गुरुग्रंथ

*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.76 : पाप और पारे को कोई हजम नहीं कर सकता* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 76)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! अपने देश में ‘महाभारत' नाम से एक बहुत बड़ी पुस्तक है। बहुत लोग पढ़ते हैं। एक ही परिवार के दो नामधारी परिवार थे - एक कौरव और दूसरा पाण्डव। पाण्डव पाँच भाई थे। कौरव एक सौ भाई थे। पाण्डवों में युधिष्ठिर श्रेष्ठ थे, बड़े धर्मात्मा थे। बारह वर्ष वनवास और तेरहवाँ वर्ष अज्ञात वास किया। *बारह वर्ष तक उनको बड़ा कष्ट हुआ, किंतु उसमें बड़े-बड़े अच्छे साधु-संतों के दर्शन होते रहे। तीर्थ-स्नान करते थे, दान-पुण्य करते थे।* बड़े दुर्गम-से-दुर्गम स्थान में जाते थे। जहाँ स्वयं नहीं जा सकते थे, वहाँ घटोत्कच अपनी देह पर बैठाकर तीर्थ-स्नान कराते थे। होते-होते लड़ाई हुई। उनकी जीत हुई, राजा हुए। अश्वमेध यज्ञ किया। राज्य-प्राप्ति के पहले राजसूय यज्ञ भी किया था। वे बहुत पुण्य करते थे। उनके सहायक भगवान श्रीकृष्ण थे। उनके यहाँ भगवान बहुत रहते थे। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से उम्र में छोटे थे। युधिष्ठिर को भगवान श्रीकृष्ण प्रणाम भी करते थे। भगवान की सहायता से उनलोगों की जीत हुई थी। *भगवान जब इस संसार से चले गए, तो वे बिल्कुल पुरुषार्थहीन हो गए।* श्रीकृष्ण के नहीं रहने से उनलोगों को बहुत वैराग्य हुआ और तमाम तीर्थों में दान-पुण्य, स्नान करते हिमालय में कोई कहीं गिरे, तो कोई कहीं गिरे। युधिष्ठिर देह-सहित स्वर्ग गए, किंतु पहले उनको नरक का दर्शन कराया गया। भगवान का दर्शन, दान-पुण्य, तीर्थ व्रत; सब कुछ होते हुए भी जरा-सा झूठ बोलने के कारण नरक उनको देखना पड़ा। विशेष पुण्य किया था, उसके बदले स्वर्ग मिला। *थोड़ा पाप किया था, इसलिए थोड़े काल नरक देखना पड़ा।* आपलोग अपने-अपने मन में सोचिए कि कितना पाप किया, उसका क्या फल होगा? *ऐसा नहीं कि पाप-कर्म पुण्य-कर्म करने से नष्ट हो जाता है।* पाण्डव बिल्कुल भगवान श्रीकृष्ण पर निर्भर थे। अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण का इतना भक्त था कि नारायणी सेना न लेकर केवल भगवान श्रीकृष्ण को लिया, किन्तु पाप-कर्म का फल कटा नहीं, भोगना पड़ा। *श्रीरामकृष्ण परमहंसजी ने कहा है - 'पाप और पारे को कोई भी हजम नहीं कर सकता।* पाण्डवों का इस तरह से दान-यज्ञ आदि करने पर भी पाप-कर्म कटा नहीं, तब फिर क्या उपाय है कि जिससे पाप कटे? विभीषण जब भगवान श्री राम के पास गया, तो वानरी सेना ने पहले तो भगवान श्रीराम के पास जाने नहीं दिया; किंतु भगवान श्रीराम की आज्ञा से फिर उनके सामने किया गया। भगवान श्रीराम ने कहा – *सन्मुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।* सुनकर आश्चर्य होगा कि भगवान श्रीराम ने जो कहा, उसके अनुकूल भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख पाण्डवों के होने पर भी पाप का नाश कैसे नहीं हुआ? भगवान ने करोड़ जन्म का नाम कहा, किंतु ऐसा नहीं कहा कि सब जन्मों का। यदि करोड़ जन्म से विशेष का पाप हो, तो सब पाप नाश कैसे होगा? ध्यानविन्दूपनिषद् में है - *यदि शैल समं पापं विस्तीर्णं बहुयोजनम्। भिद्यते ध्यानयोगेन नान्यो भेदः कदाचन।।* कई योजन तक फैला हुआ पहाड़ के समान यदि पाप हो तो वह ध्यानयोग से नष्ट हो जाता है, इसके समान पापों को नष्ट करनेवाला कभी कुछ नहीं हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है - *सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।* अर्थात् सब धर्मों को छोड़कर तू केवल एक मेरी शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर। हो सकता है कि सब धर्मों को छोड़ने में कसर हो। लोग बहस करने लगते हैं कि सब धर्मों को कैसे छोड़ा जाय? पिता-माता की सेवा धर्म है, क्या यह धर्म छोड़ दिया जाय? कर्म होने पर धर्म होता है। कर्म बड़ा है, धर्म छोटा है। इन्द्रियों से आप कर्म करते हैं। *इन्द्रियों से कर्म छूट जाय, तब धर्म से बचेंगे। जिसके द्वारा इन्द्रियाँ काम करती हैं, वह इन्द्रियों में रहने नहीं पावे, तब इन्द्रियों से कर्म नहीं होगा। कर्म नहीं होगा तो धर्म नहीं होगा।