गुरु__कृपा

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*🌸 श्री भक्तमाल – श्री पादपद्माचार्य जी 🌸💐👏🏻* श्री सम्प्रदाय के एक महान् गुरुभक्त संत हुए है श्री गंगा धराचार्य जी , जिनकी गुरु भक्ति के कारण इनका नाम गुरुदेव ने श्री पादपद्माचार्य रख दिया था । श्री गंगा जी के तट पर इनके सम्प्रदाय का आश्रम बना हुआ था और अनेक पर्ण कुटियां बनी हुई थी । वही पर एक मंदिर था और संतो के आसन लगाने की व्यवस्था भी थी । स्थान पर नित्य संत सेवा , ठाकुर सेवा और गौ सेवा चलती थी । एक दिन श्री गंगाधराचार्य जी के गुरुदेव को कही यात्रा पर जाना था । कुछ शिष्यो को छोड़ कर अन्य सभी शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! हमे भी यात्रा पर जाने की इच्छा है । कुछ शिष्य कहने लगे – गुरुजी ! आप हमें कभी अपने साथ यात्रा पर नही ले गए , हमे भी साथ चलना है । श्री गंगाधराचार्य जी गुरुदेव के अधीन थे । वे कुछ बोले नही , शांति से एक जगह पर खड़े थे । अब गुरुजी ने देखा कि सभी शिष्य यात्रा पर चलना चाहते तो है परंतु आश्रम में भगवान् ,गौ और संत सेवा करेगा कौन और अन्य व्यवस्था देखेगा कौन ? गुरुदेव ने श्री गंगाधराचार्य जी को अपने पास बुलाया और कहा – मै कुछ समय के लिए यात्रा पर जा रहा हूं । आश्रम की संत ,गौ और भगवत् सेवा का भार अब तुमपर है । श्रद्धा पूर्वक आज्ञा का पालन करो , हमे तुमपर पूर्ण विश्वास है । श्री गंगाधराचार्य जी ने प्रणाम किया और कहा – जो आज्ञा गुरुदेव । गुरुदेव जब जाने लगे तब श्री गंगाधराचार्य जी के मुख पर कुछ उदासी उन्हे दिखाई पड़ी । गुरुदेव ने कहा – बेटा ! तुम्हारे मुख मंडल पर प्रसन्नता नही दिखाई पड़ती , क्या तुम हमारी आज्ञा से प्रसन्न नही हो ? श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – गुरुदेव भगवान् आपकी आज्ञा शिरोधार्य है परंतु जब मै आपकी शरण मे आया था तब मैंने यह प्रतिज्ञा की थी कि मै नित्य ही आपका चरणामृत ग्रहण और आपका दर्शन किये बिन कोई अन्न- जल ग्रहण नही करूँगा । गुरुदेव ने कहा – कोई बात नही , श्री गंगा जी को आज से मेरा ही स्वरूप जानकर इनका जल ग्रहण करो और दर्शन करो । गुरु भी पतित को पावन बनाते है और गंगा जी भी पतित को पावन बनाती है । श्री गंगाधराचार्य जी ने कहा – जो आज्ञा गुरुदेव और चरणों मे प्रणाम किया । अपनी अनुपस्थिति मे अपने समान गंगा जी को मानने का उपदेश देकर चले गये । गंगाधराचार्य नित्य गुरूवत् गंगा जी की उपासना करने लगे । नित्य आश्रम में गौ , संत , ठाकुर सेवा उचित प्रकार से करते थे । अतिथियों का सत्कार और प्रसाद बनाना , स्वच्छता आदि सब कार्य अकेले ही करते थे । प्रातः काल श्री गंगा जी का दर्शन करते और गंगा जल गुरुदेव का चरणामृत समझकर ग्रहण करते थे । आरती करते और दण्डवत् प्रणाम निवेदन करते । अन्य कोई शिष्य श्रद्धा पूर्वक स्नान करते थे परंतु पादपद्म जी हृदय से ही श्री गंगा जी की वन्दना पूजा करते थे । गंगा जी को गुरुदेव का स्वरूप समझते थे और गुरुदेव के शरीर पर चरण कैसे पधरावें ? इससे तो पाप लगेगा यह सोचकर कभी भी गंगाजी मे स्नान नही करते थे । इनके हृदय के भाव को न जानकर दूसरे लोग आलोचना करते