पौराणिक कथा

+14 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 5 शेयर

बाल दिवस विशेष (चार साहिबजादे) 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सूरा सो पहचानिये, जो लड़े दीन के हेत । पूर्जा पूर्जा कट मरे, कबहू न छोड़े खेत ।। हमारा देश कुर्बानियों और शहादत के लिए जाना जाता है और यहां तक के हमारे गुरूओं ने भी देश कौम के लिए अपनी जानें न्यौछावर की हैं…देश और कौम के लिए अपनी शहादत देने के लिए गुरूओं के लाल भी पीछे नहीं रहें…जी हां गुरूओं के बच्चों ने भी देश और कौम की खातिर अपनी जान की बाजी लगा दी…दशम पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी के छोटे साहिबजादों की शहीदी को कौन भुला सकता है …जिन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अजीम और महान शहादत दी..उनकी शहादत से तो मानो सरहंद की दीवारें भी कांप उठी थी… वो भी नन्हें बच्चों के साथ हो रहे कहर को सुन कर रो पड़ी । गुरू गोबिन्द सिंह को चारों साहिबजादों की शहीदी को कोई भूले से भी नहीं भुला सकता…आज भी जब कोई उस दर्दनाक घटना को याद करता है तो कांप उठता है…गुरू गोबिन्द सिंह के बड़े साहिबजादें बाबा अजीत सिंह और जुझार सिंह चमकौर की जंग मुगलों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे…उन्होंने ये शहीदी 22 दिसम्बर और 27 दिसम्बर 1704 को पाई… इस दौरान बडे़ साहिबजादों में बाबा अजीत सिंह की उम्र 17 साल थी जबकि बाबा जुझार सिंह की उम्र महज 13 साल की थी….मगर जो उम्र बच्चों के खेलने कूदने की होती है उस उम्र में छोटे साहिबजादों ने शहीदी प्राप्त की…छोटे साहिबजादों को सरहंद के सूबेदार वजीर खान ने जिंदा दीवारों में चिनवा दिया था… उस समय छोटे साहिबजादों में बाबा जोरावर सिंह की उम्र आठ साल थी …जबकि बाबा फतेह सिंह की उम्र केवल 5 साल की थी…इस महान शहादत के बारे में हिन्दी के कवि मैथिलीशरण गुप्त ने लिखा है … जिस कुल जाति देश के बच्चे दे सकते हैं जो बलिदान… उसका वर्तमान कुछ भी हो भविष्य है महा महान गुरूमत के अनुसार अध्यात्मिक आनन्द पाने के लिए मनुष्य को अपना सर्वस्व मिटाना पड़ता है…और उस परम पिता परमेश्वर की रजा में रहना पड़ता है…इस मार्ग पर गुरू का भगत , गुरू का प्यारा या सूरमा ही चल चल सकता है…इस मार्ग पर चलने के लिए श्री गुरू नानक देव जी ने सीस भेंट करने की शर्त रखी थी…एक सच्चा सिख गुरू को तन , मन और धन सौंप देता है और वो किसी भी तरह की आने वाली मुसीबत से नहीं घबराता…इसी लिए तो कहा भी गया है… तेरा तुझको सौंप के क्या लागै है मेरा भारत पर मुगलों ने कई सौ बरस तक राज किया…उन्होंने इस्लाम धर्म को पूरे भारत में फैलाने के लिए हिन्दुओं पर जुल्म भी किए… मुगल शासक औरगंजेब ने तो जुल्म की इंतहा कर दी और जुल्म की सारी हदें तोड़ डाली…हिन्दुओं को पगड़ी पहनने और घोड़ी पर चढ़ने की रोक लगाई गई… और एक खास तरह टैक्स भी हिन्दु जाति पर लगाया गया जिसे जजिया टैक्स कहा जाता था…हिन्दुओं में आपसी कलह के कारण जुल्मों का विरोध नहीं हो रहा था… इन्हीं जुल्मों के खिलाफ आवाज उठाई दशम पिता गुरू गोबिन्द सिंह जी ने…उन्होंने निर्बल हो चुके हिन्दुओं में नया उत्साह और जागृति पैदा करने का मन बना लिया…इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए गुरू गोबिन्द सिंह जी ने 1699 को बैसाखी वाले दिन आनन्दपुर साहिब में खालसा पंथ की स्थापना की…कई स्थानों पर सिखों और हिन्दुओं ने खालसा पंथ की स्थापना का विरोध किया… मुगल शासकों के साथ साथ कट्टर हिन्दुओं और उच्च जाति के लोगों ने भी खालसा पंथ की स्थापना का