बद्रीनाथ_धाम_की_संपूर्ण_प्रस्तुति।

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R.G.P.Bhardwaj Dec 5, 2019

श्री भगवान् की ऐश्वर्य लीला 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 ब्रज में एक बार सब ग्वाल बाल जिद पे अड़ गए,और श्री भगवान से उनका ईश्वरिय रूप दिखाने की जिद करने लगे। बोलने लगे.... अरे कृष्णा मेरे बाबा बोलते है की तू भगवान है। क्या तू सच में भगवान है ? अगर है तो अपना भगवान वाला रूप दिखा, दूसरा गोप बालक बोला हा ये भगवान है मेरी मइया बोलती है जब ये पैदा हुआ था तो जेल के दरवाजे अपने आप खुल गए थे और देवी दुर्गा दुष्ट कंस को चेतावनी देते हुए बोली थी की रे मुर्ख कंस त्रिभुवन पति का जन्म हो चूका है तू उनसे नहीं बच सकता वो समस्त देवताओ के भी स्वामी है और वो ही तेरा संहार करेंगे। एक और ग्वाल बाल बोला मेरे बाबा बोलते है ना जब ये पैदा हुआ था तो भगवान शिव इसके दर्शन को आये थे। इसको गोद में लेकर खूब प्रेम कर रहे थे प्रेम वश महादेव की आँखों से अश्रु प्रवाहित हो रहे थे। और बार बार बोल रहे थे कि ये ही समस्त सृष्टि के ईश्वर है जो आज बाल रूप में मेरे गोद में है,मैं हमेशा समाधि लगाकर इनका ध्यान करता हूं,इनके ही नाम का सैदव जाप करता रहता हुँ । तो इसका मतलब हमारा कान्हा सच में भगवान हैं। एक गोप बालक बोला नहीं मेरी मैया बोलती है कि कान्हा तो हम लोग जिनको भगवान समझते है ये उनका भी भगवान है। शिव जी ,ब्रम्हा जी ,देवी जी,समस्त देवताओं ने इसके ऊपर पुष्प वर्षा की थी इसके जन्मोत्सव के अवसर पर .......और ये जन्म लेते ही असुरो को मारने लगा था। ये हमारा कान्हा ही सच्चा भगवान है। फिर तो सब गोप बालक मिल कर बोले.... सुन कान्हा आज अपना भगवान वाला रूप दिखा हम सबको। सब सुन लो भाई अगर आज कृष्णा ने हमको,अपना भगवान वाला रूप नहीं दिखाया तो इसको अपने साथ गेंद नहीं खेलने देंगे। और आगे से भी इसके साथ कोई नहीं खेलेगा। भक्तवत्सल श्री भगवान ग्वाल बालकों की जिद मान गए और अगले ही पल गोपवृन्द बैकुंठ धाम में पहुच गये। वहाँ का ऐश्वर्य भला कौन वर्णन कर सकता है। हजारों जन्मो की तपस्या से भी जिस धाम में जाना असम्भव है। योगी,मुनि ॐ जप कर लाख जतन करते हैं बैकुंठ दर्शन करने को,.... धन्य है वो गोप बालक जो अपने कृष्ण से इतना प्रेम करते है की स्वमं भगवान उनके संग खेल रहे है और प्रेमवश अपने बैकुंठ धाम का दर्शन भी करा रहे है। ये है जीव का ईश्वर से परम प्रेम जो पूर्ण पुरुषोत्तम भी अपने अधीन कर लेता है। ग्वाल बालक देखते है की बैकुंठ में कान्हा महाराजा के जैसे एक रत्नजड़ित ऊँचे सिंहासन पे विराजित है और और समस्त देवी देवता उनका उत्तम स्तोत्रों से स्तुति कर रहें हैं। गोप बालक सबसे पीछे है वो अपने कान्हा की स्तुति होते हुए देख रहें हैं।काफी समय हो गया श्री भगवान की स्तुति तो बंद ही नहीं हो रही समस्त देवगण उनकी स्तुति सेवा में लगे ही हैं। सेवा,आरती ,स्तुति ,पूजा चलती ही जा रही रही है....... अब तो बहुत समय हो गया, गोप बालकों से रहा नहीं गया किसी तरह से हिम्मत जुटा कर एक गोप बालक ने पीछे से आवाज दे ही दिया ........ये कान्हा गइया कब चऱायेगा ? गोधन बेला हो गई बालक के इतना बोलते ही श्री भगवान की स्तुति में लगें देवगण भी पीछे मुड़कर देखने लगें गोप बालक तो डर गए किन्तु देवगण सोचने लगे धन्य हैं ब्रज के ये सब बालक, ना जाने कितने जन्मों के उनके पुण्य है जो ब्रज में जन्म लिए और समस्त चराचर पति हम देवताओं के स्वामी उनसे इतना स्नेह करते है। मनुष्य रूप में उनके संग बाल लीला करते है। ब्रज के ग्वालबालों की जय हो। अगले ही पल श्री भगवान ने अपने ऐश्वर्य लीला का समापन कर दिया सभी गोपवृन्द वापस ब्रज में अपने सखा कृष्ण के साथ खेल खेलने में व्यस्त हो गए। वो अपने कृष्ण को भगवान नहीं अपना सखा मानते है। उनका कान्हा अब उनके साथ है,वो सब मिलकर गइया चऱायंगे, खेल खेलेंगे ,कान्हा उनके साथ भोजन करेंगे। समस्त ऐशवर्य कि देवी श्रीमती लक्ष्मी देवी भगवान के कोमल चरणकमलो की सेवा में सदा लगी रहती है। सारे देवगण श्री भगवान की सेवा में सदा लगे रहते है। भगवान कृष्ण समस्त जीवो के रचयिता है सबसे प्रेम करते है हम सबको भी उनसे प्रेम करना चाहिए। श्री भगवान अपने भक्तों के प्रेम के भूखे है। माधव भक्तवत्सल करुणासागर है। हम कृष्ण से थोड़ा सा भी प्रेम करे तो बदले में वो हमसे कई गुना ज्यादा प्रेम करते है ये उनकी दायलुता है। भगवान श्री कृष्ण की जय हो। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Fisrt time real darshan to facebook sri sri badaribnath बद्रीनाथ के बारे में यह 10 बातें हर विष्णु भक्त को जानना चाहिए 1: बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड के साथ ही साथ देश के चार धामों में से भी एक है। इस धाम के बारे में यह कहावत है कि ‘जो जाए बदरी, वो ना आए ओदरी’ यानी जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे पुनः माता के उदर यानी गर्भ में फिर नहीं आना पड़ता है। इसलिए शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य को जीवन में कम से कम एक बार बद्रीनाथ के दर्शन जरूर करना चाहिए 2: यह है ब्रदीनाथ के चरण पखरती अलकनंदा। पुराणों में बताया गया है कि बद्रीनाथ में हर युग में बड़ा परिवर्तन। सतयुग तक यहां पर हर व्यक्ति को भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे। त्रेता में यहां देवताओं और साधुओं को भगवान के साक्षात् दर्शन मिलते थे। द्वापर में जब भगवान श्री कृष्ण रूप में अवतार लेने वाले थे उस समय भगवान ने यह नियम बनाया कि अब से यहां मनुष्यों को उनके विग्रह के दर्शन होंगे। तब से भगवान के उस विग्रह के दर्शन प्राप्त होते हैं। 3: बद्रीनाथ को शास्त्रों और पुराणों में दूसरा बैकुण्ठ कहा जाता है। एक बैकुण्ठ क्षीर सागर है जहां भगवान विष्णु निवास करते हैं और विष्णु का दूसरा निवास बद्रीनाथ है जो धरती पर मौजूद है। बद्रीनाथ के बारे यह भी माना जाता है कि यह कभी भगवान शिव का निवास स्थान था। लेकिन विष्णु भगवान ने इस स्थान को शिव से मांग लिया था। 4: चार धाम यात्रा में सबसे पहले गंगोत्री के दर्शन होते हैं यह है गोमुख जहां से मां गंगा की धारा निकलती है। इस यात्रा में सबसे अंत में बद्रीनाथ के दर्शन होते हैं। बद्रीनाथ धाम दो पर्वतों के बीच बसा है। इसे नर नारायण पर्वत कहा जाता है। कहते हैं यहां पर भगवान विष्णु के अंश नर और नारायण ने तपस्या की थी। नर अगले जन्म में अर्जुन और नारायण श्री कृष्ण हुए। 5: बद्रीनाथ की यात्रा में दूसरा पड़ाव यमुनोत्री है। यह है देवी यमुना का मंदिर। यहां के बाद केदारनाथ के दर्शन होते हैं। मान्यता है कि जब केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं उस समय मंदिर एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं। 6: यह है जोशीमठ स्थित नृसिंह मंदिर। इस मंदिर का संबंध बद्रीनाथ से माना जाता है। ऐसी मान्यता है इस मंदिर भगवान नृसिंह की एक बाजू काफी पतली है जिस दिन यह टूट कर गिर जाएगा उस दिन नर नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे और बद्रीनाथ के दर्शन वर्तमान स्थान पर नहीं हो पाएंगे 7: बद्रीनाथ तीर्थ का नाम बद्रीनाथ कैसे पड़ा यह अपने आप में रोचक कथा है। कहते हैं एक बार देवी लक्ष्मी जब भगवान विष्णु से रूठ कर मायके चली गई तब भगवान विष्णु यहां आकर तपस्या करने लगे। जब देवी लक्ष्मी की नाराजगी दूर हुई तो भगवान विष्णु को ढूंढते हुए यहां आई। उस समय यहां बदरी का वन यानी बेड़ फल का जंगल था। बदरी के वन में बैठकर भगवान ने तपस्या की थी इसलिए देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को बद्रीनाथ नाम दिया। 8: यह है सरस्वती नदी के उद्गम पर स्थित सरस्वती मंदिर जो बद्रीनाथ से तीन किलोमीटर की दूरी पर माणा गांव में स्थित है। सरस्वती नदी अपने उद्गम से महज कुछ किलोमीटर बाद ही अलकनंदा में विलीन हो जाती है। कहते हैं कि बद्रीनाथ भी कलियुग के अंत में वर्तमान स्थान से विलीन हो जाएंगे और इनके दर्शन नए स्थान पर होंगे जिसे भविष्य बद्री के नाम से जाना जाता है। 9: यह है बद्रीनाथ का भव्य नजारा। मान्यता है कि बद्रीनाथ में में भगवान शिव को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। इस घटना की याद दिलाता है वह स्थान जिसे आज ब्रह्म कपाल के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मकपाल एक ऊंची शिला है जहां पितरों का तर्पण श्रद्घ किया जाता है। माना जाता है कि यहां श्राद्घ करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है। 10: बद्रीनाथ के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते हैं जो रावल कहलाते हैं। यह जब तक रावल के पद पर रहते हैं इन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

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