थे । अन्य शिष्य गंगाधराचार्य जी की बहुत प्रकार से निंदा करते हुए कहते थे – गुरुजी बाहर क्या चले गए , इसने तो गंगा स्नान करना बंद कर दिया । जाकर कुँए पर स्नान करता है । कुछ दिनो के पश्चात् श्री गुरुदेव जी लौटकर आये और अपना आसान आश्रम में रखा । अभी गुरुजी को आये कुछ ही देर हुई थी कि गंगाधराचार्य जी की निंदा करने के लिए कुछ शिष्य पहुंच गए । कुछ शिष्य जो आश्रम में ही रुके थे ,उन्होंने गुरुजी से कहा – गुरुजी ! गंगाधराचार्य जी ने आपके यात्रा पर जाने के बाद गंगा स्नान करना त्याग दिया , पड़ा प्रमादी है यह तो । श्री गुरुदेव कुछ नही बोले और श्री गंगाधराचार्य जी भी मौन खड़े रहे । गुरुदेव अच्छी तरह से गंगाधराचार्य जी की गुरुनिष्ठा के विषय मे जानते थे परंतु उन्हें उनकी गुरुभक्ति संसार मे प्रकट करनी था । अगले दिन प्रातः काल इनकी गुरूवाक्य और गुरु निष्ठा का परिचय प्रकट करने का निश्चय गुरुदेव ने किया । गुरुदेव ने अपने अन्य शिष्यों सहित गंगाधराचार्य जी को स्नानार्थ श्री गंगा जी की ओर चलने को कहा । गुरुदेव गंगाधराचार्य जी से बोले – बेटा ! हम स्नान करने जा रहे है , तुम मेरे कमंडल अचला और लंगोटी लेकर पीछे पीछे चलो । गुरुदेव गंगा जी में स्नान करने उतरे और थोड़ी देर बाद श्री गंगा धराचार्य जी से कहा – हमारा अचला लंगोटी और कमंडल यहां हमारे पास लेकर आओ । अब गंगा धराचार्य जी धर्म संकट में पड़ गए । वे सोचने लगे – श्री गंगा जी हमारे गुरुदेव का स्वरूप है , गंगा जी मे चरण रखना गुरु का अपमान होगा और यहां प्रत्यक्ष गुरुदेव आज्ञा दे रहे है । अब तो श्री गंगा जी और गुरुदेव ही हमारे धर्म की रक्षा करेगी । इस गुरुनिष्ठ शिष्य की मर्यादा और गुरु भक्ति की रक्षा करने हेतु श्री गंगा जी ने वहां अनेक विशाल कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए । गुरुदेव ने उन कमलपुष्पो पर पैर रखते हुए चलकर शीघ्र अचला ,लंगोटी और कमंडल लेकर आने को कहा । उन्हीपर पैर रखते हुए ये गुरुदेव के समीप दौडकर गये । श्री गंगाधराचार्य जी का जो प्रभाव गुप्त था, वह उस दिन प्रकट हो गया, इस दिव्य चमत्कार को देखकर सभो के मन मे गंगा जी और पादपद्म जी मे अपार श्रद्धा हो गयी । गुरुजी ने कहा – बेटा धन्य है तुम्हारी गुरुभक्ति जिसके प्रताप से गंगा जी ने यह कमलपुष्प उत्पन्न कर दिए । संसार मे आज के पश्चात तुम्हारा नाम पादपद्माचार्य के नाम से प्रसिद्ध होगा । उसी दिन से गंगाधराचार्य जी का का नाम पादपद्माचार्य पड गया । Jay Shri Krishna 🙏🏻💫

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🌷 *समर्थ रामदास और वामन पंडित की कथा* 🌷 *🌅एक बड़ा भारी पण्डित था, वामन पंडित। वह दिग्विजय की मशाल लेकर घूमा। जो उससे शास्त्रार्थ करे, उसको परास्त कर देता। चलते-चलते थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे बैठा। संध्या का समय था। उस वृक्ष पर एक ब्रह्मराक्षस रहता था। दूसरा ब्रह्मराक्षस बैठने को आया तो पहले वाला बोलाः “ऐ ! हट जा, हट जा।”* *🌹दूसरा बोलाः “बैठने की जगह तो है और तू भी ब्रह्मराक्षस, मैं भी ब्रह्मराक्षस, फिर मुझे क्यों हटाता है भैया ?”