भक्ति कथा

दुःख ईश्वर का प्रसाद है 🔸🔸🔹🔸🔹🔸🔸 जब भगवान सृष्टि की रचना कर रहे तो उन्होंने जीव को कहा कि तुम्हे मृतुलोक जाना पड़ेगा,मैं सृष्टि की रचना करने जा रहा हूँ. ये सुन जीव की आँखों मे आंसू आ गए.वो बोला प्रभु कुछ तो ऐसा करो की मे लौटकर आपके पास ही आऊ. भगवान को दया आ गई. उन्होंने दो बाते की जीव के लिए. पहला संसार की हर चीज़ मे अतृप्ति मिला दी, कि तुझे दुनिया मे कुछ भी मिल जाये तू तृप्त नहीं होगा. तृप्ति तुझे तभी मिलेगी जब तू मेरे पास आएगा और दूसरा सभी के हिस्से मे थोडा-थोडा दुःख मिला दिया कि हम लौट कर ईश्वर के पास ही पहुचे. इस तरह हर किसी के जीवन मे थोडा दुःख है. जीवन मे दुःख या विषाद हमें ईश्वर के पास ले जाने के लिए है, लेकिन हम चूक जाते है. हमारी समस्या क्या है कि हर किसी को दुःख आता है, हम भागते है ज्योतिष के पास,अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के पास. कुछ होने वाला नहीं. थोड़ी देर का मानसिक संतोष बस. यदि दुखो से घबराये नहीं और ईश्वर का प्रसाद समझ कर आगे बढे तो बात बन जाती है. यदि हम ईश्वर से विलग होने के दिनों को याद कर ले तो बात बन जाती है और जीव दुखो से भी पार हो जाता है. दुःख तो ईश्वर का प्रसाद है. दुखो का मतलब है, ईश्वर का बुलावा है. वो हमें याद कर रहा है पहले भी ये विषाद और दुःख बहुत से संतो के लिए ईश्वर प्राप्ति का मार्ग बन चुका है. हमें ये बात अच्छे से समझनी चाहिए कि संसार मे हर चीज़ मे अतृप्ति है और दुःख और विषाद ईश्वर प्राप्ति का साधन है. "जय जय श्री राधे " 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌼🌼🌼〰️〰️ ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ★ब्राह्म पर्व★ (एक सौ पच्चीसवाँ दिन) सूर्य चक्र का निर्माण और सूर्य दीक्षा की विधि... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... साम्ब ने पूछा-भगवन्! भगवान् सूर्य के चक्र का और उस में स्थित पद्म का कितने विस्तार में किस प्रकार निर्माण करना चाहिये तथा नेमि. अर और नाभि का विभाग किस प्रकार करना चाहिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-साम्ब! चक्र चौँसठ और नेमि आठ अङ्गुल की बनानी चाहिये। अङ्गुल का नाभि का विस्तार भी आठ अङ्गुल का होना चाहिये और पद्म नाभि का तीन गुना अर्थात् चौबीस अङ्गुल का होना चाहिये। कमल में नाभि, कर्णिका और केसर भी बनाने चाहिये। नाभि से कमल की ऊँचाई अधिक होनी चाहिये। वहीं पर द्वार के कोण में कमल-पुष्प के मुखर की कल्पना करनी चाहिये। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र के लिये चार द्वारों की कल्पना करनी चाहिये। द्वारों को बनाने के पश्चात् ब्रह्मा आदि देवताओं का उनके नाम-मन्त्रों से भक्तिपूर्वक आवाहन कर पूजन करना चाहिये। अर्क-मण्डल की पूजा के लिये इस यज्ञ-क्रिया के अनुरूप दीक्षित होना चाहिये, भगवान् सूर्यने इसे मुझसे पूर्वकाल में कहा था। साम्ब ने पूछा-भगवन्! सूर्यचक्र-यज्ञ के लिये देवताओं ने किन मन्त्रोंको कहा है? तथा यज्ञ के स्वरूप और क्रम को भी आप बताने की कृपा करें। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-सौम्य! सूर्यनारायण के चक्र में कमल बनाकर पूर्व की भाँति हृदय में स्थित भगवान् सूर्य का 'खखोल्क' नाम से कमल की कर्णिका-दलों में नाममन्त्र पूर्वक चतुर्थ्यन्त विभक्ति और क्रिया लगाते हुए 'नमः' लगाकर अङ्गन्यास एवं हृदयादि न्यास तथा पूजन करना चाहिये हवन करते समय नाम के अन्त में 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग करना चाहिये । यथा-'ॐ खखोल्काय स्वाहा।" ॐ खखोल्काय विद्यहे दिवाकराय धीमहि । तन्नः सूर्य: प्रचोदयात् ॥' इन चौबीस अक्षरों वाली सूर्यगायत्री का जप सभी कर्मों में करना चाहिये, अन्यथा कर्मों का फल प्राप्त नहीं होता। यह सूर्यगायत्री ब्रह्मगोत्र वाली सर्वतत्त्वमयी तथा परम पवित्र है। एवं भगवान् सूर्य को अत्यन्त प्रिय है, इसलिये प्रयत्न पूर्वक मन्त्र के ज्ञान और कर्म की विधि को जानना चाहिये। इससे अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है । साम्ब ने पूछा-भगवन्! आदित्य-मण्डल में किसकी, किस कार्य के लिये और कैसी दीक्षा होनी चाहिये ? इसे बतायें। भगवान् श्रीकृष्ण बोले-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और कुलीन शूद्र, पुरुष अथवा स्त्री भी सूर्य-मण्डल में दीक्षा के अधिकारी हैं। सूर्य शास्त्र के जानने वाले सत्यवादी, शुचि, वेदवेत्ता ब्राह्मण को गुरु बनाना चाहिये और भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम करना चाहिये। षष्ठी तिथि में पूर्वोक्त विधि के अनुसार अग्नि स्थापन कर विधिपूर्वक सूर्य तथा अग्नि की पूजा करके हवन करना चाहिये। तदनन्तर गुरु पवित्र शिष्य को कुशों और अक्षतों के द्वारा उसके प्रत्येक अङ्ग में सूर्य की भावना कर उसका स्पर्श करे। शिष्य वस्त्रादि से अलंकृत होकर पुष्प, अक्षत, गन्ध आदि से भगवान् सूर्य की पूजा करे तथा बलि भी दे। आदित्य, वरुण, अग्नि आदि का अपने हृदय में ध्यान करे। घी, गुड़, दधि, दूध, चावल आदि रखकर तीन बार जल से अग्नि को सिंचित कर अग्नि में पुन: हवन करे। उसके बाद गुरु शिष्टाचार स्वरूप शिष्य को दातून दे। वह दातून दूध वाले वृक्ष का हो और उसकी लम्बाई बारह अङ्गुल होनी चाहिये। दातून करने के पश्चात् उसे पूर्व-दिशा में फेंक देना चाहिये, उस दिशा में देखे नहीं। पूर्व, पश्चिम और ईशान कोण की ओर मुख करके दातून करना शुभ होता है और अन्य दिशाओं में दातून करना अशुभ माना गया है। निन्दित दिशा में दन्त धावन से जो दोष लगता है, उसकी शान्ति के लिये पूजन-अर्चन करना चाहिये। पुन: गुरु शिष्य के अङ्गों का स्पर्श करे। सूर्यगायत्री का जप पूर्वक उसके आँखों का स्पर्श करे। इन्द्रिय संयम के लिये शिष्य से संकल्प कराये। तदनन्तर आशीर्वाद देकर उसे शयन करने की आज्ञा दे। दूसरे दिन आचमन कर सूर्य को प्रात:काल नमस्कार कर अग्नि-स्थापन करे और हवन करे। स्वप्न में कोई शुभ संवाद सुने अथवा दिन में यदि कोई अशुभ लक्षण दिखायी पड़े तो सूर्यनारायण को एक सौ आहुति दे। स्वप्न में यदि देवमन्दिर, अग्नि, नदी, सुन्दर उद्यान, उपवन, पत्र, पुष्प, फल, कमल, चाँदी आदि और वेदवेत्ता ब्राह्मण, शौर्यसम्पन्न राजा, धनाढ्य क्षत्रिय, सेवामें संलग्न कुलीन शूद्र, तत्त्व को जानने वाला, सुन्दर भाषण देने वाला अथवा उत्तम वाहन पर सवार, वस्त्र, रत्न आदि की प्राप्ति, वाहन, गाय, धान्य आदि उपकरण अथवा समृद्धि की प्राप्ति आदि