ज्ञानवान

Charu Malhotra Mar 5, 2021

भगवान विष्णु ने लोक कल्याण के लिए किए पांच छल! 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔹🔸 हिन्दू धर्म में कहते हैं कि ब्रह्माजी जन्म देने वाले, विष्णु पालने वाले और शिव वापस ले जाने वाले देवता हैं। भगवान विष्णु तो जगत के पालनहार हैं। वे सभी के दुख दूर कर उनको श्रेष्ठ जीवन का वरदान देते हैं। जीवन में किसी भी तरह का संकट हो या धरती पर किसी भी तरह का संकट खड़ा हो गया हो, तो विष्णु ही उसका समाधान खोजकर उसे हल करते हैं। भगवान विष्णु ने ही नृसिंह अवतार लेकर एक और जहां अपने भक्त प्रहलाद को बचाया था वहीं क्रूर हिरण्यकश्यपु से प्रजा को मुक्ति दिलाई थी। उसी तरह वराह अवतार लेकर उन्होंने महाभयंकर हिरण्याक्ष का वध करके देव, मानव और अन्य सभी को भयमुक्त किया था। उन्होंने ही महाबलि और मायावी राजा बलि से देवताओं की रक्षा की थी। इसी तरह श्रीहरि विष्‍णु ने कुछ ऐसे कार्य किए थे जिनको जनकल्याण के लिए किया गया छल कहा गया। यदि वे ऐसा नहीं करते तो कई देवी और देवताओं की जान संकट में होती। श्रीहरि विष्णु द्वारा जनहित में किए गए 5 छल… 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸 भस्मासुर के साथ छल👉 भस्मासुर का नाम सुनकर सभी को उसकी कथा याद हो आई होगी। भस्मासुर के कारण भगवान ‍शंकर की जान संकट में आ गई थी। हालांकि भस्मासुर का नाम कुछ और था लेकिन भस्म करने का वरदान प्राप्त करने के कारण उसका नाम भस्मासुर पड़ गया। भस्मासुर एक महापापी असुर था। उसने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए भगवान शंकर की घोर तपस्या की और उनसे अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन भगवान शंकर ने कहा कि तुम कुछ और मांग लो तब भस्मासुर ने वरदान मांगा कि मैं जिसके भी सिर पर हाथ रखूं वह भस्म हो जाए। भगवान शंकर ने कहा- तथास्तु। भस्मासुर ने इस वरदान के मिलते ही कहा, भगवन् क्यों न इस वरदान की शक्ति को परख लिया जाए। तब वह स्वयं शिवजी के सिर पर हाथ रखने के लिए दौड़ा। शिवजी भी वहां से भागे और विष्णुजी की शरण में छुप गए। तब विष्णुजी ने एक सुन्दर स्त्री का रूप धारण कर भस्मासुर को आकर्षित किया। भस्मासुर शिव को भूलकर उस सुंदर स्त्री के मोहपाश में बंध गया। मोहिनी स्त्रीरूपी विष्णु ने भस्मासुर को खुद के साथ नृत्य करने के लिए प्रेरित किया। भस्मासुर तुरंत ही मान गया। नृत्य करते समय भस्मासुर मोहिनी की ही तरह नृत्य करने लगा और उचित मौका देखकर विष्णुजी ने अपने सिर पर हाथ रखा। शक्ति और काम के नशे में चूर भस्मासुर ने जिसकी नकल की और भस्मासुर अपने ही प्राप्त वरदान से भस्म हो गया। यहां छुपे थे शिव : भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शंकर वहां से भाग गए। उनके पीछे भस्मासुर भी भागने लगा। भागते-भागते शिवजी एक पहाड़ी के पास रुके और फिर उन्होंने इस पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। बाद में विष्णुजी ने आकर उनकी जान बचाई। माना जाता है कि वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकुटा की पहाड़ियों पर है। इन खूबसूरत पहाड़ियों को देखने से ही मन शांत हो जाता है। इस गुफा में हर दिन सैकड़ों की तादाद में शिवभक्त