पूजा-पाठ

नवार्ण मंत्र साधना एवं महत्व 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना-उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है | नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों-स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है। यह माता भगवती दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है | नवार्ण मंत्र- 🔸🔹🔸 || ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे || नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है | जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है | ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है । ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है । क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है । इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है | नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है| नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है| नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है। नवार्ण मंत्र साधना विधी 🔸🔸🔹🔹🔸🔸 विनियोग: 🔸🔹🔸 ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी,श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: ,क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll विलोम बीज न्यास:- 🔸🔸🔹🔸🔸 ॐ च्चै नम: गूदे । ॐ विं नम: मुखे । ॐ यै नम: वाम नासा पूटे । ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे । ॐ मुं नम: वाम कर्णे । ॐ चां नम: दक्ष कर्णे । ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे । ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे । ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥ (विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होता है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये) ब्रम्हारूप न्यास:- 🔸🔸🔹🔸🔸 ॐ ब्रम्हा सनातन: पादादी नाभि पर्यन्तं मां पातु ॥ ॐ जनार्दन: नाभेर्विशुद्धी पर्यन्तं नित्यं मां पातु ॥ ॐ रुद्र स्त्रीलोचन: विशुद्धेर्वम्हरंध्रातं मां पातु ॥ ॐ हं स: पादद्वयं मे पातु ॥ ॐ वैनतेय: कर इयं मे पातु ॥ ॐ वृषभश्चक्षुषी मे पातु ॥ ॐ गजानन: सर्वाड्गानी मे पातु ॥ ॐ सर्वानंन्द मयोहरी: परपरौ देहभागौ मे पातु ॥ ( ब्रम्हारूपन्यास से सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये ) ध्यान मंत्र:- 🔸🔹🔸 खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम । नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥ माला पूजन:- 🔸🔹🔸 जाप आरंभ करनेसे पूर्व ही इस मंत्र से माला का पुजा कीजिये,इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है. “ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’ ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी । चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥ ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे करे । जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥ ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा। अब आप येसे चैतन्य माला से नवार्ण मंत्र का जाप करे- नवार्ण मंत्र :- 🔸🔹🔸 ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll नवार्ण मंत्र की सिद्धि 9 दिनो मे 1,25,000 मंत्र जाप से होती है,परंतु आप येसे नहीं कर सकते है तो रोज 1,3,5,7,11,21….इत्यादि माला मंत्र जाप भी कर सकते है,इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है,सारइ दुख समाप्त होते है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है। हमे शास्त्र के हिसाब से यह सोलह प्रकार के न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी,कर ,हृदयादी ,अक्षर ,दिड्ग,सारस्वत,प्रथम मातृका ,द्वितीय मातृका,तृतीय मातृका ,षडदेवी ,ब्रम्हरूप,बीज मंत्र ,विलोम बीज ,षड,सप्तशती ,शक्ति जाग्रण न्यास और बाकी के 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से जाने जाते है,इन सारे न्यासो का अपना एक अलग ही महत्व होता है,उदाहरण के लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुष्म रूप से साधकोके सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती है और जब माँ चाहे कसी भी रूप मे क्यू न आये हमारी कल्याण तो निच्छित ही कर देती है। आप नवरात्री एवं अन्य दिनो मे इस मंत्र के जाप जो कर सकते है.