पौराणिक कथा

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ठाकुर जी ने ली भक्त की परीक्षा............... 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 एक गाँव के बाहरी हिस्से में एक वृद्ध साधु बाबा छोटी से कुटिया बना कर रहते थे। वह ठाकुर जी के परम भक्त थे। स्वाभाव बहुत ही शांत और सरल। दिन-रात बस एक ही कार्य था, बस ठाकुर जी के ध्यान-भजन में खोए रहना। ना खाने की चिंता ना पीने की, चिंता रहती थी तो बस एक कि ठाकुर जी की सेवा कमी ना रह जाए। भोर से पूर्व ही जाग जाते, स्नान और नित्य कर्म से निवृत्त होते लग जाते ठाकुर जी की सेवा में। उनको स्नान कराते, धुले वस्त्र पहनाते, चंदन से तिलक करते, पुष्पों की माला पहनाते फिर उनका पूजन भजन आदि करते जंगल से लाये गए फलों से ठाकुर जी को भोग लगाते। बिल्कुल वैरागी थे, किसी से विशेष कुछ लेना देना नहीं था। फक्कड़ थे किन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते थे। यदि कोई कुछ दे गया तो स्वीकार कर लिया नहीं तो राधे-राधे। फक्कड़ होने पर भी एक विशेष गुण उनमे समाहित था, उनके द्वार पर यदि कोई भूखा व्यक्ति आ जाए तो वह उसको बिना कुछ खिलाए नहीं जाने देते थे। कुछ नहीं होता था तो जंगल से फल लाकर ही दे देते थे किन्तु कभी किसी को भूखा नहीं जाने दिया। यही स्तिथि ठाकुर जी के प्रति भी थी। उनको इस बात की सदैव चिंता सताती रहती थी कि कही ठाकुर जी किसी दिन भूखे ना रह जाएं। उनके पास कुछ होता तो था नहीं कही कोई कुछ दे जाता था तो भोजन बना लेते थे, अन्यथा वह अपने पास थोड़ा गुड अवश्य रखा करते थे। यदि भोजन बनाते थे तो पहले भोजन ठाकुर जी को अर्पित करते फिर स्वयं ग्रहण करते, किन्तु यदि कभी भोजन नहीं होता था तो गुड से ही काम चला लेते थे। थोड़ा गुड ठाकुर जी को अर्पित करते और फिर थोड़ा खुद खा कर पानी पी लेते थे। एक बार वर्षा ऋतु में कई दिन तक लगातार वर्षा होती रही, जंगल में हर और पानी ही पानी भर गया, जंगल से फल ला पान संभव नहीं रहा, उनके पास रखा गुड भी समाप्त होने वाला था। अब बाबा जी को बड़ी चिंता हुई, सोंचने लगे यदि वर्षा इसी प्रकार होती रही तो में जंगल से फल कैसे ला पाउँगा, ठाकुर जी को भोग कैसे लगाऊंगा, गुड भी समाप्त होने वाला है, ठाकुर जी तो भूखे ही रह जायेंगे, और यदि द्वार पर कोई भूखा व्यक्ति आ गया तो उसको क्या खिलाऊंगा। यह सोंचकर वह गहरी चिंता में डूब गए, उन्होंने एक निश्चय किया कि अब से में कुछ नहीं खाऊंगा, जो भी मेरे पास है वह ठाकुर जी और आने वालो के लिए रख लेता हूँ। ऐसा विचार करके उन्होंने कुछ भी खाना बंद कर दिया और मात्र जल पीकर ही गुजरा करने लगे, किन्तु ठाकुर जी को नियमित रूप से भोग देते रहे। बाबा जी की भक्ति देखकर ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न हुए, किन्तु उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। दो दिन बाद ठाकुर जी ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उनकी कुटिया में उस समय पहुंचे जब तेज वर्षा हो रही थी। वृद्ध ब्राह्मण को कुटिया पर आया देख साधु बाबा बहुत प्रसन्न हुए और उनको प्रेम पूर्वक कुटिया के अंदर ले गए। उनको प्रेम से बैठाया कुशल क्षेम पूँछी, तब वह ब्राहमण बड़ी ही दीन वाणी में बोला कि तीन दिन भूखा है, शरीर बहुत कमजोर हो गया है, यदि कुछ खाने का प्रबन्ध हो जाये तो बहुत कृपा होगी। तब साधु बाबा ने ठाकुर जी को मन ही मन धन्यवाद दिया कि उनकी प्रेरणा से ही वह कुछ गुड बचा पाने में सफल हुए। वह स्वयं भी तीन दिन से भूखे थे किन्तु उन्होंने यथा संभव गुड और जल उस ब्राह्मण को अर्पित करते हुए कहा कि श्रीमान जी इस समय तो इस कंगले के पास मात्र यही साधन