाहिज होने वाली दुर्घटना को मामूली फिसलने वाली घटना में बदल देता है, और यही बाल गोपाल है जो भविष्य में होने वाले कैंसर को मामूली बीमारी में बदल कर ख़त्म कर देता है ! 💖🌟ये ऐसा पक्का रिश्ता निभाता है की 24 घंटा आपके साथ ही रहता है और आपको छोड़ कर कभी भी जाता ही नहीं ! तो फिर जब 24 घंटे का अति प्यारा, अति सुन्दर, अति मनमोहक बॉडी गार्ड आपके साथ है जो आपके पूर्व जन्मों के आपके ही द्वारा किये गएँ पापों की सजा के अधिकांश हिस्से को खुद ही झेल जाय तो फिर जीवन में किस बात की टेंशन ! सृष्टि का अटल नियम है की गलत और सही, दोनों भावना द्वारा किये गये कामों का भोग तो भोगना ही पड़ता है पर कृष्ण साथ हो तो आने वाला प्रचंड दुर्भाग्य भी चीटी काटने के समान हल्का हो जाता है ! 💖🌟इस दुनिया की हर स्त्री, लड्डू गोपाल की माँ और हर आदमी पिता बनने का महा सौभाग्य निश्चित पा सकता है ! 💖🌟शुरू में तो भक्त को भावना करनी पड़ती है पर कुछ दिन बाद उसे सही में लड्डू गोपाल का अहसास होने लगता है, फिर उसके कुछ दिन बाद उसे स्वप्न में लड्डू गोपाल के दर्शन होने लगते हैं और फिर उसके कुछ दिन बाद ऐसा स्पष्ट महसूस होता है की लड्डू गोपाल ने अपने छोटे छोटे मुलायम हाथों से छूया हो और उसके कुछ दिन बाद लड्डू गोपाल की विशेष कृपा हुई तो अति दुर्लभ दर्शन भी होता है ! 💖🌟ये एक ऐसा रिश्तेदार है जिसे सिर्फ चाहिए आपका थोडा समय जिसमे वो प्रेमपूर्वक आपके साथ खेल कूद सके और बदले में ये इतना कुछ देता है की झोली छोटी पड़ जाती है ! तो कोई क्यों न जोड़े ऐसे सुन्दर रिश्तेदार से रिश्ता ! 💖🌟💖 💖🌟💖 💖🌟💖 बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय। 💖🌟💖 💖🌟💖 जय जय श्री राधे। 💖🌟💖 💖💖 श्री राधा- कृष्ण की कृपा से आपका दिन मंगलमय हो। 💖🌟💖 💖🌟💖 श्री कृष्ण शरणम ममः 💖🌟💖 ❤️💛जय श्री लड्डू गोपाल की 💛❤️

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लड्डू गोपाल की सेवा............... एक नगर में दो वृद्धस्त्रियां बिल्कुल पास पास रहा करती थी। उन दोनो में बहुत घनिष्ठता थी। उन दोनों का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी। हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा करा करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था। उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनों स्त्रिओं के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था, दोनों ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। । जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनों ही वृद्धाएं स्वाभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थी। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनों एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं। एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट करी, हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं में जहां भी जाउंगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी। फिर वह बोली में तो एक माह में लिए चली जाउंगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी नियम व आवश्यकताएँ बता दी उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल के सवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया। वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा करी, भोजन कराने से लेकर रात्री में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई। अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल के सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुंची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी करी, नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं। उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही देखा था। वह नहीं जानती थी की लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और देख कर वह सोंचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया की में इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जाएं। बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी। उसके बाद वह नियम से प्रति दिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा, भक्त वत्सल भगवान् अपनी करुणा वश अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया। एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लोटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये, किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुंची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं, यह देखकर वह अचंभित रह गई। वह तुरंत उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूंछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहा गए। यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई वहां जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे, वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली है गोपाल आपकी लीला निराली है, मेने इतने वर्षो तक आपकी सेवा करी किन्तु आपको नहीं पहचान सकी। तब वह उस जैन वृद्धा से बोली की तू धन्य है, तुझको नहीं मालूम की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की और किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल पाँव भी सीधे कर दिया। उस दिन के बाद उन दोनों स्त्रिओं के मध्य प्रेम भाव और अधिक बड़ गया दोनों मिल कर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगी। वह दोनों स्त्री जब तक जीवित रही तब तक लड्डू गोपाल की सेवा करती रहीं। हरे कृष्णा ..... जय जय श्री राधे......

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