स्वप्न में दिखायी दे तो उस स्वप्न को शुभ मानना चाहिये। शुभ कर्म दिखायी पड़े तो सब कार्य शुभ ही होते हैं। अनिष्टकारक स्वप्न दिखायी पड़ने पर सप्तमी को सूर्य चक्र लिखकर सूर्यदेव की पूजा करनी चाहिये। ब्राह्मणों तथा गुरु को संतुष्ट करना चाहिये। आदित्य मण्डल पवित्र और सभी को मुक्ति प्रदान करने वाला है। इसलिये अपने मन में ही आदित्य मण्डल का ध्यान कर एक सौ आहुति देनी चाहिये। इस क्रम से दीक्षा-विधि और मन्त्र का अनुसरण करते हुए आदित्य मण्डल पर पुष्पाङ्जलि प्रदान करे। इससे व्यक्ति के कुल का उद्धार हो जाता है। सूर्यप्रोक्त पुराणादि का श्रवण करना चाहिये। पूजन के बाद विसर्जन करे। सूर्य का दर्शन करने के पश्चात् ही भोजन करना चाहिये। प्रतिमा की छाया का और न ही ग्रह-नक्षत्र-योग और तिथि का लंघन करना चाहिये। सूर्य अयन, ऋतु, पक्ष, दिन, काल, संवत्सर आदि सभी के अधिपति हैं और वे सभी के पूज्य तथा नमस्कार करने योग्य हैं। सूर्य की स्तुति, वन्दना और पूजा सदा करनी चाहिये। मन, और कर्म से देवताओं की निन्दा का परित्याग करना चाहिये। हाथ-पाँव धोकर, सभी प्रकार के शोक को त्यागकर शुद्ध अन्त:करण से सूर्य को नमस्कार करना चाहिये। इस प्रकार संक्षेप से मैंने सूर्य-दीक्षा की विधि को कहा है, जो सुख भोग और मुक्ति को प्रदान करने वाली है। क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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माघ महात्म्य चौदहवां अध्याय 〰️〰️🌼〰️🌼〰️🌼〰️〰️ कार्तवीर्य जी बोले कि हे विप्र श्रेष्ठ! किस प्रकार एक वैश्य माघ स्नान के पुण्य से पापों से मुक्त होकर दूसरे के साथ स्वर्ग को गया सो मुझसे कहिए तब दत्तात्रेय जी कहने लगे कि जल स्वभाव से ही उज्जवल, निर्मल, शुद्ध, मलनाशक और पापों को धोने वाला है. जल सब प्राणियों का पोषण करने वाला है, ऎसा वेदों ने कहा है. मकर के सूर्य माघ मास में गौ के पैर डूबने योग्य जल से भी स्नान करने से मनुष्य स्वर्ग को प्राप्त होता है. यदि सारा मास स्नान करने से अशक्त हो तो तीन दिन ही स्नान करने से पापों का नाश होता है. जो व्यक्ति थोड़ा ही दान करे वह भी धनी और दीर्घायु होता है. पांच दिन स्नान करने से चंद्रमा के सदृश शोभायमान होता है इसलिए अपना शुभ चाहने वालों को माघ से बाहर स्नान करना चाहिए। अब माघ में स्नान करने वालों के नियम कहता हूँ. अधिक भोजन का उपयोग नहीं करना चाहिए, भूमि पर सोना चाहिए, भगवान की त्रिकाल पूजा करनी चाहिए. ईंधन, वस्त्र, कम्बल, जूता, कुंकुम, घृत, तेल, कपास, रुई, वस्त्र तथा अन्न का दान करना चाहिए. दूसरे की अग्नि न तपे, ब्राह्मणों को भोजन कराए और उनको दक्षिणा दे तथा एकादशी के नियम से माघ स्नान का उद्यापन करे. भगवान से प्रार्थना करें कि हे देव! इन स्नान का मुझको यथोक्त फल दीजिए. मौन रहकर मंत्र का उच्चारण करे फिर भगवान का स्मरण करें. जो मनुष्य श्री गंगाजी में माघ में स्नान करते हैं वे चार हजार युग तक स्वर्ग से नहीं गिरते. जो कोई माघ मास में गंगा और यमुना का स्नान करता है वह प्रतिदिन हजार कपिला गौ के दान का फल पाता है। क्रमशः... अगले लेख में माघ मास पंद्रहवे अध्याय की कथा। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (उत्पत्ति-प्रकरण) (तृतीय दिवस) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः ब्रह्मा की मनोरूपता और उसके संकल्पमय जगत की असत्ता तथा ज्ञाता के कैवल्य की ही मोक्ष रूपता का प्रतिपादन...(भाग 2) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गतांक से आगे... श्रीवसिष्ठजी कहते हैं-श्रीराम ! जिनका शरीर पृथ्वी आदि तत्त्वों से नहीं बना है, जो चिदाकाश स्वरूप और निराकार हैं, वे सम्पूर्ण भूतो के अधिपति स्वयम्भू ब्रह्मा सशरीर पुरुष की भाँति प्रतीत होते हैं । पृथ्वी आदि तत्वों से शून्य आकार वाले संकल्प-पुरुष ब्रह्मा का शरीर चित्तमात्र है वे ही तीनों लोकों की स्थिति के कारण हैं । स्वयम्भू ब्रह्मा का यह संकल्प प्राणियों के कर्मो के अनुसार जिस जिस प्रकार से विकास को प्राप्त होता है, चिदाकाश- स्वरूप आत्मा उसी प्रकार से प्रतीत होता है । ब्रह्मा मनोमय ही हैं, पृथ्वी-आदि-निर्मित नहीं हैं । इसलिये उनसे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी मनोमय ही है; क्योंकि जो जिससे उत्पन्न होता है, वह तद्रूप ही होता है । (जैसे सोने का बना हुआ कटक-कुण्डल आदि सुवर्ण रूप ही होता है) अजन्मा ब्रह्मा के कोई सहकारी कारण नहीं हैं। सुतरां उनसे उत्पन्न हुए जगत् के भी कोई सहकारी कारण नहीं है । अत: यहाँ कारण से कार्य में कोई विचित्रता या विलक्षणता नहीं है। इसलिये जैसे कारण शुद्ध है, वैसे कार्य भी शुद्ध ब्रह्म ही है-यह सिद्धान्त स्थिर हुआ । इस जगत के विषय में कार्य कारण- भाव की किंचिन्मात्र भी संगति नहीं है । जैसा परब्रह्म है वैसे ही तीनों लोक हैं । जल द्रवत्व से अभिन्न ही है उस अभिन्नरूप जल से जिस तरह द्रवत्व का विस्तार होता है, उसी प्रकार मनोरूपता को प्राप्त हुए ब्रह्मा अपने शुद्ध आत्मा (स्वरूप) से ही जगत का विस्तार करते हैं । वह जगत् उनके विशुद्ध आत्म स्वरूप से भिन्न नहीं है जैसे ज्ञानियों की दृष्टि में रस्सी में सर्पभाव नहीं है, उसी प्रकार जगत में आदिभौतिकता (जडता) नहीं है । फिर वे प्रबुद्ध ब्रह्मा आदि आधिभौतिक देह में कैसे रह सकते हैं। मन ही ब्रह्मा के स्वरूप को प्राप्त हुआ है। वह मन संकल्प रूप है । मन अपने ही स्वरूप को विकसित करके इस जगत् का निर्माण एवं विस्तार करता है ! मन का रूप ब्रह्मा है और ब्रह्मा का रूप मन । इसमें पृथ्वी आदि का प्रवेश नहीं है । मन ने ही परमात्मा में पृथ्वी आदि की कल्पना की है । जैसे कमल गट्टे के अंदर कमलिनी (भावी कमल-नाल) विद्यमान है उसी प्रकार मन के भीतर सम्पूर्ण दृश्यवर्ग स्थित है । मन, दृश्यवर्ग और इन दोनों का द्रष्टा-इनका कभी किसी ने विवेक नहीं किया। ( जब तक द्रष्टा और दृश्य का विवेक न किया जाय, तबतक अज्ञान का उच्छेदन होने से मन में दृश्य वर्ग की प्रतीति होती ही है) यदि दृश्य रूप दुःख सत् हो तो उसकी कभी शान्ति नहीं हो सकती और दृश्य की शान्ति न होने पर ज्ञाता में कैवल्य (मोक्ष) की सिद्धि नहीं हो सकती। दृश्य का अभाव हो जाने पर ज्ञाता में ज्ञातृ भाव स्थित हो, तो भी वह शान्त या निवृत्त हो जाता है। वही (ज्ञाता का कैतल्य ही उसका मोक्ष कहा गया है । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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