महादेव🍃🌸

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B.G.Agrawal Jul 12, 2020

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. इस अध्याय में:- (त्रिदेवों की श्रेष्ठता और पापों के भेद) संक्षिप्त श्रीस्कन्द-महापुराण पोस्ट - 032 माहेश्वर-खण्ड-[कुमारिका-खण्ड] अध्याय - 14 करन्धम ने पूछा- ब्रह्मन्! कोई भगवान् शिव की, कोई विष्णु की तथा कोई ब्रह्माजी की शरण लेने से सर्वोत्कृष्ट मोक्षकी प्राप्ति बतलाते हैं; किंतु आप किससे मुक्ति मानते हैं? महाकाल ने कहा- नरश्रेष्ठ! इन तीनों देवताओं की महिमा अपार है। इस विषय में बड़े-बड़े योगीश्वरों का भी मन मोहित हो जाता है, फिर मेरी तो बात ही क्या है? कहते हैं, प्राचीन काल में कभी नैमिषारण्य निवासी मुनियों को भी यह सन्देह हुआ था कि इन तीनों देवताओं में कौन सबसे श्रेष्ठ है। तब वे ब्रह्मलोक में गये। उसी समय भगवान् ब्रह्मा ने इस श्लोक का पाठ किया- अनन्ताय नमस्तस्मै यस्यान्तो नोपलभ्यते। महेशाय च द्वावेतौ मयि स्तां सुमुखौ सदा॥ उन भगवान् अनन्त को नमस्कार है, जिनका कहीं अन्त नहीं मिलता तथा जो सबके महान् ईश्वर हैं, उन भगवान् शंकरको भी नमस्कार है। ये दोनों देवता सदा मुझ पर प्रसन्न रहें।' इस श्लोक के अनुसार भगवान् विष्णु और शंकर की श्रेष्ठता का निश्चय करके वे सब मुनि क्षीरसागर को गये। वहाँ योगेश्वर भगवान् विष्णु ने इस श्लोक का पाठ किया- ब्रह्माणं सर्वभूतेषु परमं ब्रह्मरूपिणम्। सदाशिवं च वन्दे तौ भवेतां मंगलाय मे॥ 'मैं सम्पूर्ण भूतों में व्यापक परब्रह्मस्वरूप भगवान् ब्रह्मा और सदाशिव को प्रणाम करता हूँ। वे दोनों मेरे लिये मंगलकारी हों।' यह श्लोक सुनकर उन ब्रह्मर्षियों को बड़ा विस्मय हुआ। वे वहाँ से हटकर पुन: कैलास पर्वत पर गये। वहाँ उन्होंने देखा कि भगवान् शंकर गिरिराजनन्दिनी उमा से इस प्रकार कह रहे हैं- एकादश्यां प्रनृत्यामि जागरे विष्णुसद्मनि। सदा तपस्याञ्चरामि प्रीत्यर्थं हरिवेधसोः॥ 'देवि! मैं भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी की प्रसन्नता के लिये भगवान् विष्णु के मन्दिर में एकादशी को जागरण पूर्वक नृत्य करता हूँ तथा उन्हीं दोनों की प्रसन्नता के लिये सदा तपस्या किया करता हूँ। यह सुनकर वे मुनिलोग वहाँ से भी खिसक आये और आपस में कहने लगे-जब ये तीनों देवता ही एक-दूसरे का पार नहीं पाते, तब उनके द्वारा उत्पन्न किये हुए महर्षियों की सन्तान-परम्परा में जन्म लेने वाले हम लोगों की क्या गणना है? जो इन तीनों में से किसी एक को उत्तम, मध्यम या अधम बतलाते हैं, वे झूठ बोलने वाले और पापात्मा हैं। उन्हें निश्चय ही नरक में जाना पड़ता है। राजेन्द्र! नैमिषारण्य वासी तपस्वी मुनियों ने ऐसा ही निश्चय किया। यह सत्य ही है और मेरा भी यही स्पष्ट मत है। सहस्रों जप करने वाले, सहस्रों वैष्णव तथा सहस्रों शैव ब्रह्मा, विष्णु और शिव का अनुगमन (आराधन) करके अपने को संसार-बन्धन से मुक्त कर चुके हैं। इसलिये जिसका हार्दिक अनुराग जिस देवता के प्रति स्पष्टरूप से प्रकट हो, वह उसी का भजन करे। इससे वह पाप रहित हो सकता है, यही मेरा सर्वोत्तम मत है। करन्धम ने पूछा- विप्रवर ! वे कौन से पाप हैं, जिनके द्वारा मोहित चित्त वाले मनुष्य का मन न तो देवता में लगता है और न धर्मो