भक्ति कथा

. "व्रज के भक्त-38" श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी (भातरोल, सिन्दुरक) श्रीव्रजकिशोरदास बाबाजी सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाके अनेकों शिष्यों में सबसे अधिक प्रसिद्ध थे। दैन्य, वैराग्य और भक्ति में वे सिद्ध बाबा की ही प्रतिमूर्ति थे। वे किसी कुटी में कभी नहीं रहे। भातरोल ग्राम में एक घर 'भूतों का घर 'के नाम से प्रसिद्ध था। उसी में अधिक रहे। एक बार उस घर में रहने वाले भूतों में से एक उनका तेज देख बहुत भयभीत हुआ। उन्हें देख उस जीव के भयभीत होने से उन्हें अपराध होगा, इस विचार से उन्होंने वह घर छोड़़ दिया, और एक प्राचीन पुल के नीचे जाकर रहने लगे, जो सिन्दुरक ग्राम के निकट वृन्दावन से सिन्दुरक जाने के मार्ग पर था। उनका अवशिष्ट जीवन वहीं व्यतीत हुआ। कोई उन्हें देखकर दण्डवत् न करे, इस उद्देश्य से वे अलक्षित भाव से रहते। वे अपने को दीन, हीन और अस्पृश्य जान किसी मन्दिर के भीतर जाकर ठाकुर के दर्शन न करते, जिससे किसी को उनका स्पर्श हो जाने का अपराध उनसे न बने। एक करुआ और एक गुदड़ी में ही उन्होंने अपना सारा जीवन व्यतीत किया। उन्हें सारा गोविन्द लीलामृत कण्ठ था। इससे लगता है कि वे अष्टकालीन लीला-स्मरण किया करते थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु के वंशज श्रृंगार-वट के श्रीप्रेमानन्द प्रभु ने उन्हीं से भजन-शिक्षा ग्रहण की थी। ----------:::×:::---------- . "व्रज के भक्त-39" श्रीहरिचरणदास बाबाजी (वृन्दावन कुसुमसरोवर) मुंगेर-जामालपुर के श्रीमहेन्द्रनाथ भट्टाचार्य नामक एक नवयुवक विरक्त वेश धारणकर भजन करने के उद्देश्य से वृन्दावन पधारे। वे परम सुन्दर ब्राह्मण-सन्तान और छोटी उम्र के थे। उन्हें कोई भी वेश देने को तैयार न हुआ। इसलिए उन्होंने स्वयं यमुना-स्नानकर वेश परिवर्तन कर लिया। श्रीगौरकिशोर शिरोमणि महाशय के पास जाकर उन्होंने दीक्षा के लिए प्रार्थना की। उन्होंने अपने-आप वेश परिवर्तन कर लिया था, इसलिए शिरोमणि महाशय ने स्वयं दीक्षा न देकर अपने ज्येष्ठ पुत्र श्रीरासवल्लभ भक्तिभूषण द्वारा उन्हें दीक्षा दिलवा दी और नाम रखा श्रीहरिचरणदास। हरिचरणदासजी ने पण्डित श्रीरामकृष्णदास बाबाजी से शास्त्रा-घ्ययन किया और गौरकिशोर शिरोमणि महाशय से भजन-शिक्षा ग्रहण की। शिरोमणि महाशय के नित्यधाम पधारने के पश्चात् वे कुछ दिन राधा-कुण्ड में रहे। फिर कुसुम-सरोवर पर एक छतरी में रहकर भजन करने लगे। उस समय श्रीरामकृष्ण पण्डित बाबाजी श्यामकुटी में भजन करते थे। उनके पास ग्वालियर महाराज के सौतेले भाई श्रीबलवन्तराव भइया साहब आये भजन-शिक्षा लेने। पण्डित बाबा ने ऐसे व्यक्ति को भजन-शिक्षा देने के लिए हरिचरणदासजी को योग्य जान उनके पास भेज दिया। भइया साहब उनके निकट रहकर भजन-शिक्षा ग्रहण करने लगे। उनके आदेश से उन्होंने कुमुमसरोवर के निकट एक मन्दिर और बगीचे का निर्माण किया और उसमें श्रीराधाकान्तजी की सेवा तथा वैष्णव-सेवा