प्रेम

संध्या समय श्यामसुंदर कजरी को पुचकारते दुलराते वंशी बजाते नंद भवन पहुँच जाते हैं। आज कजरी बहुत प्रसन्नचित्त है, श्यामसुंदर कुछ थके से हैं या यूँ कहो कि राधे का गईयों के साथ स्नेह देख कुछ वंचित से हैं। राधे जब भी मान करतीं हैं तो वे और सब सखियां मिल उन्हें खूब सताते हैं। बालसखा कान्हा का पक्ष लेते तो हैं लेकिन सखियों की चतुराई और राधे जु का साथ उनकी कोई मनमानी नहीं चलने देती। उस समय भले ही राधे सखियों का ही पक्ष ले रहीं होतीं हैं पर भीतर मन में वे मोहन की मनःस्थिति से भी अनभिज्ञ नहीं रहतीं इसलिए कभी-कभी या अंत में तो कन्हैया का ही पक्ष धरतीं हैं। तब अपने मनमोहन श्यामसुंदर की चाटूकारी और सखियों के तीक्ष्ण तर्क-वितर्क से वे मंत्रमुग्ध सी पूरा आनंद भी लेतीं हैं। पर दिन के आरंभ से अंत तक अंतर्मन में अपने प्रियवर का ही ध्यान करतीं हैं कि कब वो घड़ी आए जब श्यामसुंदर जु को इन सब से पृथक अपना स्नेह-सुधा रस प्रदान करूँ। श्यामा जु भलिभांति जानतीं हैं कि अगली सुबह तक श्याम जु उसी रसान्नद में डूबे राधे की याद में मदमस्त रहते हैं। वे भी बालसखाओं के माध्यम से घड़ी-घड़ी श्यामसुंदर के लिए मधुर प्रेमरस से सराबोर पैगाम भेजतीं रहतीं हैं और सखियों संग उनकी बातें करके उनकी कुशलक्षेम पूछती रहतीं हैं। दोनों एक दूसरे से दूर होते हैं तब भी प्रेम वार्ता में डूबे ही रहते हैं। प्यार मनुहार तो जैसे इनकी पल पल की प्यास ही हो ऐसे ये किसी ना किसी ज़रिए से जुड़े ही रहते हैं। इधर राधे अगर अपनी सखियों संग हैं तो उधर श्याम जु भी सखाओं संग। यहाँ अगर बाग बगीचे में राधे समय एकांत में व्यतीत करतीं हैं तो उधर मोहन भी डाल पात में श्यामा जु के दर्शनक रते हैं। अगर वहाँ श्यामा जु माँ संग कुछ घरेलू कार्य में जुटी हैं तो श्यामसुंदर भी बाबा संग उनके काम में हाथ बटाते हैं। राधे जब किसी कार्य में संलग्न खुद में खोई सी हैं तो श्याम जु मईया से राधे की ही बातें करते हैं। आईने में जब वे अपना मुख कमल निहारते हैं तो परस्पर अपना नहीं एक दूसरे को ही देख पाते हैं। माँ भोजन परोसती है तब भी वो पहले तुम पहले तुम कह कर ही भोजन आरंभ करते हैं। शाम ढलते ही दोनों विरह वियोगी चाँद सितारों में या यमुना की लहरों में उतर कर भावों के समन्दर में डूबते हैं। ये उनकी मूक वार्तालाप अन्यत्र बेरोक टोक चलती ही रहती है फिर चाहे वे किसी कार्य में व्यस्त ही क्यों ना हों, दोनों एक दूसरे की यादों में ही खोए रहते हैं। सत्य ही ये उनके किशोर से युवा होने की ही निशानियां हैं कि अब वो एक-एक पल को भी पृथक होते हुए भी संग ही जीते हैं। स्वप्न संगम हो या ख्यालों में सदा संग एक दूसरे में खोए-खोए कभी सुषुप्ति के आलस्य में सोए-सोए से। और इस मूक प्रेम की साक्षी मूक कजरी गाय दोनों के स्वभाव से पूर्णतः वाकिफ है। वो आज बार-बार रम्भा रम्भा कर श्याम जु को बुला रही है। जानती है आज श्यामसुंदर श्यामा जु से एकांत में मिल नहीं पाए तो क्षण प्रति क्षण उन्हें पास बिठाकर उनसे स्नेह करना चाहती है। जैसे वो श्याम जु के अकेलेपन को दूर करना चाहती हो, इसी आस में वो उठ-उठ कर उन्हें बुला रही है। श्यामसुंदर भी जानते हैं कि आज कजरी क्या चाहती है तो दिनचर्या व संध्या काल के सभी कार्यों से निर्वृत होकर प्रियतम श्यामसुंदर कजरी के पास आते हैं और अपने सखाओं संग वहीं उसके पास बैठ कर हास परिहास व खेल खेलते हैं। रात्रि के ढलते-ढलते जब सखागण और माँ-बाबा सोने चले जाते हैं तो श्यामसुंदर वंशी बजाना आरंभ करते हैं कि श्यामा जु उनके हाथ से वंशी लेकर कहतीं हैं:- क्या करते हो, तुम भी ना... यूँ भी तुम्हारे पास ही हूँ ना प्रिय तो क्यों तुम रात्रि के हमारे एकांत मिलन को इस वंशी की धुन से अवरुद्ध करते हो। रात्रि के अंधियारे को चीरती श्यामा जु की पुकार सुन श्यामसुंदर वंशी बजाना छोड़ अपनी ही भावों की दुनिया में खो जाते हैं राधे के साथ। और यहाँ कजरी श्यामसुंदर में ही राधे के दर्शन करती कान्हा से नेह लगा रही है। वो श्यामसुंदर के चरणों को चाटती हुई अपना प्रेम दर्शाती है और श्यामसुंदर भी उसे सहलाते हुए उसके प्रेम का प्रतिफल उसे देते हैं। कजरी गाय से श्यामसुंदर का ये अद्भुत प्रेम कजरी को उनका दुलराना बहुत ही आकर्षक है। श्यामा जु भी श्यामसुंदर के इस प्रेम पर बलिहार जातीं हैं और दोनों परस्पर एक दूसरे के प्रेम को ही बड़ा बता रहे हैं, उनका ये प्रेम है तो पूजनीय ही। कजरी यूँ ही प्रियतम प्रिया के प्रेम की भागीदार बनी मंत्रमुग्ध सी सो जाती है एक नई सुबह के नए इंतजार में।

