गोत्र_क्या_होता_है,

गोत्र क्या है? सनातन धर्म के अंतर्गत वर्ण के साथ-साथ गोत्र को भी बेहद महत्वपूर्ण दर्जा दिया गया है। जहां एक ओर समान वर्ण में विवाह करने को मान्यता प्रदान की गई है वहीं इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी बताया है कि वर-वधु का गोत्र समान ना हो.... ऐसी मानयता है कि अगर समान गोत्र वाले स्त्री-पुरुष विवाह बंधन में बंध जाते हैं तो उनकी होने वाली संतान को रक्त संबंधित समस्याएं आ सकती हैं। कई बार गोत्र के विषय में पढ़ा और सुना है..... लेकिन गोत्र क्या है ?इसके विषय में हम जानते हैं? शायद नहीं.... बहुत ही कमलोग इस बात से अवगत होंगे कि आखिर गोत्र है और इसका निर्धारण कैसे होता है। आज हम इसी सवाल का जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार गोत्र का शाब्दिक अर्थ बेहद व्यापक है... जिसकी समय-समय पर व्याखाया भी की जाती रही है। गोत्र शब्द की संधि विच्छेद पर ध्यान दें तो यह ‘गो’ यानि इन्द्रियां और ‘त्र’ यानि रक्षा करना से मिलकर बना है... अर्थात इन्द्रियों पर आघात से रक्षा करने वाला....जिसे “ऋषि” कहा जाता है। सनातन धर्म से संबंधित दस्तावेजों पर नजर डालें तो प्राचीनकाल में चार ऋषियों के नाम से गोत्र परंपरा की शुरुआत हुई, जिनके नाम ऋषि अंगिरा, ऋषि कश्यप, ऋषि वशिष्ठ और ऋषि भृगु हैं... कुछ समय पश्चात इनमें ऋषि जमदग्नि, ऋषि अत्रि, ऋषि विश्वामित्र और ऋषि अगस्त्य भी इसमें जुड़ गए। प्रैक्टिकल तौर पर देखा जाए तो गोत्र का आशय पहचान से है... यानि कौनसा व्यक्ति किस ऋषि का वंशज है। सामाजिक तौर पर देखा जाए तो 'गोत्र' की स्थापना का मुख्य उद्देश्य ‘एकत्रीकरण’ से संबंध रखता है। ॐ गं गणपतये नमः 👏 ॐ नम :शिवाय ॐ नमो नारायणाय ॐ नमो भगवते वासुदेवाय जय श्री भोलेनाथ ॐ सूर्याय नमः 🌅 👏 🌹 🚩 फेब्रुवारी महिने का आखरी दिवस 28 शुभ 🌅 रविवार जय श्री सुर्य नारायण 🌅 👣 💐 👏 ॐ नमो नारायणाय नमस्कार 🙏 🚩