* ऐसा भजन कीजिए कि इन्द्रियों से कर्म न हो। मन-बुद्धि से भी ऊपर वृत्ति उठ जाय, तब वह परमात्मा की शरण हो जाएगा। *पाप-वृत्तिवाला विषयी होता है। विषयी का मन बाहर में लगा रहता है।* उसका मन अंदर-भीतर प्रवेश नहीं कर सकता। जो पाप नहीं करता, उसका मन अंदर में प्रवेश करता है और ध्यान के द्वारा कर्म-मण्डल को भी पार कर जाता है। तब वह काग से हंस हो जाता है, जिसके लिए तुलसी साहब ने कहा – *आली अधर धार निहार निजकै निकरि सिखर चढ़ावहीं। जहाँ गगन गंगा सुरति जमुना, जतन धार बहावहीं।। जहाँ पदम प्रेम प्रयाग सुरसरि धुर गुरू गति गावहीं। जहाँ संत आस विलास बेनी विमल अजब अन्हावहीं।। कृत कुमति काग सुभाग कलिमल कर्म धोय बहावहीं। हिय हेरि हरष निहारि घर कौ पार हंस कहावहीं।। मिलि तूल मूल अतूल स्वामी धाम अविचल बसि रही। आलि आदि अंत विचारि पद कौ तुलसी तब पिउ की भई।।* ध्यानविन्दूपनिषद् में है कि *ध्यानयोग द्वारा पापों से छूट जाएगा।* ध्यानाभ्यासी पाप-पुण्य, दोनों से छूटकर परमात्मा को पाता है। इसलिए सब कोई ध्यानी बनो। पलंग पर बैठो या अपने योग्यतानुकूल बिछावन पर आराम से बैठो, *शरीर का, मन का आलस्य छोड़ो, ध्यान करो।* प्रारब्ध, संचित और क्रियमाण-कर्म तीन तरह के होते हैं। जो कर्म हम वर्तमान में करते हैं,वे क्रियमाण कहलाते हैं। ये क्रियमाण कर्म ही एकत्रित होने पर सञ्चित कहलाते हैं। उसी सञ्चित में से जब जिसका भोग करने लगते हैं, तब वह प्रारब्ध कहलाता है। जो ध्यानी होगा, वह पाप-कर्म नहीं करेगा; पुण्य-कर्म में आसक्ति नहीं रखेगा कि हमको यह फल मिले। ध्यान के द्वारा कर्ममण्डल से ऊपर जाना होता है। ध्यान करनेवाला पुरुष बुरे कर्मों से बचा रहेगा। वह क्रियमाण में पाप-कर्म नहीं करेगा; संचित कर्म भी उसका छूट जाएगा; क्योंकि वह कर्ममण्डल को पार कर जाएगा। कर्म का फल कर्ममण्डल तक ही लागू हो सकता है, फिर उसका प्रारब्ध कहाँ रहेगा! इसलिए मैं कहता हूँ कि *ध्यानाभ्यास कीजिए। पाप नहीं कीजिए। पुण्य कीजिए तो उसमें आसक्ति नहीं रखिए; क्योंकि पुण्य मीठा जहर है। ईश्वर के भक्त बनिए। ईश्वर से प्रेम कीजिए।* ध्यानी पुरुष पहले जप करता है, फिर परमात्मा के स्थूल रूप का ध्यान करता है, सूक्ष्म रूप का ध्यान करता है और अंत में परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसलिए आपलोग अच्छी तरह ध्यान कीजिए। यह प्रवचन श्रीरायबहादुर श्रीदुर्गादासजी तुलसी (जमालपुर, मुंगेर) के आवास पर दिनांक 18.4.1954 ईo को रात्रिकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.73 : नाद से बढ़कर कोई मंत्र नहीं* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 73)* बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।। धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! संतों की वाणी चाहे संस्कृत, चाहे पाली, चाहे भारती, चाहे किसी भी भाषा में हो, उसमें यही बात है कि *मनुष्य को बहुत पवित्रता से रहना चाहिए। पवित्रता शरीर की और हृदय की भी होनी चाहिए।* पवित्रता में रहते हुए अपने को ऊपर उठाओ। ऊपर उठाने का अर्थ अपने अंदर सूक्ष्मता में प्रवेश करो। यह जैसे-जैसे अधिक होता जाएगा, वैसे-वैसे उधर बढ़ते जाओगे, जिधर ईश्वर का ज्ञान होगा। जैसे-जैसे कोई स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर जाता है, उधर वह अपने को और परमात्मा को पहचानता है। संसार को पहचानते हुए जो भोग भोगते हैं, सबको प्रत्यक्ष है। उसमें कभी कोई सुखी नहीं, कोई तृप्त नहीं। संतों के ख्याल में है कि बारंबार जन्म लेना और मरना पड़ता है। यह शरीर है, कभी-न-कभी अवश्य छूटेगा। फिर दूसरा शरीर होगा। जैसे एक शरीर में सुख-दुःख भोगना