गुरु__कृपा

🙇🏻📿👣गुरु का आदेश👣📿🙇🏻 समर्थ गुरु रामदास जी का एक शिष्य था । जो भिक्षा लेने के लिए गांव में गया और घर-घर भिक्षा की मांग करने लगा। समर्थ गुरु की जय ! भिक्षा देहिं.... समर्थ गुरु की जय ! भिक्षा देहिं.... एक घर के भीतर से जोर से दरवाजा खुला । एक बड़ी-बड़ी दाढ़ी वाला तान्त्रिक बाहर निकला और चिल्लाते हुए बोला -- मेरे दरवाजे पर आकर किसी दूसरे का गुणगान करता है। कौन है ये समर्थ?? शिष्य ने गर्व से कहा-- मेरे गुरु समर्थ रामदास जी, जो सर्व समर्थ हैं। तांत्रिक ने सुना तो क्रोध में आकर बोला कि इतना दुःसाहस कि मेरे दरवाजे पर आकर किसी और का गुणगान करे । देखता हूँ कितना सामर्थ्य है तेरे गुरु में । मेरा श्राप है कि तू कल का उगता सूरज नही देख पाएगा अर्थात् तेरी मृत्यु हो जाएगी। शिष्य ने सुना तो देखता ही रह गया और आस-पास के भी गाँव वाले कहने लगे कि इस तांत्रिक का दिया हुआ श्राप कभी भी व्यर्थ नही जाता । बेचारा युवावस्था में ही अपनी जान गंवा बैठा । शिष्य उदास चेहरा लिए वापस आश्रम की ओर चल दिया और सोचते-सोचते जा रहा था कि आज मेरा अंतिम दिन है। लगता है मेरा समय खत्म हो गया है। आश्रम में जैसे ही पहुँचा। गुरु सामर्थ्य रामदास जी हँसते हुए पूछे --- ले आया भिक्षा ? बेचारा शिष्य क्या बोले । गुरुदेव दोबारा हँसते हुए पूछे भिक्षा ले आया ? शिष्य -- जी गुरुदेव! भिक्षा में मैं अपनी मौत ले आया हुँ और सारी घटना सुना दी । फिर एक कोने में चुप-चाप बैठ गया। गुरुदेव बोले अच्छा चल भोजन कर ले। शिष्य -- गुरुदेव ! आप भोजन करने की बात कर रहे हैं और यहाँ मेरा प्राण सूख रहा है। भोजन तो दूर एक दाना भी मुँह में न जा पाएगा। गुरुदेव बोले -- अभी तो पूरी रात बाकी है। अभी से चिंता क्यों कर रहा है। चल ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा और यह कहकर गुरुदेव भोजन करने चले गए। फिर सोने की बारी आई तब गुरुदेव ने शिष्य को बुलाकर आदेश किया -- हमारे चरण दबा दे। शिष्य मायूस होकर बोला जी गुरुदेव ! जीवन के जो कुछ क्षण बचे हैं, वे क्षण मैं आपकी सेवा कर ही प्राण त्याग करूँ यही अच्छा होगा। इतना बोलकर उसने गुरुदेव के चरण दबाने की सेवा शुरू की। गुरुदेव बोले -- चाहे जो भी हो जाय चरण छोड़ कर कहीं मत जाना । शिष्य --- जी गुरुदेव कही नही जाऊँगा। गुरुदेव ने अपने शब्दों को तीन बार दोहराया कि चरण मत छोड़ना, चाहे जो हो जाए। यह कहकर गुरुदेव सो गए। शिष्य पूरी भावना से चरण दबाने लगा। रात्रि का पहला पहर बीतने को था अब तांत्रिक अपनी श्राप को पूरा करने के लिए एक देवी को भेजा जो धन से, सोने-चांदी से, हीरे-मोती से भरी थाली हाथ में लिए थी। शिष्य चरण दबा रहा था। तभी दरवाजे पर वो देवी प्रकट हुई और कहने लगी -- इधर आओ और ये थाली ले लो। शिष्य भी बोला -- जी मुझे लेने में कोई परेशानी नही है लेकिन क्षमा करें । मैं वहाँ पर आकर नही ले सकता। अगर आपको देना ही है तो यहाँ पर आकर रख दीजिए। वह देवी कहने लगी -- नही नही ! तुम्हे यहाँ आना होगा। देखो कितना सारा माल है। शिष्य बोला -- नही। अगर देना है तो यहीं आकर रख दो। तांत्रिक ने अपना पहला पासा असफल देख दूसरा पासा फेंका । रात्रि का दूसरा पहर बीतने को था । शिष्य समर्थ गुरु रामदास जी के चरण दबाने की सेवा कर रहा था । तब रात्रि का दूसरा पहर बीता और तांत्रिक ने इस बार उस शिष्य की माँ का रूप बनाकर एक नारी को भेजा। शिष्य गुरु के चरण दबा रहा था तभी दरवाजे पर आवाज आई -- बेटा ! तुम कैसे हो ? शिष्य ने अपनी माँ को देखा तो सोचने लगा अच्छा हुआ जो माँ के दर्शन हो गए । मरते वक्त माँ से भी मिल ले। वह औरत जो माँ के रूप को धारण किये हुए थी बोली -- आओ बेटा गले से लगा लो । बहुत दिन हो गए तुमसे मिले। शिष्य बोला -- क्षमा करना माँ । लेकिन मैं वहाँ नही आ सकता । क्योंकि अभी गुरुचरण की सेवा कर रहा हुँ। मुझे भी आपसे गले लगना है इसलिए आप यहीं आकर बैठ जाओ। फिर उस औरत ने देखा कि चाल काम नही आ रहा है तो वापिस चली गई। रात्रि का तीसरा पहर बीता और इस बार तांत्रिक ने यमदूत रूप वाला राक्षस भेजा। राक्षस पहुँचकर उस शिष्य से बोला -- चल तुझे लेने आया हुँ। तेरी मृत्यु आ गई है। उठ और चल । शिष्य भी झल्लाकर बोला -- काल हो या महाकाल मैं नही आने वाला । अगर मेरी मृत्यु आई है तो यहीं आकर मेरे प्राण ले लो । लेकिन मैं गुरु के चरण नही छोडूंगा । फिर राक्षस भी उसका दृढ़ निश्चय देखकर वापिस चला गया। सुबह हुई चिड़ियाँ अपने घोंसले से निकलकर चहचहाने लगी। सूरज भी उदय हो गया। गुरुदेव रामदास जी नींद से उठे और शिष्य से पूछा -- सुबह हो गई क्या ? शिष्य बोला -- जी गुरुदेव ! सुबह हो गई । गुरुदेव -- अरे ! तुम्हारी तो मृत्यु होने वाली थी न, तुमने ही तो कहा था कि तांत्रिक का श्राप कभी व्यर्थ नही जाता। लेकिन तुम तो जीवित हो..!! गुरुदेव ने मुस्कराते हुए ऐसा बोला। शिष्य भी सोचते हुए कहने लगा -- जी गुरुदेव ! लग तो रहा हुँ कि जीवित ही हुँ। अब शिष्य को समझ में आई कि गुरुदेव ने क्यों कहा था -- चाहे जो भी हो जाए चरण मत छोड़ना। शिष्य गुरुदेव के चरण पकड़कर खूब रोने लगा । बार-बार मन ही मन यही सोच रहा था -- जिसके सिर उपर आप जैसे गुरु का हाथ हो तो उसे काल भी कुछ नही कर सकता है। मतलब कि गुरु की आज्ञा पर जो शिष्य चलता है, उससे तो स्वयं मौत भी आने से एक बार नही अनेक बार सोचती है। करता करें न कर सके गुरु करे सो होय तीन-लोक नौ खण्ड में गुरु से बड़ा न कोय पूर्ण सद्गुरु में ही सामर्थ्य है कि वो प्रकृति के नियम को बदल सकते हैं। जो ईश्वर भी नही बदल सकते । क्योंकि ईश्वर भी प्रकृति के नियम से बंधे होते हैं। लेकिन पूर्ण सद्गुरु नही। 📿🙇🏻👣गुरु चरणों से लगे रहना👣🙇🏻📿

