राधेश्याम

Neha Sharma, Haryana Jan 25, 2020

जय श्री राधेकृष्णा शुभ प्रभात् वौदन भगवान सदा हमारे साथ एक हैं, वे पृथक हो ही नहीं सकते ..... ----------------------------------------------------------------- भगवान के बारे में मनीषी कहते हैं कि वे अचिंत्य और अगम्य हैं, पर मैं इसे नहीं मानता| वे तो निकटतम से भी अधिक निकट, और प्रियतम से भी अधिक प्रिय हैं| जिनका साथ शाश्वत है वे कभी अगम्य और अचिंत्य नहीं हो सकते| यहाँ पर मैं न तो वेदान्त की भाषा का प्रयोग करूँगा और न ही दार्शनिकों की भाषा का| जो मेरे हृदय की भाषा है वही लिख रहा हूँ| यहाँ मैं एक ईर्ष्यालु प्रेमी हूँ क्योंकि भगवान स्वयं भी ईर्ष्यालु प्रेमी हैं| भगवान पर मेरा एकाधिकार है जिस पर मेरा पेटेंट भी है| उनके सिवाय मेरा अन्य कोई नहीं है अतः वे सदा के लिए मेरे हृदय में बंदी हैं| मैं नहीं चाहता कि वे मेरे हृदय को छोड़कर कहीं अन्यत्र जायें, इसलिए मैंने उनके बाहर नहीं निकलने के पुख्ता इंतजाम कर दिये हैं| वे बाहर निकल ही नहीं सकते चाहे वे कितने भी शक्तिमान हों| चाहे जितना ज़ोर लगा लें, उनकी शक्ति यहाँ नहीं चल सकती| . भगवान करुणा और प्रेमवश हमें अपनी अनुभूति करा ही देते हैं| हमें तो सिर्फ पात्रता ही जागृत करनी पड़ती है| पात्रता होते ही वे गुरुरूप में आते हैं और अपने प्रेमी की साधना का भार भी अपने ऊपर ही ले लेते हैं| उन्होने इसका वचन भी दे रखा है| जब भी परम प्रेम की अनुभूति हो, तब उस अनुभूति को संजो कर रखें| यहाँ भगवान अपने परमप्रेमरूप में आए हैं| उनके इस परमप्रेमरूप का ध्यान सदा रखें| इस दिव्य प्रेम का ध्यान रखते रखते हम स्वयं भी प्रेममय और आनंदमय हो जाएँगे| . योगियों को भगवान की अनुभूति प्राण-तत्व के द्वारा परमप्रेम और आनंद के रूप में होती है| यह प्राण तत्व ही विस्तृत होते होते आकाश तत्व हो जाता है| आकाश तत्व प्राण का ही विस्तृत रूप है| प्राण का घनीभूत रूप कुंडलिनी महाशक्ति है, और यह एक राजकुमारी की तरह शनैः शनैः बड़े शान से उठती उठती सुषुम्ना के सभी चक्रों को भेदती हुई ब्रह्मरंध्र से भी परे अनंत परमाकाश में स्वतः ही परमशिव से मिल जाती है, जो योगमार्ग की परमसिद्धि है| गुरु के आदेशानुसार शिवनेत्र होकर भ्रूमध्य में ज्योतिर्मय ब्रह्म का ध्यान करते करते जब ब्रहमज्योति प्रकट होती है, तब उसमें लिपटी हुई अनाहत नाद की ध्वनि सुनाई देने लगती है| नाद व ज्योति दोनों ही कूटस्थ ब्रह्म हैं जिनका ध्यान सदा योगी साधक करते हैं| यहाँ भी करुणावश भगवान स्वयं ही साधना करते हैं, हम नहीं| साधक होने का भाव एक भ्रम ही है| . भगवान कण भी है और प्रवाह भी| स्पंदन भी वे हैं और आवृति भी| वे ही नाद हैं और बिन्दु भी| वास्तव में उनके सिवाय अन्य कोई है भी नहीं| अतः वे कैसे अचिंत्य और अगम्य हो सकते हैं? अपने प्रेमियों के समक्ष तो वे नित्य ही निरंतर रहते हैं| उनके प्रति प्रेम जागृत हो जाने का अर्थ है कि हमने उन्हें पा लिया है| निरंतर उनके प्रेम में मग्न रहो| हम भगवान के साथ एक हैं| वे हैं, यहीं हैं, इसी समय हैं और सर्वदा हमारे साथ एक हैं| l: भगवान कृष्ण की 8 पत्नियों और 80 पुत्रों के बारे में रोचक जानकारी 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 भगवान श्री कृष्ण की 8 पत्नियां थी। प्रत्येक पत्नी से उन्हें 10 