राधा_राधा

*नाम रुपी रस* बाबूलाल गांव का एक बहुत ही बड़ा जमीदार था। बड़े बड़े खेत खलिहान बड़े-बड़े फलों के बाग बगीचे उसके पास थे ।लेकिन बाबूलाल इतना बड़ा जमींदार होने के बावजूद भी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करता था। उसकी पत्नी का नाम सावित्री था जैसा उसका नाम था वैसे ही सावित्री की तरह वह अपने पति की खूब सेवा करती थी ।बाबूलाल के घर दो बेटे और एक बेटी थी। बच्चों में भी उसने खूब अच्छे संस्कार दिए थे ।रूपवान होने के साथ-साथ तीनों बच्चे बहुत ही गुणवान थे ।बाबूलाल को बचपन से ही उसकी मां ने गले में कंठी माला और हाथ में झोली माला देकर उसकी महत्ता को समझा दिया था ।बाबूलाल बचपन से ही झोली माला से महामंत्र का निरंतर जाप करता रहता था। मां के गुजर जाने के बाद उसका साथ उसकी पत्नी ने खूब निभाया। पत्नी भी खूब संस्कारी थी। घर में इतना धन होने के बावजूद भी बाबूलाल और उसकी पत्नी बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे। बाबूलाल की पत्नी अपने हाथों से अपने पति के वस्त्रों को धोती ठाकुर जी और अपने पति बच्चों के लिए खुद भोजन तैयार करती। घर में नौकर चाकरों की कोई कमी ना थी। लेकिन फिर भी बाबूलाल की पत्नी अपने बच्चों और पति का काम खुद ही करती थी ।बाबूलाल ने कभी भी अपने हाथ से झोली माला को नहीं छोड़ा था निरंतर उसके हाथ से झोली माला में महामंत्र का जाप चलता ही रहता था ।चाहे बुखार की जकड़न हो या सर्दी की अकड़न हो उसकी हाथ से माला कभी ना छूटती। रात को सोते वक्त वो ठाकुर जी के चरणों में झोली माला को रख देता ।लेकिन उसके मन रूपी मनके से महामंत्र का जाप निरंतर चलता ही रहता। कुल मिलाकर वह 24 घंटे महामंत्र का जाप करता ही रहता था। लगातार महामंत्र का जाप करने से उस माला के मनको पर स्वयं राधा कृष्ण के नाम का आवरण चढ चुका था। एकादशी व्रत करना बाबू लाल और सावित्री के नियम में शामिल था और द्वादशी के दिन वह दूर दूर से ब्राह्मणों को बुलाकर उनको भोजन करवाता और खूब दान दक्षिणा देता। इतना दान देने के बावजूद भी वह खुद एक साधारण सी धोती कुर्ता पहनता था और उसकी पत्नी भी सूती साड़ी ही पहनती ।कुल मिलाकर वह बहुत ही साधारण जीवन व्यतीत करते थे! ठाकुर जी का खूब नाम लेते थे ।देखते ही देखते कब बच्चे बड़े हो गए बाबूलाल को पता ही नहीं चला। अब उसकी बेटी जवान हो चुकी थी और एक बहुत अच्छे घर से उसका रिश्ता तय हो गया। शादी का दिन भी तय हो गया। ठाकुर जी की कृपा से शादी बहुत अच्छी तरह से संपन्न हो कर उसकी बेटी घर से विदा हो गई। बाबूलाल कभी भी अपनी झोली माला को इधर उधर ना रखकर ठाकुर जी के चरणों में हमेशा रखता था। लेकिन बेटी की शादी में वह इतना उलझ गया कि उसको याद ही नहीं रहा कि रात को सोते समय उसकी झोली माला उसके कुर्ते की जेब में रह गई है। सुबह 5:00 बजे उठकर उसकी पत्नी जो कि रोज नदी में स्नान करने जाती थी और साथ में ही अपनने और अपने पति के कपड़ों को भी धो कर आती थी । कुर्ता और धोती लेकर सावित्री नदी किनारे धोने के लिए चली गई। कुर्ते को उसने एक पत्थर पर रख कर जैसे ही धोना शुरू किया धोते-धोते उसको महामंत्र के जाप की आवाज आने लगी ।बाबूलाल की पत्नी एकदम से घबरा गई है कि सुबह-सुबह महामंत्र का जाप नदी किनारे कौन कर रहा है जैसे जैसे वह कुरते को पत्थर पर पटकती वैसे वैसे आवाज और तेज होती गई ।उसकी पत्नी हक्की बक्की हो गई कि महामंत्र की आवाज कहां से आ रही है ।