भक्ति_और_ज्ञान

raj Dec 9, 2019

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Rameshanand Guruji Dec 8, 2019

सवाल था *मुस्लिम महिला पर रेप क्यू नहीं होते ?* इसके 2 जवाब है, पहला मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्यादा जानती है मर्यादा में रहती है, पब्लिक में पराये पुरुषों से हसती बोलती नही है, उनके वस्त्र शालीन होते है उसपर भी वो काला बुरखा पहन कर घूमती है जिस से वो पुरुषों को आकर्षित नही कर पाती , चाहे मुस्लिम महिला पढ़ी लिखी हो डॉक्टर हो वकील हो चाहे कितनी भी बड़ी पद पर आसीन हो तब भी वो अपने मज़हब का आदेश नही त्यागती हिजाब पहन कर ही बाहर निकलती है, और हां आधी रात को आवश्यक ना हो तब तक वो बाहर आपको भटकति नही दिखेगी, ना चाट पकौड़ी खाती ना पब में डांस करती मिलेगी ये औरते ना सिनेमा में 12 बजे के शो में दिखाई देती ना सड़क पर सिगरेट दारू और लड़कों के साथ भटकती दिखेगी, विपरीत इसके , हिन्दू औरतों को जीतनी आज़ादी दे दो उसको कम लगती है, उसको सब कुछ करना है जो पुरुष करता है उसको गाली देना, दारू पीना सिगरेट पीना और सब कुछ वो करना पसंद है जो पुरुष करते है (घटियापन) दूसरी बात मुस्लिम पुरुष अपनी औरतों के तरफ आँख उठा कर देखने वालों को काट डालते है चुप नही बैठते, अपराधी होकर भी अपने लोगो को बचाने की एकता उनमें होती है इतनी की मुस्लिम बहुल इलाके में घुसने की पुलिस की हिम्मत नही होती, ये दोनो बड़े कारण है जो उनकी महिलाओं को सुरक्षित रखते है, इसमें पहला कारण अधिक कारणीभूत है औरतों को इज्जत उनके हाथ मे होती है जितनी सुरक्षा औरत अपने आप को दे सकती है उतना कोई नही दे सकता है, अगर विश्वास नही तो औरते 15 दिन बुरखे में घूम कर देख ले कौन आप पर नज़र उठा कर देखता है कौन नही आप स्वयं समझ जाएगी। ॐ :-स्नेहा जी अग्रवाल - हिन्दू धर्म सेविका (हर पोस्ट हर ग्रुप में शेयर कीजिये )