* *🌹“अरे, तेरे को पता नहीं है। यह पंडित मरकर इधर आयेगा, ब्रह्मराक्षस होकर यहाँ रहेगा। यह उसकी जगह है।”* *“क्यों ?”* *🌹“वह शास्त्रार्थ करके दूसरों को नीचा दिखाता है, अपने अहं को पोसता है। शास्त्र तो अच्छे हैं लेकिन उसने अहं पोसने का रास्ता अपनाया है। अहं पोसने के लिए जो धर्म का उपयोग करता है, वह ब्रह्मराक्षस होने के ही काबिल है न ! उसका स्थान यही है।”* *🌹पंडित वृक्ष के नीचे संध्या कर रहा था। उसकी कुछ पुण्याई होगी, संध्या का कुछ प्रभाव होगा। इन दोनों का संवाद वामन पंडित ने सुन लिया। उसने सोचा, ‘बाप रे ! मैं इतना बड़ा भारी पंडित, मेरे नाम से सारे विद्वान कन्नी काटते हैं, और मैं मरूँगा तो ब्रह्मराक्षस होऊँगा ! जिसको विद्या का गर्व होता है वही तो ब्रह्मराक्षस होता है ! क्या मेरा विद्या का गर्व मुझे ब्रह्मराक्षस की योनि में ले जायेगा !’* *🌹इसीलिए भक्तिमार्ग में ‘मैं’ को झुकाने के लिए पत्थर की मूर्ति के आगे भी लेटकर प्रणाम करना होता है। इस ‘मैं’ को ही मिटाने की यह व्यवस्था है, नहीं तो मूर्ति को तुम्हारे सिर झुकाने से क्या लेना है !* *🌹संध्याकाल में सुषुम्ना नाड़ी खुली रहती है। संध्याकाल कल्याणकारी कालों में से है। चार संध्याकाल होते हैं। सुबह सूर्योदय नहीं हुआ हो पर होने वाला हो और चन्द्रमा दिखाई देने बंद हुए हों तब संधिकाल होता है, वह मंत्रसिद्धि का योग है। उस समय देवता तो सोते हैं, देवता माने इन्द्रियों का आकर्षण सोता है और मंत्र देवता जाग्रत होते हैं। वह आपका शुभ संकल्प फलने की अवस्था होती है। दूसरा दोपहर को 12 बजने के कुछ मिनट पहले और कुछ मिनट बाद संधिकाल होता है। तीसरा सूर्य अस्ताचल को नहीं गये लेकिन सूर्य का प्रकाश दिन जैसा नहीं रहा, कुछ लालिमा रही। सूर्य जब विदा हो रहे हों वह संधिकाल है। चौथा रात्रि को 12 बजे का संधिकाल होता है। इन संधिकालों को चतुर्मास में जो सँभाल ले और ध्यान-भजन करे, उसके ध्यान-भजन में विशेष सफलता, बरकत आदि की सम्भावना है।* *🌹अब उस पंडित के लिए चतुर्मास था कि कौन सा मास था लेकिन पंडित की वह वेला धनभागी वेला थी। जिस वेला में किसी के निमित्त आदमी का अहंकार विसर्जित हो, ममता विसर्जित हो, भगवान की प्रीति जगह, भगवान की शरण जाय, वह धनभागी घड़ियाँ होती हैं।* *🌹वामन पंडित सभी विजयपत्र फाड़ दिये, सारे शास्त्र वहीं विसर्जित कर दिये और हिमालय को चला गया। मैं वामन पंडित को खूब-खूब धन्यवाद दूँगा। ब्रह्मराक्षसों की बात सुनकर सर्वस्व त्यागने का कैसा सामर्थ्य था ! मनुष्य के पास यह बहुत बड़ी ईश्वरीय देन है – सर्वत्याग का सामर्थ्य। मौत तो सर्वत्याग करा देगी, जीते जी सर्वस्व त्याग का सामर्थ्य बना रहे तो सर्व जिसका है, वह सर्वेश्वर आपका आत्मादेव है, वह प्रकट हो जायेगा।* *🌹त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्। (गीताः 12.12)* *🌹वामन पंडित ने वर्षों तपस्या की लेकिन भगवान प्रकट नहीं हुए और न तत्त्वरूप से ही अनुभव हुआ। तो उन्होंने सोचा कि ‘इतना-इतना किया, कुछ नहीं हो रहा है तो अब जीकर क्या करेंगे ! इस अहंकारी शरीर को जिलाकर क्या करना !’ ऐसा सोचकर पहाड़ की चोटी पर चढ़े और ‘जय श्री हरि’ करके नीचे कूदने को गये। हरि तो हरि हैं। मेरे गुरु भी हरि हैं, हरि गुरु हैं। सर्वदेवमयो गुरुः। ‘गु’, ‘र’, ‘उ’… ‘गु’ माने सिद्धिदायक बीज, ‘रू’ माने अज्ञान हटाने वाले, उर में प्रकट होने वाले। भगवान का एक नाम ‘गुरु’ भी है। गुरु प्रकट हुए, हरि प्रकट हुए। हरि, गुरु – ये सब एक ही सद्वस्तु के भिन्न-भिन्न नाम हैं। ईश्वर तो अंतरात्मा है, बाहर प्रकट होकर हाथों में ले लिया और वामन पंडित को रोक दिया। अपना बायाँ हाथ सिर पर रखकर बोलेः “वामन पंडित ! तेरा मंगल हो।”* *🌹“भगवान ! आप इतनी तपस्या और इतनी कसौटी के बाद मिले लेकिन फिर भी… शास्त्र ने तो कहा है कि दायाँ हाथ सिर पर रखते हैं, आपने बायाँ क्यों रखा ?”* *🌹“अरे वामन ! तू इतना विद्वान होकर यह नहीं जानता कि सिर पर दायाँ हाथ रखना गुरु का अधिकार है, भगवान का नहीं। जब तक सिर पर गुरु का दायाँ हाथ नहीं आता, तब यात्रा पूरी नहीं होती।”* *🌹अब जरूरी नहीं कि गुरु अपना दायाँ हाथ ऐसे ही रखें, मानसिक रूप से भी रख सकते हैं, दृष्टि से भी होता है, वह तो गुरु जानते हैं।* *🌹“भगवान ! आपने गुरु के अधिकार की सुरक्षा करने के लिए मेरे सिर पर अपना दायाँ हाथ न रखकर बायाँ हाथ रखा ?”* *“हाँ।”* *🌹“तो क्या गुरु का अधिकार आपसे भी बड़ा है ?”* *🌹“बड़ा है, मैं अवतार लेकर भी गुरु के शरणागत होता हूँ। गुरु तो गुरु ही हैं। वामन पंडित ! जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिलता, तब तक मेरा मायावी रूप दिखता है। वह बुलाने पर प्रकट होता है और बाद में अंतर्धान हो जाता है। कभी किसी निमित्त प्रकट हुआ थोड़ी देर के लिए, फिर अदृश्य हो जाता है लेकिन गुरु तो….।”* *🌹“दायाँ हाथ सिर पर रखने वाले गुरु मुझे कहाँ मिलेंगे ?”* *🌹“वामन ! सज्जनगढ़ में मिलेंगे।”* *🌹“अच्छा, समर्थ रामदास !”* *🌹प्रभु को प्रणाम किया। प्रभु तो अंतर्धान हो गये और ये भाई साहब पहुँचे महाराष्ट्र के सज्जनगढ़ में। समर्थ रामदास जी की स्तुति की। रामदास प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना दायाँ हाथ पीठ पर रखा और बोलेः “वाह-वाह ! आ गये, अपने घर आ गये, ठीक ! अपना अहंकार छोड़ने के लिए तपस्या की और भगवान ने तुम्हें दर्शन दिया, फिर इधर भेजा है, शाबाश !”* *🌹पंडित बोलाः “गुरुदेव ! आपने दायाँ हाथ तो रखा है लेकिन सिर पर क्यों नहीं रखते ?”* *🌹“अरे पगले ! सिर पर तो नारायण ने अपना बायाँ हाथ रख दिया न !”* *🌹“फिर आप दायाँ हाथ क्यों नहीं रखते ?”* *🌹“अरे, नारायण का बायाँ भी नारायण का है दायाँ भी नारायण का है। जब नारायण ने रक दिया तो यहाँ भी तो नारायण है। सब नारायण ही नारायण है। नारायण में से समर्थ रामदास हैं।” दो वचन सुना दिये। वामन पंडित अहंकार रहित हो गये, आत्मजागृति हो गयी, ब्राह्मी स्थिति हो गयी। क्या महापुरुषों की कृपा और क्या सामर्थ्य है ! वामन पंडित गद्गद हो गये कि ‘मेरे सारे शास्त्र और सारी तपस्या गुरुकृपा के आगे बहुत छोटी हो गयी।’* ¸.•*""*•.¸ Զเधे Զเधे ......💖💞 .l ❋━━❥ जय श्री कृष्णा जी ❋━━❥ ╲\ | /╱╭━━━👏🏻☘🥀 _____💖🌹🧡💖

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madhusudan swami Oct 24, 2019

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