ज्ञानेश्वरजी

जो मज अनन्य शरण। त्याचे निवारी मी जन्म मरण। या लागी शरणगता शरण्य मि चि एकू।।८८ ही नवव्या अध्यायातील ओवी आहे. ज्ञानेश्वरीचा नववा अध्याय म्हणजे भक्ती योग आहे. भक्तीचा महिमा सांगणारा हा अध्याय आहे. जो मला एक एकनिष्ठेने शरण येतो. त्याला जन्म मरणापासून मी मुक्त करतो म्हणून शरणगताचे रक्षण करणारा एकटा मीच आहे. ज्ञानेश्वरीमध्ये ज्ञानेश्वरांनी नवव्या अध्यायामध्ये भक्तीयोग मांडला आहे. या ओवीमध्ये चार भाग पडतात. ते असे- १) शरण जाणारा कोण?  २) शरण कोणाला जायचे?  ३) शरण कशा प्रकारे जायचे? ४) शरण गेल्यानंतर फायदा काय होतो? पहिल्या भागात शरण जाणारा कोण? यावर संत ज्ञानेश्वर महाराजांनी साधकाला उत्तर देताना सांगितले की, शरण जाणारा जीव आहे. जीव हा बध्द अवस्थेत असतो. त्याला जन्म-मरणाचे बंधन असते म्हणून शरण जाणारा जीव होय. दुसºया भागात शरण कोणाला जायचे? तुकाराम महाराज कलयुगामध्ये ३३ कोटी देव आहेत. त्यापैकी कोणत्या देवाला शरण जायचे? याबाबत ज्ञानेवर महाराज सांगतात..अशा देवाला शरण जायचे त्याचे पाय सम आहेत. ज्याची दृष्टी विटेवर आहे. ज्याचे हात कमरेवर आहेत. अशा विठ्ठलाला शरण जायचे.  शरण कशा प्रकारे जायचे?-एके ठिकाणी चोखामेळा म्हणतात, ऊस ढोगा परी रस नव्हे ढोगा।। काय भुललाशी वरिल्या रंगा।। नदी ढोगी परिजल नव्हे ढोगे।। चोखा ढोगा परि भाव नव्हे ढोगा।।  जय श्री संत ज्ञानेश्वर महाराज नमस्कार शुभ प्रभात वंदन 🌅 👣 👏 🌹 शुभ सोमवार ॐ नमोजी आद्या 🌹👏🚩

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TR. Madhavan Oct 9, 2020

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Krishna Singh Feb 7, 2020

प्राचीन काल में ऋषि मुनि तपस्या करते हुए हजारों साल कैसे मैं इसी कलयुग की एक छोटी सी कहानी सुनाता हूँ महान संत ज्ञानेश्वर महराज की, जिन्होंने योग के बल पर सैकड़ो साल जीने वाले चांगदेव का अभिमान भंग किया था। चांगदेव महाराज सिद्धि के बलपर १४०० वर्ष जीए थे ।उन्होंने मृत्यु को ४२ बार लौटा दिया था । उन्हें प्रतिष्ठा का बडा मोह था । उन्हों ने सन्त ज्ञानेश्वर की कीर्ति सुनी; उन्हें सर्वत्र सम्मान मिल रहा था । चांगदेव से यह सब सहा न गया, वे ज्ञानेश्वर से जलने लगे । चांगदेव को लगा, ज्ञानेश्वरजी को पत्र लिखूं । परन्तु उन्हें समझ नहीं रहा था कि पत्र का आरम्भ कैंसे करें । क्योंकि, उस समय ज्ञानेश्वर की आयु केवल सोलह वर्ष थी । अतः, उन्हें पूज्य कैंसे लिखा जाए ? चिरंजीव कैंसे लिखा जाए; क्योंकि वे महात्मा हैं । क्या लिखेंं, उन्हें कुछ समझ नहीं रहा था । इसलिए, कोरा ही पत्र भेज दिया । सन्तों की भाषा सन्त ही जानते हैं । मुक्ताबाई ने पत्र का उत्तर दिया – आपकी अवस्था १४०० वर्ष है । फिर भी, आप इस पत्र की भांति कोरे हैं ! यह पत्र पढकर चांगदेव को लगा कि ऐसे ज्ञानी पुरुष से मिलना चाहिए । चांगदेव को सिद्धि का गर्व था । इसलिए, वे बाघपर बैठकर और उस बाघ को सर्प की लगाम लगाकर ज्ञानेश्वरजी से मिलने के लिए निकले । जब ज्ञानेश्वरजी को ज्ञात हुआ कि चांगदेव मिलने आ रहे हैं, तब उन्हें लगा कि आगे बढकर उनका स्वागत-सत्कार करना चाहिए । उस समय सन्त ज्ञानेश्वर जिस भीत पर (चबूतरा) बैठे थे, उस भीत को उन्होंने चलने का आदेश दिया । भीत चलने लगी । जब चांगदेव ने भीत को चलते देखा, तो उन्हें विश्वास हो गया कि ज्ञानेश्वर मुझसे श्रेष्ठ हैं । क्योंकि, उनका निर्जीव वस्तुओंपर भी अधिकार है । मेरा तो केवल प्राणियोंपर अधिकार है । उसी पल चांगदेव ज्ञानेश्वरजी के शिष्य बन गए । कहने का आशय यह है कि मनुष्य योग और तप के बल से उम्र बढ़ाने की सिद्धि प्राप्त कर सकता

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