शिव की आराधना करते हैं। वृंदा के साथ छल👉 श्रीमद्मदेवी भागवत पुराण अनुसार जलंधर असुर शिव का अंश था, लेकिन उसे इसका पता नहीं था। जलंधर बहुत ही शक्तिशाली असुर था। इंद्र को पराजित कर जलंधर तीनों लोकों का स्वामी बन बैठा था। यमराज भी उससे डरते थे। श्रीमद्मदेवी भागवत पुराण अनुसार एक बार भगवान शिव ने अपना तेज समुद्र में फेंक दिया तथा इससे जलंधर उत्पन्न हुआ। माना जाता है कि जलंधर में अपार शक्ति थी और उसकी शक्ति का कारण थी उसकी पत्नी वृंदा। वृंदा के पतिव्रत धर्म के कारण सभी देवी-देवता मिलकर भी जलंधर को पराजित नहीं कर पा रहे थे। जलंधर को इससे अपने शक्तिशाली होने का अभिमान हो गया और वह वृंदा के पतिव्रत धर्म की अवहेलना करके देवताओं के विरुद्ध कार्य कर उनकी स्त्रियों को सताने लगा। जलंधर को मालूम था कि ब्रहांड में सबसे शक्तिशाली कोई है तो वे हैं देवों के देव महादेव। जलंधर ने खुद को सर्वशक्तिमान रूप में स्थापित करने के लिए क्रमश: पहले इंद्र को परास्त किया और त्रिलोकाधिपति बन गया। इसके बाद उसने विष्णु लोक पर आक्रमण किया। जलंधर ने विष्णु को परास्त कर देवी लक्ष्मी को विष्णु से छीन लेने की योजना बनाई। इसके चलते उसने बैकुण्ठ पर आक्रमण कर दिया, लेकिन देवी लक्ष्मी ने जलंधर से कहा कि हम दोनों ही जल से उत्पन्न हुए हैं इसलिए हम भाई-बहन हैं। देवी लक्ष्मी की बातों से जलंधर प्रभावित हुआ और लक्ष्मी को बहन मानकर बैकुण्ठ से चला गया। इसके बाद उसने कैलाश पर आक्रमण करने की योजना बनाई और अपने सभी असुरों को इकट्ठा किया और कैलाश जाकर देवी पार्वती को पत्नी बनाने के लिए प्रयास करने लगा। इससे देवी पार्वती क्रोधित हो गईं और तब महादेव को जलंधर से युद्घ करना पड़ा, लेकिन वृंदा के सतीत्व के कारण भगवान शिव का हर प्रहार जलंधर निष्फल कर देता था। अंत में देवताओं ने मिलकर योजना बनाई और भगवान विष्णु जलंधर का वेष धारण करके वृंदा के पास पहुंच गए। वृंदा भगवान विष्णु को अपना पति जलंधर समझकर उनके साथ पत्नी के समान व्यवहार करने लगी। इससे वृंदा का पतिव्रत धर्म टूट गया और शिव ने जलंधर का वध कर दिया। विष्णु द्वारा सतीत्व भंग किए जाने पर वृंदा ने आत्मदाह कर लिया, तब उसकी राख के ऊपर तुलसी का एक पौधा जन्मा। तुलसी देवी वृंदा का ही स्वरूप है जिसे भगवान विष्णु लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय मानते हैं। भारत के पंजाब प्रांत में वर्तमान जालंधर नगर जलंधर के नाम पर ही है। जालंधर में आज भी असुरराज जलंधर की पत्नी देवी वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। मान्यता है कि यहां एक प्राचीन गुफा थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। माना जाता है कि प्राचीनकाल में इस नगर के आसपास 12 तालाब हुआ करते थे। नगर में जाने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था मोहिनी बनकर किया असुरों के साथ छल : जब इन्द्र दैत्यों के राजा बलि से युद्ध में हार गए, तब हताश और निराश हुए देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर श्रीहरि विष्णु के आश्रय में गए और उनसे अपना स्वर्गलोक वापस पाने के लिए प्रार्थना करने लगे। श्रीहरि ने कहा कि आप सभी देवतागण दैत्यों से सुलह कर लें और उनका सहयोग