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मानव एक सामाजिक प्राणी है | एक सामान्य मनुष्य समाज के बनाये नीति व नियमों का पालन करके ही इस समाज में स्वयं को व अपने परिवार के मान-सम्मान को बनाये रख सकता है | गोत्र/Gotra Kya Hai भी प्राचीन मानव समाज द्वारा बनाये गये रीती-रिवाजों का हिस्सा है जो यह निर्धारित करते है कि एक व्यक्ति किस पूर्वज की संतान है | एक वंश के सभी वंशज मूल रूप से किसी एक पूर्वज से जुड़े हुए है | Gotra Kya Hai ? गोत्र क्या है  : मान्यताओं के अनुसार हम सभी ऋषि-मुनियों की संताने है | धार्मिक ग्रंधों के अनुसार मुख्य रूप से सप्त ऋषियों के नाम के आधार पर 7 गोत्र प्रचलन में थे | सप्त ऋषि व गोत्र : 1.अत्रि, 2. भारद्वाज, 3. भृगु, 4. गौतम, 5.कश्यप, 6. वशिष्ठ, 7.विश्वामित्र. | लेकिन समय के साथ-साथ ये बढ़ते गये व आज सभी गोत्रों की संख्या लगभग 115 है | एक समान गोत्र वाले लोग आगे चलकर किसी एक ही ऋषि की संतान होने के कारण भाई-बहन समझे जाने लगे | मुख्य रूप से यही कारण है कि एक समान गोत्र वाले स्त्री-पुरुष का विवाह पाप समझा जाने लगा | समाज की द्रष्टि से एक समान गोत्र के लड़का और लड़की का रिश्ता भाई-बहन का होता है व उनका आपस में विवाह करना सामाजिक द्रष्टि से दंडनीय है | एक ही गोत्र में विवाह न करने के पीछे एक कारण यह भी है : एक ही गोत्र में विवाह करने से संतान में अनुवांशिक दोष आने का भय अधिक रहता है | व संतान में गुण-शारीरिक गुण- व्यवहार में कुछ नया नहीं आता | कानून की द्रष्टि में गोत्र- वर्ण व जाति विवाह के लिए कोई बंधन नहीं रखते | इसलिए समाज नहीं लेकिन कानून इस एक गोत्र में विवाह करने की अनुमति देता है और कानून के इस फैसले में समाज कभी भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता | Gotra Kya Hai गोत्र व वर्ण : कहा जाता है की गोत्र पहले आये व वर्ण का विस्तार बाद में हुआ | आइये इसे विस्तार से समझते है : मनुष्य के कर्म व गुण के आधार पर चार वर्णों में बांटा गया है : ब्राहण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यानी दलित | इन सभी वर्णों को प्रमुख जातियां भी कहा गया है(Gotra Kya Hai) | इन सभी जातियों में गोत्र भी समान रूप से पाए जाते है | इसका कारण यह है कि वर्णव्यवस्था के अनुसार व्यक्ति के गुण-कर्म व व्यवहार जिस वर्ण से सम्बन्ध रखते थे उसे उस वर्ण का हिस्सा बना दिया गया चाहे वह किसी भी गोत्र से संबंध क्यों न रखता हो | यही कारण है कि कौशिक ब्राह्मण भी हैं, क्षत्रिय भी. कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण भी हैं और राजपूत भी और पिछड़ी जाति वाले भी | अपना गोत्र पता करने की आवश्यकता क्यों है ? या गोत्र का प्रयोग किन-किन कार्यों में होता है : मुख्य रूप से गोत्र का प्रयोग विवाह संबंध स्थापित करते समय व सभी प्रकार के धार्मिक कार्य जैसे विशेष पूजा -अनुष्ठान , गृह प्रवेश, हवन(यज्ञ ) आदि के समय किया जाता है | विवाह में लड़का -लड़की व उनके माता और दादी का गोत्र का मिलान किया जाता है | इनमें से किसी एक एक गोत्र में भी समानता होने पर विवाह संभव नहीं माना जाता | अपना गोत्र कैसे पता करें : अपने गोत्र के विषय में एक व्यक्ति को जानकारी उसके परिवार के बड़े-बूढों से ही मिलती है | इसलिए अपने गोत्र के विषय में पता करने का व इस परम्परा को अपने वंशज तक पहुँचाने का एकमात्र तरीका यही है कि आप अपने अपने बड़े-बूढों से गोत्र के विषय में पता कर अपने पुत्र व प्रपौत्र से यह साँझा करें(Gotra Kya Hai) | यदि आपके परिवार में कोई बड़ा-बुजुर्ग नहीं है और आप अपने गोत्र के विषय में नहीं जानते है तो इस विषय में आप अपने आस-पास के लोगों से जानकारी ले सकते है | जैसे : यदि आप गाँव के रहने वाले है तो अक्सर ऐसा होता है कि गाँव में अधिकांश घर एक ही गोत्र के होते है | ऐसी स्थिति में आप आसानी से अपने आस-पास के लोगों से अपना गोत्र पता कर सकते है | अन्य जानकारियाँ : हम भगवान कृष्ण को जिस रूप में प्राप्त करने का यत्न करते है वे हमें उसी रूप में स्वीकार करते है इस संसार को चलाने वाली शक्ति से परिचय राम नाम की महिमा – पौराणिक कहानी कभी-कभी ऐसा होता है कि आपके पूर्वज पिछले 40 या 50 वर्षो से शहर में रहने लग गये है | ऐसे में आप पहले यह पता करने की कोशिश करें कि आपके पूर्वज किस गाँव के रहने वाले थे | उस गाँव में जाकर आप आस-पास के लोगों से अपने गोत्र के विषय में जानकारी ले सकते है | इन सबके अतिरिक्त ऐसी कोई ज्योतिष विद्या प्रचलन में नहीं है कि जिससे आपको आपके गोत्र के विषय में जानकारी दी जा सके | अपने गोत्र(Gotra Kya Hai) के विषय में पता करने के लिए आपको स्वयं से ही प्रयास करने होंगे | ॐ सूर्याय नमः 🌅👣👏🚩ॐ नमो नारायण ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ नमः शिवाय ॐ भास्कराय नमः ॐ गं गनपतये नमः नमस्कार शुभ प्रभात शुभ बुधवार जय श्री गणेश 👏🌹

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*पिता का गोत्र पुत्री को प्राप्त नही होता*

आइए जाने क्यूँ ?

अब एक बात ध्यान दें की स्त्री में गुणसूत्र xx होते है और पुरुष में xy होते है ।
इनकी सन्तति में माना की पुत्र हुआ (xy गुणसूत्र). इस पुत्र में y गुणसूत्र पिता से ही आया यह तो न...

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Krishna Singh Mar 8, 2018

गोत्र ज्ञान...
१.अत्रि गोत्र,
२.भृगुगोत्र,
३.आंगिरस गोत्र,
४.मुद्गल गोत्र,
५.पातंजलि गोत्र,
६.कौशिक गोत्र,
७.मरीच गोत्र,
८.च्यवन गोत्र,
९.पुलह गोत्र,
१०.आष्टिषेण गोत्र,
११.उत्पत्ति शाखा,
१२.गौतम गोत्र,
१३.वशिष्ठ और संतान (क)पर वशिष्ठ गोत्र, (ख)अपर...

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