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🌴गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते📿 वृंदावन मे एक संत के पास कुछ शिष्य रहते थे उनमे से एक शिष्य मंद बुद्धि का था। एक बार गुरु देव ने सभी शिष्यों को अपने करीब बुलाया और सब को एक मास के लिए ब्रज मे अलग-अलग स्थान पर रहने की आज्ञा दी और उस मंद बुद्धि को बरसाने जाकर रहने को कहा। मंद बुद्धि ने बाबा से पुछा बाबा मेरे रहने खाने की व्यवस्था वहा कौन करेगा। बाबा ने हंस कर कह दिया राधा रानी, कुछ दिनों बाद एक एक करके सब बालक लौट आए पर वो मंद बुद्धि बालक नही आया। बाबा को चिंता हुई के दो मास हो गए मंद बुद्धि बालक नही आया जाकर देखना चाहिए, बाबा अपने शिष्य की सुध लेने बरसाने आ गए। बाबा ने देखा एक सुन्दर कुटिया के बाहर एक सुन्दर बालक बहुत सुन्दर भजन कर रहा है, बाबा ने सोचा क्यों ना इन्ही से पुछा जाए। बाबा जैसे ही उनके करिब गए वो उठ कर बाबा के चरणों में गिर गया और बोला आप आ गए गुरु देव! बाबा ने पुछा ये सब कैसे तु ठीक कैसे हो गया शिष्य बोला बाबा आपके ही कहने से किशोरी जी ने मेरे रहने खाने पीने की व्यवस्था की और मुझे ठीक कर भजन करना भी सिखाया। बाबा अपने शिष्य पर बरसती किशोरी जी की कृपा को देख खुब प्रसन्न हुए और मन ही मन सोचने लगे मेरे कारण मेरी किशोरी जी को कितना कष्ट हुआ। उन्होंने मेरे शब्दो का मान रखते हुए मेरे शिष्य पर अपनी सारी कृपा उडेल दी। इसलिए कहते है गुरू की बात को गिरिधारी भी नही टाल सकते।

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Champatlal mali Jul 5, 2020

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