पाकर मदरांचल को मथानी तथा वासुकि नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर का मंथन करें। समुद्र मंथन से जो अमृत प्राप्त होगा उसे पिलाकर मैं आप सभी देवताओं को अजर-अमर कर दूंगा तत्पश्चात ही देवता, दैत्यों का विनाश करके पुनः स्वर्ग का आधिपत्य पा सकेंगे। देवताओं के राजा इन्द्र दैत्यों के राजा बलि के पास गए और उनके समक्ष समुद्र मंथन का प्रस्ताव रखा और अमृत की बात बताई। अमृत के लालच में आकर दैत्य ने देवताओं का साथ देने का वचन दिया। देवताओं और दैत्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर मदरांचल पर्वत को उठाकर समुद्र तट पर लेकर जाने की चेष्टा की लेकिन नहीं उठा पाए तब श्रीहरि ने उसे उठाकर समुद्र में रख दिया। मदरांचल को मथानी एवं वासुकि नाग की रस्सी बनाकर समुद्र मंथन का शुभ कार्य आरंभ हुआ। श्रीविष्णु की नजर मथानी पर पड़ी, जो कि अंदर की ओर धंसती चली जा रही थी। यह देखकर उन्होंने स्वयं कच्छप बनाकर अपनी पीठ पर मदरांचल पर्वत को रख लिया। तत्पश्चात समुद्र मंथन से लक्ष्मी, कौस्तुभ, पारिजात, सुरा, धन्वंतरि, चंद्रमा, पुष्पक, ऐरावत, पाञ्चजन्य, शंख, रम्भा, कामधेनु, उच्चैःश्रवा और अंत में अमृत कुंभ निकले जिसे लेकर धन्वन्तरिजी आए। उनके हाथों से अमृत कलश छीनकर दैत्य भागने लगे ताकि देवताओं से पूर्व अमृतपान करके वे अमर हो जाएं। दैत्यों के बीच कलश के लिए झगड़ा शुरू हो गया और देवता हताश खड़े थे। श्रीविष्णु अति सुंदर नारी का रूप धारण करके देवता और दैत्यों के बीच पहुंच गए और उन्होंने अमृत को समान रूप से बांटने का प्रस्ताव रखा। दैत्यों ने मोहित होकर अमृत का कलश श्रीविष्णु को सौंप दिया। मोहिनी रूपधारी विष्णु ने कहा कि मैं जैसे भी विभाजन का कार्य करूं, चाहे वह उचित हो या अनुचित, तुम लोग बीच में बाधा उत्पन्न न करने का वचन दो तभी मैं इस काम को करूंगी। सभी ने मोहिनीरूपी भगवान की बात मान ली। देवता और दैत्य अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए। मोहिनी रूप धारण करके विष्णु ने छल से सारा अमृत देवताओं को पिला दिया, लेकिन इससे दैत्यों में भारी आक्रोश फैल गया। असुरराज बलि के साथ छल👉 असुरों के राजा बलि की चर्चा पुराणों में बहुत होती है। वह अपार शक्तियों का स्वामी लेकिन धर्मात्मा था। दान-पुण्य करने में वह कभी पीछे नहीं रहता था। उसकी सबसे बड़ी खामी यह थी कि उसे अपनी शक्तियों पर घमंड था और वह खुद को ईश्वर के समकक्ष मानता था और वह देवताओं का घोर विरोधी था। कश्यप ऋषि की पत्नी दिति के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष थे। हिरण्यकश्यप के 4 पुत्र थे- अनुहल्लाद, हल्लाद, भक्त प्रह्लाद और संहल्लाद। प्रह्लाद के कुल में विरोचन के पुत्र राजा बलि का जन्म हुआ। राजा बलि का राज्य संपूर्ण दक्षिण भारत में था। उन्होंने महाबलीपुरम को अपनी राजधानी बनाया था। आज भी केरल में ओणम का पर्व राजा बलि की याद में ही मनाया जाता है। राजा बलि ने विश्वविजय की सोचकर अश्वमेध यज्ञ किया और इस यज्ञ के चलते उसकी प्रसिद्धि चारों ओर फैलने लगी। अग्निहोत्र सहित उसने 98 यज्ञ संपन्न कराए थे और इस तरह उसके राज्य और शक्ति का विस्तार होता ही जा रहा था, तब उसने इंद्र के राज्य पर चढ़ाई करने की