होता है, उसी तरह दूसरे-दूसरे शरीरों में भी दुःख-सुख भोगना पड़ेगा। संतों ने कहा - ईश्वर-दर्शन करो। उसको पहचानो, तब कल्याण होगा। संतों की वाणी में इसी का उपदेश है, प्रेरण है। हृदय की शुद्धि यानी हृदय की पवित्रता के लिए उन्होंने कहा - हृदय में राग, द्वेष, काम, क्रोध आदि विकार नहीं रखो। किसी से वैर भाव के कारण जो उसका अनिष्ट सोचता है, वह कभी ऊर्ध्वगति को प्राप्त नहीं कर सकता। संतों में सबसे बड़ी शक्ति सहनशक्ति है। उसको अपनाओ। अंदर में प्रवेश करने के लिए, स्थूल से सूक्ष्म में जाने के लिए ऐसा ध्यान हो कि एकविन्दुता प्राप्त कर लो। विन्दु इतना सूक्ष्म होता है कि जिसको कोई बाहर में बना नहीं सकता। विन्दु उसको कहते हैं, जिसका स्थान है, परिमाण नहीं अर्थात् परिमाण रहित चिह्न को विन्दु कहते हैं। बाहर में परिभाषा के अनुकूल विन्दु नहीं बन सकता। अपनी दृष्टि को खूब समेटो। दृष्टि को समेटकर एक स्थान पर रखो, अपने अंदर में। एक स्थान पर कहने का मतलब यह कि दृष्टि को वहाँ रखो जहाँ मांस, हाड़, चाम, खून नहीं है। शून्य में ध्यान करो। जब कोई अपने अंदर देखना चाहे, तो देखने के लिए नेत्र बंद करे। तब उसको अंधकारमय आकाश दीखता है। उसमें हाड़, मांस, खून, चाम नहीं है। जो अपनी दृष्टि को ऐसा बनाता है, जैसे सूई में धागा पिरोने में या शिकार में निशाना करने में करते हैं, तब जैसे मन और दृष्टि एक जगह होती है, उसी तरह मन और दृष्टि को अपने अंदर एक जगह रखो। तब जो उदय होगा, वह परम विन्दु है। उस परम विन्दु पर जो ठहरकर रह सकता है, वह सूक्ष्म में प्रवेश कर जाता है। ऐसा प्रवेश कर जाने से बाह्य पदार्थों की आसक्ति छूट जाती है। या यों भी कहिए कि आरंभ में मन की आसक्ति को छोड़कर ध्यान करता है, तब ऐसा होता है। उसके लिए ध्यान करने में कोई तकलीफ नहीं होती। फेफड़े में चोट नहीं लगती। हाँ, ध्यान करने में मस्तिष्क में कुछ भारीपन अवश्य लगता है। तो जब ऐसा लगे, तब ध्यान करना छोड़ दीजिए। फिर पीछे कीजिए। जैसे कमजोर शरीरवाले का शरीर व्यायाम करते-करते मजबूत होता है, उसी प्रकार ध्यान करते-करते उसका ध्यानबल बढ़ जाता है। सूक्ष्म में प्रवेश करने पर नाद को प्राप्त करता है। योगशिखोपनिषद् में कहा गया है - नास्ति नादात्परो मंत्रः न देवः स्वात्मनः परः। नानुसंधेः परा पूजा न हि तृप्तेः परं सुखम्।। नाद से बढ़कर कोई मंत्र नहीं, अपनी आत्मा से बढ़कर कोई देवता नहीं है, (नाद वा ब्रह्म की) अनुसन्धि (अन्वेषण वा खोज) से बढ़कर कोई पूजा नहीं है और तृप्ति से बढ़कर कोई सुख नहीं है। इसी को ध्यानविन्दूपनिषद् में कहा गया है - बीजाक्षरं परम विन्दुं नादं तस्योपरि स्थितम्। सशब्दं चाक्षरे क्षीणे नि:शब्दं परमं पदम्।। परम विन्दु ही बीजाक्षर है, उसके ऊपर नाद है। नाद जब अक्षर (अनाश ब्रह्म) में लय हो जाता है, तो नि:शब्द परम पद है। अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्। तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसंशयः।। अनाहत के बाद जो नि:शब्द परमपद है, योगी उसे सबसे बढ़कर समझते हैं, जहाँ सब संशय दूर हो जाते हैं। यह ज्ञान किसी भाषा में हो, ग्रहण करना चाहिए। संतों की वाणी में श्रद्धा होनी चाहिए। जो कोई संतों की वाणी में अश्रद्धा करता है, वह गलत करता है। यदि संतवाणी में हो और उसको करके देखने में लाभ हो, तो उससे बढ़कर और क्या बात हो सकती है। संतों की वाणी में स्थूल ध्यान भी बतलाया गया है। कबीर साहब ने कहा है - गुरु साहब करि जानिये, रहिये शब्द समाय। मिले तो दंडवत बन्दगी, पल पल ध्यान लगाय।। स्थूल ध्यान के बाद सूक्ष्म ध्यान बतलाया गया है। सूक्ष्म ध्यान में विन्दु और नाद का ध्यान है। स्थूल ध्यान में भी दो बातें हैं - स्थूल जप और स्थूल ध्यान। इससे स्थूल ध्यान में दृढ़ होकर सूक्ष्म ध्यान में बढ़े। हृदय की शुद्धता के कारण वह संसार में अच्छी तरह रह सकता है। जो राग- द्वेष रहित है, वह संसार में आसानी से प्रतिष्ठा से रह सकता है। इस प्रकार वह संसार में भी अच्छी तरह रहेगा और परलोक में भी उसका भला होगा। यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत मिरजानहाट में श्रीमान तिलक मोदीजी के आवास पर दिनांक 16.4.1954 ई० को प्रातः कालीन सत्संग में हुआ था। श्री सद्गुरु महाराज की जय

