महामृत्युंजय-मंत्र

Sajjan Singhal Aug 25, 2019

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Sajjan Singhal Jul 29, 2019

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Sajjan Singhal Jul 29, 2019

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. "मृत्युञ्जय-मन्त्र की महिमा" दशार्ण देश के राजा वज्रबाहु की सुमति नाम की एक रानी थी। उसकी गर्भावस्था में ही सौतों ने उसे विष दे दिया। भगवत्-प्रेरणा से उसका गर्भपात तो नहीं हुआ, परंतु उसके शरीर में व्रण रह आये। उसको जो बच्चा पैदा हुआ उसका शरीर भी व्रण से भरा था। दोनों माँ-बेटे के शरीर घावों से भर गये। राजा ने अनेकों प्रकार के उपचार किये, परंतु कुछ भी लाभ होते न देख निराश हो अपनी अन्यान्य स्त्रियों की सलाह से, जो सुमति से द्वेष रखती थीं, रानी को उसके बच्चे के साथ वन में छुड़वा दिया। वह वहाँ छोटी-सी कुटिया बनाकर रहने लगी। वन में सुमति को दु:सह कष्ट होने लगे, शरीर की पीड़ा से उसे बारम्बार मूच्र्छा आने लगी, उसका बच्चा तो पहले ही स्वर्ग सिधार गया। उसे जब होश आया, तब वह बहुत ही कातरभाव से भगवान् शंकर से प्रार्थना करने लगी, ‘प्रभो! आप सर्वव्यापक हैं, सर्वज्ञ हैं, दीन-दु:खहारी हैं, मैं आपकी शरण आयी हूँ, अब मुझे केवल आपका ही भरोसा है।' उसकी इस कातर वाणी को सुनते ही करुणामय आशुतोष का सिंहासन डोल उठा। शीघ्र ही शिवयोगी वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने सुमति को मृत्युञ्जयमन्त्र का जप करने को कहा और अभिमन्त्रित भस्म को उसकी तथा उसके बच्चे की देह में लगा दिया। लगाते ही उसकी सारी व्यथा दूर हो गयी और बच्चा भी प्रसन्नमुख हो जी उठा। सुमति ने शिवयोगी की शरण ली। शिवयोगी ने बच्चे का नाम भद्रायु रखा। सुमति और भद्रायु दोनों मृत्युञ्जय-मन्त्र को जप करने लगे और इधर राजा वज्रबाहु को अपनी निर्दोष पत्नी और अनाथ बच्चेको व्यर्थ कष्ट पहुँचाने का फल मिला। उसके राज्य को शत्रुओं ने हड़प कर लिया और उसे बंदीगृह में डाल दिया। एक दिन भद्रायु के मन्त्र-जप से प्रसन्न हो शिवयोगी प्रकट हुए। उन्होंने एक खड्ग और एक शंख दिया और बारह हजार हस्ती का बल देकर अन्तर्धान हो गये। भद्रायु ने चढ़ाई करके अपने पिताके शत्रुओं को मार भगाया और पैतृक राज्य को अधिकृत कर पिता को बंदी-गृह से छुड़ाया। उसका यश चारों ओर फैल गया। चित्राङ्गद और सीमन्तिनी ने अपनी कन्या कीर्तिमालिनी का ब्याह भद्रायु के साथ करदिया। भद्रायु ने शिवपूजा करते हुए सहस्रों वर्षों। तक सुखपूर्वक प्रजा को सुख-शान्ति पहुँचाते हुए राज्य किया और अन्त में वह शिव-सायुज्य को प्राप्त हुआ। यह मृत्युञ्जय-मन्त्र के जप की महान् महिमा है। ----------:::×:::---------- श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार (श्रीभाईजी) 'सरस प्रसंग' ॐ नमः शिवाय *******************************************

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