ज्ञानवर्षा

Neha Sharma,Haryana Nov 12, 2019

*||🔔||* *||'सोऽहं शिवोहम'||* 🙏एक बार अवश्य पड़े, आपका मन पसंद हो जायेगा। एक था भिखारी । रेल सफ़र में भीख़ माँगने के दौरान एक सूट बूट पहने सेठ जी उसे दिखे। उसने सोचा कि यह व्यक्ति बहुत अमीर लगता है, इससे भीख़ माँगने पर यह मुझे जरूर अच्छे पैसे देगा। वह उस सेठ से भीख़ माँगने लगा। : भिख़ारी को देखकर उस सेठ ने कहा : “तुम हमेशा मांगते ही हो, क्या कभी किसी को कुछ देते भी हो ??” : भिख़ारी बोला, “साहब मैं तो भिख़ारी हूँ, हमेशा लोगों से मांगता ही रहता हूँ, मेरी इतनी औकात कहाँ कि किसी को कुछ दे सकूँ ??” : सेठ:- जब किसी को कुछ दे नहीं सकते तो तुम्हें मांगने का भी कोई हक़ नहीं है। मैं एक व्यापारी हूँ और लेन-देन में ही विश्वास करता हूँ, अगर तुम्हारे पास मुझे कुछ देने को हो तभी मैं तुम्हे बदले में कुछ दे सकता हूँ। : तभी वह स्टेशन आ गया जहाँ पर उस सेठ को उतरना था, वह ट्रेन से उतरा और चला गया। : इधर भिख़ारी सेठ की कही गई बात के बारे में सोचने लगा। सेठ के द्वारा कही गयीं बात उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह सोचने लगा कि शायद मुझे भीख में अधिक पैसा इसीलिए नहीं मिलता क्योकि मैं उसके बदले में किसी को कुछ दे नहीं पाता हूँ। लेकिन मैं तो भिखारी हूँ, किसी को कुछ देने लायक भी नहीं हूँ।लेकिन कब तक मैं लोगों को बिना कुछ दिए केवल मांगता ही रहूँगा। : बहुत सोचने के बाद भिख़ारी ने निर्णय किया कि जो भी व्यक्ति उसे भीख देगा तो उसके बदले मे वह भी उस व्यक्ति को कुछ जरूर देगा। लेकिन अब उसके दिमाग में यह प्रश्न चल रहा था कि वह खुद भिख़ारी है तो भीख के बदले में वह दूसरों को क्या दे सकता है ? : इस बात को सोचते हुए दिनभर गुजरा, लेकिन उसे अपने प्रश्न का कोई उत्तर नहीं मिला। : दुसरे दिन जब वह स्टेशन के पास बैठा हुआ था, तभी उसकी नजर कुछ फूलों पर पड़ी जो स्टेशन के आस-पास के पौधों पर खिल रहे थे, उसने सोचा, क्यों न मैं लोगों को भीख़ के बदले कुछ फूल दे दिया करूँ। उसको अपना यह विचार अच्छा लगा और उसने वहां से कुछ फूल तोड़ लिए। : वह ट्रेन में भीख मांगने पहुंचा। जब भी कोई उसे भीख देता तो उसके बदले में वह भीख देने वाले को कुछ फूल दे देता। उन फूलों को लोग खुश होकर अपने पास रख लेते थे। अब भिख़ारी रोज फूल तोड़ता और भीख के बदले में उन फूलों को लोगों में बांट देता था। : कुछ ही दिनों में उसने महसूस किया कि अब उसे बहुत अधिक लोग भीख देने लगे हैं। वह स्टेशन के पास के सभी फूलों को तोड़ लाता था। जब तक उसके पास फूल रहते थे तब तक उसे बहुत से लोग भीख देते थे। लेकिन जब फूल बांटते बांटते ख़त्म हो जाते तो उसे भीख भी नहीं मिलती थी,अब रोज ऐसा ही चलता रहा । : एक दिन जब वह भीख मांग रहा था तो उसने देखा कि वही सेठ ट्रेन में बैठे है, जिसकी वजह से उसे भीख के बदले फूल देने की प्रेरणा मिली थी। : वह तुरंत उस व्यक्ति के पास पहुंच गया और भीख मांगते हुए बोला, आज मेरे पास आपको