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.70 : बिना प्रेम की सेवा ऊपरी भाव है* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 70)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे सज्जनो! *संतों के ज्ञान में सबसे विशेष बात ईश्वर का ज्ञान है, मोक्ष का ज्ञान है।* यद्यपि दोनों वाक्य पृथक-पृथक मालूम होते हैं, किंतु दोनों दो नहीं, एक ही हैं। ज्ञान के साथ योग रहता है और योग के साथ भक्ति रहती है। *ज्ञानविहीन योग और योगविहीन ज्ञान मोक्षप्रद नहीं होता।* फिर भक्ति के बिना योग और ज्ञान पूरा नहीं होता। इन सब बातों के मूल में ईश्वर का ज्ञान है। यदि ईश्वर को आप न जानें, ईश्वर तत्त्व का बोध नहीं हो तो ज्ञान किसके लिए? ज्ञान में तीन बातें होती हैं - ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय। जो जानने योग्य है, उसका पता नहीं, फिर ज्ञान किसका? बिना ज्ञेय का ज्ञान किस काम का? इसलिए ईश्वर-स्वरूप का निर्णय जानना आवश्यक है। उसे जानना ज्ञान है। *उसमें जो अत्यन्त आसक्ति है, उसको प्राप्त करने के लिए वह प्रेम है, वही भक्ति है।* जहाँ संलग्नता नहीं, वहाँ सेवा-भाव नहीं रह सकता। *बिना प्रेम की सेवा ऊपरी भाव है।* जैसे ज्ञान में तीन बातें होती हैं, वैसे ही भक्ति में भी तीन बातें होती हैं; वे हैं - भक्ति, भक्त और भगवन्त। इन तीनों में से किसी को अलग नहीं किया जा सकता। सेवा में मिलन होता है। मिलन वह कर्म है, जो सेवा के लिए होता है। यदि सेवा और मिलन - दोनों को अलग-अलग कर दो, तो सेवा हो नहीं सकती। मिलन के ही कार्य से सेवा होती है। *भक्ति और योग बिना ज्ञान के छूँछ पड़ जाता है।* इसलिए *भक्ति, ज्ञान और योग - तीनों साथ-साथ रहते हैं।* मूल में बात यह है कि ज्ञातव्य क्या है? किसकी सेवा हो? संतों ने ईश्वर से मिलने, योग करने, सेवा करने के लिए कहा है। संतों की बतायी भक्ति ईश्वर में प्रेम-भाव रखकर भक्ति करने की है। *सबसे पहले ईश्वर का स्वरूप जानना चाहिए।* उपनिषद् और संतवाणी के अनुकूल ईश्वर-स्वरूप ऐसा है कि वह इन्द्रियों के ज्ञान से बाहर है। सांसारिक ज्ञान इन्द्रियों से होता है। आपके शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। वे हैं - आँख, कान, नाक, जीभ और चमड़ा। इनसे पंच विषयों का ज्ञान होता है। एक इन्द्रिय के विषय का ज्ञान दूसरी इन्द्रिय से नहीं होता; जैसे जो ज्ञान कान से होता है, वह नाक से नहीं और जो नाक से होता है, वह आँख से नहीं। *जिस पदार्थ को ईश्वर कहते हैं, उसका ज्ञान इन पाँचों से नहीं हो सकता।* अंदर की इन्द्रियों से भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते। *गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानहु भाई।। - रामचरितमानस* जो माया है, वह विषय है और जो निर्माया है, वह निर्विषय है। बाहर-भीतर की सब इन्द्रियों को छोड़ दीजिए, तब आप स्वयं बच जाते हैं। मन, बुद्धि आदि इन्द्रियों को छोड़ो। बाहर की पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेन्द्रियों को छोड़ो, तब जो बचे, वह आप हैं। यदि कहो कि शरीर किसका? तो कहिएगा मेरा। उसी प्रकार बुद्धि किसकी? तो कहिएगा - मेरी बुद्धि। इस प्रकार आप शरीर और बुद्धि-कुछ भी नहीं, आपके संग शरीर और बुद्धि है। जैसे कपड़ा आप नहीं, आपका कपड़ा है। इस प्रकार *जो मन-बुद्धि से परे है; जो अपने से ग्रहण करने योग्य है, वह ईश्वर है और आप हैं, ईश्वर के अंश।* गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने रामचरितमानस में लिखा है – *ईश्वर अंश जीव अविनाशी। चेतन अमल सहज सुखरासी।।