गुरुग्रंथ

*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.93 : समस्त प्रकृति मण्डल को जानिए* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 93)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! *हमलोग संसार में अच्छी हालत में हैं या बुरी हालत में, इसका विचार करना चाहिए।* यदि अच्छी हालत में हैं तो ठीक है। यदि बुरी हालत में हैं, तो क्या इसी हालत में रहना अच्छा है? यदि इससे कोई अच्छी हालत है, तो उसमें जाना चाहिए। *पशु भी बुरी हालत में रहना नहीं चाहता, हम तो मनुष्य हैं।* यह संसार बहुत बड़ा है। जो पढ़े-लिखे हैं, वे जब इस संसार के चित्र को मन में लाते हैं, तो उन्हें बहुत विस्तृत मालूम होता है। संसार के जिस तल पर हमलोग हैं, संसार इतना ही बड़ा नहीं है। हमलोग जिस तल पर रहते हैं, वह स्थूल है। स्थूल तबतक नहीं हो सकता, जबतक इसका पूर्व रूप सूक्ष्म न हो। सूक्ष्म भी तबतक नहीं हो सकता, जबतक उसका पूर्व रूप कारण न हो। इसके, अर्थात् संसार के, स्थूल तल को बहुत लोग भूगोल में पढ़े हैं। किंतु इसके जो दो तल और बच जाते हैं, इसको किसी स्कूल और कॉलेज में किसी ने पढ़ा है? कभी नहीं। *यह संसार अनंत नहीं है, किंतु बहुत बड़ा है।* तुलसीकृत रामायण में है – *प्रकृति पार प्रभु सब उरबासी। ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी।।* एक अनादि-अनंत अवश्य है। दो अनादि-अनंत कभी नहीं हो सकते। दो अनंत के होने से दोनों की सीमा मिल जाएगी, दोनों सान्त हो जाएँगे। *अनंत दो नहीं हो सकते, एक ही होगा।* प्रकृति व्याप्य है और परमात्मा व्यापक है। परमात्मा मोहितेकुल्ल और प्रकृति मोहान है। परमात्मा इस प्रकृति को भरकर और भी आगे है। समस्त प्रकृति मण्डल को जानिए कि कितना बड़ा है? समस्त प्रकृति मण्डल का कहीं नक्शा है? कहीं नहीं। गुरु महाराज कहा करते थे - वह नक्शा मनुष्य के अंदर है, उसने किसी छापेखाने का मुँह नहीं देखा है। बहुत बड़ा संसार है, इसलिए उसको समुद्र कहा गया। इसमें हमलोग रहते हैं, क्या हालत है? आप बड़े धनवान हैं तो क्या आप सब तरह सुखी हैं? आपकी प्रतिष्ठा बहुत बड़ी है। आप बहुत विद्वान हैं तो क्या आप सब तरह सुखी हैं? कभी नहीं। कहेंगे यह दुःख है और वह दु:ख है। महात्मा बुद्ध को भी पेचिश का रोग हुआ। वे पहुँचे हुए महात्मा थे। *समाधि में सुखी रहते थे। समाधि से उतरने पर दु:खी होते थे, उन्होंने अपने शिष्य आनंद से कहा था।* जो पिण्ड में रहता है, स्थूल संसार में रहता है। इससे ऊपर उठता है, तो उन कष्टों से बचता है। उस तल से ऊपर उठकर भगवान बुद्ध रहते थे, तब कष्ट नहीं होता था। इस संसार में कोई सुखी नहीं रह सकता। संत कबीर साहब ने कहा है – *तन धर सुखिया कोइ न देखा, जो देखा सो दुखिया हो। उदय अस्त की बात कहतु हैं, सबका किया विवेका हो।। घाटे बाढ़े सब जग दुखिया, क्या गिरही वैरागी हो। सुकदेव अचारज दुख के डर से, गर्भ से माया त्यागी हो।। जोगी दुखिया जंगम दुखिया, तपसी को दुख दूना हो। आसा तृस्ना सबको व्यापै, कोई महल न सूना हो।। साँच कहौं तो कोइ न मानै, झूठ कहा न जाई हो। ब्रह्मा विष्णु महेसुर दुखिया, जिन यह राह चलाई हो।। अवधू दुखिया भूपति दुखिया, रंक दुखी विपरीती हो। कहै कबीर सकल जग दुखिया, संत सुखी मन जीती हो।।