माता_रानी_की_कृपा_आप_सभी_पर_बनी_रहे

🎎अथ श्री दुर्गा सप्तशती🎎 🚩🌺🦁 जय माता दी 🦁🌺🚩 ✍️ अध्याय :- आठवां ✍️ 🌹 रक्तबीज वध 🌹 🎎 महर्षि मेघा ने कहा- चण्ड और मुण्ड नामक असुरों के मारे जाने से और बहुत सी सेना का नष्ट हो जाने से असुरों के राजा, प्रतापी शुम्भ ने क्रोध युक्त होकर अपनी सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा दी । उसने कहा- अब उदायुध नामक छियासी असुर सेनापति अपनी सेनाओं के साथ युद्ध के लिए जाये और कम्बू नामक चौरासी सेनापति भी युद्ध के लिए जाये और कोटि वीर्य नामक पचास सेनापति और धौम्रकुल नाम के सौ सेनापति प्रस्थान करें, कालक, दोह्र्द, मोर्य और कालकेय यह दैत्य भी मेरी आज्ञा से सजाकर युद्ध के लिए कूँच करें, भयानक शासन करने वाला असुरों का स्वामी शुम्भ इस प्रकार आज्ञा देकर बहुत बड़ी सेना के साथ युद्ध के लिए चला। उसका सेना को अपनी ओर आता देखकर चण्डिका ने अपनी धनुष की टंकोर से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गूंजा दिया। हे राजन ! इसके पश्चात देवी के सिंह ने दहाडनय दैत्यों के नाश के लिए और देवताओं के हित के लिए ब्रम्हा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा इंद्र आदि देवों शक्तियां जो अत्यंत पराक्रम और से सम्पन थीं, उनके शरीर से निकल कर उसी रूप में चण्डिका देवी पास गई। जिस देवता का जैसा रूप था, जैसे आभूषण थे और जैसा वाहन था, वैसा ही रूप, आभूषण और वाहन लेकर, उन देवताओं की शक्तिया दैत्यों से युद्ध करने के लिए आई। 🎎वृषभ पर सवार होकर, हाथ में त्रिशूल लेकर, महानाग का कंकण पहन कर और चंद्ररेखा से भूषित होकर भगवान शंकर की शक्ति रसिंह भी आई, उसकी गर्दन के झटकों से आकाश के तारे टूट पड़ते थे और इसी प्रकार देवराज इंद्र की शक्ति ऐन्द्री भी ऐरावत के ऊपर सवार होकर आई, पश्चात इन देवशक्तियों से घिरे हुए भगवान शंकर ने चंडिका से कहा- मेरी प्रसन्नता के लिए तुम शीघ्र ही इन असुरों को मारो। इसके पश्चात देवी के शरीर में से अत्यंत उग्र रूप वाली और सैकड़ों गीदड़ियों के समान आवाज़ करने वाली चंडिका शक्ति प्रकट हुई, उस अपराजिता देवी ने धूमिल जटा वाले भगवन शंकर जी से कहा- हे प्रभो! आप मेरी ओर से दूत बनकर शुम्भ और निशुम्भ के पास जाइये और उन अत्यंत गर्वीले दैत्यों से कहिये तथा उनके अतिरिक्त और भी जो दैत्य वहाँ युद्ध के लिए उपस्थित हों, उनसे भी कहिये- जो तुम्हें अपने जीवित रहने की इच्छा हो तो त्रिलोकी का राज्य इंद्र को दे दो, देवताओं को उनका यज्ञ भाग मिलना आरंभ हो जाय और तुम पाताल को लौटे जाओ, किन्तु यदि बल के गर्व से तुम्हारी लड़ने की इच्छा हो तो फिर आ जाओ, तुम्हारे माँस से मेरी, योगिनियां तृप्त होगीं, चूँकि उस देवी ने भगवान शंकर को दूत के कार्य में नियुक्त किया था, इसलिए वह संसार में शिवदूती के नाम से विख्यात हुई। भगवान शंकर से देवी का सन्देश पाकर उन दैत्यों के क्जिस तरफ दौड़ती थी, उसी तरफ अपने कमण्डलु का जल छिड़क कर दैत्यों के वीर्य व बल को नष्ट कर देती थी और इसी प्रकार माहेश्वरी त्रिशूल से, वैष्णवी चक्र से और अत्यंत कोपवाली कौमारी शक्ति द्वारा असुरों को मार रही थी और ऐन्द्री के बाजु के प्रहार से सैकड़ों दैत्य रक्त की नदियाँ बहाते हुए पृथवी पर सो गए । 🦁वाराही ने कितने ही राक्षसों को अपनी थूथन द्वारा मृत्यु के घाट उतार दिया, दाढ़ों के अग्रभाग से कितने ही राक्षसों की छाती को चीर डाला और चक्र की चोट से कितनों ही को विदर्ण करके धरती पर डाल दिया । बड़े -२ राक्षसों को नारसिंही अपने नखों से विदर्ण करके भक्षण रही थी, शिवदूती के प्रचंड अट्टहास से कितने ही दैत्य भयभीत होकर पृथ्वी पर गिर पड़े और उनके गिरते ही वह उनको भक्षण कर गई। इस तरह क्रोध में भरे हुए मातृगणों द्वारा नाना प्रकार के उपायों से बड़े-बड़े असुरों को मरते हुए देखकर राक्षसी सेना भाग खड़ी हुई और उनको इस प्रकार भागता देखकर रक्तबीज नामक महा पराक्रमी राक्षस क्रोध में भरकर युद्ध के लिए आगे बढ़ा। उसके शरीर से रक्त की बूँदें पृथ्वी पर जिसे ही गिरती थीं तुरन्त वैसे ही शरीर वाला तथा वैसा ही बलवान दैत्य पृथ्वी से उत्पन्न हो जाता था। रक्तबीज गदा हाथ में लेकर इंद्री के साथ युद्ध करने लगा, जब इंद्रिशाक्ति ने अपने वज्र से उसको मारा तो घायल होने के कारण उसके शरीर से बहुत सा रक्त बहने लगा और उनकी प्रत्येक बूँद से उसके सामन ही बलवान तथा महा पराक्रमी अनेकों दैत्य भयंकर रूप से प्रकट हो गए, वह सब के सब दैत्य बीज के सामान ही बलवान तेज वाले थे, वह भी भयंकर अस्त्र-शस्त्र लेकर देवियो के साथ लड़ने लगे| जब इंद्री के वज्र प्रहार से उनके मस्तक पर चोट लगी और रक्त बहने लगा तो उसमे से हज़ारों हो पुरुष उत्पन्न हो गए| वैष्णवी ने चक्र से और इंद्री ने गदा से रक्तबीज को चोट पहुचाई और वैष्णवी के चक्र से घायल होने पर उनके शरीर से जो रक्त बहा, उससे हजारों महा आसुर उत्पन्न हुए, जिनके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया, कौमारी ने शक्ति, से वाराही ने खड्ग से अरु माहेश्वरी ने त्रिशूल से उसको घायल किया| इस प्रकार क्रोध में भरकर उस महादैत्य से सब मातृ शकितयों पर पृथक-पृथक गदा से प्रहार किया, और माताओं ने शक्ति तथा शूल इत्यादि से उसको जो बार-बार घायल किया, उससे सैकड़ों महादैत्य उत्पन्न हुए और इस प्रकार उस रक्तबीज के रुधिर से उत्पन्न हुए असुरों से सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया जिससे देवताओं को भय हुआ, देवताओं को भयभीत देखर चंडिका ने काली से कहा- हे चामुण्डे ! अपने मुख को बड़ा करो और मेरे शास्त्र घात से उतपन्न हुए रक्त बिंदुओं तथा रक्त बिंदुओं से उत्पन्न हुए महा- असुरों को तुम अपने इस मुख से भक्षण करती जाओ| 🦁इस प्रकार रक्त बिंदुओं से उत्पन्न हुए महादैत्यों को भक्षण करती हुई तुम रण भूमि में विचरो| इस प्रकार रक्त कम होने से यह दैत्य नष्ट हो जावेगे, तुम्हारे भक्षण करने के कारण अन्य दैत्य उत्पन्न नहीं होगें| काली से इस प्रकार कहकर चंडिका देवी ने रक्तबीज पर अपने त्रिशूल किया और काली देवी ने अपने मुख में उसका रक्त ले लिया, तब उसने गदा से चंडिका पर प्रहार किया, प्रहार से चंडिका को तनिक भी कष्ट न हुआ, किन्तु रक्तबीज के शरीर से बहुत सा रक्त बहने लगा, लेकिन उसके गिरने के साथ ही काली ने उसको अपने मुख में ले लिया| काली के मुख में उस रक्त से जो असुर उतपन्न हुए, उनको उसने भक्षण कर लिया और रक्त को पीती गई, तदन्तर देवी ने रक्तबीज को जिसका की खून काली ने पिया था, चंडिका दैत्य को वज्र,बाण, खंडग और ऋष्टि इत्यादि से मार डाला| हे राजन ! अनेक प्रकार के शस्त्रों से मारा हुआ और खून से वंचित वह महादैत्य रक्तबीज पृथ्वी पर गिर पड़ा| हे राजन ! उसके गिरने से देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और माताएं उन असुरों का रक्त पिने के पश्चात उद्धत हो कर नृत्य करने लगी| *दुर्गा सप्तशती का आठवां अध्याय समाप्त* 🚩👣🦁जय माता दी 🦁👣🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯

