दुर्गापूजा

नवरात्र - कुलदेवी - नवदुर्गा उपासना 🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺 तिथि नक्षत्र पंचांग मुजब अश्विन मासमें ब्रह्मांड की सर्व देवी शक्तियां पूर्ण जागृत स्वरूपमे पृथ्वीलोकमें विचरण करती है इसलिए नाव रात्रिमें अलग अलग शक्तिधाराओ को अलग अलग दुर्गा स्वरूप पूजा जाता है । ऐसे तो महालक्ष्मी , महासास्वती , महाकाली इन तीन प्रमुख महादेवीओ के सत,रजस,तम ऐसे तीन तीन स्वरूप नोउ स्वरूप है जो विविध नामो से भी पूजा जाता है । अम्बा , गायत्री , सरस्वती , लक्ष्मी , महाकाली , अन्नपूर्णा ... वो सब रूप ही नवदुर्गा के अवतार है । निराकार ब्रह्म शिव की शक्ति महामाया के ही ये सब स्वरूप है । हरेक वंश गोत्र की कुलदेवी ही महामाया स्वरूप है इसलिए देवी के किसी भी स्वरूप की पूजा कुलदेवी के स्वरूपमे ही करनी होती है । प्रत्येक युग में 9 देवियां अलग-अलग होती हैं. यह एक वृहद विषय है, जिसका उल्लेख यहां संभव नहीं है. शीघ्र सिद्धि के लिए नियत जप-पूजन इत्यादि आवश्यक है. इससे भी अधिक आवश्यक है श्रद्धा व विश्वास. कलियुग में प्रत्येक‍ दिन की देवियां अलग-अलग अधिष्ठात्री हैं, जिनकी साधना से कामना-पूर्ति अलग-अलग है, जो निम्न प्रकार से की जा सकती है. 1. माता शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता दुर्गा का प्रथम रूप है. इनकी आराधना से कई सिद्धियां प्राप्त होती हैं. प्रतिपदा को मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्ये नम:' की माला दुर्गा जी के चित्र के सामने यशाशक्ति जप कर घृत से हवन करें. 2. माता ब्रह्मचारिणी: माता दुर्गा का दूसरा स्वरूप पार्वतीजी का तप करते हुए हैं. इनकी साधना से सदाचार-संयम तथा सर्वत्र विजय प्राप्त होती है. चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन पर इनकी साधना की जाती है. द्वितिया को मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:', की माला दुर्गा जी के चित्र के सामने यशाशक्ति जप कर घृत से हवन करें. 3. माता चन्द्रघंटा: माता दुर्गा का यह तृतीय रूप है. समस्त कष्टों से मुक्ति हेतु इनकी साधना की जाती है. तृतीया को मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:' की 1 माला जप कर घृत से हवन करें. 4. माता कुष्मांडा: यह मां दुर्गा का चतुर्थ रूप है. चतुर्थी इनकी तिथि है. आयु वृद्धि, यश-बल को बढ़ाने के लिए इनकी साधना की जाती है. चतुर्थी को मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै नम:' की 1 माला जप कर घृत से हवन करें. 5. माता स्कंदमा‍ता: दुर्गा जी के पांचवे रूप की साधना पंचमी को की जाती है. सुख-शांति एवं मोक्ष को देने वाली हैं. पांचवें दिन मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमा‍तायै नम:' की 1 माला जप कर घृत से हवन करें. 6. मां कात्यायनी: मां दुर्गा के छठे रूप की साधना षष्ठी तिथि को की जाती है. रोग, शोक, संताप दूर कर अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को भी देती हैं. छठे दिन मंत्र- 'ॐ क्रीं कात्यायनी क्रीं नम:' की 1 माला जप कर घृत से हवन करें. 7. माता कालरात्रि: सप्तमी को पूजित मां दुर्गा जी का सातवां रूप है. वे दूसरों के द्वारा किए गए प्रयोगों को नष्ट करती हैं. सातवें दिन मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:' की 1 माला जप कर घृत से हवन करें. 8. माता महागौरी: मां दुर्गा के आठवें रूप की पूजा अष्टमी को की जाती है. समस्त कष्टों को दूर कर असंभव कार्य सिद्ध करती हैं. आठवें दिन मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:' की 1 माला जप कर घृत या खीर से हवन करें. 