* जैसे बाहर का आकाश और घर का आकाश - दोनों एक ही हैं, लेकिन घर की लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई के कारण उसकी नाप-जोख के अंदर ही शून्य जाना जाता है और बाहर का आकाश उससे विशेष है; किंतु बाहर का आकाश और घर का आकाश तत्त्वरूप में एक ही है। जैसे एक लोटा पानी और दरिया का पानी या समुद्र का पानी तत्त्वरूप में एक ही है। *परमात्मा का जातीय पदार्थ चेतन आत्मा है। इसलिए चेतन आत्मा ही उसे ग्रहण कर सकती है। उसको ग्रहण करने से नित्य सुख-शान्ति मिलती है, तृप्ति होती है। इसी के लिए सभी संतों का कहना है कि उस ईश्वर का भजन करो।* यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत ग्राम पुनामा श्री रामकृष्ण सिंहजी के आवास पर दिनांक 12.4.1954 ई० को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.69 : कोशिश करो तो ईश्वर मदद करेंगे* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 69)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! श्रीराम पिताजी की आज्ञा से वनवास गए। वनवास में कितना कष्ट होता है, लोग जानते हैं। उनको वनवास के लिए उनके पिता ने नहीं कहा कि आप जंगल जाएँ, बल्कि वन जाने के संबंध में वे मौन रहे। उनका मन तो था कि श्रीराम जंगल नहीं जाए तो अच्छा हो। कैकेई के कारण ही श्रीराम वन गए; क्योंकि उन्होंने ही कहा कि श्रीराम वन जाएँ। पिता के मौन रहने का श्रीराम समझ गए कि मुझे वन जाना चाहिए। वन गए और सब कष्टों को सहन किया और संसार का यह कार्य कि दुष्टों का दमन करना चाहिए, किया। भरतजी ननिहाल से घर आए। उनको मालूम हुआ कि श्रीराम जंगल गए। *पिता के मरने का उनको उतना दु:ख नहीं हुआ, जितना कि श्रीराम के वन जाने का।* श्रीराम को लौटाने के लिए भरतजी उनके पास जंगल गए; किन्तु श्रीराम ने कहा कि पिता की आज्ञा मेरे लिए वनवास की है। चौदह वर्षों में एक दिन भी कम रहने से मैं जा नहीं सकता। भरत लौट आए। श्रीराम चौदह वर्षों के बाद अयोध्या आए और अच्छी तरह राज्य करने लगे। प्रजा दुःखी नहीं थी। शोषण, लूट आदि नही थी। प्रजा सब तरह से सुखी थी। श्रीराम ने समझा कि *प्रजा तो संसार में सुखी हैं, किन्तु शरीर छोड़ने पर भी सुखी रहें, इसके लिए श्रीराम को चिन्ता हुई।* महाराजा अशोक भी बहुत अच्छा शासन करते थे। उन्होंने भी प्रजा की मुक्ति के लिए उपाय किया था। *श्रीराम ने समझा कि प्रजा को मामूली सुख - स्वर्ग तो क्या, जिससे मुक्ति हो जाय, ऐसा उपाय करना चाहिए।* इसलिए श्रीराम ने एक बार सभा बुलाकर सबों से कहा कि मैं ममता में आकर नहीं कहता हूँ। बल्कि आपकी भलाई के लिए कहता हूँ। *यह मनुष्य-शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। यह शरीर देवताओं को भी कठिनाई से मिलता है।* आप उच्च वर्ण के हैं या आपको किसी प्रकार का विशेष गुण है, इसलिए बड़े नहीं हैं; बल्कि यह मनुष्य-देह ही बड़े भाग्य से मिलती है। *यह शरीर साधन का भण्डार और मोक्ष का द्वार है।* मोक्ष छुटकारा, मुक्ति को कहते हैं। कोई कारागार में पड़ा हो, उससे छूट जाय, तब कारागार से उसकी मुक्ति है। इसी प्रकार *शरीर रूप कारागार से जीव छूट जाय, यह मुक्ति है।* यह बहुत बड़ी चीज है। मोक्ष और मुक्ति किसकी? जो बंधा हुआ है, जो कैद है। *एक-एक जीवात्मा एक-एक शरीर में कैद है।* यह शरीर पिण्ड है और बाहर का संसार ब्रह्माण्ड है। *पिण्ड और ब्रह्माण्ड में बड़ा सरोकार है।