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🎎 महाभागवत–देवीपुराण 🎎 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ ✍️ अध्याय दसवाँ ✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🚩👣🌺जय माता दी🌺👣🚩 🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗 ✍️इस अध्याय में सती के यज्ञकुण्ड में प्रवेश का समाचार सुनकर भगवान शंकर का शोक से विह्वल होना, उनके तृतीय नेत्र की अग्नि से वीरभद्र का प्राकट्य, वीरभद्र द्वारा दक्ष का यज्ञ-विध्वंस कर उनका सिर काटना, ब्रह्माजी का भगवान शंकर से यज्ञ पूर्ण करने की प्रार्थना करना, भगवान शंकर की कृपा से दक्ष का जीवित होना है । 🎎श्रीमहादेव जी बोले – इसके बाद ब्रह्माजी के पुत्र मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने वहाँ (कैलास पर) आकर देवाधिदेव त्रिलोचन शिवजी से अश्रुपूरित नेत्रों से कहा – देवदेव! आपको नमस्कार है. महेश्वर ! मैं नारद दक्षप्रजापति के घर से आया हूँ. आपने यह समाचार सुना है या नहीं कि आपकी प्राणप्रिया सती दक्षप्रजापति के यज्ञ में गयी हुई थीं. वहाँ आपकी निन्दा सुनकर उन्होंने क्रोधित होकर अपना देह त्याग दिया. दक्ष “सती”, “सती” ऎसा बार-बार आक्षेप करके पुन: करके पुन: यज्ञ करने में लग गए और देवगण आहुति ग्रहण करने लगे।।1-4।। नारद के मुख से यह महान कष्टकारी बात सुनकर तीन नेत्रों वाले देवाधिदेव शिव ने शोकाकुल होकर बहुत तरह से विलाप किया. हा सती ! मुझे शोकसागर में छोड़कर तुम कहाँ चली गई हो? अब मैं तुम्हारे बिना कैसे जीवित रहूँगा? पिता के घर जाने के लिए मैंने तुम्हें अनेक तरह से रोका था, शिवे! क्या उसी से रुष्ट होकर तुम मेरा परित्याग करके चली गई! ।।5-7।। महामुने ! इस प्रकार बहुत तरह से विलाप कर लाल-लाल नेत्रों तथा मुखवाले त्रिलोचन महादेव अत्यन्त कुपित हो उठे।।8।। भगवान रुद्र को कोपाविष्ट देखकर सभी प्राणी भयभीत हो गए, सारा जगत अत्यधिक विक्षुब्ध हो उठा और पृथ्वी डोलने लगी।।9।। उनके ऊर्ध्व नेत्र से अत्यन्त तेजस्वी अग्नि प्रादुर्भूत हुई और उस अग्नि से एक परम पुरुष उत्पन्न हुआ. विशाल विग्रह धारण करते हुए वह कालान्तक यमराज के समान प्रतीत हो रहा था और प्रज्वलित अग्नि के स्फुलिंगों की आभावाले तीन भयानक नेत्रों से युक्त था. वह अपने समस्त अंगों में विभूति धारण किए हुए था, अपने ललाट पर उसने अर्धचन्द्रमा को मुकुट की भाँति धारण कर रखा था और मध्यान्हकालीन करोड़ों सूर्यों की आभा तथा जटाजूट से उसका मस्तक सुशोभित हो रहा था।।10-12।। देवाधिदेव महेश्वर महादेव को प्रणाम करके तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा कर उसने दोनों हाथ जोड़कर उनसे कहा – पिताजी ! मैं क्या करूँ? यदि आप मुझे आज्ञा प्रदान करें तो अभी आधे क्षण में इस चराचर ब्रह्माण्ड को नष्ट कर डालूँ. क्या इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओं को उनके बाल पकड़कर आपके सामने ला दूँ? विभो ! यदि आप कहें तो यमराज को भी मार डालूँ. महेशान! यह मेरी प्रतिज्ञा है मैं आपसे यह सच-सच कह रहा हूँ. जिसके शमन के लिए आप मुझसे इस समय कहेंगे मैं उसका शमन कर दूँगा. चाहे वह सुरश्रेष्ठ इन्द्र ही क्यों ना हो. यदि वैकुण्ठनाथ विष्णु भी उसकी सहायता करने लगेंगे तो मैं आपकी आज्ञा से उन्हें भी कुण्ठित अस्त्रवाला कर दूँगा।।13-17½।। 🔱 शिवजी बोले – तुम्हारा नाम वीरभद्र है और तुम प्रमथगणों के अधिपति हो. मेरी आज्ञा से दक्ष के नगर में जाकर तुम शीघ्र ही उनके यज्ञ को नष्ट कर डालो. वत्स ! मेरा परित्याग करके जो देवतागण वहाँ गए हैं और उस दक्ष की सहायता कर रहे हैं, मेरी आज्ञा से तुम उनका भी निग्रह करो. मेरी निन्दा करने में संलग्न दक्षप्रजापति का भी मुख काट डालो. पुत्र ! वहाँ शीघ्र जाओ, विलम्ब मत करो।।18-20½।। वीरभद्र से ऎसा कहकर त्रिनेत्रधारी महादेव शिव ने लम्बी साँसें छोड़ी, उनसे हजारों शिवगण उत्पन्न हो गए. वे सब के सब भयंकर कर्म करने वाले तथा युद्धविद्या में पूर्ण पारंगत थे. वे अपने हाथों में गदा, खड्ग, मूसल, प्रास, त्रिशूल तथा पाषाण आदि अस्त्र लिए हुए थे।।21-22½।। उन गणों से घिरे हुए महामति वीरभद्र परमेश्वर शिव को प्रणाम कर तथा तीन बार उनकी प्रदक्षिणा करके वहाँ से चल पड़े।।23½।। तत्पश्चात वे सभी प्रमथगण सिंहनाद करते हुए क्षणभर में ही दक्षपुरी पहुँच गए, जहाँ उसका यज्ञ चल रहा था।।24½।। इसके बाद क्रोधयुक्त वीरभद्र ने कोपाविष्ट प्रमथगणों से कहा – शीघ्र ही यज्ञ का नाश कर दो और देवताओं को भगा दो।।25½।। उसके बाद उन प्रमथगणों ने उस महायज्ञ का विध्वंस कर डाला. कुछ गणों ने यज्ञ के खम्भे उखाड़कर उन्हें दसों दिशाओं में फेंक दिया, किसी ने यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझा दी तथा अन्य गण हव्य खाने लगे और क्रोध से लाल-लाल आँखों वाले कुछ गण देवताओं को खदेड़ने लगे।।26-27½।। इस प्रकार उन भयानक रूपवाले प्रमथगणों के द्वारा ध्वस्त किये गये यज्ञ को देखकर विष्णु ने वहाँ आकर प्रमथगणों से यह वचन कहा – तुम लोगों ने यज्ञ को क्यों नष्ट किया और देवताओं को क्यों भगा दिया? तुम लोग कौन हो? इन सभी बातों को बताओं, देर मत करो।।28-29½।। प्रमथों ने कहा – प्रभो! हम लोग देवाधिदेव शिव के द्वारा भेजे गए प्रमथगण हैं. हम शिव को अपमानित करने वाले इस महायज्ञ को नष्ट कर रहे हैं।।30½।। इसी बीच प्रतापशाली वीरभद्र ने क्रोध में आकर प्रमथगणों से कहा – शिव के प्रति द्वेषभाव रखने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? इन सभी को पकड़कर मेरे सामने ले आओ।।31-32।। इस प्रकार आदेश पाकर प्रमथगण क्रोधित होकर दसों दिशाओं में दौड़ पड़े. वे क्रोधाभिभूत होकर सभी देवताओं को पकड़-पकड़कर रौंदने लगे. कुछ गणों ने सूर्य को पकड़कर उनके दाँतों को चूर-चूर कर दिया और किसी गण ने अग्निदेव को बलपूर्वक पकड़कर उनकी जीभ काट ली. किसी ने भय के मारे भागते हुए मृगरूपधारी यज्ञपुरुष का सिर काट लिया और किसी ने देवी सरस्वती की नाक काट ली. किसी गण ने अर्यमा की दोनों भुजाएँ काट डालीं तो दूसरे गण ने अंगिरा ऋषि का ओष्ठ ही काट लिया. किसी गण ने यम, नैऋत तथा वरुणदेव को बाँध लिया।।33-36।। ब्राह्मणों को देखकर उन्हें विनयपूर्वक प्रणाम करके प्रमथगणों ने कहा – विप्रगण! आप लोग भय का त्याग कर दीजिए और यहाँ से चले जाइए. उसे सुनते ही सभी ब्राह्मण यज्ञ में प्राप्त वस्त्र, अलंकार आदि लेकर अपने-अपने घर चले गए।।