सोची। इस तरह राजा बलि ने 99वें यज्ञ की घोषणा की और सभी राज्यों और नगरवासियों को निमंत्रण भेजा। देवताओं की ओर गंधर्व और यक्ष होते थे, तो दैत्यों की ओर दानव और राक्षस। अंतिम बार हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रहलाद और उनके पुत्र राजा बलि के साथ इन्द्र का युद्ध हुआ और देवता हार गए, तब संपूर्ण जम्बूद्वीप पर असुरों का राज हो गया। लेना पड़ा वामन अवतार👉 वामन ॠषि कश्यप तथा उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे। वे आदित्यों में 12वें थे। ऐसी मान्यता है कि वे इन्द्र के छोटे भाई थे और राजा बलि के सौतेले भाई। विष्णु ने इसी रूप में जन्म लिया था। देवता बलि को नष्ट करने में असमर्थ थे। बलि ने देवताओं को यज्ञ करने जितनी भूमि ही दे रखी थी। तब सभी देवता विष्णु की शरण में गए। विष्णु ने कहा कि वह भी (बलि भी) उनका भक्त है, फिर भी वे कोई युक्ति सोचेंगे। तब विष्णु ने अदिति के यहां जन्म लिया और एक दिन जब बलि यज्ञ की योजना बना रहा था तब वे ब्राह्मण-वेश में वहां दान लेने पहुंच गए। उन्हें देखते ही शुक्राचार्य उन्हें पहचान गए। शुक्र ने उन्हें देखते ही बलि से कहा कि वे विष्णु हैं। मुझसे पूछे बिना कोई भी वस्तु उन्हें दान मत करना। लेकिन बलि ने शुक्राचार्य की बात नहीं सुनी और वामन के दान मांगने पर उनको तीन पग भूमि दान में दे दी। जब जल छोड़कर सब दान कर दिया गया, तब ब्राह्मण वेश में वामन भगवान ने अपना विराट रूप दिखा दिया। भगवान ने एक पग में भूमंडल नाप लिया। दूसरे में स्वर्ग और तीसरे के लिए बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखूं? पूछने पर बलि ने मुस्कराकर कहा- इसमें तो कमी आपके ही संसार बनाने की हुई, मैं क्या करूं भगवान? अब तो मेरा सिर ही बचा है। इस प्रकार विष्णु ने उसके सिर पर तीसरा पैर रख दिया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे पाताल में रसातल का कलियुग के अंत तक राजा बने रहने का वरदान दे दिया। तब बलि ने विष्णु से एक और वरदान मांगा। राजा बलि ने कहा कि भगवान यदि आप मुझे पाताल लोक का राजा बना ही रहे हैं तो मुझे वरदान ‍दीजिए कि मेरा साम्राज्य शत्रुओं के प्रपंचों से बचा रहे और आप मेरे साथ रहें। अपने भक्त के अनुरोध पर भगवान विष्णु ने राजा बलि के निवास में रहने का संकल्प लिया। पातालपुरी में राजा बलि के राज्य में आठों प्रहर भगवान विष्णु सशरीर उपस्थित रह उनकी रक्षा करने लगे और इस तरह बलि निश्चिंत होकर सोता था और संपूर्ण पातालपुरी में शुक्राचार्य के साथ रहकर एक नए धर्म राज्य की व्यवस्था संचालित करता है। माता पार्वती के साथ छल👉 माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम कभी भगवान शिव और पार्वती का विश्राम स्थान हुआ करता था। यहां भगवान शिव अपने परिवार के साथ रहते थे लेकिन श्रीहरि विष्णु को यह स्थान इतना अच्छा लगा कि उन्होंने इसे प्राप्त करने के लिए योजना बनाई। पुराण कथा के अनुसार सतयुग में जब भगवान नारायण बद्रीनाथ आए तब यहां बदरीयों यानी बेर का वन था और यहां भगवान शंकर अपनी अर्द्धांगिनी पार्वतीजी के साथ मजे से रहते थे। एक दिन श्रीहरि विष्णु बालक का रूप धारण कर जोर-जोर से रोने लगे। उनके रुदन को सुनकर माता पार्वती को