विरोध किया… कई स्थानों पर माहौल तनाव पूर्ण हो गया…सरहंद के सूबेदार वजीर खान और पहाड़ी राजे एकजुट हो गए और 1704 पर गुरू गोबिन्द सिंह जी पर आक्रमण कर दिया…सिखों ने बड़ी दलेरी से इनका मुकाबला किया और सात महीने तक आनन्दपुर के किले पर कब्जा नहीं होने दिया–आखिर हार कर मुगल शासकों ने कुरान की कसम खाकर और हिन्दु राजाओं ने गऊ माता की कसम खाकर गुरू जी से किला खाली कराने के लिए विनती की…20 दिसम्बर 1704 की रात को गुरू गोबिन्द जी ने किले को खाली कर दिया गया और गुरू जी सेना के साथ रोपड़ की और कूच कर गए…जब इस बात का पता मुगलों को लगा तो उन्होंने सारी कसमें तोड़ डाली और गुरू जी पर हमला कर दिया…लड़ते – लड़ते सिख सिरसा नदी पार कर गए और चमकौर की गढ़ी में गुरू जी और उनके दो बड़े साहिबजादों ने मोर्चा संभाला…ये जंग अपने आप में खास है क्योंकि 80 हजार मुगलों से केवल 40 सिखों ने मुकाबला किया था…जब सिखों का गोला बारूद खत्म हो गया तो गुरू गोबिन्द सिंह जी ने पांच पांच सिखों का जत्था बनाकर उन्हें मैदाने जंग में भेजा ..इस लड़ाई में गुरू जी से इजाजत लेकर बड़े साहिबजादें भी शामिल हो गए लड़ते लड़ते वो सिरसा नदी पार कर गए…बड़े साहिबजादें छोटी सी उम्र में मुगलों से मुकाबला करते हुए शहीद हो गए…अब सवाल ये उठता है कि छोटे साहिबजादों का आखिर क्या कसूर था कि सरहंद के सूबेदार ने नन्हें बच्चों की उम्र का भी लिहाज नहीं रखा…और उन्हें जिन्दा सरहंद की दीवारों में चिनवा दिया । मगर छोटे साहिबजादों ने इन जुल्मों की परवाह नहीं की… दूसरी ओर सिरसा नदी पार करते वक्त गुरू जी की माता गुजरी जी और छोटे साहिबजादे बिछुड़ गए…गुरू जी का रसोईया गंगू ब्राहम्ण उन्हें अपने साथ ले गया …रात को उसने माता जी की सोने की मोहरों वाली गठरी चोरी कर ली…सुबह जब माता जी ने गठरी के बारे में पूछा तो वो न सिर्फ आग बबूला ही हुआ…बल्कि उसने गांव के चौधरी को गुरू जी के बच्चों के बारे में बता दिया…और इस तरह ये बात सरहिन्द के नवाब तक पहुंच गई…सरहंद के नवाब ने उन्हें ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया….नवाब ने दो तीन दिन तक उन बच्चों को इस्लाम धर्म कबूल करने को कहा…जब वो नहीं माने तो उन्हें खूब डराया धमकाया गया ,मगर वो नहीं डोले और वो अडिग रहें …उन्हें कई लालच दिए गए…लेकिन वो न तो डरे , न ही किसी बात का लोभ और लालच ही किया…न ही धर्म को बदला… सुचानंद दीवान ने नवाब को ऐसा करने के लिए उकसाया और यहां तक कहां कि यह सांप के बच्चे हैं इनका कत्ल कर देना ही उचित है…आखिर में काजी को बुलाया गया…जिसने उन्हें जिंदा ही दीवार में चिनवा देने का फतवा दे दिया…उस समय मलेरकोटला के नवाब शेर मुहम्मद खां भी वहां उपस्थित थे…उसने इस बात का विरोध किया…फतवे के अनुसार जब 27 दिसम्बर 1704 में छोटे साहिबजादों को दीवारों में चिना जाने लगा तो…जब दीवार गुरू के लाडलों के घुटनों तक पहुंची तो घुटनों की चपनियों को तेसी से काट दिया गया ताकि दीवार टेढी न हो जाए…जुल्म की इंतहा तो तब हो गई…जब दीवार साहिबजादों के सिर तक पहुंची तो शाशल बेग और वाशल बेग जल्लादों ने शीश काट कर साहिबजादों को शहीद कर दिया…छोटे साहिबजादों की शहीदी की खबर सुनकर उनकी दादी स्वर्ग सिधार गई…इतने से भी इन जालिमों का दिल नहीं भरा और लाशों को खेतों में फेंक दिया गया…जब इस बात की खबर सरहंद के हिन्दू साहूकार टोडरमल को लगी तो उन्होंने संस्कार करने की सोची..