* तुलसी साहब को लोग 'साहब' कहते थे, वे अपने को ‘दास' कहते थे। ‘साहब' अरबी शब्द है। इसका अर्थ है - प्रभु, स्वामी आदि। तुलसी साहब ने कहा है - *आली देख लेख लखाव मधुकर भरम भौ भटकत रही। दिन तीनि तन संग साथ जानौ अंत आनंद फिरि नहीं।।* संत लोग ऐसा ही कहते चले गए हैं। *यह संसार सुख का स्थान नहीं है, दुःख का स्थान है।* यहाँ रहकर हम अच्छी हालत में नहीं रह सकते हैं। इसलिए यहाँ से हमलोग चल दें, तभी अच्छा है। किंतु फिर चलें तो किधर? पूर्व, पश्चिम, उत्तर या दक्षिण? चारो ओर संसार-ही-संसार दिखता है। यह संसार बहुत बड़ा है। ऊपर की ओर आकाश है, यह भी संसार है। नीचे भी संसार है। बचे हुए आठो दिशाओं में भी संसार है। इसलिए किसी जानकार से जानें कि किधर जाएँ? *कबीर साहब कहते हैं - ‘संत सुखी मन जीती हो।* इसलिए मन जीतने की ओर चले। *चंचल मन थिर राखु जबै भल रंग है। तेरे निकट उलट भरि पीव सो अमृत गंग है।। - संत कबीर साहब* चंचल चित्त को थिर करो तो भला रंग देखोगे। तुम्हारे नजदीक ही अमृत की गंगा बहती है। तुम उलटकर पीओ। संत कबीर साहब की एक कड़ी और याद आती है - ‘उलटि पाछिलो पैंड़ो पकड़ो, पसरा मना बटोर।‘ बड़े मजे का भजन है – *मोरे जियरा बड़ा अन्देसवा, मुसाफिर जैहो कौनी ओर।। मोह का शहर कहर नर नारि, दुइ फाटक घन घोर। कुमती नायक फाटक रोके, परिहौ कठिन झिंझोर।। संशय नदी अगाड़ी बहती, विषम धार जल जोर। क्या मनुआँ तुम गाफिल सोवौ, इहवाँ मौरन तोर।। निसि दिन प्रीति करो साहेब से, नाहिंन कठिन कठोर। काम दिवाना क्रोध है राजा, बसैं पचीसो चोर।। सत्त पुरुष इक बसैं पछिम दिसि, तासों करो निहोर। आवै दरद राह तोहि लावै, तब पैहो निज ओर।। उलटि पछिलो पैंड़ो पकड़ो, पसरा मना बटोर। कहै कबीर सुनो भाइ साधो, तब पैहो निज ठोर।।* पता कौन बता देगा? तो कहा - *सत्त पुरुष इक बसैं पछिम दिसि, तासों करो निहोर। आवै दरद राह तोहि लावै, तब पैहो निज ओर।।* मन को जीतने के लिए किधर जाइएगा? आकाश में उड़ने से मन वश होता तो आकाश में उड़नेवाला, वायुयान पर चलनेवाले का मन काबू हो जाता। पहले जानो कि मन कहाँ है? *इस तन में मन कहँ बसै, निकसि जाय केहि ठौर। गुरु गम है तो परखि ले, नातर कर गुरु और।। नैनों माहीं मन बसै, निकस जाय नौ ठौर। गुरु गम भेद बताइया, सब संतन सिरमौर।। - कबीर साहब* ब्रह्मोपनिषद् में भी यही बात है - ‘नेत्रस्थं जागरितं विद्यात्...’ यह आँख में रहता है। *आँख का स्थान सबसे ऊँचा है।* कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों में सबसे ऊँचे में आँख है। कान से भी ऊपर आँख है। संत दरिया साहब बिहारी ने कहा है – *जानिले जानिले सत्त पहचानिले, सुरति साँची बसै दीद दाना। खोलो कपाट यह बाट सहजै मिलै, पलक परवीन दिव दृष्टि ताना।।* इस साधन अभ्यास में – *मन में मन नैनन में नैना, मन नैना एक होइ जाई। मन में मन तब होगा, जब नैनन में नैना होगा।।* दरिया साहब ने कहा - ‘दृष्टि भीतर अब दृष्टि समोए। लागी झरी अमृत रस पोए।।' मन को काबू में करने के लिए बाहर जाना नहीं है। *मन को सम्हाल कर उसके केन्द्र में समेटना है।* समेट लो तो मन में मन हो जाएगा। उसको मिठास मिल जाएगा, अपना आनंद अपना सुख उसको मिल जाएगा। भगवान श्रीकृष्ण के वचन अनुकूल ‘कछुए की तरह अंगों को समेट लेगा।' शरीर के अंग तो नहीं सिमटेंगे, इन्द्रियों की चेतनधारा सिमटेगी। यदि कोई कहे कि यहाँ भी संसार में सुख मिलता है, तो वह अल्प है। भगवान बुद्ध ने कहा यदि विशेष सुख-प्राप्ति की संभावना दीखे तो विशेष सुख की प्राप्ति के लिए स्वल्प सुख छोड़ दे। मण्डल ब्राह्मणोपनिषद् में है - *निद्रा भय सरीसृपं हिंसादि तरंग तृष्णावर्त्तंदारपंकं संसार वार्धितर्तुं सूक्ष्म मार्गमवलम्ब्य..............।|* शरीर के जितने सरोकारी हैं, सब पंक हैं। सन का बंधन, लोहे का बंधन, मजबूत बंधन नहीं है। *जिसमें अपनी ममता है, वह बड़ा बंधन है भगवान बुद्ध ने कहा।* अज्ञानता से ममता उत्पन्न होती है। इस अज्ञानता के कारण हम पंक में लसके हैं। इसको पार करने के लिए सूक्ष्म मार्ग का अवलंब करो। 'मन में मन नैनन में नैना' जो कहा, वह सूक्ष्ममार्ग है। कबीर साहब ने कहा है – *गुरुदेव बिन जीव की कल्पना ना मिटै, गुरुदेव बिन जीव का भला नाहीं। गुरुदेव बिन जीव का तिमिर नासे नहीं, समुझि विचार ले मने माहिं।। राह बारीक गुरुदेव तें पाइए, जनम अनेक की अटक खोलै। कहै कबीर गुरुदेव पूरन मिलै, जीव और सीव तब एक तोलै।।* अनेक जन्मों से इस पिण्ड में अटके थे। यह अटक सूक्ष्म मार्ग के अवलंब से खुलता है। *इस संसार से पार होने के लिए सूक्ष्ममार्ग का अवलंबन करें।* सूक्ष्ममार्ग का अभ्यास करने के लिए गुरु से जानो। इससे आखिर में क्या मिलता है? जीव परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उसकी प्राप्ति में जो मिठास है, उसको पाकर फिर जीव दु:खी नहीं होता। इस संसार में नहीं आता है। ‘फिर आवना नहिं या देश।‘ फर्ज करो कि मैं पहली बार यहाँ (मुरादाबाद) आया। निशाना था कि मुरादाबाद पहुँचें। रास्ते में बहुत शहर से मिले, किंतु वह मुरादाबाद नहीं। सबको पार करता हुआ अब मुरादाबाद पहुँचा हूँ। उसी तरह *अपना लक्ष्य परमात्मा में रखो और चलो।* कबीर साहब ने कहा - ‘उलटि पाछिलो पैड़ो पकड़ो।' इस पिछले पैड़े को पकड़ो। बहिर्मुख से अंतर्मुख होओ। यह चेतन आत्मा सूक्ष्म तल से स्थूल तल (पिण्ड) में आई है। सूक्ष्मतल में जाने को ही ब्रह्माण्ड में जाना कहते हैं। *पिण्ड से ब्रह्माण्ड की ओर चलो, यही उलटना है।