* संसार और शरीर में इतना सम्बन्ध है कि जितने तत्त्वों से शरीर बना है, संसार भी उतने ही तत्त्वों से बना है अर्थात् आपकी देह में पांच तत्त्व - क्षिति, जल, पावक, समीर और गगन है। उसी तरह संसार में भी उपर्युक्त पांचों तत्त्व हैं। यथा – *छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम सरीरा।। - रामचरितमानस* इन तत्त्वों का वजन तो किया नहीं जा सकता, किंतु जितने तत्त्व शरीर में हैं, उतने ही तत्त्व संसार में भी है। जितने तल संसार के हैं, शरीर के भी उतने ही तल हैं। माया के पिण्ड में भी चार तल (स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण) हैं और संसार में भी चार तल हैं। यह मोटा शरीर जो बना है, इसका बारीक रूप इसमें नहीं हैं – कहा नहीं जा सकता। एक मोटा घर आप देखते हैं, तो उसका सूक्ष्मरूप पहले मन में बना लेते हैं, फिर स्थूल रूप बनाते हैं। बड़े-बड़े महल बनाने में चित्र कागज पर खींचकर कारीगर को देते हैं और वह घर बना देता है। बिना सूक्ष्म के स्थूल नहीं बनता; उसी प्रकार बिना कारण के सूक्ष्म नहीं बनता। ब्रह्माण्ड का भी कारण माना जाएगा और पिण्ड का भी। जैसे एक बर्तन बनाना चाहें, तो उस बर्तन के लायक मिट्टी लेकर बर्तन बना सकते हैं, सम्पूर्ण संसार की मिट्टी लेकर नहीं। भूमण्डल भर की मिट्टी लेकर नहीं। उसे आप नाप नहीं सकते; किंतु एक बर्तन में जो मिट्टी लगी है, वह कम है। पदार्थरूप में एक कम है, दूसरा विशेष है। थोड़ी-सी मिट्टी कारण है और अधिक मिट्टी, जिसमें से थोड़ी-सी मिट्टी ली गई, महाकारण है। जिससे सारा पिण्ड-ब्रह्माण्ड बना है, वह प्रकृति है। प्रकृति के जितने अंशों की जरूरत पिण्ड-ब्रह्माण्ड बनाने में होती है, वह अंश कारण है। और फिर सूक्ष्म और स्थूल होता है। ये चारों जड़ हैं। *मनुष्य-शरीर में भी चार तल हैं और ब्रह्माण्ड में भी चार तल। दोनों में इतना सम्बन्ध है कि पिण्ड के स्थूल तल पर जब रहते हैं, तब संसार के भी स्थूल तल पर रहना होता है।* जाग्रत से स्वप्न में जाने पर आपको स्थूल शरीर का ज्ञान नहीं होता, तो आपको स्थूल संसार का भी ज्ञान नहीं रहता। उस समय आप अपने हित-अनहित को नहीं जानते। किस बिछौने पर लेटे हैं, यह भी ज्ञान नहीं रहता। किंतु जगने पर सब मालूम होता है। इसी तरह अपने शरीर के सूक्ष्मतल में जाएँ, तो संसार के भी सूक्ष्म तल का ज्ञान होगा। हमलोग समस्त शरीर में फैले हैं, तो संसार में भी फैले हैं। *शरीर के स्थूल, सूक्ष्म, कारण, महाकारण के तलों से छूट जाएँ, तो संसार के भी सब तलों को पार कर जाएँगे।* इसके लिए ऐसी बात नहीं है कि शरीर छूटने के बाद मुक्ति होगी - ऐसा ज्ञान नहीं दिलाया गया है। यहाँ तो कहा गया है - *लहहिं चारि फल अछत तनु,..........* *जीवनमुक्त ब्रह्म पर, चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरिकथा न करहिं रति, तिन्हके हिय पाषान।। - रामचरितमानस* तथा – *जीवन मुक्त सो मुक्ता हो........ - संत कबीर साहब* जिन्होंने जीवनकाल में हीं चारो तलों से अपना छूटकारा कर लिया, अपने को प्रत्यक्ष पा लिया, तब उनको अपने लिए कुछ करना नहीं रह जाता। एक काम रहता है कि *संसार में वे रहते हैं, तो संसार का उपकार करें। जहाँ सत्संग होता है, वहाँ वे जाते हैं; क्योंकि ऐसे महान जन के जाने से ही सत्संग होता है। नहीं तो सत्संग, सत्संग नहीं होता।* श्रीराम को अपने लिए कुछ करना नहीं था। उन्होंने लोगों को मुक्ति में ले जाने के लिए सभा की और मुक्ति का उपदेश दिया। उन्होंने कहा – *साधन धाम मोक्ष कर द्वारा। पाइ न जेहि परलोक सँवारा।। सो परत्र दुख पावइ, सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि, मिथ्या दोष लगाइ।।* छोटे-छोटे छिद्र को खिड़की और बड़े-बड़े छिद्र को द्वार कहते हैं। आपके शरीर में नौ बड़े बड़े छिद्र हैं। ये ही नौ द्वार हैं। गुरुनानक देव ने कहा - *नउ दरवाजे नवै दर फीके रसु अंम्रित दसवैं चुईजै।* इनके अतिरिक्त एक और द्वार है, जिसको दसवाँ द्वार कहते हैं। आपलोग जानते होंगे कि शिवजी ध्यान में बैठे थे, तो देवताओं ने कामदेव को भेजा। शिवजी का ध्यान छूटा, तो उन्होंने अपनी तीसरी आँख खोल दी। *तब शिव तीसर नयन उघारा। चितवत काम भयउ जरि छारा।।* नौ दरवाजे तो पहले गिना दिए और शिवजी ने तीसरी दृष्टि खोली, यह दसवाँ द्वार है। *इस तीसरी दृष्टि से, क्रूर दृष्टि से देखा जाय, तो नाश हो और दया की दृष्टि से देखें, तो अमृत बरस जाय।