ज्ञानवर्षा

white beauty Jan 24, 2020

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Swami Lokeshanand Jan 24, 2020

दो गोपियाँ रास्ते में खड़ी हैं, गुमसुम हैं, देखने में लगता है कि बड़ी उदास हैं, हैं नहीं, पूछो तो कहती हैं कन्हैया कहीं गया थोड़े है, यहीं है। हैं? यहीं है? कहाँ? दिखता तो नहीं? तो एकसाथ बोलीं, मुझे दिखता है। भीतर दिखता है। "सखी री! मन के श्याम भले।" यही है "जिगर में छिपी है तस्वीरे यार। जब जरा नज़रें झुकाईं दीदार हो गया॥" सूरदास कुएँ में पड़ गए, शिकायत नहीं करते, रोते नहीं, भजन गा रहे हैं। कन्हैया ने हाथ दिया, तो पकड़कर बाहर आ गए। अब कन्हैया हाथ छुड़ाए तो ये छोड़ें नहीं। जोरआजमाईश बढ़ी तो हाथ छूट गया। सूरदास जी कहने लगे, निर्बल जानकर हाथ तो छुड़ाकर जा रहे हो, मन से निकल कर जाओ तो तुम्हें सबल मानूं। दूसरी ओर वासुदेव जी कन्हैया को यशोदा मैया के पास लिटा तो गए, पर मैया तो सो रही है, जानती नहीं कि कन्हैया मेरे पास है। मेरे प्यारे, मेरे भोलेराम! वह परमात्मा न दूर था, न है, न हो ही सकता है। वह तो सदा साथ है, बाहर भीतर सब और पसरा है, छाया है। आपको नहीं दिखाई देता? कारण क्या है? कारण आपका मन है। आपका मन परमात्मा से जितना दूर है, परमात्मा आपको उतना ही दूर है। यदि मन से दूरी नहीं है, परमात्मा मन में ही है, तो आपको वह सदा ही संग है। और लोकेशानन्द कहता है कि इसमें कठिन क्या है? आप अभी आँखों को बंद करो, भगवान के एक रूप की कल्पना करो, जितने समय तक कल्पना रहेगी, उतने समय वह मन में ही रहेगा। बस बार बार के अभ्यास से जब यह कल्पना मन में बैठ जाएगी, दृढ़ हो जाएगी, तब वह परमात्मा आपका हो जाएगा, तब देह भले छूट जाए, वह नहीं छूटने का॥

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