37-38।। परम बुद्धिमान इन्द्र ने मोर का रूप धारण कर लिया और उड़कर पर्वत पर जा करके वे छिपकर यह सब कौतुक देखने लगे।।39।। इस प्रकार प्रमथगणों के द्वारा भगा दिए गए, श्रेष्ठ देवताओं को देखकर नारायण विष्णु मौन होकर मन-ही-मन सोचने लगे – यह मूर्खबुद्धि दक्ष शिव से विद्वेष करते हुए यज्ञ कर रहा है. तब यदि उसे वैसा फल नहीं मिलता तो वेदवचन ही निरर्थक हो जाता. शिव के प्रति दक्ष का विद्वेष होने से नि:संदेह मेरे प्रति भी उसका द्वेषभाव ही हुआ, क्योंकि मैं ही शिव हूँ और शिव ही विष्णु हैं. इस प्रकार हम दोनों में कोई भेद नहीं है।।40-42।। मैं दक्ष के द्वारा इस विष्णुरूप से विशेषरूप से प्रार्थित हुआ और महादेव के रूप में निन्दित भी मैं ही हुआ हूँ. इसका भी दो प्रकार का भाव है. यह कर्म तथा मन से दो तरह का भाव रखता है. अत: मैं भी अब वही करूँगा. मैं विष्णुरूप से रक्षक और शिवरूप से संहारक बनूँगा. इस प्रकार स्नेहमिश्रित युद्ध करके और फिर उसमें पराजित होकर स्वयं रूद्ररूप से उस दक्ष का शमन भी करूँगा, इसमें संदेह नहीं है. इसके बाद मैं देवताओं को साथ लेकर यज्ञ पूर्ण करूँगा, यही विष्णु की आराधना का फल कहा गया है।।43-46½।। इस प्रकार मन में निश्चय करके शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाले भगवान विष्णु ने प्रमथगणों को रोक दिया और वे सिंहनाद करने लगे।।47½।। इसके बाद वीरभद्र ने क्रोधित होकर सनातन विष्णु से कहा – विष्णो! आप ही यज्ञापति हैं – ऎसा श्रुतियाँ कहती हैं. इस महायज्ञ में शिव की निन्दा करने वाला वह दुराचारी दक्ष कहाँ है? उसे आप स्वयं लाकर मेरे हवाले कर दीजिए, नहीं तो आप मेरे साथ युद्ध कीजिए. प्राय: विशिष्ट शिवभक्तों में आप अग्रणी हैं और आप ही शिव के प्रति द्वेषभाव रखनेवालों के हित के लिए तत्पर भी दिखाई दे रहे हैं।।48-50½।। तत्पश्चात विष्णु ने मुस्कुराकर कहा – मैं तुम्हारे साथ युद्ध करूँगा. मुझे युद्ध में पराजित कर दक्ष को ले जाओ, मैं भी तुम्हारा पराक्रम देखता हूँ।।51½।। इतना कहकर विष्णु ने धनुष उठाया और चारों ओर बाणों का जाल-सा फैला दिया. उन बाणों से क्षणभर में ही प्रमथगणों के सभी अंग क्षत-विक्षत हो गए. सैकड़ों गण रक्त का वमन करने लगे और हजारों बेहोश हो गए।।52-53।। उसके बाद उस वीरभद्र ने भी विष्णु को लक्ष्य करके गदा चलायी. उनके शरीर का स्पर्श करते ही उस गदा के सैकड़ों खण्ड हो गए. तब विष्णु ने भी रोष में आकर वीरभद्र की ओर गदा चलायी. महामुने ! वह गदा भी उसके पास आते ही उसी तरह सौ टुकड़ों में हो गयी. तदनन्तर क्रोध से दीप्त नेत्रों वाले अनन्तात्मा विष्णु ने क्षण भर में ही लौहमयी एक दूसरी गदा उठा ली. तत्पश्चात खट्वांग लेकर वीरभद्र ने उन गदाधर विष्णु के बाहुदण्ड पर प्रहार करके उनकी गदा भूमि पर गिरा दी. इससे अत्यन्त कुपित विष्णु ने अपने तेज से प्रज्वलित महाभयंकर सुदर्शन चक्र को उस वीरभद्र के ऊपर चला दिया. मुने! उसे देखकर वीरभद्र ने भी मन में भगवान शिव का स्मरण किया. उससे वीरभद्र के कण्ठ तक पहुँचा हुआ वह चक्र माला की भाँति सुशोभित होने लगा।।54-59।। तत्पश्चात युद्ध में भगवान विष्णु ने क्रुद्ध होकर सैकड़ों सूर्यों की भाँति कान्तिवाला खड्ग ले लिया और वे वीरभद्र को मारने के लिए दौड़े. तब विशाल भुजाओं वाले प्रतापी वीरभद्र ने उसी क्षण अपने हुंकार मात्र से खड्ग तथा उन विष्णु – दोनों को स्तम्भित कर दिया. उसके बाद क्रोधोन्मत्त वह वीरभद्र स्तंभित हुए उन विष्णु को मारने के लिए शूल तथा मुद्गर उठाकर उनकी ओर झपटा।।60-62।। उसी बीच यह आकाशवाणी हुई – “वीरभद्र! रुक जाओ! युद्ध में इस तरह से क्रोध को प्राप्त होकर क्या तुम अपने को भूल गये हो. जो विष्णु हैं, वे ही महादेव हैं और जो शिव हैं वे ही स्वयं विष्णु हैं. इन दोनों में कभी कहीं कोई भी अन्तर नहीं है”।।63-64।। यह सुनकर महामति वीरभद्र ने शिवस्वरुप विष्णु को नमस्कार कर “दक्ष के केश पकड़कर” यह वचन कहा – प्रजापते! तुमने जिस मुख से परम पुरुष देवेश्वर शिव की निन्दा की है, अब मैं उसी मुख पर प्रहार करता हूँ।।65-66।। ऎसा कहकर क्रोध से अत्यन्त लाल नेत्रों वाले वीरभद्र ने दक्ष के मुख पर बार-बार प्रहार करके अपने नख के अग्रभाग से उसे काट डाला. साथ ही जो लोग महादेव जी की निन्दा सुनकर हर्षित हुए थे, प्रमथाधिपति वीरभद्र ने उनकी भी जीभ तथा कान काट डाले।।67-68।। इस प्रकार यज्ञ के विनष्ट हो जाने पर ब्रह्माजी कैलास पर्वत पर गये और भगवान शिव को प्रणाम करके यज्ञविधान के लोप की बात कहने लगे।।69।। ब्रह्माजी ने महादेव जी से कहा – आप ऎसा क्यों कर रहे हैं? जगन्माता ब्रह्मस्वरूपिणी सती तो सनातन हैं. उनका देहग्रहण और जन्म लेना तो भ्रान्तिपूर्ण और विडम्बना मात्र है. वे तो जगद्व्यापिनी महामाया हैं. उन्होंने ही दक्ष को मोहित करने के लिए यज्ञकुण्ड के पास छायासती को स्थापित कर दिया था. दक्षप्रजापति को मोहित करने के उद्देश्य से वही छाया यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयी और परा प्रकृति भगवती स्वयं आकाश में विराजमान हो गयीं. क्या उस रहस्य को आप नहीं जानते हैं? फिर ऎसा क्यों कर रहे हैं?।।70-73।। देवदेवेश ! आइये और अपने शरणागतों पर कृपा कीजिए. आप तो विधि का संरक्षण करने वाले हैं, अत: विधि का लोप मत कीजिए. हम लोगों के साथ वहाँ यज्ञ सम्पन्न करने के पश्चात परमेशानी सती की विधिवत प्रार्थना करके आप उन्हें पुन: अवश्य ही देखेंगे. महादेव ! अब आप दक्षप्रजापति के घर चलिए. भगवन् ! मुझ पर अनुग्रह कीजिए, आपको अन्यथा नहीं करना चाहिए।।74-76।। उनकी यह बात सुनकर शिवजी दक्षप्रजापति के घर गये. वहाँ शिव को आया देखकर वीरभद्र ने उन्हें प्रणाम किया।।77।। उसके बाद भगवान शिव की प्रार्थना कर के ब्रह्माजी ने उनसे पुन: आदरपूर्वक कहा – महेशान! अब आप आज्ञा दीजिए, जिससे यज्ञ पुन: आरंभ हो सके।।78।। तब शिवजी ने उत्सुक वीरभद्र को आज्ञा दी – वीरभद्र ! क्रोध छोड़ो और यज्ञ की सारी व्यवस्था फिर से कर दो।।79।। महादेव से आज्ञा प्राप्त करके वीरभद्र ने उसी क्षण पूर्व की भाँति यज्ञ को व्यवस्थित कर दिया और सभी देवताओं को बन्धनमुक्त कर दिया।।80।। उसके बाद ब्रह्माजी ने देवाधिदेव त्रिलोचन शिव से फिर कहा – परमेश्वर ! अब दक्ष को जीवित करने के लिए आज्ञा प्रदान कीजिए।।81।। उन ब्रह्मा की वह बात सुनते ही भगवान शंकर ने कहा – वीरभद्र ! महाबाहु ! दक्ष को अब अवश्य ही जीवित कर दो।।82।। देवाधिदेव शंकर का वचन सुनकर बुद्धिमान उस वीरभद्र ने एक बकरे का सिर जोड़कर दक्षप्रजापति को जीवित कर दिया।।