जब उसने ध्यान लगाकर सुना तो उसने देखा कि कुर्ते की जेब के अंदर से आवाज आ रही है। उसने जब कुरते को देखा तो उसमें झोली माला को देखकर वो एकदम से सकपका सी गई और उसने झट से नदी के पानी से हाथ होकर उस माला को कुर्ते की जेब से निकालकर मस्तक पर लगाया ।और ठाकुर जी से क्षमा मांगने लगी कि भूलवश मैने पत्थर पर झोली माला को पटक दिया । हजार बार वह ठाकुर जी से क्षमा मांग चुकी थी ।जब वह वापस आई तो उसने देखा कि बाबूलाल घर के आंगन में बहुत घबराया हुआ सा इधर-उधर चक्कर लगा रहा है। सावित्री ने पूछा कि आप इतने चिंतित क्यों हैं तो बाबूलाल ने बोला कि मेरी झोली माला नहीं मिल रही तो उसकी पत्नी ने हाथ जोड़कर क्षमा मांगते हुए अपने पति से कहा कि यह भूलवश आपके कुर्ते में रह गई थी और मैंने उसको ऐसे ही धो दिया ।अपनी माला को पाकर बाबूलाल के जैसे शरीर से निकले हुए प्राण वापस आ गए हो। उसने माला को पकड़ा और अपने सीने से लगाया और सीने से माला को लगाकर उसको ऐसा लगा कि जैसे उसने ठाकुर जी और किशोरी जी को सीने से लगा लिया हो और आनंद से उसकी आंखो से झरझर आंसु बहने लगे और उसकी आंखों में निकलने वाले ठंडे ठंडे आंसु उसके शरीर को भिगोने लगे।क्योंकि आनंद और प्रेम में निकलने वाले आंसू हमेशा ठंडे होते हैं और शोक में निकलने वाले आंसू हमेशा गर्म होते हैं ।अभी सुबह के 6:00 बजे थे जैसे-जैसे सूरज चढ़ने लगा वैसे वैसे गांव में शोर मचने लगा कि नदी किनारे एक पत्थर ऐसा है जो कि सोने जैसा चमक रहा है और अपने आप ही हिल रहा है और उसमें से अजीब सी ध्वनि निकल रही है। सब लोग उस पत्थर को देखने के लिए जा रहे थे ।बाबूलाल और उसकी पत्नी के कानो में भी उस पत्थर के बारे में बातें पढ़ी तो वह भी देखने के लिए चल पड़े ।बाबूलाल की पत्नी यह देखकर हैरान हो गई यह तो वही पत्थर है जिस पर उसने अपने पति के कुरत्ते को धोया था ।और जिसमें झोली माला थी वह सब कुछ समझ गई जब उसने पास जाकर उस ध्वनि को सुना वह ध्वनि ओर कुछ नहीं बल्कि महामंत्र की ध्वनी थी क्योंकि झोली माला के ऊपर चढ़ा हुआ राधा कृष्ण नाम का रस निचुड कर उस पत्थर पर पड़ गया था जिसके कारण वह सोने जैसा चमक रहा था और महामंत्र के आनंद मे अपने आप ही झूम रहा था। बाबूलाल उसकी पत्नी एक दूसरे के साथ बातें करने लगे और कहने लगे कि अगर महामंत्र की झोली माला से निकले महामंत्र के रस से एक पत्थर सोने जैसा चमक रहा है और उसके आनंद से झूम रहा है और अगर हम अपने हृदय रूपी मानस पटल पर राधाकृष्ण के नाम रुपी रस और महामंत्र के रस को निचोड़ ले तो उस मंत्र के मद में चूर श्री राधाकृष्ण नाम की नैया हमेशा हमारे हृदय में हिचकोले खाती फिरेगी !! 🙏जय हो महामंत्र की !! 🙏जय हो हम सब के प्यारे श्यामाश्याम जू की !! 💮!!हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे!!💮 💮!!हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे!!💮

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Charu Malhotra Oct 12, 2019

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Hem Lata Rawat Jul 20, 2018

💞💞श्रीजी की चुनरी💞💞
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बाबा श्री माधव दास जी बरसाने में श्री किशोरी जी के दर्शन के लिए मंदिर की सीढ़ियों से चढ़ते हुए मन ही मन किशोरी जी से प्रार्थना कर रहे हैं....
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कि हे किशोरी जी मुझे प्रसाद में आपकी वह चुन्नी मिल जाए जिसे आप ओढ़े हुए हो त...

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