उसको कहा गया कि जितनी जमीन संस्कार के लिए चाहिए…उतनी जगह पर सोने की मोहरें बिछानी पड़ेगी…कहते हैं कि टोडरमल जी ने उस जगह पर अपने घर के सब जेवर और सोने की मोहरें बिछा कर साहिबजादों और माता गुजरी का दाह संस्कार किया…संस्कार वाली जगह पर बहुत ही सुन्दर गुरूव्दारा ज्योति स्वरूप बना हुआ है जबकि शहादत वाली जगह पर बहुत बड़ा गुरूव्दारा है…यहां हर साल 25से 27 दिसम्बर तक शहीदी जोड़ मेला लगता है…जो तीन दिन तक चलता है…धर्म की रक्षा के लिए …नन्हें बालकों ने हंसते हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए मगर हार नहीं मानी…मुगल नवाब वजीर खान के हुक्म पर इन्हें फतेहगढ़ साहिब के भौरा साहिब में जिंदा चिनवा दिया गया …यही नहीं छोटे साहिबजादे बाबा फतेह सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम फतेहगढ़ साहिब रखा गया था…. जी हां धर्म ईमान की खातिर दशम पिता के इन राजकुमारों ने शहीदी पाई …लेकिन वो सरहंद के सूबेदार के आगे झुके नहीं …बल्कि उन्होंने खुशी खुशी शहीदी प्राप्त की…पंजाब के फतेहगढ़ साहिब में हर साल साहिबजादों की याद में तीन दिवसीय मेला लगता है… गुरूव्दारा श्री फतेहगढ़ साहिब में बना ठंडा बुर्ज का भी अहम महत्व है…यही पर माता गुजरी ने तकरीबन आठ वर्ष तक दोनों छोटे साहिबजादों को धर्म और कौम की रक्षा का पाठ पढ़ाया था..इसी ठंडे बुर्ज में पोष माह की सर्द रातों में माता गुजरी ने बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह को धर्म की रक्षा के लिए शीश न झुकाते हुए अपने धर्म पर कायम रहने की शिक्षा दी थी …गुरू गोबिन्द सिंह जी के चारो साहिबजादों की पढ़ाई और शस्त्र विद्या गुरू साहिब की निगरानी में हुई …उन्होंने घुड़सवारी , शस्त्र विद्या और तीर अंदाजी में अपने राजकुमारों को माहिर बना दिया….दशम पातशाह के चारों राजकुमारों को साहिबजादें इसलिए कहा जाता है …क्योंकि दो दो साहिबजादें इक्टठे शहीद हुए थे … इसलिए इनको बड़े साहिबजादें और छोटे साहिबाजादे कहकर याद किया जाता है…जोरावर सिंह जी की शहीदी के समय उम्र 9 साल जबकि बाबा फतेह सिंह की उम्र 7 साल की थी ….इनके नाम के साथ बाबा शब्द इसलिए लगाया क्योंकि उन्होंने इतनी छोटी उम्र में शहादत देकर मिसाल पेश की …उनकी इन बेमिसाल कुर्बानियों के कारण इन्हें बाबा पद से सम्मानित किया गया… आप सभी से निवेदन है बाल दिवस मनाना है तो कृपया हमारे सनातनी बालको जिन्होंने अपने देश के लिये अपने प्राण न्योछावर किये उनके लिये मनाये तो उन नन्हे बालको के लिये यही सच्ची श्रध्दांजलि होगी। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+39 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 17 शेयर
Neetu Shukla Nov 14, 2019

एक स्त्री को ईश्वर ने वह सभी गुण दिए हैं जिससे वह अगर चाहे तो पूरी दुनिया पर सिर्फ अपनी सुंदरता औऱ विवेक से राज कर सकती है। स्त्रियों को कमजोर समझने वाले यह नहीं समझ पाते कि अगर वह अपनी खूबसूरती का जादू चला दे तो वह खुद उसके आगे कमजोर हो जाएंगे। इस बात का प्रमाण मिलता है एक पौराणिक कथा से जिसमें विश्वामित्र की तपस्या अप्सरा मेनका ने भंग कर दी थी। आपको बताते हैं विश्वामित्र और मेनका की प्रेम कहानी। विश्वामित्र और मेनका की प्रेम कहानी विश्वामित्र एक ऋषि थे और वह वन में घोर तपस्या में लीन थे। उनकी तपस्या का उद्देश्य एक नए संसार का निर्माण करना था। उनकी तपस्या इतनी कठोर और इतनी दृढ़ थी कि वन में रह रहे भयावह जीवों का भी उन्हें ध्यान ना था। पानी बह रहा था, जानवर चल रहे थे, मानव अपने समाज में व्यस्त थे, लेकिन विश्वामित्र एक ही स्थान पर बैठे घोर तप में लीन थे। नारद मुनि को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने यह बात