* सिमटी हुई चीज की ऊर्ध्वगति होती है। सुरत के सिमटाव से उसकी ऊर्ध्वगति हो जाएगी। रास्ता पकड़ने के लिए सत्संग करो। *जिसमें श्रद्धा हो, उसको गुरु धारण कर उसके बताए हुए रास्ते पर चलो।* सिनेमा की बिजली क्या है? अपने अंदर एक बार भी देख पाओ तो समझ में आ जाए कि सिनेमा की बिजली कुछ नहीं है। अंदर में तारा देखने से क्या होगा? मेरे एक मित्र ने कहा। मैंने कहा - ‘जिस कर्म के करने में विशेष कष्ट होता है, उसको पाकर वह उतना ही सुखी होता है। इस तारे को (बाहर आकाश के तारे को) देखने में क्यों, कष्ट है? गर्दन ऊपर उठाया कि देखा। किंतु अंदर के तारे को देखने में कितना परिश्रम होता है? सतोगुण को पार कर दोनों भौओं के बीच में तारक ब्रह्म *(...सत्त्वादि गुणानतिक्रम्य तारकमवलोकयेत्। भूमध्ये सच्चिदानन्दतेजः कूट रूपं तारकं ब्रह्म।।)* का अवलोकन करने के लिए मंडल ब्राह्मण उपनिषद् में वचन आया है। सतोगुण से कैसे पार होंगे? *बायें इड़ा नाड़ी दक्षिणे पिंगला, रजस्तमो गुणे करि ते छे खेला, मध्ये सत्त्व गुणे सुषुम्ना विमला धर धर तारे सादरे।* दायें-बायें को रोक कर सुषुम्ना में चलो, सतोगुण को भी पार कर जाओगे। यह परा भक्ति है। *श्रवण बिना धुनि सुनै, नयन बिनु रूप निहारै। रसना बिनु उच्चरै, प्रशंसा बहु विस्तारै।। नृत्य चरण बिनु करै, हस्त बिनु ताल बजावै। अंग बिना मिलि संग, बहुत आनंद बढ़ावै।। बिनु शीश नवे जहँ सेव्य को, सेवक भाव लिए रहै। मिलि परमातम आतमा, पराभक्ति सुन्दर कहै।।* इसी का प्रचार गुरु महाराज करते थे। गुरु महाराज की दया से 1909 ईo में मुझे विश्वास हुआ। 1904 ईo में मैंने स्कूल छोड़ा। इस मार्ग के पहिला मेरे गुरु थे बाबू राजेन्द्रनाथ सिंह वकील। मैंने उनसे पूछा - ‘कैसे विश्वास हो कि तारा अंदर में देखने में आवेगा?’ उन्होंने कहा - आकाश के तारे को कैसे देखते हो? बाहर के तारा की ओर नजर करके देखते हो, उसी तरह उस तारा की ओर भी नजर करो तो देखोगे। *जौं लग नहिं देखौं निज नैना। तब लग नहिं मानौं गुरु के बैना।* जिस तरह गुरु कहें उस तरह करो, तब नहीं देखोगे तो कहो कि गुरु झूठा है। जैसा गुरु ने कहा, वैसा किया नहीं और कहे कि नहीं है, ठीक नहीं। यह प्रवचन उत्तरप्रदेश राज्यान्तर्गत मुरादाबाद में दिनांक 10.10.1954 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.92 : संगत ही जरि जाय न चरचा राम की* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 92)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! जैसे प्रत्येक जाप करने की माला में सुमेरु होता है, वैसे ही संसार में सुमेरु पर्वत सबसे ऊँचा है। उसी तरह *धर्मों में सुमेरु ईश्वर की मान्यता है। ईश्वर की मान्यता को हटा दो तो धर्म उथल-पुथल हो जाएगा।