9. माता सिद्धिदात्री: मां दुर्गा के इस रूप की अर्चना नवमी को की जाती है. अगम्य को सुगम बनाना इनका कार्य है. नौवें दिन मंत्र- 'ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नम:' की 1 माला जप कर जौ, तिल और घृत से हवन करें. माता के किसी भी चि‍त्र या कुलदेवी के चित्र या मूर्ति स्थापना कर यथाशक्ति पूजन कर, नियत तिथि को मंत्र जपें तथा गौघृत द्वारा यथाशक्ति हवन करें. तंत्र का नियम आदि किसी विद्वान व्यक्ति द्वारा समझकर करें. विधिवत पूजन :- 1- सबसे पहले दोनों हाथ जोड़कर पूरी श्रद्धा से माँ दुर्गा का ध्यान करें- सर्व मंगल मागंल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्येत्रयम्बिके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥ 2- दाहिने हाथ में फूल-चावल लेकर माता का आवाहन करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दुर्गादेवीमावाहयामि॥ 3- थोड़ें ले चावल की ढेरी लगाकर उस पर माता को आसन प्रदान करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आसानार्थे पुष्पाणि समर्पयामि॥ 4- माँ दुर्गा को जल का अर्घ्य देवें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हस्तयो: अर्घ्यं समर्पयामि॥ 5- माँ दुर्गा को जल का आचमन करावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आचमनं समर्पयामि॥ आश्विन शारदीय नवरात्र : माँ दुर्गा की संपूर्ण शास्त्रोंक्त पूजा विधि 6- माँ दुर्गा को शुद्ध जल से स्नान करावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। स्नानार्थं जलं समर्पयामि॥ 7- माँ दुर्गा को जल को स्नान के बाद जल का आचमन करावें- स्नानान्ते पुनराचमनीयं जलं समर्पयामि। 8- माँ दुर्गा को पंचामृत से स्नान करावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पंचामृतस्नानं समर्पयामि॥ 9- माँ दुर्गा को गन्धोदक-स्नान करावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। गन्धोदकस्नानं समर्पयामि॥ 10- माँ दुर्गा को शुद्ध जल से शुद्धोदक स्नान करावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि॥ आश्विन शारदीय नवरात्र : माँ दुर्गा की संपूर्ण शास्त्रोंक्त पूजा विधि 11- माँ दुर्गा को पुनः जल का आचमन करावें- शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। 12- माँ दुर्गा को नवीन वस्त्र या लाल कलावा भेंट करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। वस्त्रं समर्पयामि॥ वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। 13- माँ दुर्गा को सौभाग्य सू़त्र अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सौभाग्य सूत्रं समर्पयामि॥ 14- माँ दुर्गा को सुगंधित चन्दन अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। चन्दनं समर्पयामि॥ 15- माँ दुर्गा को हरिद्रा चूर्ण, हल्दी अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। हरिद्रां समर्पयामि॥॥ 16- माँ दुर्गा को कुंकुम अर्पित- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कुंकुम समर्पयामि॥ 17- माँ दुर्गा को सिन्दूर अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सिन्दूरं समर्पयामि॥ 18- माँ दुर्गा को काजल अर्पित करें- 19- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। कज्जलं समर्पयामि॥ 20- माँ दुर्गा को आभूषण आदि भेंट करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आभूषणानि समर्पयामि 21- माँ दुर्गा को सुगंधित ताजी पुष्पमाला अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। पुष्पमाला समर्पयामि॥ 22- माँ दुर्गा को सुगंधित चंदन की धूप अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। धूपमाघ्रापयामि॥ 23- माँ दुर्गा को गाय के घी का दीपक अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दीपं दर्शयामि॥ 24- माँ दुर्गा को नैवेद्य के रूप में शुद्ध मावें का प्रसाद भोग लगावें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। नैवेद्यं निवेदयामि॥नैवेद्यान्ते त्रिबारं आचमनीय जलं समर्पयामि। 25- माँ दुर्गा को ऋतुफल फल अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। फलानि समर्पयामि॥ 26- माँ दुर्गा को ताम्बूल (पान, सुपारी, लौंग, इलाइची) अर्पित करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ताम्बूलं समर्पयामि॥ 27- माँ दुर्गा को अपनी ईमानदारी की कमाई का एक अंश दक्षिणा के रूप में अर्पित करें। श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। दक्षिणां समर्पयामि॥ 