की व्यवस्था की। दूर-दूर के गाँवों के भजन करनेवाले विरक्त महात्माओं के लिए मासिक वृत्ति का प्रबन्ध किया। इस व्यवस्था को स्थायी रूप देने के लिए 'राधाकान्त फण्ड' नाम से गवर्मेंन्ट में बहुत-सा धन जमा किया और एक कार्यकारी समिति का गठन किया, जो आज भी यह सेवा सुचारु रूप से चला रही है। श्रीहरिचरणदास बाबा श्रीधामपुरी के श्री राधारमण चरणदास देव (बड़े बाबा) के समकालीन थे और उनके व्रजवास के समय उनकी बहुत सी अलौकिक लीलाओं के प्रत्यक्ष द्रष्टा थे। ----------:::×:::---------- लेखक: बी. एल कपूर पुस्तक: व्रज के भक्त (द्वितीय खण्ड) "जय जय श्री राधे" *******************************************

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👉🌲श्री कृष्ण का मुंडन संस्कार की लीला🌲👈 🌿 उस समय व्रज के लोगों का मुख्य व्यवसाय गौ-चारण ही था इसलिए मुख्य व्यवसाय से सम्बंधित कुछ वर्जनाएं भी थी। अब इसे वर्जनाएं कहें या सामाजिक नियम बालक का जब तक मुंडन नहीं हो जाता तब तक उसे जंगल में गाय चराने नहीं जाने दिया जाता था। अब तो हम काफी आधुनिक हो गये हैं या यूं कह सकते हैं अपनी जड़ों से दूर हो गये हैं नहीं तो हमारे यहाँ भी बालक को मुंडन के पहले ऐसी-वैसी जगह नहीं जाने दिया जाता था। खैर....बालक कृष्ण रोज़ अपने परिवार के व पडौस के सभी पुरुषों को, थोड़े बड़े लड़कों को गाय चराने जाते देखते तो उनका भी मन करता पर मैया यशोदा उन्हें मना कर देती कि अभी तू छोटा है, थोड़ा बड़ा हो जा फिर जाने दूँगी। एक दिन बलराम जी को गाय चराने जाते देख कर लाला अड़ गये –"दाऊ जाते हैं तो मैं भी गाय चराने जाऊंगा....ये क्या बात हुई....वो बड़े और मैं छोटा ?" मैया ने समझाया कि दाऊ का मुंडन हो चुका है इसलिए वो जा सकते हैं, तुम्हारा मुंडन हो जायेगा तो तुम भी जा सकोगे। लाला को चिंता हुई इतनी सुन्दर लटें रखे या गाय चराने जाएँ। बहुत सोच विचार के बाद उन्होंने सोचा कि लटें तो फिर से उग जायेगी पर गाय चराने का इतना आनंद अब मुझसे दूर नही रहना चाहिए। तुरंत नन्दबाबा से बोले –"कल ही मेरा मुंडन करा दो....मुझे गाय चराने जाना है। नंदबाबा हँस के बोले –“ऐसे कैसे करा दें मुंडन....हमारे लाला के मुंडन में तो जोरदार आयोजन करेंगे." लाला ने अधीरता से कहा –"जो करना है करो पर मुझे गाय चराने जाना है....आप जल्दी से जल्दी मेरा मुंडन करवाओ। " मुंडन तो करवाना ही था अतः नंदबाबा ने गर्गाचार्य जी से लाला के मुंडन का मुहूर्त निकलवाया । निकट में अक्षय तृतीया का दिन शुभ था इसलिए उस दिन मुंडन का आयोजन तय हुआ। न्यौते बांटे गये कई तैयारियां की गयी। आखिर वो दिन आया. जोरदार आयोजन हुआ, मुंडन हुआ और मुंडन होते ही लाला मैया से बोले –"मैया मुझे कलेवा नाश्ता दो....मुझे गाय चराने जाना है । " मैया बोली –"इतने मेहमान आये हैं घर में तुम्हें देखने और तुम हो कि इतनी गर्मी में गाय चराने जाना है....थोड़े दिन रुको गर्मी कम पड़ जाए तो मैं तुम्हें दाऊ के साथ भेज दूँगी । " लाला भी अड़ गये –"ऐसा थोड़े होता है....