बड़ी पीड़ा हुई। वे सोचने लगीं कि इस बीहड़ वन में यह कौन बालक रो रहा है? यह आया कहां से? और इसकी माता कहां है? यही सब सोचकर माता को बालक पर दया आ गई। तब वे उस बालक को लेकर अपने घर पहुंचीं। शिवजी तुरंत ही ‍समझ गए कि यह कोई विष्णु की लीला है। उन्होंने पार्वती से इस बालक को घर के बाहर छोड़ देने का आग्रह किया और कहा कि वह अपने आप ही कुछ देर रोकर चला जाएगा। लेकिन पार्वती मां ने उनकी बात नहीं मानी और बालक को घर में ले जाकर चुप कराकर सुलाने लगी। कुछ ही देर में बालक सो गया तब माता पार्वती बाहर आ गईं और शिवजी के साथ कुछ दूर भ्रमण पर चली गईं। भगवान विष्णु को इसी पल का इंतजार था। इन्होंने उठकर घर का दरवाजा बंद कर दिया। भगवान शिव और पार्वती जब घर लौटे तो द्वार अंदर से बंद था। इन्होंने जब बालक से द्वार खोलने के लिए कहा तब अंदर से भगवान विष्णु ने कहा कि अब आप भूल जाइए भगवन्। यह स्थान मुझे बहुत पसंद आ गया है। मुझे यहीं विश्राम करने दी‍जिए। अब आप यहां से केदारनाथ जाएं। तब से लेकर आज तक बद्रीनाथ यहां पर अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हैं और भगवान शिव केदानाथ में। 🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸

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Santosh Hariharan Mar 5, 2021

भगवान ने आँखें सभी प्राणियों को दी हैं पर वे काम उतना ही देती हैं जितना कि उस प्राणी के निर्वाह के लिए आवश्यक है। बिना जरूरत का भार उसने किसी पर भी नहीं लादा है। सृष्टि का विस्तार असीम है। आवश्यक नहीं कि हर प्राणी उसके हर रहस्य को खोजें और उसके लिए हाथ पैर पटके जिसकी कि उसे सामान्य निर्वाह के लिए आवश्यकता ही नहीं है। हर प्राणी की शरीर संरचना इसी स्तर की है कि उसे अपना काम चलाने समय गुजारने में कठिनाई न पड़े और जानकारियों का इतना बोझ भी न लदे जो उसके लिए आवश्यक नहीं है। साधन सुविधाओं के संबंध में भी यही बात है। सृष्टि एक असीम सागर है उसमें से मछली, शैवाल, घोंघे, प्रबाल और बादल अपनी काम चलाऊ आवश्यकता ही पूर्ण करते हैं। जो अनावश्यक उसके लिए हाथ पैर नहीं पीटते। आँखों का अन्यान्य सभी अवयवों की तुलना में अधिक महत्व है। वे जीवनचर्या में बहुत काम आती हैं तो भी हर प्राणी के शरीर में उन्हें इस योग्य बनाया गया है और इस प्रकार लगाया गया है कि उन्हें दूसरों से तुलना करने के झंझट में न पड़कर अपना काम चलाते रहने की सुविधा मिलती रहे। मेंढक, रेंगने वाले कीड़े मकोड़े और मछलियाँ हिलती-जुलती चीजों को देखते हैं। जो स्थिर है वह उन्हें दिखाई ही नहीं पड़ता। मेंढक को एक लम्बा चौड़ा बगीचा मात्र भूरे पर्दे की तरह स्थिर दीखता है। या तो मक्खी आदि शिकार स्वयं उठे या मेढ़क उचले तभी उसे काम की वस्तु देखने पकड़ने का अवसर मिलता है। अन्यथा सब कुछ स्थिर एवं एक रंग का ही दीखता रहता है। कुत्ता सिर्फ काला सफेद रंग पहचानता है। शिकार तलाश करने में उसकी आँखें उतना काम नहीं देती जितना कि नाक के सहारे सूँघकर पता चलता है। आँखें तो रुकावटों से बचाने भर में काम आती है। खरगोश उसकी इस कमजोरी को भली-भाँति जानते हैं इसलिए अपना बचाव करने के लिए हवा की विपरीत दिशा में दौड़ते हैं ताकि सूँघने से पता न चले। घोड़े की आँखें