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युगल रूप ~~~~~ एक सखी बहुत सुंदर पायल लेकर स्वामिनी जू की सेवा में जाती है। मन में यही भाव आहा ! आज तो मेरे अहोभाग्य मुझे श्री जू के चरण छूने का सुअवसर मिल रहा । श्री जू के कोमल चरणों को छू पाऊँगी मैं। कहीँ मेरे स्पर्श से कोमलांगी श्री किशोरी जू को कष्ट तो न होगा। मन में यही भाव लिए श्री जू की और चलती है। हृदय में स्वामिनी जू का नाम ही ध्वनित हो रहा है। राधा राधा राधा ........ मार्ग में उसे कान्हा रोक लेते हैँ और उसे कान्हा भी आज श्री जू दिखाई पड़ते हैँ। राधा जू मैं तो आपके पास ही आ रही थी। आज मुझे आपके चरणों को छूने का सौभाग्य मिला है। ये पायल मुझे आपके चरणों में अर्पित करनी है। अरे बाँवरी ! तुझे क्या हुआ है मैं तुझे राधा दीख रहा हूँ । ये क्या लाई है तू राधा जू के लिए। सखी कहती है स्वामिनी जू ये पायल आपके लिए ही तो लाई हूँ । कान्हा उसके हाथ से पायल पकड़ लेते हैँ तो सखी कहती है प्यारी जू मुझे अपने चरण न छूने दोगी । लाओ मैं पहना दूँ । कान्हा कहते हैँ बाँवरी तू आज भर्मित जान पड़ती है। यहां बैठ जा। तभी कान्हा अपनी बाँसुरी निकालकर बजाने लगते हैँ। कान्हा की बांसुरी तो एक ही नाम पुकारती है राधा राधा राधा ......... देख मैं कान्हा हूँ । सखी कहती है अच्छा कान्हा हो । कान्हा कान्हा कान्हा ....... यही बोलते हुए उठकर श्री जू के सन्मुख पहुंच जाती है। श्री जू के पास जाकर उनसे कहने लगती है कान्हा ! मुझे फिर से बांसुरी सुनाओ ना । तुम बाँसुरी में प्यारी जू का नाम लेते हो तो मन करता है तुम्हारी बांसुरी सदा बजती ही रहे। श्री जू उस सखी को पकड़ कर हिलाती हैँ। श्री जू कहती हैँ तुझे आज क्या हो गया मैं कान्हा नहीं हूँ बांसुरी तो कान्हा के पास है। श्री जू के छूने से जाने क्या हो जाता है। सखी उनके चरणों को पकड़ लेती है और कहती है कान्हा एक बार और सुनाओ मुझे बांसुरी में प्यारी जू का नाम। तभी वहां कान्हा आ जाते हैँ । राधा और कान्हा एक दूसरे को देख देख आनन्दित होने लगते हैँ। ये उन्हीं का ही तो प्रेम है जो सखी उनको अभिन्न देख रही है। कान्हा को प्यारी जू और प्यारी जू को राधा देख रही है। ये वास्तव में युगल प्रेम ही है जहाँ एक क्षण को भी प्रिया प्रियतम का वियोग ही नहीं है। इस अद्भुत प्रेम की जय हो। जय जय श्री राधे