28- माँ दुर्गा की उपरोक्त पूजा पदार्थों में कोई कमी रही हो तो उसकी पूर्ति के रूप में सफेद चावल अर्पित करें श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। सर्वेशाम अक्षतान समर्पयामि।। 29- माँ दुर्गा को दंडवत लेटकर या सिर झुकाकर नमस्कार करें श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। ततो श्रद्धापूर्वकं नमस्कारं करोमि।। 30- उपरोक्त विधि से संपूर्ण पूजा संपन्न होने के बाद आरती में पंच दीपक रखकर माँ दुर्गा की भावपूर्ण आरती करें- श्रीजगदम्बायै दुर्गादेव्यै नम:। आरार्तिकं समर्पयामि॥ नवदुर्गा के विविध स्वरूप को तिथि मुजब अलग बीज मंत्र से भी जप किया जा सकता है . देवी : बीज मंत्र 1. शैलपुत्री : ह्रीं शिवायै नम:। 2. ब्रह्मचारिणी : ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:। 3. चन्द्रघण्टा : ऐं श्रीं शक्तयै नम:। 4. कूष्मांडा : ऐं ह्री देव्यै नम:। 5. स्कंदमाता : ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:। 6. कात्यायनी : क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:। 7. कालरात्रि : क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:। 8. महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:। 9. सिद्धिदात्री : ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:। माँ दुर्गा के विविध स्वरूपो को तिथि मुजब का नैवेद्य भोग :- 1 पहले दिन देवी शैलपुत्री के स्वरूप की पूजा की जाती है. इस दिन माता को गाय के दूध से बने पकवानों का भोग लगाया जाता है. पिपरमिंट युक्त मीठे मसाला पान, अनार और गुड़ से बने पकवान भी देवी को अर्पण किए जाते हैं. 2 दूसरे दिन मां दुर्गा की ब्रह्मचारिणी के रूप में पूजा होती है. मातारानी को को चीनी, मिश्री और पंचामृत का भोग लगाया जाता है. देवी को इस दिन पान-सुपाड़ी भी चढ़ाएं. 3 तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी चीजें अर्पित करनी चाहिए. गुड़ और लाल सेब भी मैय्या को बहुत पसंद है. ऐसा करने से सभी बुरी शक्तियां दूर भाग जाती हैं. 4 चौथे स्वरूप यानि इस दिन देवी कुष्मांडा की पूजा होती है. इनकी उपासना करने से जटिल से जटिल रोगों से मुक्ति मिलती है और सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. इस दिन माता को मालपुए का भोग लगाएं. 5 पांचवे स्वरूप स्कंदमाता की की गई पूजा से भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति होती है. नवरात्र के पांचवे दिन देवी को लगाएं केले का भोग या फिर इसे प्रसाद के रूप में दान करें. इस दिन बुद्धि में वृद्धि के लिए माता को मंत्रों के साथ छह इलायची भी चढ़ाएं. 6 छठे स्वरूप देवी कात्यायनी की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है. शहद का भोग लगाकर मां कात्यायनी को प्रसन्न किया जाता है. 7 सांतवें स्वरूप माँ कालरात्रि की पूजा. भूत-प्रेतों से मुक्ति दिलवाने वाली देवी कालरात्रि की उपासना करने से सभी दुख दूर होते हैं. माता को लगाएं गुड़ के नैवेद्य का भोग. 8 आंठवें दिन महागौरी के स्वरूप का वंदन किया जाता है. इस दिन नारियल का भोग लगाने से घर में सुख-समृद्धि आती है. महागौरी की पूजा करने के बाद पूरी, हलवा और चना कन्याओं को खिलाना शुभ माना जाता है. इनकी पूजा से संतान संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिलता है. 9 नोम के दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है. मां सिद्धिदात्री को जगत को संचालित करने वाली देवी कहा जाता है. इस दिन माता को हलवा, पूरी, चना, खीर, पुए आदि का भोग लगाएं. नवरात्र के पर्व पर हरदिन सिर्फ कुलदेवी की पूजा मंत्र करे वो भी नवदुर्गा उपासना है . विविध मंत्र की जगह एक ही नवार्ण मंत्र जाप भी कर सकते है । शक्ति उपासना फलादेश क्या लिखूं ? बस इतना लिख सकते है कि हजारो जन्मों के संचित कर्म बंधनो को काटकर कुदरत के नियम से विपरीत भी वो फल दे सकती है । कितना भी बड़ा अपराध हो उनको क्षमा करके वो दया करती है इसलिए माँ का स्वरूप सर्वश्रेष्ठ है । उनकी भक्ति सदैव सुखदायी है l.