उपलब्ध है, कृपया इसको ग्रहण करें। बाबा की निष्ठा देख ठाकुर जी अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु उन्होंने अभी और परीक्षा लेने की ठानी, वह बोले इसके मेरी भूख भला कैसे मिटेगी, यदि कुछ फल आदि का प्रबंध हो तो ठीक रहेगा। अब बाबा जी बहुत चिंतित हुए, उनके द्वार से कोई भूखा लोटे यह उनको स्वीकार नही था, वह स्वयं वृद्ध थे, तीन दिन से भूखे थे, शरीर भूख निढाल था, किन्तु सामने विकट समस्या थी। उन्होंने उन ब्राह्मण से कहा ठीक है श्रीमान जी आप थोड़ा विश्राम कीजिये में फलों का प्रबन्ध करता हूँ। बाबा जी ने ठाकुर जी को प्रणाम किया और चल पड़े भीषण वर्षा में जंगल की और फल लाने। जंगल में भरा पानी था, पानी में अनेको विषैले जीव इधर-उधर बहते जा रहे थे, किन्तु किसी भी बात की चिन्ता किये बिना साधु बाबा, कृष्णा कृष्णा का जाप करते चलते रहे, उनको तो मात्र एक ही चिंता थी की द्वार पर आए ब्राह्मण देव भूखे ना लोट जाएं। जंगल पहुंच कर उन्होंने फल एकत्र किये और वापस चल दिए। कुटिया पर पहुंचे तो देखा कि ब्राह्मण देव उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, बाबा जी ने वर्षा और भरे हुए पानी के कारण हुए विलम्ब के कारण उनसे क्षमा मांगी और फल उनको अर्पित किए। वह वृद्ध ब्राह्मण बोला बाबा जी आप भी तो ग्रहण कीजिये किन्तु वह बाबा जी बोले क्षमा करें श्रीमान जी, में अपने ठाकुर जी को अर्पित किए बिना कुछ भी ग्रहण नहीं करता, यह फल में आपके लिए लाया हूँ मेने इनका भोग ठाकुर जी को नही लगाया है। तब वह ब्राह्मण बोला ऐसा क्यों कह रह हैं आप ठाकुर जी को तो आपने अभी ही फल अर्पित किये हैं। बाबा बोले अरे ब्राह्मण देव क्यों परिहास कर रहे हैं, मेने कब अर्पित किये ठाकुर जी को फल। तब ब्राह्मण देव बोले अरे यदि मुझे पर विश्वाश नहीं तो जा कर देख लो अपने ठाकुर जी को, वह तो तुम्हारे द्वारा दिए फलों को प्रेम पूर्वक खा रहे हैं। ब्राह्मण देव की बात सुनकर बाबा जी ने जा कर देखा तो वह सभी फल ठाकुर जी के सम्मुख रखे थे जो उन्होंने ब्राह्मण देव को अर्पित किये थे। वह तुरंत बाहर आए और आकर ब्राह्मण देव के पेरो में पड़ गए और बोले कृपया बताएं आप को है। यह सुनकर श्री हरी वहां प्रत्यक्ष प्रकट हो गए, ठाकुर जी को देख वह वृद्ध बाबा अपनी सुध-बुध खो बैठे बस ठाकुर जी के चरणों से ऐसे लिपटे मानो प्रेम का झरना बह निकला हो, आँखों से अश्रुओं की धारा ऐसे बहे जा रही थी जैसे कुटिया में ही वर्षा होने लगी हो। ठाकुर जी ने उनको प्रेम पूर्वक उठाया और बोले तुम मेरे सच्चे भक्त हो, में तुम्हारी भक्ति तुम्हारी निष्ठा और प्रेम से अभिभूत हूँ, में तुम्हारी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करूँगा, कहो क्या चाहते हो। किन्तु साधु बाबा की तो मानो वाणी ही मारी गई हो, बस अश्रु ही बहे जा रहे थे, वाणी मौन थी, बहुत कठिनता से स्वयं को संयत करके बोले है नाथ जिसने आपको पा लिया हो उसको भला और क्या चाहिए। अब तो बस इन चरणों में आश्रय दे दीजिये, ऐसा कह कर वह पुनः ठाकुर जी के चरणों में गिर पड़े। तब ठाकुर जी बोले मेरा दर्शन व्यर्थ नहीं जाता, मांगो क्या चाहते हो, कहो तो तुमको मुक्ति प्रदान करता हूँ , यह सुनते ही बाबा विचलित हो उठे तब बाबा बोले है हरी, है नाथ, मुझको यूं ना छलिये , में मुक्ति नहीं चाहता, यदि आप देना ही चाहते है, तो जन्मों-जन्मों तक इन चरणों का आश्रय दी जिए, है नाथ बस यही वरदान दी जिए कि में बार-बार इस धरती पर जन्म लूँ और हर जन्म में आपके श्री चरणों के ध्यान में लगा रहूँ, हर जन्म में इसी प्रकार आपको प्राप्त करता रहूँ। तब श्री हरी बोले तथास्तु, भगवान् के ऐसा कहते ही साधु बाबा के प्राण