पुत्रों की प्राप्ति हुई थी इस तरह से उनके 80 पुत्र थे। आज हम आपको श्री कृष्ण की 8 रानियों और 80 पुत्रों के बारे में बताएँगे। यह भी पढ़े- कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश? 1. रुक्मणी 🔸🔹🔹🔸 महाभारत अनुसार कृष्ण ने रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह किया था। विदर्भ के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणि भगवान कृष्ण से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। रुक्मणि के पांच भाई थे- रुक्म, रुक्मरथ, रुक्मबाहु, रुक्मकेस तथा रुक्ममाली। रुक्मणि सर्वगुण संपन्न तथा अति सुन्दरी थी। उसके माता-पिता उसका विवाह कृष्ण के साथ करना चाहते थे किंतु रुक्म चाहता था कि उसकी बहन का विवाह चेदिराज शिशुपाल के साथ हो। यह कारण था कि कृष्ण को रुक्मणि का हरण कर उनसे विवाह करना पड़ा। रूक्मिणी के पुत्रों के ये नाम थे- प्रद्युम्न, चारूदेष्ण, सुदेष्ण, चारूदेह, सुचारू, विचारू, चारू, चरूगुप्त, भद्रचारू, चारूचंद्र। 2. सत्यभामा 🔸🔹🔹🔸 सत्यभामा, सत्राजीत की पुत्री थी, सत्राजीत को शक्तिसेन के नाम से भी जानते है। सत्यभामा के पुत्रों के नाम थे- भानु, सुभानु, स्वरभानु, प्रभानु, भानुमान, चंद्रभानु, वृहद्भानु, अतिभानु, श्रीभानु और प्रतिभानु। श्यामा श्याम तत्वज्ञान परिवार हमारा उदेश्य प्रभु तत्वज्ञान को जन जन तक पहुँचाना l 3. सत्या 🔸🔹🔸 सत्या राजा कौशल की पुत्री थी। सत्या के बेटों के नाम ये थे- वीर, अश्वसेन, चंद्र, चित्रगु, वेगवान, वृष, आम, शंकु, वसु और कुंत। 4. जाम्बवंती 🔸🔹🔹🔸 जाम्बवंती, निषाद राज जाम्बवन की पुत्री थी। जाम्बवान उन गिने चुने पौराणिक पात्रों में से एक है जो रामायण और महाभारत दोनों समय उपस्तिथ थे। जाम्बवंती के पुत्र ये थे- साम्ब, सुमित्र, पुरूजित, शतजित, सहस्रजित, विजय, चित्रकेतु, वसुमान, द्रविड़ व क्रतु। 5. कालिंदी 🔸🔹🔹🔸 कृष्ण की पत्नी कालिंदी, खांडव वन की रहने वाली थी। यही पर पांडवो का इंद्रप्रस्थ बना था। कालिंदी के पुत्रों के नाम ये थे- श्रुत, कवि, वृष, वीर, सुबाहु, भद्र, शांति, दर्श, पूर्णमास एवं सोमक। 6. लक्ष्मणा 🔸🔹🔹🔸 मद्र कन्या लक्ष्मणा, वृहत्सेना की पुत्री थी। लक्ष्मणा के पुत्रों के नाम थे- प्रघोष, गात्रवान, सिंह, बल, प्रबल, ऊध्र्वग, महाशक्ति, सह, ओज एवं अपराजित। 7. मित्रविंदा 🔸🔹🔹🔸 मित्रविंदा, अवन्तिका की राजकुमारी थी। मित्रविंदा के पुत्रों के नाम – वृक, हर्ष, अनिल, गृध, वर्धन, अन्नाद, महांश, पावन, वहिन तथा क्षुधि। 8. भद्रा 🔸🔹🔸 कृष्ण की अंतिम पत्नी, भद्रा केकय कन्या थी। ये थे भद्रा के पुत्र – संग्रामजित, वृहत्सेन, शूर, प्रहरण, अरिजित, जय, सुभद्र, वाम, आयु और सत्यक। विशेष👉 इनके अलावा श्री कृष्ण की 16100 और पत्नियां बताई जाती है। इन 16100 कन्याओं को श्री कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध कर मुक्त कराया था और अपने यहाँ आश्रय दिया था। इन सभी कन्याओं ने श्री कृष्ण को पति स्वरुप मान लिया था। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Amit Kumar Jan 25, 2020

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Amit Kumar Jan 25, 2020

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Bindi Pandey Jan 25, 2020

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