83।। जो लोग ईश्वर की निन्दा करते हैं, वे निश्चय ही गूँगे पशु हैं. मुने ! ऎसा विचार करके वीरभद्र ने दक्ष को बकरे का सिर जोड़ा था।।84।। ब्रह्माजी के प्रार्थना करने पर सभी देवादि भयमुक्त होकर पुन: आ गये. दक्षप्रजापति ने महेश्वर को आहुति देकर यज्ञ का समापन किया।।85।। उसके बाद ब्रह्मा तथा विष्णु ने दक्षप्रजापति से कहा – अनेक स्तुतियों के द्वारा आदरपूर्वक शिव की आराधना कीजिए. बहुत दिनों तक देवेश्वर शिव की निन्दा करके आपने जो पाप अर्जित किया है, उससे मुक्ति की इच्छा रखते हुए आप सनातन भगवान शिव की स्तुति कीजिए. ये भगवान शिव स्वभाव से ही आशुतोष हैं और शिव नाम लेने मात्र से प्रसन्न हो जाते हैं. आपके प्रति इनकी अप्रसन्नता तब नहीं रहेगी।।86-88।। उन दोनों की यह बात सुनकर दक्ष ने शाश्वत परमेश्वर महादेव को प्रणाम किया और उनका स्तवन करना आरम्भ किया।।89।। 🎎 दक्ष बोले – आपको तत्त्वत: न तो विष्णु, न ब्रह्मा और न मुख्य योगीगण ही जान पाते हैं. अत: दुर्बुद्धि मैं आपके उस दुर्गम्य स्वरूप को जानने में कैसे समर्थ होता? आप ही सबके बुद्धितत्व हैं. आपकी इच्छा के अधीन ही ये सभी लोक हैं. तब आपकी इच्छा के वशीभूत मेरे द्वारा आपकी निन्दा करने से मेरा कैसा अपराध हुआ?।।90।। आप शुद्ध परम परात्पर तत्त्व हैं तथा ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा पूजित हैं. मैं आपके महान चरित्र तथा स्वरुप का वर्णन कैसे करूँ? मैं आपकी शरण में आया हुआ दास हूँ. आपका चरणयुगल छोड़कर मेरे लिए दूसरा अवलम्ब ही क्या है? शम्भो ! आप मेरे उस अपराध को क्षमा कीजिए और अपने कृपागुणों से पापरूपी सागर से मेरा उद्धार कीजिए।।91।। पशुपते ! आप भगवान परमेश्वर हैं. इस जगत में जो भी निर्बल अथवा महान लोग हैं, वे सब आपके ही रूप हैं, क्योंकि आप विश्वरुप हैं. उस आप परमेश्वर के विद्यमान रहते मेरे द्वारा की गयी निन्दा से उत्पन्न पाप भला कैसे रह सकता है? विश्वेश्वर ! कृपापूर्वक मुझ शरणागत तथा दीन की रक्षा कीजिए।।92।। आपके चरण कमल पराग को अपने सिर पर धारण करके ही ब्रह्मा तथा विष्णु समस्त देवताओं के द्वारा वन्दित चरण वाले हो पाए हैं. इस सभा में आये हुए आप सुरेश्वर को जो मैं अपने नेत्र से देख पा रहा हूँ, वह तो मेरे पूर्वजों का अतुलनीय भाग्य है।।93।। इस जगत में सभी देहधारियों में कुबुद्धि तथा सुबुद्धि के रूप में आप ही हैं. आप ही सबकी निन्दा तथा वन्दन के पात्र हैं, अत: मेरा कोई अपराध नहीं है।।94।। दक्ष के इस प्रकार प्रार्थना करने पर आशुतोष दयासिन्धु भगवान शिव ने अपने दोनों हाथों से उन्हें खींचकर उठा लिया।।95।। शिव के अंग के स्पर्शमात्र से ही दक्षप्रजापति कृतकृत्य हो गये और अपने को जीवन्मुक्त के समान तथा महान भाग्यशाली समझने लगे।।96।। मन, वाणी तथा शरीर से परम भक्ति से संपन्न होकर दक्षप्रजापति ने अनेकविध उपहारों द्वारा शंकर का अभुत सत्कार किया।।97।। उसके बाद ब्रह्माजी ने महादेव जी से पुन: भक्तिपूर्वक कहा – परमेश्वर ! एकमात्र आप भगवान सदाशिव ही भक्तों पर अनुकम्पा करने वाले हैं, क्योंकि आपने अनुग्रहपूर्वक मेरी प्रार्थना सुनकर दक्षप्रजापति की रक्षा की. आपको छोड़कर यदि देवतागण कहीं भी यज्ञ में जाएँगे तो वे उसी क्षण निश्चय ही पूर्वोक्त दशा को प्राप्त होंगे. जो नराधम यज्ञ में आपके बिना अन्य देवताओं का यजन करेंगे, उनका यज्ञकार्य नष्ट हो जाएगा और वे महापाप के भागी होंगे।।98-101।। ।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “दक्षयज्ञविध्वंसवर्णन” नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।। 🚩👣🌺जय माता दी🌺👣🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯

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🎎महाभागवत – देवीपुराण 🎎 ⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️⚛️ ✍️ अध्याय नवाँ ✍️ ✍️✍️✍️✍️✍️✍️ 🚩🏵️🌺जय माता दी🌺👣🚩 🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗🥗 ✍️इस अध्याय में सती का पिता के घर पहुँचना, माता प्रसूति द्वारा सती का सत्कार करना तथा यज्ञ-विध्वंस के भयंकर स्वप्न को सुनाना, दक्ष द्वारा शिव की निन्दा. क्रुद्ध सती द्वारा छाया सती का प्रादुर्भाव और उसे यज्ञ नष्ट करने की आज्ञा देकर अन्तर्धान हो जाना, छाया सती का यज्ञ कुण्ड में प्रवेश का वर्णन है. 🔱 श्रीमहादेव जी बोले – [नारद !] इसके बाद सुन्दर वक्ष:स्थल तथा खुले हुए केशों वाली दक्षपुत्री भगवती सती रथ से उतरकर शीघ्रतापूर्वक अपनी माता के पास चलीं गई।।1।। अपनी पुत्री को बहुत दिनों बाद आया देखकर दक्षपत्नी प्रसूति उन्हें गोद में लेकर वस्त्र से उनका मुखकमल पोंछने लगीं और बार-बार उनका मुख चूमती हुई रो-रोकर कहने लगीं – ।।2½।। माता ! सर्वदेवेश्वर सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करके आप सोचने योग्य नहीं रह गई हैं और आप हम लोगों को शोकरूपी महासागर में छोड़कर चली गईं. आप अत्यंत श्रेष्ठ, तीनों लोकों की माता तथा आदिशक्ति हैं. यह मेरा महान भाग्य है कि आप साक्षात् भगवती मेरे गर्भ से उत्पन्न हुई हैं. सती ! मेरे घर में कृपापूर्वक उपस्थित हुई आपको जो मैं देख रही हूँ, इससे बहुत दिनों से विद्यमान मेरा शोक आज दूर हो गया. आपके दुर्बुद्धि पिता भी परम शिव को न जानकर उनसे विशेष द्वेषभाव रखते हुए मोहवश महान यज्ञ कर रहे हैं. हमारे तथा विद्वान मुनियों के द्वारा अनेक तरह से कहे जाने पर भी इन्होंने न तो आपको और न ही परमेश्वर शिव को बुलाया।।3-7½।। 👣सती बोलीं – सभी देवताओं के देवता यज्ञेश्वर भगवान शिव का अपमान करके मेरे पिता समस्त देवताओं के साथ यज्ञ कर रहे हैं. कोई कुछ भी माने, किंतु मेरा तो ऎसा निश्चय है कि इस यज्ञ की समाप्ति निर्विघ्न नहीं हो सकेगी।।8-9½।। प्रसूति बोलीं – मैंने रात में जो अत्यधिक भयानक, दारुण तथा अत्यन्त रोमांचक स्वप्न देखा है, उसे सुनो – ।।10½।। उस महायज्ञ में जहाँ दक्षप्रजापति देवताओं के साथ स्थित थे, वहाँ कोई देवी महेश्वरी अकस्मात् आ गयीं. वे महान मेघों की कान्ति के समान श्यामवर्ण वाली थीं, उनके बाल खुले हुए थे, वे दिगम्बर थीं, उनकी चार भुजाएँ थीं, वे अट्टहास कर रही थीं और जाज्वल्यमान तीन नेत्रों से प्रकाशित थीं. उन्हें देखकर दक्षप्रजापति आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने विनयपूर्वक कहा – “आप कौन हैं, किसकी पत्नी हैं और यहाँ क्यों आयी हैं? उन्होंने कहा – “क्या आप नहीं जानते कि मैं आपकी पुत्री सती हूँ.” इसके बाद दक्षप्रजापति ने शिव की निन्दा करते हुए बहुत तरह की बात कही. उसे सुनते ही वे बड़े क्रोध से यज्ञाग्नि में कूद पड़ी।।