* साधु-संत कहते हैं कि केवल शिवजी को यह आँख नहीं थी, सबको है। किन्तु शिवजी का उस पर काबू था। अब भी जो यत्न करेंगे, तो दसवाँ द्वार देख सकते हैं। *जितने साधु-संत हुए हैं, सभी ने इस तीसरी आँख को अपनाया, तब साधु-संत कहलाए।* शिव, पार्वती और गणेश की तीन-तीन आँखों के होने की बात तस्वीर से जानी जाती है। यह तस्वीर सिखाती है कि तीन-तीन आँखें सबको हैं। *जबतक आप नौ दरवाजे में रहिएगा, तो मुक्ति का द्वार नहीं मिलेगा। दसवें द्वार में जाने से मुक्ति का द्वार मिलेगा।* श्रीराम स्वर्ग-वैकुण्ठ जाने की शिक्षा नहीं देते हैं। वे कहते हैं कि तुम्हारे अंदर मोक्ष का द्वार है, उसको प्राप्त करो। वह मुक्ति दिन-रात के अन्दर नहीं है; देश-काल से छूटी हुई रहती है। देश-काल से छूटा हुआ परमात्मा रहता है – *सोक मोह भय हरष दिवस निसि, देस काल तहँ नाहीं। तुलसिदास एहि दसा-हीन, संसय निर्मूल न जाहीं।। - गोस्वामी तुलसीदासजी* परमात्मा देश-काल में नहीं रहते; वे देश-कालातीत हैं। आप यह समझें कि बिना धरती के हम नहीं रह सकते, बिना आकाश के हवा नहीं ले सकते; उसी तरह परमात्मा बिना धरती-आकाश के नहीं रह सकते, तो ऐसी बात नहीं है। *हमलोग साधार हैं; किंतु परमात्मा निराधार हैं।* हमलोगों को पांच तत्वों की आवश्यकता होती है। तीन गुणों के प्रभाव में हम रहते हैं, किंतु परमात्मा के लिए ऐसी बात नहीं है। पिण्ड-ब्रह्माण्ड से छूटकर, समस्त संसार से छूटकर जो अपने को परमात्मा में मिला देता है, वह मोक्ष पाता है। *जीवन काल में जबतक ऐसे पुरुष रहते हैं, तो वे जीवन मुक्त और शरीर छोड़ने पर विदेह-मुक्त कहलाते हैं।* भगवान श्रीराम इसी मोक्ष को प्राप्त करने के लिए कहते हैं। स्वर्ग में जाओ, तो वहाँ भी दु:ख नहीं छूटता। ऊँचनीच पद स्वर्ग में भी होते हैं। ब्रह्मा के धाम में भी अपना कर्मफल भोगना पड़ता है। राजा श्वेत अपने पुण्यकर्म के कारण ब्रह्मलोग गए। *अतिथि-सत्कार नहीं करने के कारण उनको वहाँ भूख-प्यास सताती थी।* ब्रह्मा ने उनको अपने मृत शरीर का मांस खाने की आज्ञा दी। यह कथा बतलाती है कि *ब्रह्मलोक जाने पर भी कर्मफल पीछा नहीं छोड़ता, भोगना पड़ता है।* ऐसे ही जितने लोक-लोकांतर हैं, सबमें यह बात है। वैकुण्ठ से ही जय-विजय गिरे थे। नारदजी मोह लेकर वैकुण्ठ गये; परंतु वहाँ उनका मोह और बढ़ गया। इसीलिए श्रीराम का यह ख्याल नहीं हुआ कि प्रजा किसी लोकलोकांतर में जाकर रहे। बल्कि मोक्ष को प्राप्त करे, इसके लिए शिक्षा दी। उन्होंने कहा – *एहि तन कर फल विषय न भाई। स्वरगउ स्वल्प अन्त दुखदाई।।* विषय पांच हैं - रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द। आँख, जिह्वा, नाक, त्वचा और कान - इन पांचों ज्ञान-इन्द्रियों से जो जानते हैं, वे हैं विषय। मन इन्हीं पांचों विषयों को जानता है। श्रीराम कहते हैं कि मनुष्य-शरीर के अतिरिक्त जिस-जिस शरीर में तुम थे, तब तुमको इन पंच विषयों से छूटने का ज्ञान नहीं था। *अब मनुष्य-शरीर में आये हो, अब तुम पांचों विषयों से ऊपर हो जाओ। यह मनुष्य देह का कर्तव्य है।* स्वर्ग के लिए कहा कि स्वर्ग में स्वल्प सुख है। और अंत में दुःख है। उस स्वर्ग का सुख भी थोड़ा है। *मनुष्य-शरीर पाकर जो विषयों में मन लगाता है, उसके लिए कहा कि अमृत के बदले में वह विष लेता है।* नौ द्वारों में विष है और दसवें द्वार में अमृत है। उसे कभी कोई अच्छा नहीं कह सकता, जो कर्जनी (घुँघची) को ले ले और पारसमणि को फेंक दे। *मनुष्य-शरीर पाकर जो विषयों में मन लगाता है, उसको बहुत हानि होती है।* चार खानियों में चौरासी लाख योनियाँ हैं। अण्डज, पिण्डज, उष्मज और अंकुरज - स्थावर; ये चार खानियाँ हैं। यह अविनाशी जीव चौरासी लाख योनियों में काल, कर्म, स्वभाव, और गुण के घेरे में घूमता रहता है। *कभी दया करके इस जीव को परमात्मा मनुष्य का शरीर देते हैं। यह शरीर संसार-सागर को पार करने के लिए नाव है।