ऊपर और नीचे भी देख सकती हैं। उसे शत्रुओं से बचने के लिए मात्र सामने देखना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अन्य दिशाओं में क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी बहुत काम आती है। प्रकृति ने उसकी आँखें इसी हिसाब से बनाई हैं। चील गिद्धों की आँखें बहुत दूर का देख सकती है यही कारण है कि वे ऊँचे रहकर भी जमीन पर अपने आहार का पता लगाने को नीचे उतर पड़ते हैं। उकाव मछलियों की ताक में तालाबों के इर्द-गिर्द मंडराता रहता है। साँस लेने के लिए जैसे ही कोई मछली पानी से बाहर तनिक भी शिर उठाती है कि बिजली की तरह झपटकर वह उसे लपक लेता है। मनुष्य की पुतलियाँ चलती हैं और पलक झपकते हैं। जबकि यह विशेषता अन्य प्राणियों में बहुत कम मात्रा में ही देखी जाती है। मनुष्य प्रायः 700 प्रकार के रंगों को देख सकता है। किन्तु इससे क्या। सात रंगों के सम्मिश्रण तो 6700 के लगभग बनते हैं। इन सभी को देख पाना मनुष्य की आँखों के लिए सम्भव नहीं। टिड्डी, मक्खियों, मच्छरों के कई-कई आंखें होती है। वे कुछ से देखते हैं तथा कुछ से अन्य प्रकार के अनुभव करते हैं। प्रागैतिहासिक काल के प्राणी अपेक्षाकृत अधिक आँखों वाले थे जब मस्तिष्क का विकास हुआ और सामने दीखने वाली दो आँखें ही आवश्यक ज्ञान अर्जित करने में कई प्रकार की भूमिकाएँ निभाने लगीं तो उनकी बढ़ी हुई संख्या अनावश्यक होने के कारण क्रमशः समाप्त होती चली गई। मनुष्य और उसी वर्ग के पशुओं को रीढ़ वाले प्राणियों में गिना जाता है। उनमें से सभी की तीन आँखें होती है। दो प्रत्यक्ष दृश्यमान एक झोपड़ी के भीतर विद्यमान किन्तु टटोलने में अदृश्य। इस तीसरे नेत्र को वैज्ञानिक भाषा में ‘पीनियल ग्लाण्ड’ कहा जाता है। मनुष्य में यह ग्रन्थि प्रायः डेढ़ दो मिलीग्राम की होती है। बनावट आँख की तरह। इसमें एक पारदर्शक द्रव भरा रहता है। आँख की पुतली की तरह उसमें प्रकाश संवेदी कोशिकाएँ भी रहती हैं। न केवल मनुष्य में वरन् थोड़ा हट-बढ़कर थोड़े आकार प्रकार के अन्तर से यह प्रायः सभी रीढ़ वाले प्राणियों में पाई जाती है। प्रत्यक्ष वाली दो आँखें सिर्फ अमुक दूरी तक अमुक स्तर के प्रकाश में दीख पड़ने वाले दृश्य ही देख पाती हैं पर यह तीसरी आँख अनेकों काम आती है। प्रकाश की कमी पड़ने पर पलकों वाली आँखों को कुछ दिखाई नहीं पड़ता परन्तु सर्वदा, सर्वत्र किसी न किसी रूप में विद्यमान रहने वाली सूक्ष्म प्रकाश तरंगों के सहारे वह अन्धकार में भी बहुत कुछ देख सकती है, अनुमान इसी आधार पर लगाते जाते हैं। अन्धों के लिए तो यह लाठी का काम देती है। न केवल दृश्य वरन् गंध, शब्द और ताप की इन तरंगों को भी वह ग्रहण कर सकती है जो नाक, कान या त्वचा की पकड़ में सामान्यतया आती नहीं है। मछलियाँ इसी उपकरण के सहारे पानी का तापमान नापती हैं और अनुकूल क्षेत्र के लिए चली जाती हैं। वे समुद्र की गहराई और अत्यधिक दूरी में क्या स्थिति हैं, इस संबंध की सभी जानकारियाँ प्राप्त करती रहती हैं जो खुली आँखों की सामर्थ्य से बाहर है। मेंढ़कों की तीसरी आँख में ‘मेलाटोनि’ नामक हारमोन निकलता है। उसी प्रकृति वरदान के सहारे उनका काया उन चित्र विचित्र पुरुषार्थों को सम्पन्न करती रहती है जो अन्य प्राणियों के बस से बाहर