11-15।। उसके बाद भयानक कर्म करने वाले तथा भीषण आकार वाले करोड़ों प्रमथगण क्षण भर में ही वहाँ उपस्थित हो गए और फिर कालान्तक यमराज के समान महान उग्र कार्य करने वाला कोई महान पुरुष भी वहाँ आ गया. उसने विष्णु आदि प्रमुख देवताओं को जीतकर प्रमथगणों के साथ महायज्ञ का विध्वंस कर डाला और दक्षप्रजापति का सिर काट लिया. अब वे दक्ष प्रजापति मुखविहीन होकर यज्ञकुण्ड के किनारे पड़े रहे. कौपीन वस्त्र धारण किए तथा जटामुकुट से सुशोभित महान उग्र वाले वे सभी प्रमथगण क्रोधित होकर उन दक्ष प्रजापति को खाने को उद्यत हो गए. अपने समस्त अंगों में भस्म लपेटे तथा हाथों में शूल, पाश और खड्ग धारण किए हुए वे उनका रक्त पी रहे थे और हँस रहे थे. तब दक्ष के सभी नगरवासी ऎसा देखकर व्याकुल हो उठे और रोते हुए हाहाकार करने लगे।।16-21।। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने देवाधिदेव सदाशिव की विनयपूर्वक प्रार्थना करके उन्हें स्वयं बुलाकर कहा – “इन दक्ष प्रजापति को अवश्य ही जीवित कीजिए. विभो ! देवदेव ! इस यज्ञ का समापन कीजिए और मुझ पर प्रसन्न होइए,” उनकी वह बात सुनकर शिव की निन्दा किए जाने के कारण एक बकरे का सिर जोड़कर भगवान शिव ने दक्ष को जीवित कर दिया।।22-23½।। रात के थोड़ा शेष रहने पर मैंने इस प्रकार का स्वप्न देखा था और आज वही श्यामवर्ण वाली तुम मेरे बगल में आई हुई हो. मैंने जैसा स्वप्न में देखा था, तुम वैसी ही दिखाई पड़ रही हो और दक्ष प्रजापति के विषय में जैसा देखा, वही होनेवाला है, क्योंकि जिस देवी को मैंने स्वप्न में देखा था, तुम्हें वैसी ही देख रही हूँ।।24-26।। माता ! क्या यह स्वप्न कभी विफल हो सकेगा? और शिवनिन्दा का समुचित फल प्राप्त कर वे दक्ष क्या अपनी मूर्खता का त्याग करेंगे? वे तत्त्वत: तुम दोनों को जानकर शीघ्र ही अपना द्वेष त्याग देंगे, पुत्री ! तुम चिरंजीवी होओ और तुम्हारी कभी भी कोई हानि न हो. यह वियोग स्वप्नमात्र ही हो, प्रत्यक्ष में तुम दोनों दीर्घायु प्राप्त करो. तुम जिसकी अपनी हो, वह निश्चय ही शोक करने योग्य नहीं है. वह धन्य है और भाग्यवान है. तुम कभी भी मेरा त्याग मत करना, क्योंकि मैं तुम्हारी माँ हूँ।।27-29½।। 🎎श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार माता से सम्मान प्राप्त करके सती ने उन्हें प्रणाम किया तथा उनसे आज्ञा लेकर वे शीघ्र ही दक्षप्रजापति के पास चली गई।।30½।। उसी समय दक्ष के नगरवासी एकत्र होकर आपस में विचार करने लगे कि यह कैसा महान आश्चर्य है?।।31½।। सुवर्ण के समान गौर अंगों एवं शान्त रूपवाली सुन्दरी सती अब काले मेघ के समान वर्णवाली तथा भयंकर रूपवाली कैसे बन गयीं? इनके बाल खुले हुए हैं, ये भयानक दाँतों से युक्त हैं, क्रोध के मारे इनकी आँखें लाल-लाल हो गई हैं, इन्होंने व्याघ्रचर्म धारण कर रखा है और ये चार पराक्रमी भुजाओं से युक्त हैं. इस यज्ञ की देवसभा में इस तरह से इनका आगमन क्यों हुआ है?।।32-34।। ऎसा मानता हूँ कि ये सम्पूर्ण जगत् को क्षणार्धमात्र में ग्रसित कर लेंगी. आज दक्षप्रजापति की न जाने क्या गति होगी? इनका अपमान करके ये दक्षप्रजापति देवताओं के साथ यज्ञ कर रहे हैं. निश्चय ही उसी का फल प्रदान करने के किए ये क्रुद्ध होकर आयी हुई हैं. संहार के समय जो ब्रह्मा तथा विष्णु का भी नाश कर देती हैं, वे ही ये यदि यज्ञ नष्ट कर दें तो विष्णु भी क्या कर सकेंगे?।।35-37।। इसके बाद यज्ञशाला में आकर सती ने भगवान शिव के विद्वेषजनित हर्ष से परिपूर्ण उस दक्षप्रजापति को देखा. उन सती को देखते ही हव्य के भोक्ता देवता, ऋषि, बृहस्पति तथा अन्य देवगण भी भय से काँपने लगे. सभी देवता तथा महात्मागण अपना-अपना कार्य छोड़कर पट पर अंकित चित्र की भाँति स्थिर दृष्टि से उन पराशक्ति को देखने लगे. कुछ देवताओं ने दक्ष के भय से उस संहारकारिणी भगवती काली को प्रत्यक्ष प्रणाम कर लिया।।38-41।। तत्पश्चात दक्षप्रजापति ने पूर्वोक्त स्थिति वाले उन लोगों को देखकर सभी दिशाओं में दृष्टिपात करते हुए चारों ओर देखा।।42।। तदनन्तर दक्ष प्रजापति ने क्रोध से दीप्त नेत्रों वाली, खुले बाल वाली, वस्त्ररहित तथा काले धुएँ से निर्मित अंजनसमूह की कान्तिवाली उन भगवती काली को देखा।।43।। 🔯 दक्ष बोले – तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो तथा किसकी पत्नी हो? इस तरह निर्लज्ज होकर यहाँ क्यों आयी हो? तुम तो सती की तरह दिखाई पड़ रही हो. पुत्री ! क्या तुम मेरी पुत्री सती ही हो और शिव के घर से यहाँ आयी हो?।।44½।। सती बोलीं – पिताजी ! क्या आप अपनी इस पुत्री सती को नहीं पहचानते? आप मेरे पिता हैं और मैं आपकी पुत्री हूँ. आप पिता को मैं प्रणाम करती हूँ।।45½।। दक्ष बोले – माता ! सती ! आप इस तरह कृष्णवर्ण की कैसे हो गई हैं. आप तो पहले मेरे घर में स्वर्ण के समान गौर अंगों वाली थीं, आपकी कान्ति शरत्कालीन चन्द्रमा के समान थी और आप दिव्य वस्त्र धारण किए रहती थीं, वही आप आज निर्वस्त्र होकर मेरी सभा में क्यों आयी हुई हैं? आप इस तरह खुले बालों तथा भयानक नेत्रों वाली क्यों हो गई हैं? क्या अयोग्य पति पाने के कारण आप इस दशा को प्राप्त हैं? मैंने अपने यज्ञमहोत्सव में तुम्हें नहीं बुलाया, इसका कारण तुम्हारा शिवपत्नी होना है न कि तुम्हारे प्रति हमारे स्नेह आदि का अभाव. तुमने अच्छा किया जो स्वयं ही यहाँ चली आयी. तुम्हारे लिए वस्त्र, आभूषण आदि रखे हुए हैं, वह सब तुम ले लो. त्रैलोक्यसुन्दरी पुत्री सती ! तुम मेरे प्राण के समान प्रिय हो. सुन्दर नेत्रों वाली ! अयोग्य शंकर को पति के रूप में पाकर तुम बहुत ही दु:खित हो।।46-51½।। शिव के प्रति दक्ष के द्वारा कहा गया यह निन्दा से परिपूर्ण वचन सुनकर क्रोध से प्रज्वलित समस्त अंगों वाली वे सती सोचने लगीं कि मैं मात्र आधे क्षण में सभी देवताओं तथा यज्ञ सहित अपने पिता को जलाकर राख कर सकती हूँ, किंतु पितृहत्या के भय से वैसा नहीं करूँगी. अपितु देवताओं के सहित इन्हें मोहित कर दे रही हूँ।।52-54।। इस प्रकार मन में विचार करने के बाद उन दक्षपुत्री सती ने क्षण भर में अपने ही समान रूप वाली एक छाया सत्ती की रचना कर दी।।55।। तब सती ने उस छाया सती से कहा – मेरी बात पर ध्यान दो. तुम मेरा एक काम कर दो, इस यज्ञ का विध्वंस कर डालो. सुलोचने ! मेरे पिता के साथ बहुत प्रकार की बातें करके तथा उनके मुख से शिव के प्रति अपमानजनक वाक्य सुनकर क्रोध से प्रज्वलित शरीर वाली तुम यज्ञाग्नि में प्रवेश कर जाना. 🌺 मैं इसकी पुत्री हूँ – इसी से गर्वित होकर यह दक्ष शिव की निन्दा कर रहा है. इसलिए तुम शीघ्र ही दक्ष के उस गर्व को चूर-चूर कर दो. यज्ञाग्नि में तुम्हारे प्रविष्ट होने की बात सुनकर शोक से संतप्त हृदय वाले भगवान महेश्वर यहाँ निश्चित रूप से आयेँगे और सभी देवताओं तथा यज्ञ की रक्षा करने में संलग्न विष्णु को पराजित करके यज्ञ को नष्ट कर देंगे और पिता का वध कर डालेंगे।।