मैंने तो गाय चराने के लिए ही मुंडन कराया था....नहीं तो मैं इतनी सुन्दर लटों को काटने देता क्या....मैं कुछ नहीं जानता....मैं तो आज और अभी ही जाऊंगा गाय चराने । " मैया ने नन्द बाबा को बुला कर कहा –"लाला मान नहीं रहा....थोड़ी दूर तक आप इसके साथ हो आइये....इसका मन भी बहल जायेगा....क्योंकि इस गर्मी में मैं इसे दाऊ के साथ या अकेले तो भेजूंगी नहीं । " नन्द बाबा सब को छोड़ कर निकले. लाला भी पूरी तैयारी के साथ छड़ी, बंसी, कलेवे की पोटली ले कर निकले एक बछिया भी ले ली जिसे हुर्र....हुर्र कर चरा कर वो अपने मन में ही बहुत खुश हो रहे थे....कि आखिर मैं बड़ा हो ही गया। बचपन में सब बड़े होने के पीछे भागते हैं कि कब हम बड़े होगे....और आज हम बड़े सोचते हैं कि हम बच्चे ही रहते तो कितना अच्छा था। खैर....गर्मी भी वैशाख माह की थी और व्रज में तो वैसे भी गर्मी प्रचंड होती है। थोड़ी ही देर में बालक श्री कृष्ण गर्मी से बेहाल हो गये पर अपनी जिद के आगे हार कैसे मानते....बाबा को कहते कैसे की थक गया हूँ....अब घर ले चलो....सो चलते रहे....मैया होती तो खुद समझ के लाला को घर ले आती पर बाबा थे....चलते रहे। रास्ते में ललिता जी और कुछ अन्य सखियाँ मिली। देखते ही लाला की हालत समझ गयी. गर्मी से कृष्ण का मुख लाल हो गया था सिर पर बाल भी नही थे इसलिए लाला पसीना-पसीना हो गये थे। उन्होंने नन्द बाबा से कहा कि आप इसे हमारे पास छोड़ जाओ. हम इसे कुछ देर बाद नंदालय पहुंचा देंगे। नंदबाबा को रवाना कर वो लाला को निकट ही अपने कुंज में ले गयीं । उन्होंने बालक कृष्ण को कदम्ब की शीतल छांया में बिठाया और अपनी अन्य सखी को घर से चन्दन, खरबूजे के बीज, मिश्री का पका बूरा, इलायची, मिश्री आदि लाने को कहा । सभी सामग्री लाकर उन सखियों ने प्रेम भाव से कृष्ण के तन पर चन्दन की गोटियाँ लगाई और सिर पर चन्दन का लेप किया । कुछ सखियों ने पास में ही बूरे और खरबूजे के बीज के लड्डू बना दिए और इलायची को पीस कर मिश्री के रस में मिला कर शीतल शरबत तैयार कर दिया और बालक कृष्ण को प्रेमपूर्वक आरोगाया । साथ ही ललिता जी लाला को पंखा झलने लगी। यह सब अरोग कर लाला को नींद आने लगी तो ललिताजी ने उन्हें वहीँ सोने को कहा और स्वयं उन्हें पंखा झलती रही । कुछ देर आराम करने के बाद लाला उठे और ललिता जी उन्हें नंदालय छोड़ आयीं। आज भी अक्षय-तृतीया के दिन प्रभु को ललिता जी के भाव से बीज के लड्डू और इलायची का शीतल शर्बत आरोगाये जाते हैं व विशेष रूप से केशर मिश्रित चन्दन जिसमें मलयगिरी पर्वत का चन्दन भी मिश्रित होता है की गोटियाँ लगायी जाती हैं । लाला ने गर्मी में गाय चराने का विचार त्याग दिया था। औपचारिक रूप से श्री कृष्ण ने गौ-चारण उसी वर्ष गोपाष्टमी (दीपावली के बाद वाली अष्टमी) के दिन से प्रारंभ किया और इसी दिन से उन्हें गोपाल कहा जाता है। वर्ष में एक ये ही दिन ऐसा होता है जब बीज के लड्डू अकेले श्रीजी को आरोगाये जाते हैं अन्यथा अन्य दिनों में बीज के लड्डू के साथ चिरोंजी के लड्डू भी आरोगाये जाते हैं । 🌲🙏जय श्रीकृष्ण🙏🌲