देने के लिए कुछ फूल हैं, आप मुझे भीख दीजिये बदले में मैं आपको कुछ फूल दूंगा। : सेठ ने उसे भीख के रूप में कुछ पैसे दे दिए और भिख़ारी ने कुछ फूल उसे दे दिए। उस सेठ को यह बात बहुत पसंद आयी। : सेठ:- वाह क्या बात है..?? आज तुम भी मेरी तरह एक व्यापारी बन गए हो, इतना कहकर फूल लेकर वह सेठ स्टेशन पर उतर गया। : लेकिन उस सेठ द्वारा कही गई बात एक बार फिर से उस भिख़ारी के दिल में उतर गई। वह बार-बार उस सेठ के द्वारा कही गई बात के बारे में सोचने लगा और बहुत खुश होने लगा। उसकी आँखे अब चमकने लगीं, उसे लगने लगा कि अब उसके हाथ सफलता की वह "🔑" चाबी लग गई है, जिसके द्वारा वह अपने जीवन को बदल सकता है। : वह तुरंत ट्रेन से नीचे उतरा और उत्साहित होकर बहुत तेज आवाज में ऊपर आसमान की ओर देखकर बोला, “मैं भिखारी नहीं हूँ, मैं तो एक व्यापारी हूँ.. : मैं भी उस सेठ जैसा बन सकता हूँ.. मैं भी अमीर बन सकता हूँ । लोगों ने उसे देखा तो सोचा कि शायद यह भिख़ारी पागल हो गया है, अगले दिन से वह भिख़ारी उस स्टेशन पर फिर कभी नहीं दिखा। एक वर्ष बाद इसी स्टेशन पर दो व्यक्ति सूट बूट पहने हुए यात्रा कर रहे थे। दोनों ने एक दूसरे को देखा तो उनमे से एक ने दूसरे को हाथ जोड़कर प्रणाम किया और कहा, “क्या आपने मुझे पहचाना ??” सेठ:- “नहीं तो ! शायद हम लोग पहली बार मिल रहे हैं। भिखारी:- सेठ जी.. आप याद कीजिए, हम पहली बार नहीं, बल्कि तीसरी बार मिल रहे हैं। सेठ:- मुझे याद नहीं आ रहा, वैसे हम पहले दो बार कब मिले थे ?? अब पहला व्यक्ति मुस्कुराया और बोला : हम पहले भी दो बार इसी ट्रेन में मिले थे, मैं वही भिख़ारी हूँ.. जिसको आपने पहली मुलाकात में बताया कि मुझे जीवन में क्या करना चाहिए और दूसरी मुलाकात में बताया कि मैं वास्तव में कौन हूँ..?? : नतीजा यह निकला कि आज मैं फूलों का एक बहुत बड़ा व्यापारी हूँ और इसी व्यापार के काम से दूसरे शहर जा रहा हूँ। : आपने मुझे पहली मुलाकात में प्रकृति का नियम बताया था.. जिसके अनुसार हमें तभी कुछ मिलता है, जब हम कुछ देते हैं। लेन-देन का यह नियम वास्तव में काम करता है, मैंने यह बहुत अच्छी तरह महसूस किया है, लेकिन मैं खुद को हमेशा भिख़ारी ही समझता रहा, इससे ऊपर उठकर मैंने कभी सोचा ही नहीं था और जब आपसे मेरी दूसरी मुलाकात हुई.. तब आपने मुझे बताया कि मैं एक व्यापारी बन चुका हूँ। अब मैं समझ चुका था कि मैं वास्तव में एक भिखारी नहीं, बल्कि व्यापारी बन चुका हूँ। : भारतीय मनीषियों ने संभवतः इसीलिए स्वयं को जानने पर सबसे अधिक जोर दिया और फिर कहा :- *'सोऽहं शिवोहम !!'* *समझ की ही तो बात है...भिखारी ने स्वयं को जब तक भिखारी समझा, वह भिखारी रहा, उसने स्वयं को व्यापारी मान लिया, व्यापारी बन गया..!!* *जिस दिन हम समझ लेंगे कि मैं कौन हूँ.. फिर जानने समझने को रह ही क्या जाएगा..??* . *"!! जय श्री राधे कृष्ण !!"* -- Get Good Morning, Good Night, Shayari etc. messages on IndiaChat App https://wn78r.app.goo.gl/tCX11