में ही ? महाकाल ने कहा- राजन् ! अपनी चित्तवृत्तियों के भेद से अधर्म के भेद जानने चाहिये। अधर्म तीन प्रकार के हैं स्थूल, सूक्ष्म और अत्यन्त सूक्ष्म। ये ही अपने करोड़ों भेदों के द्वारा अनेक प्रकार के हो जाते हैं। इनमें से जो स्थूल पाप समुदाय नरक की प्राप्ति कराने वाले हैं, उनका संक्षेप से वर्णन किया जाता है। उन पापों का अनुष्ठान मन, वाणी और कर्मो द्वारा होता है। उनमें से मानसिक पाप के चार भेद हैं,- पर-स्त्रीचिन्तन, दूसरों के धन हड़प लेने का संकल्प, अपने मन से किसी का भी अनिष्ट चिन्तन तथा न करने योग्य कार्यों के लिये मन में आग्रह रखना। इसी प्रकार वाचिक पापकर्म के भी चार भेद हैं- असंगत वचन बोलना, झूठ बोलना, अप्रिय भाषण करना तथा दूसरों की निन्दा और चुगली करना। शारीरिक पापकर्म भी चार प्रकार के हैं- अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या भोगों का सेवन तथा पराये धन का अपहरण। इस प्रकार मन, वाणी और शरीर से होने वाले ये बारह प्रकारके पाप - कर्म बताये गये। इनके भेदों का पुन: वर्णन करूँगा, जिनका फल अनन्त है। जो संसार-समुद्र से तारने वाले महादेवजी से द्वेष रखते हैं, वे महान् पातकों से युक्त होने के कारण नरकाग्नियों में जलते हैं। निरन्तर फल देने वाले छः महापातक बताये जाते हैं- (१) जो मन्दिर आदि में भगवान् शंकर को देखकर न तो नमस्कार करते हैं और (२) न उनकी स्तुति ही करते हैं, (३) अपितु भगवान् के सामने नि:शंक हो मनमानी चेष्टा करते हुए खड़े होते और क्रीडा-विलास आदि करते हैं, (४) भगवान् शिव तथा गुरुजन के समीप पूजा, नमस्कार आदि आवश्यक शिष्टाचारों का पालन नहीं करते, (५) शिवशास्त्रों में बताये हुए सदाचार को नहीं मानते, (६) और शिवभक्तों से द्वेष रखते हैं। ये छहों प्रकार के मनुष्य महापात की समझे जाते हैं। जो पापात्मा अपने गुरु का, कष्ट में पड़े हुए व्यक्ति का, असमर्थ पुरुष का, विदेश गये हुए व्यक्ति का तथा शत्रुओं द्वारा अपमानित मनुष्य का परित्याग करता है अथवा उनके स्त्री-पुत्र एवं मित्रों की अवहेलना करता है, उसका यह कृत्य गुरुनिन्दा के समान महापातक समझना चाहिये। ब्रह्महत्यारा, मदिरा पीने वाला, (सुवर्णकी) चोरी करने वाला, गुरु पत्नीगामी ये चार महापात की हैं। जो इनके पास संसर्ग रखता है, वह पाँचवाँ महापातकी है। जो लोग क्रोध से, द्वेष से, भय से अथवा लोभ से ब्राह्मण पर उसके मर्म को अत्यन्त पीड़ा पहुँचाने वाले महान् दोष का आरोप करते हैं, वे ब्रह्महत्यारे कहे गये हैं। जो याचना करने वाले अकिंचन ब्राह्मण को बुलाकर पीछे 'नहीं है' ऐसा कहते हुए देना अस्वीकार कर देता है, वह भी ब्रह्महत्या करने वाला माना गया है। जो सभा में उदासीन भाव से बैठे हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने विद्या-अभिमान से निस्तेज करने की चेष्टा करता है, वह ब्राह्मणघाती बताया गया है। जो गुरुजनों के साथ बल पूर्वक विरोध करके अपने झूठे गुणों का बखान करते हुए अपने-आपको उत्कृष्ट सिद्ध करना चाहता है, उसे भी ब्रह्महत्यारा कहा गया है। भूख-प्यास से जिनके शरीर को संताप हो रहा है, अतएव जो भोजन करने के इच्छुक हैं, ऐसे ब्राह्मणों के भोजन में जो विघ्न डालता है, उसे ब्राह्मणघाती कहते हैं। जो सबकी चुगली करता है, सब लोगों के छिद्र