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रामचरित मानस....... यह हमारे देश और समस्त भारतवासियों का सौभाग्य है कि यहाँ समय-समय पर अनेक कवियों ने जन्म लिया है और अपनी कालजयी कृतियों से जनमानस का मनोरंजन ही नहीं किया, बल्कि उन्हें ज्ञान के साथ-साथ कर्म का संदेश भी दिया। इनमें से कुछ कवियों ने धर्म और भक्तिभाव को प्रेरित करने वाली कृतियों की रचना की तो कुछ ने कर्तव्यबोध और आदर्श व्यवहार की तथा कुछ ने नीति सम्मत व्यवहार करने की । गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस में आवश्यक एवं जीवनोपयोगी गुणों एवं मूल्यों का संगम है। रामचरित मानस की प्रमुख कथावस्तु दशरथ पुत्र श्रीराम का जीवन चरित्र है। इसमें उनके जन्म से लेकर उनके सुख-सुविधापूर्ण शासन तक का वर्णन है। बीच-बीच में अनेक उपकथाएँ इसके कलेवर में वृद्धि करती हैं। रामचरित मानस में वर्णित रामकथा को सात सर्गों में बाँटकर वर्णित किया गया है। इन्हें बालकांड, अयोध्याकांड, सुंदरकांड, किष्किंधाकांड, अरण्यकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड नामों से जाना जाता है। कथा का प्रारंभ ईश वंदना के दोहों, श्लोकों और चौपाइयों से शुरू होता है और राम-जन्म उनके तीनों भाइयों लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के साथ की गई बाल-क्रीड़ा, उनकी शिक्षा-दीक्षा, विश्वामित्र के साथ राक्षसों के वध के लिए उनके संग गमन, मारीचि, सुबाहु, ताड़का वध, जनकपुर गमन, स्वयंवर में धनुषभंग करना, सीता विवाह और अयोध्या वापस लौटना, कैकेयी का राजा दशरथ से दो वरदान माँगना, राम का सीता और लक्ष्मण के साथ वन गमन, सीता हरण, हनुमान-सुग्रीव से मित्रता, बालि वध, समुद्र पर पुल बाँधकर सेना सहित लंका गमन, रावण से युद्ध, रावण को मारकर विभीषण को लंका का राजा बनाना, अयोध्या प्रत्यागमन, कुशलतापूर्वक राज्य करना, सीता को वनवास देना, लव-कुश के द्वारा अश्वमेध के घोड़े को रोकने आदि का वर्णन है। रामचरित मानस में अनेक प्रसंग ऐसे हैं जिनका मार्मिक वर्णन मन को छू जाता है। राम का वनवास जाना, दशरथ का मूर्छित होना, समस्त प्रजाजनों का शोकाकुल होना, दशरथ का प्राणत्याग, रावण द्वारा सीता-हरण, अशोक वाटिका में राम की याद में उनका शोक संतप्त रहना, मेघनाद के साथ युद्ध में लक्ष्मण का मूर्छित होना, भरत मिलन प्रसंग, सीता का निष्कासन आदि प्रसंग मन को छू जाते हैं। इन अवसरों पर पाठकों के आँसू रोकने से भी नहीं रुकते हैं। आज भी दशहरे के अवसर जब रामलीला का मंचन होता है तो इन मार्मिक प्रसंगों को देखकर आँसू बहने लगते हैं। रामचरित मानस की सबसे मुख्य विशेषता है- कर्तव्य का बोध कराना। इस महाकाव्य में राजा को प्रजा के साथ, प्रजा को राजा के साथ, मित्र को मित्र के साथ, पिता को पुत्र के साथ कर्तव्यों का वर्णन एवं उन्हें अपनाने की सीख दी गई है। एक प्रसंग के अनुसार-आज के बच्चों को उनके कर्तव्य का बोध ‘प्रातः काल उन्हें माता-पिता के चरण छूना चाहिए’ कराते हुए लिखा गया है – प्रातकाल उठि के रघुनाथा। मातु-पिता गुरु नावहिं माथा॥ इस कर्तव्य का उन्हें शीघ्र फल भी प्राप्त होता है। राम अपने भाइयों के साथ गुरु विश्वामित्र के घर पढ़ने जाते हैं और सारी विद्याएँ शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं – गुरु गृह पढ़न गए दोउ भाई। अल्पकाल सब विद्या पाई ॥ रामचरित मानस पाठकों के मन में धर्म और भक्तिभाव का उदय तो करती है साथ ही आदर्श व्यवहार की सीख भी देती है। यह मानव को मानवोचित व्यवहार के लिए प्रेरित करती है। राजा पर यह दायित्व होता है कि वह प्रजा का पालन-पोषण करें तथा अपने कर्तव्यों का उचित प्रकार से निर्वाह करे। इसी को याद दिलाते हुए तुलसीदास ने लिखा है – जासु राज निज प्रजा दुखारी। सो नृप अवस नरक अधिकारी। आज के मंत्रियों और अफसरों के लिए इससे बड़ी सीख और क्या हो सकती है। रामचरित मानस हमें कर्म का संदेश देती है। राम ईश्वर के अवतार थे, अंतर्यामी थे, त्रिकालदर्शी थे, फिर भी उन्होंने आम इन्सान की तरह हर कार्य अपने हाथों से करके एक ओर कर्म की प्रेरणा दी तो दूसरी ओर असत्य, अन्याय और अत्याचार सहन न करके उससे मुकाबला करने की प्रेरणा दी। इस महाकाव्य की एक-एक पंक्ति जीवन के सभी पक्षों को प्रेरित करती है। ‘रामचरितमानस’ की रचना को लगभग पाँच सौ वर्ष बीत गए पर इसकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है। यह पुस्तक भारत में ही नहीं विश्व की भाषाओं में रूपांतरित की गई। इसकी अवधी भाषा, दोहा, सोरठा और चौपाई जैसे गेयता वाले छंदों के कारण यह पढ़ने में सरल सहज और सुनने में कर्णप्रिय है। इसकी लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह महाकाव्य हर हिंदू के घर में देखा जा सकता है।

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