* नाव के लिए अनुकूल पवन होना चाहिए। नाव पूरब की ओर जाय और पुरवैया हवा लगे, तो पश्चिम की ओर जाने में सरल होगा। विषय के प्रवाह में हमलोग बह रहे हैं। परमात्मा की कृपारूपी अनुकूल वायु है कि उस विषय की ओर से फेरती है। इस नाव के लिए मल्लाह सद्गुरु हैं। *सद्गुरु उसे कहते हैं, जो स्वयं सद्ज्ञान जाने, सद्ज्ञान की शिक्षा दे, स्वयं परमात्मा का ध्यान करे और दूसरे को ध्यान करने के लिए प्रेरणा दे।* *मुक्ति मारग जानते, साधन करते नित्त। साधन करते नित्त, सत्त चित जग में रहते।। दिन दिन अधिक विराग, प्रेम सत्संग सों करते। दृढ़ ज्ञान समुझाय, बोध दे कुबुधि को हरते।। संशय दूर बहाय, संतमत स्थिर करते। ‘मेँहीँ ये गुण धर जोई,गुरु सोई सतचित्त।। मुक्ति मार्ग जानते, साधन करते नित्त।* मनुष्य-शरीर-रूप नाव प्राप्त है। मनुष्य-शरीर होने से ईश्वर की कृपा हुई है और खोज करे, तो उसे सद्गुरु भी मिल जाय। *इस तरह के साज-सामान को पाकर जो भवसागर से अपना उद्धार नहीं करता, वह आत्महिंसा करनेवाले की जो गति होती है, वह पाता है।* भगवान राम का आज जन्म-दिवस है। हमको चाहिए कि *भगवान के इस उपदेश के अनुकूल मोक्ष प्राप्त करने के लिए अन्तस्साधना करें।* भक्ति करने में संयम कीजिए। संयम यह कि पाप नहीं करें। *पाप करना और ईश्वर की भक्ति; दोनों साथ-साथ नहीं हो सकते।* ‘हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।‘ दोनों एक साथ नहीं हो सकते। इसलिए पाप नहीं कीजिए। सब पापों का मूल है झूठ - झूठ मत बोलो; चोरी नहीं करो; हिंसा नहीं करो; व्यभिचार मत करो; मादक द्रव्यों का सेवन नहीं करो। इन पंच पापों को छोड़ दो। *इन्हें छोड़ने के लिए अपनी शक्ति लगावें तो भगवान भी मदद करेंगे।* लोग समझते हैं कि हम झूठ नहीं बोलेंगे, तो काम नहीं चलेगा; हमसे झूठ नहीं छूट सकता। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा – *जौं तेहि पंथ चलइ मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई।।* *जहाँ आप अपने को बलहीन पाइए, तो भगवान को याद कीजिए और अपनी शक्ति लगाइए, अवश्य मदद मिलेगी।* एक हनुमान-भक्त था। वह बैलगाड़ी हाँकते हुए कहीं जा रहा था। रास्ते में गाड़ी का पहिया पंक में फँस गया। वह गाड़ी पर बैठे-बैठे हनुमानजी को पुकारने लगा - ‘हे हनुमानजी! हे हनुमानजी! मेरी गाड़ी को पंक से निकाल दो।' आर्त पुकार सुनकर एक सज्जन के रूप में हनुमानजी आए और बोले – ‘हनुमानजी! हनुमानजी!! क्या करते हो? गाड़ी से उतरो, कमर में फेटा बांधो और पहिए में जोर लगाओ। तब हनुमानजी का बल मिलेगा। वे मदद करेंगे।‘ वह भक्त गाड़ी से नीचे उतरता है और कमर कसकर पहिए में जोर लगाता है। परिणामस्वरूप गाड़ी पंक से बाहर निकल जाती है। इस कथा से यह जानने में आता है कि *अपने से कोशिश करो, तो ईश्वर मदद करेंगे।* *हिम्मते मरदा मददे खुदा।' God helps those who help themselves.* *ईश्वर उनकी मदद करते हैं, जो अपने से अपने की मदद करते हैं।* कल कहूँगा कि ईश्वर की भक्ति कैसे कीजिएगा। जो सुनिए, उसको बार-बार विचारिए कि क्या सुना। यह श्रवण है। इसके बाद मनन है - सुने को विचारना, फिर है निदिध्यासन। आजकल हर्ष का दिवस है कि हमलोगों का अपना राज्य हुआ है। स्वराज्य = अपना राज्य। स्वराज्य में सुराज लावें। कांग्रेस = बड़ी सभा। कांग्रेस के ऊपर भार है कि इसको किस तरह चलावे। लोग कसूर और पाप न करें। कसूर = जिसका दण्ड राजा दे। पाप = जिसका दण्ड ईश्वर दे। *पाँचों पापों की जो व्याख्या हुई, वह कसूर और पाप दोनों हैं।* कसूर और पाप कैसे छूटेगा? कानून से जेल देते हैं। जेल देते-देते भी यह नहीं छूटता है। कानून भी है और पाप-कसूर भी होते रहते हैं। इसके लिए मैं कहूँगा कि *ईश्वर का भजन करो। नेक-नीयत से रहो। सद्ज्ञान की शिक्षा हो, सदाचार-पालन का प्रचार हो। इस लोक और परलोक - दोनों की इससे सँभाल होगी, उन्नति होगी। घूस, झूठ को हटाइए, स्वराज्य में सुराज आएगा।* यह प्रवचन भागलपुर जिलान्तर्गत ग्राम पुनामा श्री रामकृष्ण सिंहजी के आवास पर दिनांक 11.4.1654 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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