श्री हरी में विलीन हो गए। हरे कृष्णा जय जय श्रीराधे 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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एक दिन एक बहू ने गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया !!! सफाई कर रही थी, मुंह में सुपारी थी..... पीक आया तो वेदी में थूक दिया पर उसे यह देखकरआश्चर्य हुआ कि उतना थूक तत्काल स्वर्ण में बदल गया है। अब तो वह प्रतिदिन जान बूझकर वेदी में थूकने लगी। और उसके पास धीरे धीरे स्वर्ण बढ़ने लगा। महिलाओं में बात तेजी से फैलती है। कई और महिलाएं भी अपने अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूक कर सोना उत्पादन करने लगी। धीरे धीरे पूरे गांव में यह सामान्य चलन हो गया, सिवाय एक महिला के... {{ 👉Bhakti Sagar Videos | NonStop | Devi Sakshi Nidhi https://youtu.be/YyzU_CA2wkk 👈}} उस महिला को भी अनेक दूसरी महिलाओं ने उकसाया..... समझाया..... “अरी..... तू क्यों नहीँ थूकती ?” “महिला बोली..... जी बात यह है कि मै अपने पति की अनुमति बिना यह कार्य हरगिज नहीँ करूंगी और जहाँ तक मुझे ज्ञात है वे इसकी अनुमति कभी भी नहीँ देंगे।” किन्तु ग्रामीण महिलाओं ने ऐसा वातावरण बनाया..... कि आखिर उसने एक रात डरते डरते अपने ‎पति‬ को पूछ ही लिया। “खबरदार जो ऐसा किया तो..... !! यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है ?” पति की गरजदार चेतावनी के आगे बेबस वह महिला चुप हो गई.... पर जैसा वातावरण था और जो चर्चाएं होती थी, उनसे वह साध्वी स्त्री बहुत व्यथित रहने लगी। खास कर उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियां अपने नए नए कण्ठ-हार दिखाती तो वह अन्तर्द्वन्द में घुलने लगी। पति की व्यस्तता और स्त्रियों के उलाहने उसे धर्मसंकट में डाल देते। वह सोचती थी कि - “यह शायद मेरा दुर्भाग्य है..... अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप..... कि एक सती स्त्री होते हुए भी मुझे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है।” “शायद यह मेरे पति का कोई गलत निर्णय है।” “ओह !!! इस धर्माचरण ने मुझे दिया ही क्या है ?” “जिस नियम के पालन से ‎दिल‬ कष्ट पाता रहे। उसका पालन क्यों करूं ?” {{👉 मेरा राम की कृपा से सब काम हो रहा है , करते हो मेरे राघव मेरा नाम हो रहा है https://youtu.be/DbCsO9--rio 👈}} ...और हुआ यह कि वह बीमार रहने लगी। ‎ पतिदेव‬ इस रोग को ताड़ गए। उन्होंने एक दिन ब्रह्म मुहूर्त में ही सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया। गाड़ी में सारा सामान डालकर वे रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे। किन्तु..... अरे !!! यह क्या..... ??? ज्यों ही वे गांव की कांकड़ (सीमा) से बाहर निकले। पीछे भयानक विस्फोट हुआ। पूरा गांव धू धू कर जल रहा था। सज्जन दम्पत्ति अवाक् रह गए और उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ आ गया। {{👉भूमी बड़ी ही पावनी अयोध्या धाम की, इसमे है झलक पाती प्रभू श्री राम की https://youtu.be/hmS6rvUqSmI 👈}} वास्तव में..... इतने दिन गांव बचा रहा, तो केवल इस कारण..... कि धर्म आचरण करने वाला उसका परिवार, गांव की परिधि में था। *धर्माचरण करते रहे.....* *कुछ पाने के लालच में इंसान बहुत कुछ खो बैठता है......इसलिए लालच से बचें.....* *न जाने किसके भाग्य से आपका जीवन सुखमय व सुरक्षित है* 👉{{ऐं हिन्द देश के लोगों मेरी सुन लो दर्द की कहानी https://youtu.be/ukykNJ0R_9E }}👈 *परहित धर्म का भी पालन करते रहिए* *क्योंकि.....व्यक्तिगत स्वार्थ पतन का कारण बनता है*

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