लड्डूगोपाल

लड्डू गोपाल की सेवा,,,,, एक नगर में दो वृद्ध स्त्रियां बिल्कुल पास पास रहा करती थी। उन दोनो में बहुत घनिष्ठता थी। उन दोनों का ही संसार में कोई नहीं था इसलिए एक दूसरे का सदा साथ देतीं और अपने सुख-दुःख आपस में बाँट लेती थीं। एक स्त्री हिन्दू थी तथा दूसरी जैन धर्म को मानने वाली थी। हिन्दू वृद्धा ने अपने घर में लड्डू गोपाल को विराजमान किया हुआ था। वह प्रतिदिन बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा किया करती थी। प्रतिदिन उनको स्नान कराना, धुले वस्त्र पहनाना, दूध व फल आदि भोग अर्पित करना उसका नियम था। वह स्त्री लड्डू गोपाल के भोजन का भी विशेष ध्यान रखती थी। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम का ध्यान उसको रहता था। वह जब भी कभी बाहर जाती लड्डू गोपाल के लिए कोई ना कोई खाने की वस्तु, नए वस्त्र खिलोने आदि अवश्य लाती थी। लड्डू गोपाल के प्रति उसके मन में आपार प्रेम और श्रद्धा का भाव था। उधर जैन वृद्धा भी अपनी जैन परम्परा के अनुसार भगवान् के प्रति सेवा भाव में लगी रहती थी। उन दोनों स्त्रिओं के मध्य परस्पर बहुत प्रेम भाव था, दोनों ही एक दूसरे के भक्ति भाव और धर्म की प्रति पूर्ण सम्मान की भावना रखती थी। । जब किसी को कोई समस्या होती तो दूसरी उसका साथ देती, दोनों ही वृद्धाएं स्वाभाव से भी बहुत सरल और सज्जन थी। भगवान की सेवा के अतिरिक्त उनका जो भी समय शेष होता था वह दोनों एक दूसरे के साथ ही व्यतीत करती थीं। एक बार हिन्दू वृद्धा को एक माह के लिए तीर्थ यात्रा का अवसर प्राप्त हुआ उसने दूसरी स्त्री से भी साथ चलने का आग्रह किया किन्तु वृद्धावस्था के कारण अधिक ना चल पाने के कारण उस स्त्री ने अपनी विवशता प्रकट की, हिन्दु वृद्धा ने कहा कोई बात नहीं मै जहां भी जाउंगी भगवान् से तुम्हारे लिए प्रार्थना करुँगी। फिर वह बोली मैं तो एक माह में लिए चली जाउंगी तब तक मेरे पीछे मेरे लड्डू गोपाल का ध्यान रखना। उस जैन वृद्धा ने सहर्ष ही उसका यह अनुरोध स्वीकार कर लिया। हिन्दू वृद्धा ने उस जैन वृद्धा को लड्डू गोपाल की सेवा के सभी नियम व आवश्यकताएँ बता दी उस जैन वृद्धा ने सहर्ष सब कुछ स्वीकार कर लिया। कुछ दिन बाद वह हिन्दू वृद्धा तीर्थ यात्रा के लिए निकल गई। उसके जाने के बाद लड्डू गोपाल की सेवा का कार्य जैन वृद्धा ने अपने हाथ में लिया। वह बहुत उत्त्साहित थी कि उसको लड्डू गोपाल की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ। उस दिन उसने बड़े प्रेम से लड्डू गोपाल की सेवा की, भोजन कराने से लेकर रात्रि में उनके शयन तक के सभी कार्य पूर्ण श्रद्धा के साथ वैसे ही पूर्ण किए जैसे उसको बताए गए थे। लड्डू गोपाल के शयन का प्रबन्ध करके वह भी अपने घर शयन के लिए चली गई। अगले दिन प्रातः जब वह वृद्धा लड्डू गोपाल के सेवा के लिए हिन्दू स्त्री के घर पहुंची तो उसने सबसे पहले लड्डू गोपाल को स्नान कराने की तैयारी की,नियम के अनुरूप जब वह लड्डू गोपाल को स्नान कराने लगी तो उसने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और मुड़े हुए हैं। उसने पहले कभी लड्डू गोपाल के पाँव नहीं देखे थे जब भी उनको देखा वस्त्रों में ही देखा था। वह नहीं जानती थी की लड्डू गोपाल के पाँव हैं ही ऐसे, घुटनों के बल बैठे हुए। लड्डू गोपाल के पाँव पीछे की और देख कर वह सोंचने लगी अरे मेरे लड्डू गोपाल को यह क्या हो गया इसके तो पैर मुड़ गए है। उसने उस हिन्दू वृद्धा से सुन रखा था की लड्डू गोपाल जीवंत होते हैं। उसने मन में विचार किया की मैं इनके पैरो की मालिश करुँगी हो सकता है इनके पाँव ठीक हो जाएं। बस फिर क्या था भक्ति भाव में डूबी उस भोली भाली वृद्धा ने लड्डू गोपाल के पैरों की मालिश आरम्भ कर दी। उसके बाद वह नियम से प्रति दिन पांच बार उनके पैरों की मालिश करने लगी। उस भोली वृद्धा की भक्ति और प्रेम देख कर ठाकुर जी का हृदय द्रवित हो उठा, भक्त वत्सल भगवान् ने अपनी करुणा अपना प्रेम उस वृद्धा पर उड़ेल दिया। एक दिन प्रातः उस जैन वृद्धा ने देखा की लड्डू गोपाल के पाँव ठीक हो गए हैं और वह सीधे खड़े हो गए हैं, यह देख कर वह बहुत प्रसन्न हुई और दूसरी स्त्री के आने की प्रतीक्षा करने लगी। कुछ दिन पश्चात् दूसरी स्त्री वापस लोटी तो उसने घर आकर सबसे पहले अपने लड्डू गोपाल के दर्शन किये, किन्तु जैसे ही वह लड्डू गोपाल के सम्मुख पहुंची तो देखा कि वह तो अपने पैरों पर सीधे खड़े हैं, यह देखकर वह अचंभित रह गई। वह तुरंत उस दूसरी स्त्री के पास गई और उसको सारी बात बताई और पूंछा कि मेरे लड्डू गोपाल कहा गए। यह सुनकर उस जैन स्त्री ने सारी बात बता दी उसकी बात सुनकर वह वृद्ध स्त्री सन्न रह गई और उसको लेकर अपने घर गई वहां जाकर उसने देखा तो लड्डू गोपाल मुस्करा रहे थे, वह लड्डू गोपाल के चरणों में गिर पड़ी और बोली है गोपाल आपकी लीला निराली है, मैंने इतने वर्षो तक आपकी सेवा की किन्तु आपको नहीं पहचान सकी। तब वह उस जैन वृद्धा से बोली की तू धन्य है, तुझको नहीं मालूम की हमारे लड्डू गोपाल के पाँव तो ऐसे ही हैं, पीछे की और किन्तु तेरी भक्ति और प्रेम ने तो लड्डू गोपाल के पाँव भी सीधे कर दिये l उस दिन के बाद उन दोनों स्त्रिओं के मध्य प्रेम भाव और अधिक बड़ गया दोनों मिल कर लड्डू गोपाल की सेवा करने लगी। वह दोनों स्त्री जब तक जीवित रही तब तक लड्डू गोपाल की सेवा करती रहीं। राधे राधे🙏🙏