है। पीनियल ग्लाण्ड का मनुष्य की विशेषतया महत्वाकाँक्षा और कामुकता के साथ गहरा संबंध है। इस क्षेत्र में थोड़ी से विशिष्टता बढ़ जाने से मनुष्य असाधारण रूप से महत्वाकाँक्षी हो उठते हैं और दुस्साहस भरे कदम उठाने के लिए बिना डरे, रुके, आतुर रहते देखा जाता। इसी प्रकार इस क्षेत्र के उतार-चढ़ावों से कामुकता की प्रवृत्ति पर गहरा असर पड़ता है। वह असाधारण रूप से उत्तेजित एवं अतृप्त भी रहती देखी गई है और ऐसा भी पाया गया कि उस उत्साह का एक प्रकार से लोप ही हो जाय एवं नपुँसकता की स्थिति बन पड़े। अल्प आयु में प्रौढ़ों जैसी परिपक्व एवं विकसित जननेन्द्रियों वाले कितने ही व्यक्तियों की यह विचित्रता, पीनियल ग्लाण्ड की उत्तेजना से संबंधित पाई गई है। इसी प्रकार शरीर से सर्वथा हृष्ट पुष्ट होने पर भी वासना से घृणा करने वालों या डरने वालों में इसी क्षेत्र की शिथिलता को आधारभूत कारण समझा गया है। इतना ही नहीं आयु की तुलना बहुत घटी या बढ़ी हुए व्यक्तित्व का आश्चर्य भी इसी कारण दृश्यमान होता है। कई अधेड़ों की प्रवृत्ति बचपन जैसी पाई गई है जबकि कई बच्चे बुजुर्गों जैसे गम्भीर और दूरदर्शी देखे गये हैं। इसी तीसरे नेत्र का सहयोग करने के लिए एक छोटी ग्रन्थि मस्तिष्क के पिछले भाग में रहती है। इसे ‘पिट्यूटरी’ ग्रन्थि कहते हैं। यों इसका प्रभाव क्षेत्र एड्रीनल और थाइराइड ग्रन्थियों से रिसने वाले हारमोनों पर अधिक रहता है फिर भी वह पीनियल के कामों में बराबर हिस्सा बंटाती और भार हलका करती है। इसीलिए इन दोनों का एक युग्म माना गया है। मनुष्य में उदासी या प्रसन्नता का स्वभाव इसी क्षेत्र की स्थिति एवं प्रतिक्रिया पर निर्भर रहता है। आलसी और उत्साही का अन्तर भी इसी क्षेत्र से सम्बन्धित है। शरीर का विकास जब असाधारण रूप से घट रहा या बढ़ रहा होता तब उसका कारण पोषण की न्यूनाधिकता न होकर उपरोक्त ग्रन्थियों की हलचलों में कोई व्यतिरेक उत्पन्न होने की बात ही मस्तिष्क विधा के ज्ञाता सोचते और तद्नुरूप उपचार करते देखे गये हैं। चूहों और मुर्गियों पर किये गये प्रयोगों में यह तथ्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुआ कि यह तीसरी आँख जो सामान्यतया निरर्थक जैसी प्रतीत होती है, उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति को उठाने गिराने में कितनी बड़ी भूमिका निभाती हैं। उस क्षेत्र को उत्तेजित कर देने पर यह प्राणी अपनी सामान्य गतिविधियों और योग्यताओं को कई गुना बढ़ा सके। जबकि शिथिल कर देने पर वे मुर्दनी के शिकार हुए और अपनी दक्षता तथा क्रियाशीलता सर्वथा स्वस्थ होते हुए भी गँवा बैठे। पीनियल ग्रन्थि मेंढक और गिरगिट के मस्तिष्क पर एक उभार के रूप में ऊँची उठी हुई देखी जा सकता है। वे इसी के सहारे ऋतुओं के अनुरूप अपनी स्थिति बदलते रहते हैं जिसे रंग परिवर्तन के रूप में देखा जा सकता है। मनुष्य की आंखें मस्तिष्कीय पीनियल ग्रन्थि से प्रभावित होतीं और उसी स्तर के अनुरूप दृश्य देखती हैं। इन्फ्रारेड और अल्फा वायलेट किरणों को पकड़ने की क्षमता उसमें विशेष रूप से पाई जाती है। इसलिए मनुष्य प्रकाश किरणों के सातों रंग न देखकर मात्र उन्हीं रंगों को उतनी ही मात्रा में देख पाता है जितने के लिए कि पीनियल ग्रन्थि का कामकाजी