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Radha Bansal Sep 27, 2020

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sandhya pandey Sep 27, 2020

दुर्गा माँ आरती जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी । तुमको निशि दिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी ।। मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को । उज्ज्वल से दोउ नैना, चन्द्रवदन नीको ।। कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै । रक्तपुष्प गल माला, कंठन पार साजै ।।  केहरि वाहन राजत, खडूग खप्पर धारी । सुर - नर मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी ।। कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती । कोटिक चन्द्र दिवाकर, राजत सम ज्योति ।। शुम्भ निशुम्भ विदारे, महिषासुर घाती । धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मतमाती ।। चण्ड - मुण्ड संहारे, शौणित बीज हरे । मधु - कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे ।। ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी । आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी ।। चौंसठ योगिनी गावत, नृत्य करत भैरु । बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू ।। तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता । भक्तन की दुःख हरता, सुख सम्पत्ति करता ।। भुजा चार अति शोभित, वरमुद्रा धारी । मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी ।। कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती । श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योति ।। अम्बे जी की आरती, जो कोई नर गावे । कहत शिवानन्द स्वामी, सुख - सम्पत्ति पावे ।। ।। वंदना ।। या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।

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"!!शारदीय नवरात्रि घट स्थापना मुहूर्त एवं तिथि निर्णय!!" 🌾🍁🏯👏👏👏👏👏🏯🍁🌾 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩 इस बार अधिकमास लगने के कारण शारदीय नवरात्र एक महीने आगे खिसक गए हैं। इस साल शारदीय नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरू होंगे। हर साल जहां पितृपक्ष की अमावस्या के बाद से नवरात्रि शुरू होते हैं, वहीं इस बार अमावस्या और नवरात्रि के बीच एक महीने का समय लग गया। अधिकमास लगने के कारण ऐसा किया गया। इस नवरात्रि कई अच्छे संयोग बन रहे हैं। इस नवरात्रि ग्रहों की स्थिति ऐसी है कि नवरात्रि पर विशेष संयोग बन रहे हैं। इस साल नवरात्रि पर राजयोग, द्विपुष्कर योग, सिद्धियोग, सर्वार्थसिद्धि योग, सिद्धियोग और अमृत योग जैसे संयोगों का निर्माण हो रहा है। नवरात्रि शनिवार से प्रारंभ हो रहे हैं। इस नवरात्रि दो शनिवार भी पड़ रहे हैं। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा का पाठ करना बहुत ही उत्तम रहता है। इस बार नवरात्रि पर मां दुर्गा घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं। ऐसा कहा जाता है कि माता के वाहन के रूप से भविष्य के कई संकेत मिलते हैं। इस बार मां घोड़े पर सवार होकर आ रही हैं, जिसे अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है। इस बार चातुर्मास जो हमेशा चार महीने का होता है, इस बार पांच महीने का होगा। ज्योतिष की मानें तो 165 साल बाद लीप ईयर और अधिकमास दोनों ही एक साल में हो रहे हैं। चतुर्मास लगने से विवाह, मुंडन, कर्ण छेदन जैसे मांगलिक कार्य नहीं होंगे। इस काल में पूजन पाठ व्रत उपवास और साधना का विशेष महत्व होता है। इस दौरान देव सो जाते हैं। देवउठनी एकादशी के बाद ही देव जागते हैं। (आश्विन अधिक मास 19 साल के अंतराल से पड़ता है ) आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा शनिवार दिनांक 17-10-2020 को प्रातः 8 बजकर 12 मिनिट से उसी दिन प्रातः 9 बजकर 37 मिनिट तक शुभ --- दिवा 12 बजकर 00 मिनिट से 12 बजकर 46 मिनिट तक लाभ-अमृत, दिवा 12 बजकर 30 मिनिट से 1 बजकर 14 मिनिट तक अभिजित वेला में पूजन व घट स्थापना शुभ रहे !! #दुर्गा_अष्टमी_निर्णय :-:-:- अथ महाष्टमी घटी का मात्रा प्यौदयिकी नवमीयुता ग्राह्या !! सप्तमी स्वल्पयुता सर्वथा त्याज्या !! यदा तु पूर्वत्र सप्तमीयुता परस्त्रोदये नास्ति घटिका न्यूना वर्तते तदा पूर्वा सप्तमी विद्धापि ग्राह्या ! इयं भौम वारेति प्रशस्ता !! ( #धर्मसिन्धु) महाष्टमी जो उदयकाल में घटी मात्र हो वह भी नवमी से युक्त ग्रहण करनी चाहिए परन्तु जिसमे सप्तमी का अल्प भी योग हो तो वह महाष्टमी सर्वथा त्याग देनी है और जो अष्टमी में पहले दिन सप्तमी का योग हो तथा अगले दिन अर्थात उदयकालीन अष्टमी के दिन अष्टमी का मान एक घटी से न्यून हो तो सप्तमी विद्धा भी पहले दिन अर्थात सप्तमी वाले ही दिन महाष्टमी करनी होगी ! अष्टमी का क्षय हो तो भी सप्तमी विद्धा होने पर भी महाष्टमी सप्तमी के दिन ही होगी ! संवत्सर 2077 शाक 1942 द्वितीय आश्विन शुक्ल पक्ष की महाष्टमी (सप्तमी शुक्रवार तथा महाष्टमी शनिवार) को मनाई जावेगी ! तदनुसार दुर्गाष्टमी दिनांक 23-10-2020 को इंदौर,उज्जैन,कोटा,दिल्ली,मथुरा,हरिद्वार इन नगरों से पश्चिमी नगरों तथा पश्चिमी भारत मे मनाई जावेगी ! क्यो की यहां पर अगले दिन अर्थात दिनांक 24-10-2020 को अष्टमी का मान एक घटी से कम रहेगा तथा इन नगरों के पूर्व में एवं पूर्वी भारत मे दिनांक 24-10-2020 को अष्टमी मनाई जाएगी ! क्यो की यहा पूर्वी भारत मे दिनांक 24-10-2020 को अष्टमी का मान एक घटी या उससे अधिक रहेगा ! 17-10-2020 - प्रतिपदा 18-10-2020 - द्वितीय 19-10-2020 - तृतीय 20-10-2020 - चतुर्थी 21-10-2020 - पंचमी 22-10-2020- षष्ठी 23-10-2020 सप्तमी (प्रातः6:56 तक) ततपश्चात अष्टमी 24-10-2020- नवमी 25-10-2020 - दशहरा (दशमी) 27-10-2020 - एकादशी 30-10-2020 को पूर्णिमा व कोजागरी व्रत 31-10-2020 से कार्तिक स्नान प्रारम्भ 🚩✊जय हिंदुत्व✊🚩☀!! श्री हरि: शरणम् !! ☀ 🍃🎋🍃🎋🕉️🎋🍃🎋🍃 🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾🙏🏾

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