जगन्नाथ_भगवान

जगन्ननाथ पुरी में होगा 5 जून को पूर्णिमा स्नान पर्व, सेवकों के कोरोना टेस्ट के बाद मनेगा उत्सव देश में फैले कोरोना वायरस के संक्रमण के कारण पुरी के जगन्नाथ मंदिर में रथयात्रा को लेकर अभी भी संशय चल रहा है। पुरी में भी कोरोना केस मिलने के बाद हड़कंप मच गई है। हालांकि, इस सब के बीच रथ निर्माण का काम तेजी से चल रहा है। 23 जून को रथयात्रा निकलनी है। इसके पहले 5 जून को मंदिर में पूर्णिमा उत्सव भी होगा। इसमें भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा देवी की मूर्तियों को स्नान कराया जाता है। इसके लिए अभिषेक में लगने वाले 170 गरबाड़ू सेवकों का कोरोना टेस्ट किया गया है। रिपोर्ट निगेटिव आने पर ही उन्हें पूर्णिमा स्नान में शामिल होने की अनुमति दी जाएगी। 5 जून को पूर्णिमा उत्सव होना है। इसमें पवित्र त्रिमूर्ति (भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा) को सुगंधित जल से अभिषेक-स्नान कराया जाएगा। ये उत्सव रथयात्रा से जुड़ा है और इससे बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। हालांकि, इस साल इसे मंदिर परिसर में ही गिनती के लोगों की उपस्थिति में मनाया जाएगा। इस उत्सव में 108 सुगंधित जल के घड़ों से भगवान का अभिषेक स्नान कराया जाएगा। इस पर्व में जो सेवक शामिल होते हैं उन्हें गरबाड़ू कहा जाता है। ये लोग ही पूर्णिमा स्नान की पूरी विधि का संचालन करते हैं। मंदिर प्रशासक पीके जेना के मुताबिक मंदिर समिति ने फैसला लिया है कि सभी गरबाड़ू सेवकों का कोरोना टेस्ट किया जाएगा। रथयात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण उत्सव है पूर्णिमा स्नान रथयात्रा निकलने से लगभग 15 दिन पहले होने वाला पूर्णिमा स्नान उत्सव काफी महत्वपूर्ण है। हर साल ये बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। लेकिन, इस बार मंदिर समिति ने तय किया है कि कुछ ही लोगों की मौजूदगी में आयोजित किया जाएगा। इसी उत्सव में 108 घड़ों के पानी से स्नान के बाद भगवान की तबीयत खराब होती है और उन्हें कुछ दिन एकांत में रखा जाता है। औषधियां दी जाती हैं। इसके बाद जैसे ही भगवान ठीक होते हैं, उन्हें मौसी के घर गुंडिचा मंदिर ले जाता है। अपने-अपने रथों में सवार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा 8 दिन के लिए जाते हैं । 8 मई से शुरू हुआ रथ निर्माण तेजी से चल रहा है। रथ धीरे-धीरे आकार ले रहा है। हालांकि, अम्फान तूफान के कारण दो दिन के लिए रथ निर्माण में बाधा आई थी। लेकिन, उसके बावजूद 23 जून से पहले रथों को तैयार करने के लिए विश्वकर्मा सेवक पूरी जी जान से लगे हैं। मंदिर समिति और जिला प्रशासन भी कोरोना वायरस के चलते इनकी सेहत पर विशेष निगरानी रख रहा है। मुख्य जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. नीलकंठ मिश्रा के मुताबिक कर्मचारियों को समय-समय पर कोरोना से सावधानी के बारे में बताया जा रहा है। उनके लिए कैंप भी लगाए जा रहे हैं। नियमित रूप से उनकी सेहत पर निगरानी रखी जा रही है।

