चैतन्य_महाप्रभु

*श्रीनिताई चाँद* 6⃣1⃣ *श्रीजगन्नाथ मन्दिर में* दक्षिणदेश-यात्रा से जब श्रीमन्महाप्रभु नीलाचल में लौट आए, तब अनेक स्थानों से अनेक भक्त आआकर प्रभु के दर्शन करने लगे ।श्रीनिताईचाँद तो श्रीचैतन्य-रस में अति विभोर हो उठे उस समय । महाधीर होते हुए भी एक जगह स्थिर होकर बैठना इनके लिए सम्भव न था। श्रीजगन्नाथदेव के दर्शनों को जाते तो बार-बार निज मन्दिर में घुसकर श्रीजगन्नाथदेव को आलिंगन करने का यत्न करते, परन्तु द्वारपाल पुजारी इन्हें पकड़ लेते अन्दर न घुसने देते ।। एक दिन तो यह आगए अपने आवेश में और फिर किसी की क्या मजाल कि इनको रोक सके। 'हा कृष्ण’ ‘हा बलराम' कहकर आप मन्दिर में कूद पड़े और द्वारपालों के रोकने-पकड़ने पर किसी से नहीं रोके जा सके। ये स्वर्णसिंहासन पर चढ़ गए और जाकर श्रीबलराम जी को जोर से आलिंगन कर लिया और प्रेमाश्रुओं से अभिषिक्त करने लगे। पुजारी ने ज्यों ही इनका हाथ पकड़ा, त्यों ही वह सात–हाथ पीछे जा गिरा, बिजली का सा करेंट लगा। श्रीनिताईचाँद ने श्रीबलरामजी के गले की माला उतारी और अपने गले में डाल ली सिंहासन से उतरकर मतवाले हाथी की चाल चलते हुए बाहर चले आए। पुजारी और पहरेदार अचम्भित हो उठे और जान गए यह अवधूत कोई साधारण मनुष्य नहीं है। असीम शक्तिशाली है। पुजारी को अहंकार था कि मैं बलवान हूँ-आज उसका गर्व चूर्ण हो गया-उठकर श्रीनिताईचाँद के चरणों में पड़ गया। उनके वास्तविक स्वरूप का अनुभव कर उनकी स्तुति गान करने लगा। श्रीनिताईचाँद तो स्वरूपतः बाल्यभाव में आविष्ट रहते हैं। परम अनुराग से पुजारी को आलिंगन कर लिया। फिर जब-जब श्रीनिताईचाँद दर्शनों को जाते, पुजारी उन्हें स्वयं ही श्रीजगन्नाथ का प्रसाद एवं श्रीबलराम की प्रसाद माला भेंट कर उनकी वन्दना करते थे। क्रमशः श्रीगुरुगौरांगो जयते !!

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