बधाई

।। उत्सव व्यंजन द्वादशी की मंगल बधाई ।। म्हारा बाल गोविंदा जी ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ लाडु मंगई दूँ पेड़ा मंगई दूँ, साथ मे माखन मिश्री जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, की छप्पन भोग जिमई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ हाथ धुलई दूँ पाँव धुलई दूँ, और धूलई दूँ थारौ मुंडों जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, की अपने हाथ निहलई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ चरमरीया झूल सिलई दूँ, रंग राधा की टोपी जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, अपने हाथ पिरई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥ राधा बुलई दूँ, रुकमणी बुलई दूँ, और बुलऊ सत्यभामा जी। म्हारा मन मे ऐसी आवै, संग मे रास रचई दूँ जी। ठाकुर छेल छबीला जी, की म्हारे घर रमवा आजो जी॥

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।। श्री तुंगविद्या सखी प्रागट्योत्सव की मंगल बधाई ।। तुंगविद्या सखियन सरताज | गौर बरनि, तनु – सुंदरता लखि, सुंदरताहूँ लाज | पहिरे पांडुर – वसन मनोहर, अंग – अंग छवि छाज | विविध राग लै तान सुनावति, साजि सबै विधि साज | गुण – आगरि, नागरि तहँ राजत, जहँ दोउ रहे बिराज | लखि ‘कृपालु’ दोउन रुचि रिझवत, महरानिहिं महराज || "श्री तुंगविद्या सखी" पिता- अंगद गोप, माता- ब्रह्मकर्णी, गांव- कमाई, जन्म- भाद्रपद, शुक्ल पक्ष पंचमी श्री तुंगविद्या जी अष्टदश विद्याओं में पारंगत है। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष, धातुगण, वेदांत दर्शन, मीमांसा दर्शन, न्याय दर्शन, वैशीषिक दर्शन, सांख्य दर्शन, पातंजल दर्शन, पुराण, धर्म शास्त्र ये युगल का मिलन कराने में विशेष कुशल तथा श्री कृष्ण की विश्वास पात्री है। गन्धर्व विद्या की आचार्य पदवी पर आरूढ़ तुंगविद्या जी रसशास्त्र,नीतिशास्त्र,नाट्य शास्त्र,नाटक आदि में पारंगत है। सुसंगत कहानी सुनाने में पारंगत है। संगीत की राग रागिनियों के गान और वीणा यंत्र बजाने में परम् पंडिता है। ये संधि कराने वाली सुपटु दूतियों की अध्यक्षा हैं। संगीत और रंगशाला में अधिकार प्राप्त गोपिओं की अध्यक्षा है।मृदंग वाद्य और ६४ कलाओं के प्रदर्शन और नृत्य करने वाली दक्ष गोपिओं की अध्यक्षा हैं। श्री वृन्दावन की विभिन्न धाराओं, झरनों आदि से जल एकत्रित करनेवाली सखियों की अध्यक्षा हैं। श्री तुंगविद्या जी पीले रंग की साड़ी पहनती हैं । युगलवर के दरबार में नृत्य गायन करना व सदैव प्रिया-प्रियतम की सेवा में रहती हैं। श्री तुंगविद्या सखी श्री राधाकुंड के पश्चिम-दिशावर्ती दल पर अरुण वर्ण की अति सुन्दर तुंगविद्यानन्दन नामक कुंज विख्यात है, श्री तुंगविद्या जी नित्य उसमें विराजती हैं। इनकी सदा श्री कृष्ण में विप्रलम्भ भावनात्मक रति है। इनकी अंग कांति प्रचुर कपूर-चन्दन-मिश्रित केसर की भांति है, यह प्रखर–दक्षिण स्वभाव की नायिका हैं। कलियुग में श्री गौर लीला में ये "श्री वक्रेश्वर–पंडित" नाम से विख्यात हुई हैं। श्री तुंगविद्या सखी ध्यान चंद्राढयेsरपि चन्दनै: सुलालितां श्रीकुंकुमाभाधूतिं |सदरत्नाचितभूषणाचिततारां शोणाम्बरोल्लासिताम |सद्गीतावलि संयुतां बहुगुणां डम्फस्यशब्देन वैनृत्यन्तीं पुरतो हरे रसवतीं श्रीतुंगविद्यां भजे जो कर्पुरयुक्त चन्दन से चर्चित होकर अति सुशोभित हो रही है, जिनकी अंग-कांति सुन्दर केसर तुल्य है, जो सुन्दर रत्न भूषणों से अलंकृत है और जो लाल रंग के वस्त्र धारण कर उल्लसित होती है, सद् गीतावली संयुक्ता है, बहुगुण शालिनी है जो डफली-वाद्य के साथ श्री कृष्ण के सामने नृत्य करती हैं - इन रसवती श्री तुंगविद्या जी का मैं ध्यान करती हूँ। श्री तुंगविद्या सखी-यूथ मंजुमेधा, सुमधुरा, सुमध्या, मधुराक्षी, तनुमध्या, मधुस्यन्दा, गुणचूड़ा, वरांगदा ये आठ सखियाँ श्री तुंगविद्या जी के यूथ में प्रधान सहायक सखिया हैं। तुंगविद्या सखी अपनी बुद्धिमत्ता के लिए जानी जाती हैं। इन्हें नीति-नाटक आदि सभी विद्याओं का ज्ञाता बताया गया है। तुंगविद्या सखी का कार्य श्रीराधाकृष्ण को गीत, वाद्य आदि से प्रसन्न करना है। गीत-वाद्य से सेवा करती अतिशय सरस सदा अविराम। नीति-नाट्य-गान्धर्व-शास्त्र निपुणा रस-आचार्या अभिराम।। भावार्थ – तुंगविद्या समस्त सखियों की सरताज हैं | इनका गोरा रंग एवं इनकी सुन्दरता को देखकर सुन्दरता भी लज्जित होती है | पांडुरंग के प्रमुख अंगों में कपड़े पहनती हैं, एवं समस्त बाजों के साजों को सजाकर तान आलाप के साथ श्यामा – श्याम को अनेक प्रकार के राग सुनाती हैं | गुणों की खानि श्यामा – श्याम के पास ही निरन्तर रहती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि ये दोनों की रुचि के अनुसार उन्हें प्रसन्न करती हैं |

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