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गणेश जी की कहानी | ................... एक सास बहु थी | सास उसकी बहु को खाना नहीं देती थीं | बहु रोज नदी पर जाती तो जाते समय घर से आटा ले जाती | नदी के पानी से आटा गूंधती | गणेश जी के मन्दिर के दीपक से घी लेती भोग में से गुड लेती , पास के श्मशान में बाटी सेकती | बाती में घी गुड मिलाकर चूरमा बनाती और गणेश जी के भोग लगा कर खुद खा लेती | ऐसा करते बहुत दिन हो गये , गणेश जी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने अपने नाक पर ऊँगली रख ली | बहु तो घर आ गई | दुसरे दिन मन्दिर के पट खुले तो लोगो ने देखा गणेशजी की नाक पर ऊँगली हैं तो मन्दिर में भीड़ एकत्रित हो गई | गाँव के लोगो ने हवन ,पूजा की पर गणेशजी ने ऊँगली नहीं उतारी | तब सारे गाँव में कहलवा दिया की जों कोई गणेश जी के नाक से ऊँगली हटवायेगा उसे राजाजी सम्मानित करेंगे | बहु ने सास से कहा सासुजी में कोशिश करूंगी तब सास बोली इतने बड़े बड़े कोशिश कर लिए तू क्या करेगी | सब लोग मन्दिर के बाहर एकत्रित हो गये बहु घुंघट निकाल कर अंदर गयी पर्दा लगाया और गणेश जी से बोली मैं मेरे घर से आटा लाती , लोगो का चढाया घी घुड लेती, श्मशान में बाटी सेकती उसमे आपको क्या आपति हुई | आपको मुँह से ऊँगली हटानी पड़ेगी | गणेश जी ने सोचा इसकी बात तो मान नी पड़ेगी | इसने पहले मेरे भोग लगाया | यह तो मेरी भक्त हैं | गणेश जी ने ऊँगली हटा ली | सब गाँव वालो ने कहा बहूँ तूने ऊँगली कैसे हटवाई तू तो जादूगरनी हैं | तब बहु ने सारी बात गाँव वालो को बताई की मेरी सास मुझे खाना नहीं देती थी , तब मैं घर से आटा लाकर , नदी के पानी से आटा लगाकर , बाटी बनाकर . श्मशान में सेककर , गणेशजी के दीपक से घी ,प्रसाद में से गुड चुराकर गणेश जी के भोग लगाकर खुद खा लेती इसलिये गणेशजी को आश्चर्य हुआ और उन्होंने नाक पर ऊँगली रख ली , और मेरी प्रार्थना पर ऊँगली हटा ली और मुझे वरदान दिया की अब इस गाँव में सब प्रेम से रहेंगे | हे गणेशजी भगवान जैसे बहु का मान बढ़ाया वैसे ही सब का मान बढ़ाना रक्षा करना | गणपति गणेश को उमापति महेश को मेरा प्रणाम गणपति बप्पा मोरिया श्री गणेशाय नमः गाइए गाइए गणपति जगबन्दन। शंकर सुवन भवानी नन्दन।।

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कार्तिक माह महात्म्य – दसवाँ अध्याय 〰️〰️🔸〰️〰️🔸🔸〰️〰️🔸〰️〰️ मायापति नारायण के, चरणों में सीस नवाय। दसवाँ अध्याय कार्तिक, लिखूं नारायण राय।। राजा पृथु बोले – हे ऋषिश्रेष्ठ नारद जी! आपको प्रणाम है. कृपया अब यह बताने की कृपा कीजिए कि जब भगवान शंकर ने अपने मस्तक के तेज को क्षीर सागर में डाला तो उस समय क्या हुआ? नारद जी बोले – हे राजन्! जब भगवान शंकर ने अपना वह तेज क्षीर सागर में डाल दिया तो उस समय वह शीघ्र ही बालक