मंत्र जाप रुद्राक्ष अथवा काली हकीक माला से ही किया करे। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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वरुथिनी एकादशी विशेष 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यह व्रत वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को किया जाता है। हिन्दू धर्म में इस पुण्य व्रत को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इस वर्ष 7 मई शुक्रवार के दिन वरूथिनी एकादशी व्रत किया जाएगा। वरुथिनी एकादशी व्रत मुहूर्त एवं विधि 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ एकादशी तिथि 06 मई दोपहर 02 बजकर 09 मिनट से 07 मई की शाम 03 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। जबकि द्वादशी तिथि 08 मई शाम 05 बजकर 33 मिनट पर समाप्त हो जाएगी।  एकादशी व्रत पारण 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ 08 मई को सुबह 05 बजकर 33 मिनट से सुबह 08 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। वरुथिनी एकादशी व्रत करने वाले व्यक्ति को व्रत से एक दिन पहले यानि दशमी के दिन कांस, उड़द, मसूर, चना, कोदो, शाक, मधु, किसी दूसरे का अन्न, दो बार भोजन तथा काम क्रिया, इन दस बातों का त्याग करना चाहिए। एकादशी के दिन भगवान का पूजन कर भजन कीर्तन करना चाहिए। द्वादशी के दिन पूजन कर ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए। अतः दक्षिणा देकर विदा करने बाद स्वयं भोजन ग्रहण करना चाहिए। एकादशी के व्रत में सोना, पान खाना, दांतुन, दूसरे की बुराई, चुगली, चोरी, हिंसा, काम क्रिया, क्रोध तथा झूठ का त्याग करना चाहिए। वरुथिनी एकादशी महात्म्य 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ पद्मपुराण में वरूथिनी एकादशी के विषय में तथ्य प्राप्त होते हैं जिसके अनुसार भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के पूछने पर की वैशाख माह के कृष्णपक्ष की एकादशी का फल एवं महात्मय क्या है तो उनके इस कथन पर भगवान उन्हें कहते हैं कि हे धर्मराज लोक और परलोक में सौभाग्य प्रदान करने वाली है वरूथिनी एकादशी के व्रत करने से साधक को लाभ की प्राप्ति होती है तथा उसके पापों का नाश संभव हो जाता है. यह एकादशी भक्त को समस्त प्रकार के भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली होती है. वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को कठिन तपस्या करने के समान फल की प्राप्ति होती है. इस व्रत के नियम अनुसार व्रत रखने वाले को दशमी तिथि के दिन से ही नियम धारण कर लेना चाहिए. संयम व शुद्ध आचरण का पालन करते हुए एकादशी के दिन प्रात:काल समस्त क्रियाओं से निवृत्त होकर भगवान विष्णु जी का पूजन करना चाहिए. विधि पूर्वक वरूथिनी एकादशी का व्रत करते हुए एकादशी की रात्रि में जागरण करना चाहिए तथा भजन किर्तन करते हुए श्री हरि की का मनन करते रहना चाहिए. वरूथिनी एकादशी कथा 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ इस एकादशी के विषय में एक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार मांधाता, इक्ष्वाकुवंशीय नरेश थे इनकी प्रशिद्धि दूर दूर तक थी। इनके विषय में कहा जाता है कि इन्हें सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ जैसा अभिन्न माना जाता था। यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक ही साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं। पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला। वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की तर्जनी उँगली को चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बढ़ा हुआ था। इंद्र द्वारा दुध पिलाने तथा पालन करने के कारण इनका नाम मांधाता पड़ा। यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी राजा बना। इन्होंने विष्णु जी से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी इसी वरूथिनी एकादश