ढूँढ़ने में ही लगा रहता है, सबके मन में उद्वेग पैदा करता है तथा जिसमें क्रूरता भरी हुई है, ऐसा मनुष्य ब्रह्महत्यारा माना गया है। जो प्यास से पीड़ित हो जल पीने के लिये जलाशय पर जाती हुई गौओं के मार्ग में विघ्न उपस्थित करता है, उसे गोघाती कहते हैं। ब्राह्मणों ने न्याय पूर्वक जिस धन का उपार्जन किया है, उसे छल-बल से हर लेना ब्रह्महत्या के समान माना गया है। माता-पिता का त्याग करना, झूठी गवाही देना, अपने मित्र का वध करना, अभक्ष्य-भक्षण करना, किसी स्वार्थवश वनजन्तुओं का वध करना, क्रोध में आकर गाँव, वन और गोशालाओं में आग लगा देना इत्यादि बड़े भयानक पाप मदिरापान के समान माने गये हैं। दरिद्र मनुष्यों का सर्वस्व हर लेना; मनुष्य, स्त्री, हाथी और घोड़ों को चुरा लेना; गौ, भूमि, रत्न, सुवर्ण, ओषधियों के रस, चन्दन, अगुरु, कपूर, कस्तूरी तथा रेशमी वस्त्रों का अपहरण करना तथा हाथ में दी हुई धरोहर को हड़प लेना आदि पाप सुवर्ण की चोरी के समान माने गये हैं। पुत्र और मित्र की स्त्रियों तथा बहिनों के साथ सम्भोग करना, कन्या के साथ व्यभिचार का दुःसाहस करना, चाण्डाल की स्त्रियों को अपने उपभोग में लाना तथा अपने समान वर्ण वाली स्त्री के साथ भी व्यभिचार करना गुरुपत्नी गमन के समान माना गया है। अहंकार, अधिक क्रोध, पाखण्ड, कृतघ्नता, अत्यन्त विषयासक्ति, कृपणता, शठता, ईर्या तथा बिना किसी अपराध के ही पुत्र, मित्र, पत्नी, स्वामी और सेवकों का परित्याग करना; साधु, बन्धु, तपस्वी, गाय, क्षत्रिय, वैश्य, स्त्री और शूद्रों को मारना-पीटना, भगवान् शिव के आवास-स्थान पर लगे हुए वृक्षों और पुष्पवाटिका आदि को नष्ट करना, जो यज्ञ के अधिकारी नहीं हैं, उनका यज्ञ कराना, जिनसे याचना करनी उचित नहीं, उनसे याचना करना; यज्ञ, बगीचा, पोखरा, पत्नी और सन्तान को बेचना; तीर्थयात्रा, उपवास, व्रत तथा मन्दिर निर्माण आदि के पुण्यों का विक्रय करना; स्त्री के धन से जीविका चलाना, स्त्रियों के अत्यन्त वशीभूत रहना, स्त्रियों की रक्षा न करना, ऋण न चुकाना, झूठ बोलकर जीविका चलाना, साध्वी कन्या की बातों में दोष निकालना, विष तथा मारणयन्त्रों का प्रयोग करना, किसी का मूलोच्छेद कर डालना, उच्चाटन एवं अभिचार कर्म करना, राग और द्वेष के कार्य करना, समय पर संस्कार न कराना, स्वीकार किये हुए व्रत का परित्याग करना, सब प्रकार के आहारों का सेवन करना, असत्-शास्त्रों के अनुसार चलना, सूखे तर्क का सहारा लेना; देवता, अग्नि, गुरु, साधु. गौ, ब्राह्मण, राजाओं तथा चक्रवर्ती नरेशों की उनके सामने या परोक्ष में निन्दा करना-ये सब उपपातक हैं। जिन्होंने श्राद्ध और देवयज्ञ का परित्याग कर दिया है, अपने वर्णाश्रमोचित कर्मों को सर्वथा छोड़ दिया है; जो दुराचारी नास्तिक, पापी और सदा झूठ बोलने वाले हैं; जो पर्व के समय अथवा दिन में, जल में, विपरीत योनि में, पशु-योनि में, रजस्वलाओं में अथवा अयोनि में मैथुन करता है; जो सबसे अप्रिय बोलते हैं, क्रूर हैं, प्रतिज्ञा को तोड़ने वाले हैं, तालाब और कुँओं को नष्ट करने वाले हैं; जो रस का विक्रय करते हैं। तथा एक ही पंक्ति में बैठे हुए लोगों को भोजन कराते समय पंक्ति-भेद करते हैं, वे लोग इन सभी पापों के कारण उपपातकी माने गये हैं। जो इनकी अपेक्षा कुछ न्यून श्रेणी