जयजिनेंद्र

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"स्नेह भरी ममता....... घरसे बाहर निकलते ही सबसे पहले मे इधर उधर देखता था कहीं गली मे या अपने दरवाजे पर लक्ष्मी मौसी तो नहीं खडी .....लक्ष्मी मौसी....हमारे पास ही दो घर छोडकर रहती है...जब कभी मुझे बाहर निकलते देखती हैं उन्हें कुछ ना कुछ बाजार से मंगाना ही होता है.... कभी सब्जी तो कभी दवाई तो कभी दूध.... तंग आ गया हूं उनसे.....कभी कभी तो मन करता है जीभरकर सुना दूं..... खुद के बेटे को तो गांव से बाहर बडे शहर भेज दिया और मुझे यहां नौकर समझ रखा है.... पर अकेली रहती है अंकल भी शायद बीमार रहते है इसलिए चुप हो जाता हूं यही सोचकर.... अपनी बाइक मैं अब घर से दूर ले जाकर स्टार्ट करता हूं कि कहीं आवाज सुन कर आ ना जाएं.... आज बाइक लेकर अभी गांव की गली के मोड़ से मुड़ने ही वाला था कि सामने से लक्ष्मी मौसी दिख गई.... हाथों में बड़ा सा झोला लिए पैदल.... पसीने से तर बतर.... नाजाने क्या हुआ मुझे .... मैंने बाइक रोक दी.... राम राम मौसी.... पैदल....क्युं.....कोई रिक्शा नहीं था क्या.... सांसे काफी तेज चल रही थी उनकी....अपने पल्लू से पसीने को पोछ थोड़ा रुक कर बोली.... राम राम बेटा....राम राम....वो रिक्शावाला..... ज्यादा पैसे मांग रहे था झोले को किसी तरह बमुश्किल उठाकर वह फिर चलने को हुई.... उन्हें इस हाल में देख मैं पसीज गया....लाओ मौसी.... मैं ले चलता हूं.... उन्होंने एकटक मेरी और देखा फिर कुछ सोचने लगी... चलिए ना ....क्या सोचने लग गई आप.... उन्होंने कुछ बोला नही.... मैंने खुद उनके हाथों का सामान लिया और उन्हें पीछे बिठाकर उनके घर ले आया....अंकल मोबाइल फोन पर बातें कर रहे थे... बेटा.....मैं भी बहुत बीमार रहता हूं तेरी मां भी थक चुकी है ....अभी बाजार गई है सब्जियों को लाने.... फिर मेरी दवा लाने बडे बाजार जाएगी....गांव के बच्चे कितना करेंगे हमारे लिए....सच कहूं तो वो भी बचने लगे हैं हमसे..... अंकल की ये बात सुन मैं कहीं ना कहीं खुद से नज़रें चुराने लग गया था अंकल हाथ में दवा की पर्ची लिए फोन पर बातें किये जा रहे थे.... हमें अपने साथ ही रखता तो......ना जाने उधर से क्या बोला गया.... अंकल फोन रखकर रोने से लग गए.... लक्ष्मी मौसी उनको चुप कराते हुए बोली....आप क्यूं उससे रोज रोज ये विनती करते है मैं हूँ ना..... जबतक सांस है मैं खींच लुंगी अपनी गृहस्थी....मौसी ने उनके हाथ से दवा की पर्ची ले ली....उनके माथा अभी भी पसीने से भीगा हुआ था....उनकी ये परिस्थिति देख दिल में दर्द सा उठ आया.... अरे तुम.... तुम जाओ बेटा...तुम्हें देर हो रही होगी....मुझे छोडने के लिए साथ आ गए..... मौसी ने भरी हुई आवाज से मुझे जाने को कहा.... उन्हें देख मेरी आँखें भी भर आई... मुझे क्षमा कर दीजिएगा मौसी...मै पड़ोस में रहकर आपकी इन परिस्थितियों से अनजान था....आप मुझे पर्ची दीजिये मैं दवा लेकर आता हूं.... जब खुद का बेटा सब जानकर ही अनजान बना बैठा है तो तुम क्युं माफ़ी मांग रहे हो बेटा.... कयोंकि आप मुझे भी तो बेटा कहती है मौसी...... मैंने अपने इस हक से उनके हाथों से पर्ची ले ली....उन्होंने भी मेरे माथे को चूम अपना हक जता दिया..... दोस्तों..... बडे बुजुर्ग कहते थे मौसी अर्थात मां जैसी ..... जब मौसी आपको स्नेह और ममता देने मे मां बन जाती है तो आप किसी मौसी , चाची , आंटीजी के बेटे कयूं नहीं बन सकते .......जब कोई आपको बेटा कहता है ना तो आप के अंदर उन्हें वो आदर सम्मान और कुछ आशाएं दिखाई देती है .....आशा है एकदूसरे के प्यार सम्मान और स्नेह भरी ममता को समझते हुए आप भी इन सभी बने रिश्तों का सम्मान करेंगे एक सुंदर रचना... #दीप...🙏🙏🙏

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