के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग को गए थे क्योंकि गर्व से चूर होकर और स्वयं को उच्च मानते हुए इनके द्वारा कई गलत कार्य भी हुए जिनके प्रभाव स्वरूप इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई अत: अपने पापों से मुक्ति पाने हेतु क्षमायाचना स्वरूप इन्होंने इस एकादशी व्रत का पालन किया जिसके प्रभाव से इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति संभव हो सकती इसी प्रकार राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार क्रोद्धवश श्राप दे दिया था जिसके कारण उन्हें बहुत सारे कष्टों की प्राप्ति हुई उनसे मुक्ति के मार्ग के लिए धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उन्हें श्राप से मुक्ति प्राप्त हुए और वह उत्तम लोक को प्राप्त हुए। भगवान जगदीश्वर जी की आरती 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ "ओम जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे !! जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, सुख-सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का !! मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी, तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी !! तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी !! तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता !! तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति !! दीनबंधु दुःखहर्ता, तुम रक्षक मेरे, करुणा हस्त बढ़ाओ, द्वार पडा तेरे !! विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, श्रद्धा विवेक बढाओ, संतन की सेवा !! ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीगणेश कवच : इसको सिद्ध करने से मृत्यु पर मिलेगी विजय 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ गणेश कवच। 〰️〰️〰️〰️ भगवान श्रीगणेश सभी जगहों पर अग्रपूजा के अधिकारी हैं. किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत श्रीगणेश की पूजा के साथ ही करने का विधान है. श्री गणेश की पूजा से धन धान्य और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है. इसी प्रकार शास्त्रों में श्रीगणेश कवज का उल्लेख आता है. गणेश कवच को सिद्ध कर लेने मात्र से मनुष्‍य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकता है. शनैश्‍चरदेप के विनयपूर्ण आग्रह के बा भगवान श्रीविष्‍णु ने उन्हें गणेश कवज की दीक्षा दी. भगवान श्रीविष्‍णु ने कहा - दस लाख जप करने के बाद गणेश कवच सिद्ध हो जाता है. कवच सिद्ध कर लेने पर मनुष्‍य मृत्यु पर भी विजय प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है. यह सिद्ध कवच धारण करने पर मनुष्‍य वाग्मी, चिरजीवी, सर्वत्र विजयी और पूज्य हो जाता है. इस मालामंत्र और कवच के प्रभाव से मनुष्‍य के सारे पातकोप पातक ध्‍वस्त हो जाते हैं. इस कवच के शब्द श्रवण मात्र से ही भूत-प्रेत, पिशाच, कूष्‍माण्‍ड, ब्रह्मराक्षस, डाकिनी, योगिनी, वेताल आदि बालग्रह, ग्रह तथा क्षेत्रपाल आदि दूर भाग जाते हैं. कवचधारी पुरुष को आधि (मानसिक रोग), व्याधि ( शारीरिक रोग), और भयप्रद शोक स्पर्श नहीं कर पाते. इस प्रकार सर्वविघ्‍नैकहरण गणेश कवच का महात्मय गान करके लक्ष्‍मीपति विष्‍णु सूर्यपुत्र शनैश्‍चर को कवच का उपदेश दिया इसको सिद्ध करने से मृत्यु पर मिलेगी विजय। गणेश कवच 〰️〰️〰️〰️ एषोति चपलो दैत्यान् बाल्येपि नाशयत्यहो । अग्रे किं कर्म कर्तेति न जाने मुनिसत्तम ॥ दैत्या नानाविधा दुष्टास्साधु देवद्रुमः खलाः । अतोस्य कंठे किंचित्त्यं रक्षां संबद्धुमर्हसि ॥ ध्यायेत् सिंहगतं विनायकममुं दिग्बाहु माद्ये युगे त्रेतायां तु मयूर वाहनममुं षड्बाहुकं सिद्धिदम् ।| द्वापरेतु गजाननं युगभुजं रक्तांगरागं विभुम् तुर्ये तु द्विभुजं सितांगरुचिरं सर्वार्थदं सर्वदा ॥ विनायक श्शिखांपातु परमात्मा परात्परः । अतिसुंदर कायस्तु मस्तकं सुमहोत्कटः ॥ ललाटं कश्यपः पातु भ्रूयुगं तु महोदरः । नयने बालचंद्रस्तु गजास्यस्त्योष्ठ पल्लवौ ॥ जिह्वां पातु गजक्रीडश्चुबुकं गिरिजासुतः । वाचं विनायकः पातु दंतान्‌ रक्षतु दुर्मुखः ॥ श्रवणौ पाशपाणिस्तु नासिकां चिंतितार्थदः । गणेशस्तु मुखं पातु कंठं पातु गणाधिपः ॥ स्कंधौ पातु गजस्कंधः स्तने विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरंबो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरश्शुभः । लिंगं गुह्यं सदा पातु वक्रतुंडो महाबलः ॥ गजक्रीडो जानु जंघो ऊरू मंगलकीर्तिमान् । एकदंतो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदावतु ॥ क्षिप्र प्रसादनो बाहु पाणी आशाप्रपूरकः । अंगुलीश्च नखान् पातु पद्महस्तो रिनाशनः ॥ सर्वांगानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदावतु । अनुक्तमपि यत् स्थानं धूमकेतुः सदावतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ता व्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्याविशनंदनः । दिवाव्यादेकदंत स्तु रात्रौ संध्यासु यःविघ्नहृत् ॥ राक्षसासुर बेताल ग्रह भूत पिशाचतः । पाशांकुशधरः पातु रजस्सत्त्वतमस्स्मृतीः ॥ ज्ञानं धर्मं च लक्ष्मी च लज्जां कीर्तिं तथा कुलम् । वपुर्धनं च धान्यं च गृहं दारास्सुतान्सखीन् ॥ सर्वायुध धरः पौत्रान् मयूरेशो वतात् सदा । कपिलो जानुकं पातु गजाश्वान् विकटोवतु ॥ भूर्जपत्रे लिखित्वेदं यः कंठे धारयेत् सुधीः । न भयं जायते तस्य यक्ष रक्षः पिशाचतः ॥ त्रिसंध्यं जपते यस्तु वज्रसार तनुर्भवेत् । यात्राकाले पठेद्यस्तु निर्विघ्नेन फलं लभेत् ॥ युद्धकाले पठेद्यस्तु विजयं चाप्नुयाद्ध्रुवम् । मारणोच्चाटनाकर्ष स्तंभ मोहन कर्मणि ॥ सप्तवारं जपेदेतद्दनानामेकविंशतिः । तत्तत्फलमवाप्नोति साधको नात्र संशयः ॥ एकविंशतिवारं च पठेत्तावद्दिनानि यः । कारागृहगतं सद्यो राज्ञावध्यं च मोचयोत् ॥ राजदर्शन वेलायां पठेदेतत् त्रिवारतः । स राजानं वशं नीत्वा प्रकृतीश्च सभां जयेत् ॥ इदं गणेशकवचं कश्यपेन सविरितम् । मुद्गलाय च ते नाथ मांडव्याय महर्षये ॥ मह्यं स प्राह कृपया कवचं सर्व सिद्धिदम् । न देयं भक्तिहीनाय देयं श्रद्धावते शुभम् ॥ अनेनास्य कृता रक्षा न बाधास्य भवेत् व्याचित् । राक्षसासुर बेताल दैत्य दानव संभवाः ॥ 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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पूजा करते समय कमर और गर्दन सीधी क्यो रखनी चाहिए ? गीले सिर पूजा क्यो नहीं करनी चाहिए ? 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ जब हम पूजा करते है तो कमर और गर्दन को सीदा रखने को कहा जाता है । ऐसा क्यो कहा जाता है ? इसका मुख्य कारण है कि जब हम पूजा करते है तो ध्यान अंतिरक्ष मे जाता है । और ध्यान को ऊपर ले जाने मे सुषुम्णा नाड़ी का बहुत बड़ा योगदान होता है । यह नाड़ी रीड की हड्डी मे से होकर ब्रह्मरंध्र चक्र से जुड़ी होती है । अगर कमर और गर्दन झुक जाएंगी तो नाड़ी भी झुक जाएगी । अगर नाड़ी झुक जाएगी तो ब्रह्मरंध्र की नाड़ियाँ धुलोक से संपर्क बनाने मे असमर्थ हो जाती है । क्योकि तरंगो की दिशा नीचे की ओर हो जाती है । और जो ध्यान की तरंगे ऊपर को जानी चाहिए । वो नीचे को जाना शुरू कर देती है । ध्यान हमेशा ऊपर को सोचने से ही लगता है । इसलिए हवन यज्ञ ध्यान और पूज पाठ मे हमेशा कमर और गर्दन को सीदा रखना चाहिए । अगर आप जल्दी वाजी मे गीले सिर पूजा करते हो तो बहुत हानिकारक होता है । तथा जमीन पर बिना कुचालक आसन के बैठ जाते हो तो भी बहुत हानिकारक होता है । जब आप पूजा करते हो तो उस समय आपके शरीर से विधुत तरंगे निकलती है । और आपका सिर गीला होता है तो वो विधुत तरंगे गीले सिर के वालो मे ही विलय कर जाती है । जिसके कारण ध्यान क्रिया तो वाधित होती ही है इसके साथ साथ सिर मे भयंकर बीमारियो का जन्म हो जाता है । इसी प्रकार जब आप खाली जमीन पर बैठते हो तरंगे मूलाधार चक्र से भी गुदा के द्वार से बाहर निकलती है तथा वो प्रथवि के चुम्बकीय क्षेत्र मे संपर्क बना लेती है । जिसके कारण वो तरंगे जमीन मे चली जाती है । जो शरीर की पॉज़िटिव ऊर्जा को खीच लेती है । जो ध्यान से उत्पन्न होती है । क्योकि पृथ्वी सुचालक का काम करती है । इसलिए पूजा करते समय कुचालक आसन का प्रयोग करना चाहिए । जिससे उत्पन्न तरंगे सीदे ऊपर की ओर जाये तथा ध्यान और पूजा मे सहायक बन जाए। 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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