+51 प्रतिक्रिया 13 कॉमेंट्स • 32 शेयर

लड्डू गोपाल जी की लीला जिस किसी भी भक्त के घर में लड्डू गोपाल जी विराजमान रहते हैं, वह सभी भक्त तन मन से उनकी सेवा करते है। जितना भी सम्भव हो सकता है उतना प्रयास उनके लिए करते है। गोपाल जी के प्रत्येक भक्त के मन में उनके लिए अपार प्रेम का भण्डार होता है , सभी की यही कामना होती है कि लड्डू गोपाल जी उन पर भी अपनी कृपा दृष्टि रखें। लड्डू गोपाल का प्रेम और उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए भक्त हर सम्भव प्रयास करते है। कोई उनके लिए सुन्दर सुन्दर वस्त्र बनाता है, कोई सुन्दर आसन, कोई सुन्दर सजावट करता है, कोई सुन्दर श्रंगार, कोई स्वादिष्ट भोग तैयार करने में जुटा रहता है तो कोई उनके लिए सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं को जुटाने में तत्पर रहता है। सबके अपने अपने भाव होते है और सब अपने भाव के अनुरूप अपने लड्डू जी के प्रति अपने प्रेम और भक्ति को प्रकट करते है। भक्तों के यही भाव लड्डू गोपाल जी को बहुत प्रिय लगते है, वह अपने भक्तो कि उनके प्रति की गई चेष्टाओं को मौनभाव से देखते है और उसका आनन्द लेते है। किन्तु उनके भक्तो की उनसे एक बड़ी शिकायत सदा बनी रहती है कि लड्डू गोपाल जी उनको अपनी लीला नहीं दिखाते। ऐसा नही है कि गोपाल जी अपनी लीला नहीं दिखाते वह तो नित प्रति अपनी लीला करते ही रहते है। यह तो उनके भक्तो का प्रेम भाव ही है जो उनकी इस लीला को ना समझ कर उनको प्रत्यक्ष रूप में देखना चाहते है और उसके लिए इतने लालायित और बेचैन रहते हैं कि वह गोपाल जी की उनके घर में होने वाली लीला को नही समझ पाते। यदि लड्डू गोपाल जी के भक्त अपने जीवन और अपने घर का एक सूक्ष्म विश्लेष्ण करें तो निश्चित ही यह जान पाएंगे कि लड्डू गोपाल जी के घर में प्रवेश के बाद से उनके जीवन में, उनके घर में कितना परिवर्तन आया है। उनके जीवन में दैनिक रूप से कितना परिवर्तन हुआ है, उनके स्वाभाव में उनके विचारों में कितना परिवर्तनहु आ है, उनके घर के वातावरण में कितना परिवर्तन हुआ है। वास्तव में प्रतिदिन धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन हमारे दैनिक जीवन का अंग बन जाते हैं जिस कारण यह हमारी दृष्टि में नहीं आ पाते किन्तु यदि सूक्ष्मता से इस विषय पर चिन्तन किया जाये तो बहुत कुछ सत्य हम देख पाएंगे। यदि लड्डू गोपाल जी की लीला देखना ही चाहते है तो एक उत्तम मार्ग आप सभी भक्तजनों के लिए बता रहे हैं। लड्डू गोपाल जी की लीला देखने कि लालसा यदि मन में है तो रात्री में शयन के समय जब तक निद्रा ना आये तब तक लड्डू गोपाल जी का ही स्मरण करते रहिए, किसी भी अन्य विषय पर विचार मत कीजिये और मन में यह धारणा पक्की कर लीजिये कि आज मेरे गोपाल मुझको दर्शन अवश्य देंगे, बस इस विचार को मन में धारण करके निद्रा आने तक उनका स्मरण करते रहिए।

+61 प्रतिक्रिया 10 कॉमेंट्स • 3 शेयर

+11 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 4 शेयर
Sajjan Singhal Dec 8, 2019

+13 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 4 शेयर