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*प्रेम की नगरिया आँखों से दिखाई नहीं देती* करुणामयी राधे पत्रिका। भौतिकवादी युग को आँखों से देखा जा सकता है परंतु श्यामसुंदर की प्रेम नगरिया को कानों से सुना जाता है। श्यामसुंदर की जो प्रेम डगरिया है वह आँखों से नहीं बल्कि कानों से सुनकर उसके रास्ते पर चला जाता है। हर क्षण उनके गुणों को सुनो, हमें अपने-आप उनका रास्ता मिल जाएगा। भगवन्न नाम स्मरण व श्रवण से रास्ता ही नहीं वे खुद ही आकर तुम्हारे पास बैठ जाएंगे। स्वयं श्री कृष्ण ने कहा है, " मैं बैकुंठ में नहीं रहता, जहाँ मेरे भक्त स्नेह से मेरा नाम गाते व श्रवण करते हैं, मैं तो वहीँ उनके पास ही रहता हूँ। एक दवा ऐसी होती है जो केवल रोग को समाप्त करती है और एक दवा ऐसी होती है जो रोग को भी नष्ट करती है और स्वस्थ भी करती है। भगवन्नाम इसी दवा का नाम है। हर क्षण प्रभु का नाम लेते रहिये। ये पाप भी नाश कर देगा और मंगल भी करेगा। भगवान् को *देखकर प्रेम* नहीं किया जाता, भगवान् को *सुनकर प्रेम* किया जाता है। *करुणामयी राधे धार्मिक पत्रिका* (श्रीधामबरसाना से प्रकाशित) *श्री प्रवीण गोस्वामी जी* (सेवाधिकारी श्रीजी मंदिर, बरसाना) संपर्क सूत्र: 9319587188

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आपल्यावर ज्याने उपकार केले त्याच्याजवळ जी वस्तू नाही ती त्याला देणे म्हणजे खऱ्या अर्थाने उतराई होणे होय. जी वस्तू त्याच्यापाशी आहे तीच त्याला देण्यात फारसे स्वारस्य नाही. सर्व दृश्य वस्तूंची मालकी मूळ भगवंताची असल्याने दृश्य वस्तू त्याला देणे म्हणजे त्याचेच त्याला दिल्यासारखे घडते. त्याच्यापाशी जे नाही ते त्याला देणे योग्य आहे. *** त्याच्यापाशी नाही अशी एकच वस्तू आहे. ती म्हणजे "त्याला स्वतःचे स्वतःवर प्रेम करता येत नाही" *** आपण त्याच्यावर मनापासून प्रेम केले म्हणजे त्याच्यापाशी नसलेली वस्तू त्याला दिल्यासारखे होते. भगवंतावर मनापासून प्रेम करणे शक्य होण्यासाठी त्याला शरण जावे. शरणागती साधण्यास मी कोणी नाही ही भावना निर्माण झाली पाहिजे. नामस्मरणाने ती निर्माण होते. म्हणून मनापासून नाम घेण्याचा अभ्यास करावा! ~~ श्रीमहाराज

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