56-60½।। छायाकाली से ऎसा कहकर मुसकान भरे मुख वाली महाकाली स्वयं अन्तर्धान होकर आकाश में स्थित हो गयीं।।61।। मुनिश्रेष्ठ ! उस समय भेरी, मृदँग और तुरही आदि बाजें बजने लगे, महोत्सव होने लगे और भारी पुष्पवर्षा होने लगी. उन देवी के निकट रहने पर भी उनकी माया से मोहित होने के कारण किसी देवता और महर्षि ने यह सब नहीं देखा।।62-63½।। इसके बाद छायासती ने क्रुद्ध होकर दक्षप्रजापति से कहा – तुम अज्ञानवश देवाधिदेव सनातन शिव तथा मुझ सती की निन्दा क्यों कर रहे हो? दुर्बुद्धि ! यदि कल्याण चाहते हो तो अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखो, अन्यथा महामूर्ख ! शिव की निन्दा करने वाली तुम्हारी इस जीभ को मैं काट दूँगी. जो तुम देवसभा में बहुत काल से परमेश्वर शिव की निन्दा करते रहे हो, उसका फल आज ही तुम्हें मिल जाएगा, ऎसा मुझे लगता है. जो मनुष्य सम्पूर्ण लोकों के एकमात्र कारण महेशान शिव की निन्दा करता है, वे परमात्मा सदाशिव उसका सिर काट देते हैं।।64-67½।। 🌹दक्ष बोले – अल्प बुद्धिवाली बालिके ! मेरे सामने ऎसी बात फिर मत बोलना. श्मशान में रहने वाले उस दुराचारी को मैं जानता हूँ. दुर्मति ! तुमने स्वयं ही अपनी बुद्धि से भूतगणों के अधिपति शिव को पतिरूप में वरण किया है. अब उसी के पास जाकर अपने योग्य परम सुख प्राप्त कर रही हो. मैं प्रजापति दक्ष हूँ – ऎसा सभी देवताओं तथा देवियों को मालूम है. मेरे आगे तुम शिव की प्रशंसा क्यों कर रही हो, जिसे मैं सुन ही नहीं सकता।।68-70½।। 🔯 छायासती बोलीं – दक्ष मैं फिर कह रही हूँ कि यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो पापबुद्धि का त्याग कर दो और भक्तिपूर्वक भगवान सदाशिव की उपासना करो. यदि तुम पुन: अज्ञानवश परमात्मा शिव की निन्दा करोगे तो वे शम्भु निश्चित रूप से यज्ञसहित तुम्हें नष्ट कर डालेंगे।।71-72½।। दक्ष बोले – कुपुत्री ! तुम बुरे चरित्रवाली हो, मेरे नेत्रों के सामने से हट जाओ. मेरे लिए तो तुम उसी समय से मत गई हो जब तुमने शिव को पतिरूप में प्राप्त किया था. तुम मुझे बार-बार अपने पति रुद्र की याद क्यों दिला रही हो? जिससे कि मेरे अंदर स्थित क्रोधाग्नि भूसी की आग की तरह बढ़ती जा रही है. कुपुत्री ! दुष्टबुद्धिवाली तुमने शिव को पति रूप में प्राप्त किया है. अत: तुम्हें देखने से मेरा शरीर शोकाग्नि से दग्ध हो रहा है. दूषित अन्त:करण वाली ! तुम शीघ्र ही मेरी आँखों से दूर हो जाओ. मेरे समक्ष अपने पति का गुणगान मत करो।।73-76½।। 🛕श्रीमहादेवजी बोले – [नारद !] दक्ष के ऎसा कहने पर उन भगवती छायाकाली ने कोपाविष्ट होकर भयंकर रूप धारण कर लिया. उनके जाज्वल्यमान तीनों नेत्र अत्यन्त प्रकाशित थे, उनका मस्तक नक्षत्रलोक पहुँचा हुआ था, उनका मुख फैला हुआ था, पैरों तक लटकने वाले खुले हुए केशपाश से वे सुशोभित हो रही थीं, वे मध्यान्हकालीन हजारों सूर्यों की कान्ति से सम्पन्न थीं और प्रलयकाल के बादलों के समान प्रतीत हो रही थीं।।77-79।। तत्पश्चात क्रोध से दीप्त अंगों वाली उन महेश्वरी ने बार-बार अट्टहास करके गंभीर वाणी में दक्ष से कहा – मैं केवल आपकी आँखों से ही दूर नहीं हो जाऊँगी, अपितु आप से उत्पन्न इस देह से भी अविलम्ब दूर हो जाऊँगी।।80-81।। इस प्रकार क्रोध से प्रदीप्त नेत्रों वाली छायासती सभी देवताओं के देखते-देखते यज्ञाग्नि में प्रवेश कर गयीं।।82।। उसके बाद पृथ्वी हिलने लगी, महाप्रचण्ड वायु बहने लगी और सूर्य को भेदकर बड़े-बड़े उल्कापिण्ड पृथ्वीतल पर गिरने लगे. सभी दिशाएँ विक्षुब्ध हो उठीं, मेघ रक्त बरसाने लगे, समस्त देवतागण विकृत वर्णवाले हो गए. यज्ञकुण्ड की अग्नि बुझ गयी और सियार तथा कुत्ते यज्ञ मण्डप में रखी हवनीय सामग्री खाने लगे. इस प्रकार वह यज्ञमण्डप मात्र आधे ही क्षण में श्मशान के रूप में परिवर्तित हो गया. इससे दक्षप्रजापति का मुख-मण्डल मलिन हो गया और वे बार-बार गहरी साँसें छोड़ने लगे. इसके बाद ब्राह्मणों ने जिस किसी तरह फिर से यज्ञ आरंभ किया।।83-86।। 💐मुने ! भगवान शिव के भय से देवता अत्यन्त घबराए हुए थे. सभी देवता तथा महर्षिगण आपस में कहने लगे कि यह अमंगलकारी बात क्षणभर में ही दूर तक फैल जाएगी और शिवजी आज ही सती के देहत्याग का समाचार सुन लेंगे. जगत का संहार करने वाले वे महाराज शम्भु क्रुद्ध होकर न जाने किसका क्या कर डालेंगे अथवा हो सकता है वे सृष्टि का ही लोप कर दें।।87-89।। इसके बाद मुनिश्रेष्ठ महर्षि नारद सभा के बीच से चुपचाप उठकर शीघ्रतापूर्वक कैलास की ओर चल दिए।।90।। ।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “छायासत्यग्निप्रवेश” नामक नवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।। 🚩👣🌺जय माता दी 🌺👣🚩 🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯🔯

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. देवी माहात्म्य अध्याय - 01 इस अध्याय में:- (मेधा ऋषि का राजा सुरथ और समाधि को भगवती की महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वध का प्रसंग सुनाना) भगवान् विष्णु के सो जाने पर मधु और कैटभ को मारने के लिये कमलजन्मा ब्रह्माजी ने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवी का मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथों में खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शंख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अंगों में दिव्य आभूषणों से विभूषित हैं। उनके शरीर की कान्ति नीलमणि के समान है तथा वे दस मुख और दस पैरों से युक्त हैं। मार्कण्डेयजी बोले- 'सूर्य के पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्ति की कथा विस्तार पूर्वक कहता हूँ , सुनो। सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वन्तर के स्वामी हुए, वही प्रसंग सुनाता हूँ। पूर्वकाल की बात है, स्वारोचिष मन्वन्तर में सुरथ नाम के एक राजा थे, जो चैत्रवंश में उत्पन्न हुए थे। उनका समस्त भूमण्डल पर अधिकार था। वे प्रजा का अपने औरस पुत्रों की भाँति धर्म पूर्वक पालन करते थे; तो भी उस समय कोलाविध्वंसी नामक कुल के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये। राजा सुरथ की दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्या में कम थे, तो भी राजा सुरथ युद्ध में उनसे परास्त हो गये। तब वे युद्धभूमि से अपने नगर को लौट आये और केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे। (समूची पृथ्वी से अब उनका