स्वर्गलोक देवता महारा इंद्र को बताई। नारद मुनि की बात सुनकर इंद चिंता में पड़ गए। विश्वामत्र के तप से उन्हें अपना सिंहासन हिलता हुए प्रतीत होने लगा। धरती पर भेजी मेनका इंद्र को अपनी गद्दी से बहुत मोह था। वह किसी भी कीमत पर अपनी गद्दी नहीं छोड़ना चाहते थे। विश्वामित्र की घोर तपस्या से उन्हें अपने सिंहासान खो जाने का भय सताने लगा। उन्होंने विश्वामित्र की तपस्या भंग करने की योना बनाई और इसके लिए उन्होंने इंद्र की सबसे खूबसूरत अप्सरा मेनका को बुलाया र धरती पर जाने का आदेश दिया। अप्सरा की खूबसूरती ऐसी थी की देवता भी उस पर मोहित हो जाते थे, फिर मनुष्य की क्या बात थी। उन्होंने अप्सरा को धरती पर जाने को कहा जिससे वह अपनी खूबसूरती से उनकी तपस्या भंग कर दे। कामदेव ने की मेनकी की मदद जब अप्सरा धरती पर विश्वामित्र के पास पहुंची तो वह तप में लीन थे। वह इतने वर्षों से तपस्या कर रहे थे कि उनका शरीर वज्र के समान कठोर हो गया था। जंगल के जानवर का भय उन्हें हिला नहीं पाया था तो किसी की खूबसूरती कैसे उन्हें विवश कर पाती। वह तप में लीन रहे और अप्सरा की खूबसूरती का का उनपर कोई असर नहीं पड़ां। वह काम या रति क वश में कर चुके थे। अप्सरा को कोई साधारण मनुष्य़ देख लेता तो उसकी खूबसूरती देखकर पागल हो जाता, लेकिन विश्वामित्र का इस पर कोई असर नहीं पड़ रहा था। मेनका की मदद के लिए कामदेव आगे आए और विश्वामित्र पर अपने तीर चलाए। उनका तीर विश्वामित्र पर चल गया। आखिरकार विश्वामित्र थे तो एक मनुष्य ही। मेनका के सौंदर्य में मंत्रमुग्ध हो गए। अप्सरा की तरफ उनका ऐसा आकर्षण हुआ कि वह अपनी तपस्या भूल गए। उनके दिल मे मेनका के लिए प्रेम आने लगा। टूट गई विश्वामित्र की तपस्या मेनका अपनी योजना में सफल हुईं, लेकिन विश्वामित्र को लुभाते लुभाते वह खुद उन पर मोहित हो चुकी थीं। वह विश्वामित्र की तरफ आकर्षित होने लगीं। मेनका ने सोचा कि अगर उसने अपना सच विश्वामित्र को बताया तो वह बहुत क्रोधित होंगे, लेकिन वह उन्हें छोड़कर भी नहीं जा सकती थी। ऐसा करने पर विश्वामित्र फिर से तपस्या पर बैठ सकते थे। मेनका ने विश्वामित्र से विवाह कर लिया। इंद्र हुए प्रकट मेनका के साथ विश्वामित्र गृहस्थ जीवन बिताने लगे। वह भूल गए कि किस उद्देश्य के साथ वह तप करने बैठे थे। वह पूरी तरह से मेनका पर मोहित हो चुके थे। कई वर्षों तक साथ रहने के बाद मेनका ने एक पुत्री को जन्म दिया। मेनका भी पूरी तरह भूल गई कि वह कोई साधारण स्त्री नहीं बल्कि स्वर्ग की अप्सरा है। वह अपनी पुत्री के साथ खेल रही थी कि इंद्र देव उसके सामने प्रकट हो गए। उन्होंने अप्सरा से कहा कि तुम्हारा काम खत्म हो चुका है और अब तुम स्वर्ग में जा सकती हो। विश्वामित्र को बताया सच मेनका यह सुनते ही बिखर गई। उसके मन में अपने पति और पुत्री के लिए बहुत प्रेम था। उन्हें छोड़कर जाना उसके लिए आसान नही थी। वह रोने लगी और इंद्र देव से विनती की की वह उसे छोड़ दें, लेकिन इंद्र ने उसे धमकी दी की वह अगर साथ नहीं चली तो उसे पत्थर का बना दिया जाएगा। अब मेनका कुछ नहीं कर सकती थी। मेनका ने विश्वामित्र को सच बताया। उसने कहा कि वह स्वर्गलोक की अप्सरा है और उसे धरती पर उनकी तपस्या भंग करने के लिए भेजा गया था। विश्वा मित्र यह सुनकर बहुत दुखी हुए। मेनका ने पुत्री को विश्वामित्र के पास सौंपा और इंद्र के साथ चली गई। विश्वामित्र ने उस बालिका को जंगल में एक ऋषि के आश्रम पर छोड़ दिया। यह वही बालिका थी जो आगे चलकर शंकुतला बनी और उसका विवाह दुष्यंत कुमार से हुआ।

+21 प्रतिक्रिया 4 कॉमेंट्स • 3 शेयर