होकर सागर के संगम पर बैठकर संसार को भय देने वाला रूदन करने लगा. उसके रूदन से सम्पूर्ण जगत व्याकुल हो उठा. लोकपाल भी व्याकुल हो गये. चराचर चलायमान हो गया. शंकर सुवन के रुदन से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड व्याकुल हो गया. यह देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि व्याकुल होकर ब्रह्माजी की शरण में गये और उन्हें प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे. उन सभी ने ब्रह्मा जी से कहा – हे पितामह! यह तोन बहुत ही विकट परिस्थिति उत्पन्न हो गई है. हे महायोगिन! इसको नष्ट कीजिए। देवताओं के मुख से इस प्रकार सुनकर ब्रह्माजी सत्यलोक से उतरकर उस बालक को देखने के लिए सागर तट पर आये. सागर ने ब्रह्मा जी को आता देखकर उन्हें प्रणाम किया और बालक को उठाकर उनकी गोद में दे दिया. आश्चर्य चकित होते हुए ब्रह्मा जी ने पूछा – हे सागर! यह बालक किसका है, शीघ्रतापूर्वक कहो. सागर विनम्रतापूर्वक बोला – प्रभो! यह तो मुझे ज्ञात नहीं है परन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि यह गंगा सागर के संगम पर प्रगट हुआ है इसलिए हे जगतगुरु! आप इस बालक का जात कर्म आदि संस्कार कर के इसका जातक फल बताइए. नारद जी राजा पृथु से बोले – सागर ब्रह्माजी के गले में हाथ डालकर बार-बार उनका आकर्षण कर रहा था. फिर तो उसने ब्रह्माजी का गला इतनी जोर से पकड़ा कि उससे पीड़ित होकर ब्रह्मा जी की आँखों से अश्रु टपकने लगे. ब्रह्माजी ने अपने दोनों हाथों का जोर लगाकर किसी प्रकार सागर से अपना गला छुड़वाया और सागर से कहा – हे सागर! सुनो, मैं तुम्हारे इस पुत्र का जातक फल कहता हूँ. मेरे नेत्रों से जो यह जल निकला है इस कारण इसका नाम जलन्धर होगा. उत्पन्न होते ही यह तरुणावस्था को प्राप्त हो गया है इसलिए यह सब शास्त्रों का पारगामी, महापराक्रमी, महावीर, बलशाली, महायोद्धा और रण में विजय प्राप्त करने वाला होगा। यह बालक सभी दैत्यों का अधिपति होगा. यह किसी से भी पराजित न होने वाला तथा भगवान विष्णु को भी जीतने वाला होगा. भगवान शंकर को छोड़कर यह सबसे अवध्य होगा. जहां से इसकी उत्पत्ति हुई है यह वहीं जायेगा. इसकी पत्नी बड़ी पतिव्रता, सौभाग्यशालिनी, सर्वांगसुन्दरी, परम मनोहर, मधुर वाणी बोलने वाली तथा शीलवान होगी। सागर से इस प्रकार कहकर ब्रह्माजी ने शुक्राचार्य को बुलवाया और उनके हाथों से बलक का राज्याभिषेक कराकर स्वयं अन्तर्ध्यान हो गये. बालक को देखकर सागर की प्रसन्नता की सीमा न रही, वह हर्षित मन से घर आ गया. फिर सागर में उस बालक का लालन-पालन कर उसे पुष्ट किया, फिर कालनेमि नामक असुर को बुलाकर वृन्दा नामक कन्या से विधिपूर्वक उसका विवाह करा दिया. उस विवाह में बहुत बड़अ उत्सव हुआ. श्री शुक्राचार्य के प्रभाव से पत्नी सहित जलन्धर दैत्यों का राजा हो गया। शेष जारी... 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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