के पापों से युक्त हैं, वे पापी कहलाते हैं। अब उनका वर्णन सुनो। जो गौ, ब्राह्मण, कन्या, स्वामी, मित्र तथा तपस्वीजनों के कार्यों में अन्तर डालते हैं, वे पापी माने गये हैं। जो दूसरों की सम्पत्ति से जलते हैं, नीच जाति की स्त्री का सेवन करते हैं, गोशाला, अग्नि, जल, सड़क तथा वृक्षों की छाया में, वृक्षों पर, बगीचों और मन्दिरों में जो लोग मलमूत्र आदि का त्याग करते हैं, वे पापी हैं। मत वाले होकर किलकारियाँ भरते हैं; वंचकवेष, वंचनापूर्ण कार्य तथा वंचकोंके-से आचरण करते हैं; झूठ और कपट के ही व्यवहार में लगे रहते हैं, कपटपूर्ण शासन करते हैं और कूटनीति का आश्रय लेकर युद्ध करते हैं, वे सब पापी हैं। जो अपने सेवकों के प्रति अत्यन्त निष्ठुर और पशुओं का दमन करने वाला (उनके अण्डकोष छेदन करने वाला) है; जो झूठी बातें बोलता और स्त्री, पुत्र, मित्र, बाल, वृद्ध, दुर्बल, रोगी, भृत्य वर्ग, अतिथि वर्ग तथा भाई-बन्धुओं को भूखे छोड़कर अकेला ही भोजन करता है; स्वयं तो मिठाई खाता और ब्राह्मणों को दूसरी वस्तुएँ देता है, उसका पाक व्यर्थ जानना चाहिये, अर्थात् उसके किये हुए दान और यज्ञ आदि का कोई फल नहीं मिलता, वह ब्रह्मवादी विद्वानों द्वारा निन्दित होता है। जो अजितेन्द्रिय मनुष्य स्वयं ही कोई नियम लेकर फिर उन्हें त्याग देते हैं, प्रतिदिन गौओं को मारते और उन्हें बार-बार त्रास देते हैं, जो दुर्बलों का पोषण नहीं करते, पशुओं के ऊपर अधिक भार लादकर उन्हें पीड़ा देते हैं, उनकी पीठ में घाव हो जाने पर भी उन्हें सवारी में जोतते हैं, उनको भोजन न देकर स्वयं खाते हैं। और रोगी होने पर भी उनकी दवा नहीं करते, वे सब पापी हैं। जो सामुद्रिक शास्त्र को जीविका का साधन बनाता है, शूद्रकुल में उत्पन्न स्त्री को अपनी भार्या बनाकर रखता है और जो धर्मात्मा होने का ढोंग रचता है, वे सब-के-सब पापी माने गये हैं। जो राजा शास्त्रीय आज्ञा का उल्लंघन करके प्रजा से मनमाना कर लेता है, सदा दण्ड देने की ही रुचि रखता है अथवा जो अपराधी को भी दण्ड देने की रुचि नहीं रखता तथा जिसके राज्य में प्रजा घूस लेने वाले अधिकारियों और चोरों से पीड़ित होती है, वह नरक की आग में पकाया जाता है। जो चोरी से दूर रहने वाले को चोर समझता है और वास्तविक चोर को चोर नहीं मानता, वह आलस्यदोष से दूषित तथा दुर्व्यसनों में आसक्त राजा नरक में जाता है। पुराणवेत्ता विद्वान् इस प्रकार के और भी बहुत-से पाप बताते हैं। दूसरों की कोई भी वस्तु, वह सरसों के बराबर भी छोटी क्यों न हो, अपहरण करने पर मनुष्य पापी एवं नरक में गिरने का अधिकारी होता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। इस प्रकार के पाप बन जाने पर मनुष्य प्राण त्याग के पश्चात् नरक का कष्ट भोगने के लिये पूर्वशरीर की ही भाँति एक यातना देह प्राप्त करता है। अंत: नरक में डालने वाले इन तीनों ही प्रकार के पापकर्मों को त्याग देना चाहिये और श्रद्धापूर्वक भगवान् सदाशिव की शरण लेनी चाहिये। संसर्गवश, कौतूहलवश अथवा लोभ से भी भगवान् शंकर के प्रति किये हुए नमस्कार, स्तुति, पूजा तथा नाम संकीर्तन कभी विफल नहीं होते हैं। ~~~०~~~ "ॐ नमः शिवाय" ********************************************

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