अधिकार जाता रहा), किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओं ने उस समय महाभाग राजा सुरथ पर आक्रमण कर दिया। राजा का बल क्षीण हो चला था; इसलिये उनके दुष्ट, बलवान् एवं दुरात्मा मन्त्रियों ने वहाँ उनकी राजधानी में भी राजकीय सेना और खजाने को हथिया लिया। सुरथ का प्रभुत्व नष्ट हो चुका था, इसलिये वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार हो वहाँ से अकेले ही एक घने जंगल में चले गये। वहाँ उन्होंने विप्रवर मेधा मुनि का आश्रम देखा, जहाँ कितने ही हिंसक जीव [अपनी स्वाभाविक हिंसावृत्ति छोड़कर] परम शान्त भाव से रहते थे। मुनि के बहुत-से शिष्य उस वन की शोभा बढ़़ा रहे थे। वहाँ जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वे उन मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक रहे। फिर ममता से आकृष्टचित्त होकर वहाँ इस प्रकार चिन्ता करने लगे- 'पूर्वकाल में मेरे पूर्वजों ने जिसका पालन किया था, वही नगर आज मुझसे रहित है। पता नहीं, मेरे दुराचारी भृत्यगण उसकी धर्म पूर्वक रक्षा करते हैं या नहीं। जो सदा मद की वर्षा करने वाला और शूरवीर था, वह मेरा प्रधान हाथी अब शत्रुओं के अधीन होकर न जाने किन भोगों को भोगता होगा? जो लोग मेरी कृपा, धन और भोजन पाने से सदा मेरे पीछे-पीछे चलते थे, वे निश्चय ही अब दूसरे राजाओं का अनुसरण करते होंगे। उन अपव्ययी लोगों के द्वारा सदा खर्च होते रहने के कारण अत्यन्त कष्ट से जमा किया हुआ मेरा वह खजाना खाली हो जायगा।' ये तथा और भी कई बातें राजा सुरथ निरन्तर सोचते रहते थे। एक दिन उन्होंने वहाँ विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा- 'भाई ! तुम कौन हो? यहाँ तुम्हारे आने का क्या कारण है ? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखायी देते हो?' राजा सुरथ का यह प्रेम पूर्वक कहा हुआ वचन सुनकर वैश्य ने विनीत भाव से उन्हें प्रणाम करके कहा- वैश्य बोला- 'राजन्! मैं धनियों के कुल में उत्पन्न एक वैश्य हूँ। मेरा नाम समाधि है। मेरे दुष्ट स्त्री-पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। मैं इस समय धन, स्त्री और पुत्रों से वंचित हूँ। मेरे विश्वसनीय बन्धुओं ने मेरा ही धन लेकर मुझे दूर कर दिया है, इसलिये दु:खी होकर मैं वन में चला आया हूँ। यहाँ रहकर मैं इस बात को नहीं जानता कि मेरे पुत्रों की, स्त्री की और स्वजनों की कुशल है या नहीं। इस समय घर में वे कुशल से रहते हैं अथवा उन्हें कोई कष्ट है ? वे मेरे पुत्र कैसे हैं? क्या वे सदाचारी हैं अथवा दुराचारी हो गये हैं ?' राजा ने पूछा- 'जिन लोभी स्त्री-पुत्र आदि ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके प्रति तुम्हारे चित्त में इतना स्नेह का बन्धन क्यों है ?' वैश्य बोला- 'आप मेरे विषय में जैसी बात कहते हैं, वह सब ठीक है। किंतु क्या करूँ, मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण करता। जिन्होंने धन के लोभ में पड़कर पिता के प्रति स्नेह, पति के प्रति प्रेम तथा आत्मीयजन के प्रति अनुराग को तिलांजलि दे मुझे घर से निकाल दिया है, उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह है। महामते! गुणहीन बन्धुओं के प्रति भी जो मेरा चित्त इस प्रकार प्रेममग्न हो रहा है, यह क्या है- इस बात को मैं जानकर भी नहीं जान पाता। उनके लिये मैं लंबी साँसे ले रहा हूँ और मेरा हृदय अत्यन्त दुःखित हो रहा है। उन लोगों में प्रेम का सर्वथा अभाव है; तो भी उनके प्रति जो मेरा मन निष्ठुर नहीं हो पाता, इसके लिये क्या करूँ ?' मार्कण्डेयजी कहते हैं- 'ब्रह्मन् ! तदनन्तर राजाओं में श्रेष्ठ सुरथ और वह समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुए और उनके साथ यथायोग्य न्यायानुकूल विनयपूर्ण बर्ताव करके बैठे। तत्पश्चात् वैश्य और राजा ने कुछ वार्तालाप आरम्भ किया। राजा ने कहा- 'भगवन् ! मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूँ, उसे बताइये। मेरा चित्त अपने अधीन न होने के कारण वह बात मेरे मन को बहुत दु:ख देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया है, उसमें और उसके सम्पूर्ण अंगों में मेरी ममता बनी हुई है। मुनिश्रेष्ठ! यह जानते हुए भी कि वह अब मेरा नहीं है, अज्ञानी की भाँति मुझे उसके लिये दु:ख होता है। यह क्या है ? इधर यह वैश्य भी घर से अपमानित होकर आया है। इसके पुत्र, स्त्री और भृत्यों ने इसे छोड़ दिया है। स्वजनों ने भी इसका परित्याग कर दिया है, तो भी यह उनके प्रति अत्यन्त हार्दिक स्नेह रखता है। इस प्रकार यह तथा मैं, दोनों ही बहुत दु:खी हैं। जिसमें प्रत्यक्ष दोष देखा गया है, उस विषय के लिये भी हमारे मन में ममता जनित आकर्षण पैदा हो रहा है। महाभाग ! हम दोनों समझदार हैं; तो भी हमें जो मोह पैदा हुआ है, यह क्या है ? विवेक शून्य पुरुष की भाँति मुझमें और इसमें भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखायी देती है। ऋषि बोले- 'महाभाग ! विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवों को है। इसी प्रकार विषय भी सबके लिये अलग अलग हैं, कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते और दूसरे रात में ही नहीं देखते। तथा कुछ जीव ऐसे हैं, जो दिन और रात्रि में भी बराबर ही देखते हैं। यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं; किंतु केवल वे ही ऐसे नहीं होते। पशु, पक्षी और मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। मनुष्यों की समझ भी वैसी ही होती है, जैसी उन मृग और पक्षियों की होती है। तथा जैसी मनुष्यों की होती है,वैसी ही उन मृग-पक्षी आदि की होती है। यह तथा अन्य बातें भी प्रायः दोनों में समान ही हैं। समझ होने पर भी इन पक्षियों को तो देखो, ये स्वयं भूख से पीड़ित होते हुए भी मोहवश बच्चों की चोंच में कितने चाव से अन्न के दाने डाल रहे हैं! नरश्रेष्ठ! क्या तुम नहीं देखते कि ये मनुष्य समझदार होते हुए भी लोभवश अपने किये हुए उपकार का बदला पाने के लिये पुत्रों की अभिलाषा करते हैं? यद्यपि उन सबमें समझ की कमी नहीं है, तथापि वे संसार की स्थिति (जन्म-मरण की परम्परा) बनाये रखने वाले भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भँवर से युक्त मोह के गहरे गर्त में गिराये गये हैं। इसलिये इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिये। जगदीश्वर भगवान् विष्णु की योगनिद्रारूपा जो भगवती महामाया हैं, उन्हीं से यह जगत् मोहित हो रहा है। वे भगवती महामायादेवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं। वे ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत् की सृष्टि करती हैं तथा वे ही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिये वरदान देती हैं। वे ही परा विद्या संसार-बन्धन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनीदेवी तथा सम्पूर्ण ईश्वरों की भी अधीश्वरी हैं। राजा ने पूछा- 'भगवन् ! जिन्हें आप महामाया कहते हैं, वे देवी कौन हैं ? ब्रह्मन्! उनका आविर्भाव कैसे हुआ ? तथा उनके चरित्र कौन-कौन हैं ? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे ! उन देवी का जैसा प्रभाव हो, जैसा स्वरूप हो और जिस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ हो, वह सब मैं आपके मुख से सुनना चाहता हूँ। ऋषि बोले- 'राजन्! वास्तव में तो वे देवी नित्यस्वरूपा ही हैं। सम्पूर्ण जगत् उन्हीं का रूप है तथा उन्होंने समस्त विश्व को व्याप्त कर रखा है, तथापि उनका प्राकट्य अनेक प्रकार से होता है। वह मुझसे सुनो। यद्यपि वे नित्य और अजन्मा हैं, तथापि जब देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिये प्रकट होती हैं, उस समय लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अन्त में जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णव में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनाग की शय्या बिछाकर योगनिद्रा का आश्रय ले सो रहे थे , उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजी का वध करने को तैयार हो गये। भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्माजी ने जब उन दोनों भयानक असुरों को अपने पास आया और भगवान् को सोया हुआ देखा, तब एकाग्रचित्त होकर उन्होंने भगवान् विष्णु को जगाने के लिये उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा का स्तवन आरम्भ किया। जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत् को धारण करने वाली, संसार का पालन और संहार करने वाली तथा तेज:स्वरूप भगवान् विष्णु की अनुपम शक्ति हैं, उन्हीं भगवती निद्रादेवी की भगवान् ब्रह्मा स्तुति करने लगे। ब्रह्माजी ने कहा- 'देवि! तुम्हीं स्वाहा, तुम्हीं स्वधा और तुम्हीं वषट्कार हो। स्वर भी तुम्हारे ही स्वरूप हैं। तुम्हीं जीवनदायिनी सुधा हो। नित्य अक्षर प्रणव में अकार, उकार, मकार- इन तीन मात्राओं के रूप में तुम्हीं स्थित हो तथा इन तीन मात्राओं के अतिरिक्त जो बिन्दुरूपा नित्य अर्धमात्रा है, जिसका विशेष रूप से उच्चारण नहीं किया जा सकता, वह भी तुम्हीं हो। देवि ! तुम्हीं संध्या, सावित्री तथा परम जननी हो। देवि ! तुम्हीं इस विश्व-ब्रह्माण्ड को धारण करती हो। तुमसे ही इस जगत् की सृष्टि होती है। तुम्हीं से इसका पालन होता है और सदा तुम्हीं कल्प के अन्तर में सबको अपना ग्रास बना लेती हो। जगन्मयी देवि! इस जगत् की उत्पत्ति के समय तुम सृष्टिरूपा हो, पालन काल में स्थितिरूपा हो तथा कल्पान्त के समय संहाररूप धारण करने वाली हो। तुम्हीं महाविद्या, महामाया, महामेधा, महासमृति, महामोहरूपा, महादेवी और महासुरी हो। तुम्हीं तीनों गुणों को उत्पन्न करने वाली सबकी प्रकृति हो। भयंकर कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं श्री, तुम्हीं ईश्वरी, और तुम्हीं बोधस्वरूपा बुद्धि हो। लज्जा, पुष्टि, तुष्टि, शान्ति और क्षमा भी तुम्हीं हो। तुम खड्गधारिणी, शूलधारिणी, घोररूपा तथा गदा, चक्र, शंख और धनुष धारण करने वाली हो। बाण, भुशुण्डी और परिघ-ये भी तुम्हारे अस्त्र हैं। तुम सौम्य और सौम्यतर हो- इतना ही नहीं, जितने भी सौम्य एवं सुन्दर पदार्थ हैं, उन सबकी अपेक्षा तुम अत्यधिक सुन्दरी हो। पर और अपर-सबसे परे रहने वाली परमेश्वरी तुम्हीं हो। सर्वस्वरूपे देवि! कहीं भी सत्-असत् रूप जो कुछ वस्तुएँ हैं और उन सबकी जो शक्ति है, वह तुम्हीं हो। ऐसी अवस्था में तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है ? जो इस जगत् की सृष्टि, पालन और संहार करते हैं, उन भगवान् को भी जब तुमने निद्रा के अधीन कर दिया है, तब तुम्हारी स्तुति करने में यहाँ कौन समर्थ हो सकता है? मुझको, भगवान् शंकर को तथा भगवान् विष्णु को भी तुमने ही शरीर धारण कराया है; अत: तुम्हारी स्तुति करने की शक्ति किसमें है ? देवि ! तुम तो अपने इन उदार प्रभावों से ही प्रशंसित हो। ये जो दोनों दुर्धर्ष असुर मधु और कैटभ हैं, इनको मोह में डाल दो और जगदीश्वर भगवान् विष्णु को शीघ्र ही जगा दो। साथ ही इनके भीतर इन दोनों महान् असुरों को मार डालने की बुद्धि उत्पन्न कर दो। ऋषि कहते हैं- 'राजन्! जब ब्रह्माजी ने वहाँ मधु और कैटभ को मारने के उद्देश्य से भगवान् विष्णु को जगाने के लिये तमोगुण की अधिष्ठात्री देवी योगनिद्रा की इस प्रकार स्तुति की, तब वे भगवान् के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु, हृदय और वक्ष:स्थल से निकलकर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजी की दृष्टि के समक्ष खड़ी हो गयीं। योगनिद्रा से मुक्त होने पर जगत् के स्वामी भगवान् जनार्दन उस एकार्णव के जल में शेषनाग की शय्या से जाग उठे। फिर उन्होंने उन दोनों असुरों को देखा। वे दुरात्मा मधु और कैटभ अत्यन्त बलवान् तथा पराक्रमी थे और क्रोध से लाल आँखें किये ब्रह्माजी को खा जाने के लिये उद्योग कर रहे थे।तब भगवान् श्रीहरि ने उठकर उन दोनों के साथ पाँच हजार वर्षों तक केवल बाहुयुद्ध किया। वे दोनों भी अत्यन्त बल के कारण उन्मत्त हो रहे थे। इधर महामाया ने भी उन्हें मोह में डाल रखा था; इसलिये वे भगवान् विष्णु से कहने लगे- 'हम तुम्हारी वीरता से संतुष्ट हैं। तुम हम लोगों से कोई वर माँगो।' श्रीभगवान् बोले- 'यदि तुम दोनों मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथ से मारे जाओ। बस, इतना-सा ही मैंने वर माँगा है। यहाँ दूसरे किसी वर से क्या लेना है।' ऋषि कहते हैं- 'इस प्रकार धोखे में आ जाने पर जब उन्होंने सम्पूर्ण जगत् में जल-ही-जल देखा, तब कमलनयन भगवान् से कहा- 'जहाँ पृथ्वी जल में डूबी हुई न हो, जहाँ सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो।' ऋषि कहते हैं- 'तब 'तथास्तु' कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान् ने उन दोनों के मस्तक अपनी जाँघ पर रखकर चक्र से काट डाले। इस प्रकार ये देवी महामाया ब्रह्माजी की स्तुति करने पर स्वयं प्रकट हुई थीं। अब पुनः तुमसे उनके प्रभाव का वर्णन करता हूँ, सुनो। इस प्रकार श्रीमार्कण्डेय पुराण में सावर्णिक मन्वन्तर की कथा के अन्तर्गत देवीमाहात्म्य में 'मधु-कैटभ-वध' नामक पहला अध्याय पूरा हुआ॥१॥ ----------:::×:::---------- "ॐ श्री दुर्गायै नमः" ******************************************

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