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. "भगवद्प्रसादनिष्ठ राजा" श्री जगन्नाथपुरी के राजा की भगवत्प्रसाद में बड़ी ही निष्ठा थी, परन्तु एक दिन राजा चौपड़ खेल रहा था, इसी बीच श्रीजगन्नाथ जी के पण्डाजी प्रसाद लेकर आये। राजा के दाहिने हाथ में फासा था। अतः उसने बायें हाथ से प्रसाद को छूकर उसे स्वीकार किया। इस प्रकार प्रसाद का अपमान जानकार पाण्डाजी रुष्ट हो गये। प्रसाद को राजमहल में न पहुँचाकर उसे वापस ले गये। चौपड़ खेलकर राजा उठे और अपने महल में गये। वहाँ उन्होंने नयी बात सुनी कि मेरे अपराध के कारण अब मेरे पास प्रसाद कभी नहीं आयेगा। राजा ने अपना अपराध स्वीकार कर अन्न-जल त्याग दिया। उसने मन में विचारा कि जिस दाहिने हाथ ने प्रसाद का अपमान किया है, उसे मैं अभी काट डालूँगा, यह मेरी सच्ची प्रतिज्ञा है। ब्राह्मणों की सम्मति लेना उचित समझकर राजा ने उन्हें बुलाकर पूछा कि यदि कोई भगवान् के प्रसाद का अपमान करे तो चाहे वह कोई अपना प्रिय अंग ही क्यों न हो, उसका त्याग करना उचित है या नहीं। ब्राह्मणों ने उत्तर दिया कि राजन् ! अपराधी का तो सर्वथा त्याग ही उचित है। राजा ने अपने मन में हाथ कटाना निश्चित कर लिया, परन्तु मेरे हाथ को अब कौन काटे ? यह सोचकर मौन और खिन्न हो गया। राजा को उदास देखकर मंत्री ने उदासी का कारण पूछा। राजा ने कहा-नित्य रात के समय एक प्रेत आता है और वह मुझे दिखाई भी देता है। कमरे की खिड़की में हाथ डालकर वह बड़ा शोर करता है। उसी के भय से मैं दुखी हूँ। मंत्रीने कहा- आज मैं आपके पलंग के पास सोऊँगा और आप अपने को दूसरी जगह छिपाकर रखिये, जब वह प्रेत झरोखे में हाथ डालकर शोर मचायेगा, तभी मैं उसका हाथ काट दूँगा। सुनकर राजा ने कहा-बहुत अच्छा ! ऐसा ही करो। रात होने पर मंत्रीजी के पहरा देते समय राजा ने अपने पलंग से उठकर झरोखे में हाथ डालकर शोर मचाया। मंत्री ने उसे प्रेत का हाथ जानकर तलवार से काट डाला। राजा का हाथ कटा देखकर मंत्रीजी अति लज्जित हुए और पछताते हुए कहने लगे कि मैं बड़ा मुर्ख हूँ, मैंने यह क्या कर डाला ? राजा ने कहा-तुम निर्दोष हो, मैं ही प्रेत था; क्योंकि मैंने प्रभु से बिगाड़ किया था। राजा की ऐसी प्रसादनिष्ठा देखकर अपने पण्डों से श्रीजगन्नाथ जी ने कहा कि अभी-अभी मेरा प्रसाद ले जाकर राजा को दो और उसके कटे हुए हाथ को मेरे बाग में लगा दो। भगवान् के आज्ञानुसार पण्डे लोग प्रसाद को लेकर दौड़े, उन्हें आते देख राजा आगे आकर मिले। दोनों हाथो को फैलाकर प्रसाद लेते समय राजा का कटा हुआ हाथ पूरा निकल आया। जैसा था, वैसा ही हो गया। राजा ने प्रसाद को मस्तक और हृदय से लगाया। भगवत् कृपा अनुभव करके बड़ा भारी सुख हुआ। पण्डे लोग राजा का कटा हुआ वह हाथ ले आये। उसे बाग में लगा दिया गया। उससे दौना के वृक्ष हो गये। उसके पत्र-पुष्प नित्य ही श्रीजगन्नाथ जी के श्रीअंग पर चढ़ते हैं। उनकी सुगन्ध भगवान् को बहुत प्रिय लगती है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" ******************************************** /

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