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Shilpa Hari Nov 12, 2019

((((((( #सदुपयोग )))))) एक गांव में धर्मदास नामक एक व्यक्ति रहता था। बातें तो बड़ी ही अच्छी- अच्छी करता था पर था एकदम कंजूस। कंजूस भी ऐसा वैसा नहीं बिल्कुल मक्खीचूस। चाय की बात तो छोड़ों वह किसी को पानी तक के लिए नहीं पूछता था। साधु-संतों और भिखारियों को देखकर तो उसके प्राण ही सूख जाते थे कि कहीं कोई कुछ मांग न बैठे। एक दिन उसके दरवाजे पर एक महात्मा आये और धर्मदास से सिर्फ एक रोटी मांगी। पहले तो धर्मदास ने महात्मा को कुछ भी देने से मना कर दिया , लेकिन तब वह वहीं खड़ा रहा तो उसे आधी रोटी देने लगा। आधी रोटी देखकर महात्मा ने कहा कि अब तो मैं आधी रोटी नहीं पेट भरकर खाना खाऊंगा। इस पर धर्मदास ने कहा कि अब वह कुछ नहीं देगा। महात्मा रातभर चुपचाप भूखा- प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा। सुबह जब धर्मदास ने महात्मा को अपने दरवाजे पर खड़ा देखा तो सोचा कि अगर मैंने इसे भरपेट खाना नहीं खिलाया और यह भूख-प्यास से यहीं पर मर गया तो मेरी बदनामी होगी। बिना कारण साधु की हत्या का दोष लगेगा। धर्मदास ने महात्मा से कहा कि बाबा तुम भी क्या याद करोगे , आओ पेट भरकर खाना खा लो। महात्मा भी कोई ऐसा वैसा नहीं था। धर्मदास की बात सुनकर महात्मा ने कहा अब मुझे खाना नहीं खाना , मुझे तो एक कुआं खुदवा दो। ‘लो अब कुआं बीच में कहां से आ गया’ धर्मदास ने साधु महाराज से कहा। धर्मदास ने कुआं खुदवाने से साफ मना कर दिया। साधु महाराज अगले दिन फिर रात भर चुपचाप भूखा- प्यासा धर्मदास के दरवाजे पर खड़ा रहा। अगले दिन सुबह भी जब धर्मदास ने साधु महात्मा को भूखा-प्यासा अपने दरवाजे पर ही खड़ा पाया तो सोचा कि अगर मैने कुआं नहीं खुदवाया तो यह महात्मा इस बार जरूर भूखा-प्यास मर जायेगा और मेरी बदनामी होगी। धर्मदास ने काफी सोच- विचार किया और महात्मा से कहा कि साधु बाबा मैं तुम्हारे लिए एक कुआं खुदवा देता हूँ और इससे आगे अब कुछ मत बोलना। ‘नहीं , एक नहीं अब तो दो कुएं खुदवाने पड़ेंगे। महात्मा की फरमाइशें बढ़ती ही जा रही थीं। धर्मदास कंजूस जरूर था बेवकूफ नहीं। उसने सोचा कि अगर मैंने दो कुएं खुदवाने से मनाकर दिया तो यह चार कुएं खुदवाने की बात करने लगेगा , इसलिए धर्मदास ने चुपचाप दो कुएं खुदवाने में ही अपनी भलाई समझी। कुएं खुदकर तैयार हुए तो उनमें पानी भरने लगा। जब कुओं में पानी भर गया तो महात्मा ने धर्मदास से कहा , दो कुओं में से एक कुआं मैं तुम्हें देता हूँ और एक अपने पास रख लेता हूँ। मैं कुछ दिनों के लिए कहीं जा रहा हूँ , लेकिन ध्यान रहे मेरे कुएं में से तुम्हें एक बूंद पानी भी नहीं निकालना है। साथ ही अपने कुएं में से सब गांव वालों को रोज पानी निकालने देना है। मैं वापस आकर अपने कुएं से पानी पीकर प्यास बुझाऊंगा। धर्मदास ने महात्मा वाले कुएं के मुंह पर एक मजबूत ढक्कन लगवा दिया। सब गांव वाले रोज धर्मदास वाले कुएं से पानी भरने लगे। लोग खूब पानी निकालते पर कुएं में पानी कम न होता। शुध्द-शीतल जल पाकर गांव वाले निहाल हो गये थे और महात्मा जी का गुणगान करते न थकते थे। एक वर्ष के बाद महात्मा पुनः उस गांव में आये और धर्मदास से बोले कि उसका कुआं खोल दिया जाये। धर्मदास ने कुएं का ढक्कन हटवा दिया। लोग लोग यह देखकर हैरान रह गये कि कुएं में एक बूंद भी पानी नहीं था। महात्मा ने कहा , ‘कुएं से कितना भी पानी क्यों न निकाला जाए वह कभी खत्म नहीं होता अपितु बढ़ता जाता है। कुएं का पानी न निकालने पर कुआं सूख जाता है इसका स्पष्ट प्रमाण तुम्हारे सामने है और यदि किसी कारण से कुएं का पानी न निकालने पर पानी नहीं भी सुखेगा तो वह सड़ अवश्य जायेगा और किसी काम में नहीं आयेगा। महात्मा ने आगे कहा , ‘कुएं के पानी की तरह ही धन-दौलत की भी तीन गतियां होती हैं। उपयोग , नाश अथवा दुरुपयोग। धन-दौलत का जितना इस्तेमाल करोगे वह उतना ही बढ़ती जायेगी। धन-दौलत का इस्तेमाल न करने पर कुएं के पानी की वह धन-दौलत निरर्थक पड़ी रहेगी। उसका उपयोग संभव नहीं रहेगा या अन्य कोई उसका दुरुपयोग कर सकता है। अतः अर्जित धन-दौलत का समय रहते सदुपयोग करना अनिवार्य है।’ ज्ञान की भी कमोबेश यही स्थिति होती है। धन-दौलत से दूसरों की सहायता करने की तरह ही ज्ञान भी बांटते चलो। हमारा समाज जितना अधिक ज्ञानवान , जितना अधिक शिक्षित व सुसंस्कृत होगा उतनी ही देश में सुख- शांति और समृध्दि आयेगी। फिर ज्ञान बांटने वाले अथवा शिक्षा का प्रचार-प्रसार करने वाले का भी कुएं के जल की तरह ही कुछ नहीं घटता अपितु बढ़ता ही है। धर्मदास ने कहा , ‘हां, गुरुजी आप बिल्कुल सही कह रहे हो। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। इस घटना से धर्मदास को सही ज्ञान और सही दिशा मिल गयी थी।

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Nikhil Nair Nov 12, 2019

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