भाग सहमति प्रदान करता है। जिस प्रकार मस्तिष्क का मात्र 7 प्रतिशत कामकाजी प्रयोजनों में प्रयुक्त होता है और शेष भाग प्रस्तुत स्थिति में पड़ा रहता है उसी प्रकार पीनियल का एक अंश ही प्रकृति ने दैनिक व्यवहार में काम आने के लिए पर्याप्त समझा है और शेष को विशेष व्यक्तियों द्वारा, विशेष प्रयोजन के लिए, विशेष प्रयत्नों के सहारे प्रयुक्त किये जाने के लिए सुरक्षित रखा है। यदि उन अन्धेरे क्षेत्रों को प्रकाशवान बनाया जा सके तो न केवल पीनियल ग्रन्थि वरन् सुविस्तृत मस्तिष्कीय चेतना भी जागृत हो सकती है और मानवी क्षमता से रहस्य भरे चमत्कारों का समावेश हो सकता है। सन् 1898 में जर्मन चिकित्सक ह्यूबनर के सामने एक बारह वर्षीय ऐसा बालक लाया गया जिसके अन्य सभी अंग तो आयु के हिसाब से ही विकसित हुए थे किन्तु जननेन्द्रिय पूर्ण वयस्कों जितनी परिपुष्ट हो गई थी और वह सन्तानोत्पादन में हर दृष्टि से समर्थ थी। इस असाधारण और एकाँगी प्रगति का कारण उन्होंने खोजा तो पाया कि उसकी पीनियल ग्रन्थि को अविकसित रहने वाला भाग किसी कारण उत्तेजित हो गया है और उसने अपने प्रभाव क्षेत्र को अतिशय विकसित करने की भूमिका निभाई है। ह्यूबनर से पूर्व पीनियल ग्रन्थि की रहस्यमय क्षमता के संबंध में ईसा में 400 वर्ष पहले यूनान के चिकित्सक हैरी फिल्म ने ऐसे संकेत दिये थे कि यह क्षेत्र मानवी व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। फ्राँसीसी तत्ववेत्ता रेने डेस्कार्टीज ने भी इस क्षेत्र को आत्मा का निवास माना था और वहाँ दिव्य दर्शन की सम्भावना व्यक्ति की थी। पीनियल में कितनी ही अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान है। आज्ञा चक्र जागरण एवं तृतीय नेत्र उन्मीलन के रूप में उन्हीं के माहात्म्य प्रतिफल की चर्चा होती रहती है। शिवजी द्वारा कामदेव जलाया जाना, दमयन्ती के शाप से व्याध का भस्म होना, गाँधार द्वारा दुर्योधन का वज्रांग बना दिया जाना, संजय को महाभारत का दृश्य धृतराष्ट्र को दिखाना, लेख द्वारा ऊषा के अनिरुद्ध दर्शन कराना जैसा पौराणिक आख्यायिकाएं इसी तृतीय नेत्र उन्मीलन के साथ जुड़ी हुई सिद्धियों का दिग्दर्शन कराती हैं। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में नेत्रों के द्वारा जिस वेधक दृष्टि को उगाया बढ़ाया एवं प्रयुक्त किया जाता है वस्तुतः वह उसी तृतीय नेत्र का उत्पादन है जिसे शरीर शास्त्री पीनियल ग्रन्थि के नाम से संवर्धन करते हैं। चर्म चक्षुओं की यदि हिफाजत न रखी जाय, उनके प्रति उपेक्षा बरती जाय, दृश्य शक्ति का व्यतिक्रम किया जाय तो वे असमय में ही खराब हो जाते हैं और समान या आँशिक मान्यता का शिकार बनना पड़ता है। यही बात तृतीय नेत्र के सम्बन्ध में भी है। ध्यान योग त्राटक अभ्यास आदि के माध्यम से आज्ञाचक्र के नाम से जानने वाले पीनियल संस्थान को विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बना सकते हैं। तीसरी आँख प्रस्तुत दो आँखों से कम महत्वपूर्ण नहीं है। उसे न तो उपेक्षित पड़े रहने देना चाहिए और कुदृष्टि अपनाकर नष्ट-भ्रष्ट ही करना चाहिए।

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Neha G Mar 4, 2021

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