* धर्म मिट जाएगा। किसी भी धर्म में जहाँ ईश्वर की मान्यता नहीं है, वहाँ धर्म-भाव अवश्य डगमग रहेगा। संतों में उसकी मान्यता बहुत बड़ी है। संत कबीर साहब कहते हैं – *संगत ही जरि जाय, न चरचा राम की। दूलह बिना बारात, कहो किस काम की।।* ईश्वर की मान्यता को केवल कहा ही नहीं है कि मान लो और बुद्धि से कुछ काम मत लो। बुद्धिगम्य बात यह है कि सोचने-विचारनेवाले जान सकते हैं और निर्णय कर सकते हैं कि *इस विश्व का आदि तत्त्व अवश्य है।* वह आदि तत्त्व ऐसा नहीं कि थोड़ा ही हो, व्यापक न हो। जो व्यापक नहीं होगा, थोड़ा ही होगा अपना तल थोड़ी दूर में समाप्त कर लेता है। तो दूसरे कहेंगे कि उस तल के बाद में क्या है? इस प्रकार कम समझी के साथ संतों ने नहीं कहा है। उन्होंने कहा है जैसे संत बाबा नानक के वचनों में है – *अलख अपार अगम अगोचरि, ना तिसु काल न करमा।।* अपार शब्द का व्यवहार किया। उपनिषद् वाक्यों में भी है - *वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।।* वह ऐसा है जैसा वायु प्रत्येक के अन्दर भी है और बाहर भी है। सबके अंदर और सबके बाहर के तत्त्व पर सोचने से अपार तत्त्व हो जाता है। *वह आदि तत्त्व अनादि-अनंत है।* ऐसा विचार में भी निर्णय होता है। जो स्वरूपतः अनादि-अपरिमित है। तो उसकी शक्ति भी अपार अपरिमित हो तो क्या संदेह है? *अपरिमित, शक्तियुक्त, आदि और अनादि भी।* सबसे पहले का इसलिए आदि और उसका कहीं कभी आदि नहीं - इसलिए अनादि। उसको सर्वेश्वर कुल्ल मालिक मानते हैं। इस ईश्वर का ज्ञान देते हुए संतों ने कहा कि उसका दर्शन आँख से नहीं कर सकते। उसे हाथ से नहीं पकड़ सकते। वह इन्द्रियों के ज्ञान से परे है, इसलिए ‘अगम अगोचर' शब्द कहा। यह कह कर उन्होंने कहा - तुम अपने शरीर और इन्द्रियों से भिन्न पदार्थ अपने शरीर के अंदर रहते हो। इन्द्रियों को छोड़कर तुम क्या कर सकते हो, क्या पहचान सकते हो, इसको नहीं जानते हो। *तुम्हारा काम ईश्वर की पहचान करना है।* इन्द्रियों से ईश्वर की पहचान करना चाहो तो यह ज्ञान अपूर्ण है। प्रेममय गाना को गाना, उसके विचार में तल्लीन होना, केवल इतना ही बस नहीं है। आत्मज्ञान को विचार से विचार लो, सुन लो, समझ लो; किंतु कहोगे कि पहचान नहीं हुई। जाना, किंतु पहचाना नहीं। तुलसी साहब का आदेश है - *हिय नैन सैन सुचैन सुंदरि साजि स्रुति पिउ पै चली।* पिय के पास चलो। चलने के लिए अंतर-दृष्टि का सहारा लो। सहारा कैसे लिया जाए? केवल ख्याली पोलाव नहीं है, जिससे पेट नहीं भरता। यह कैसे होता है? यह गुरुगम्य है। जैसे कोई महिला अपने रूप को बनाती है और पति से मिलने के लिए जाती है, उसी प्रकार जीवात्मा अपने को अंतर-दृष्टि से सजाकर ईश्वर से मिलने के लिए जाती है और इसकी युक्ति गुरु से प्राप्त होती है। अन्न-अन्न कितनाहू कहो, किंतु बिना भोजन किए पेट नहीं भरता। इसी तरह ज्ञान की बातें कितनी ही कहो, इससे ज्ञान के पद तक पहुँचा नहीं जाता और न संतुष्टि होती है। जो ईश्वर सर्वव्यापी है, उनको पहचानने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं, यदि ऐसा कोई कहे तो वे सज्जन अपने हृदय पर हाथ रखकर कहें ‘सर्वेश्वर-सर्वेश्वर कहते-कहते कभी उनको प्रत्यक्ष हुआ?’ मिट्टी में पानी अवश्य है, किंतु बिना खोदे नहीं मिलता। मिट्टी खोदते-खोदते पानी तक जाओ, तभी पानी पाओगे। उसी तरह तुम अपने अंदर धँसो तो सर्वेश्वर को पाओगे। इसी को ‘सब क्षेत्र क्षर अपरा परा पर और अक्षर पार में। निर्गुण सगुण के पार में......।। वाले भजन में कहा गया है। किसी सज्जन ने मुझसे कहा - ‘सब पार में ही है, इधर नहीं है?’ मैंने कहा - 'इधर भी है, किंतु उसे पहचान नहीं सकते। उधर अर्थात् मायिक आवरणों से पार जाकर ही पहचान करेंगे।' ईश्वर को पार नहीं किया जाता। सृष्टि के तत्त्वों को जिधर पार करो (उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम) उधर ही मिल जाएँगे। इन तत्त्वों को पार करना ही कठिन मसला है। मेरे सामने सृष्टि के तत्त्व हमेशा रहते हैं। इसीलिए उपनिषद् में है *जिस इस (देशकालाविच्छिन्न वस्तु) की लोक उपासना करता है, वह ब्रह्म नहीं है।* *यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनोमतम्। तदेव ब्रह्मत्वं विद्धिनेदं यदिदमुपासते।। - केनोपनिषद्* यह जो भूतल है, एक महान टापू है। कई महादेश हैं, सब मिलाकर महान टापू है। इन सबको जिधर पार करो, उधर ही जल है। उसी तरह सृष्टि के तत्त्वों को जिधर पार करो, उधर ही ईश्वर है। ईश्वर का स्वरूप और उसका ज्ञान ऐसा देकर संतों ने कहा है - *ईश्वर का भजन करो। भजन वही है, जिससे सृष्टि के सब तत्त्वों को पारकर ईश्वर को पहचाना जा सके।* इसी को हमलोग समझते, सोचते और विचारते हैं। मायिक तत्त्वों से ही मनुष्य-पिण्ड बना है। जिसमें सतगुरु बाबा देवी साहब ने चौदह दर्जे बताए हैं। मूलाधार से आज्ञाचक्र तक छह और उसके ऊपर आठ दर्जे मानते हैं। इन चौदहों दर्जे में आप चले तो धर्म की सचाई मापने में आ जाएगी। उन्होंने कोई खास किताब नहीं लिखी। तुलसी साहब की घटरामायण उन्होंने छपवायी, उसकी भूमिका में यह लिखा है। हमलोगों को चाहिए कि *ईश्वर की उपासना अंतर्मुख होकर करें।* उपनिषद् में बड़ा अच्छा लिखा है - *नाविरतो दुश्चरितानाशान्तो ना समाहितः। नाशान्तो मानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात्।। – कठोपनिषद्* जो पाप कर्मों से निवृत्त नहीं हुआ है, जिसकी इन्द्रियाँ शान्त नहीं हैं और जिसका चित्त असमाहित या अशान्त है, वह इसे आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं कर सकता है। *पाप करनेवाला विषयों में लसका हुआ रहता है।* जो अपने को पापों से छुड़ावे, वही उसको पा सकता है। पापों से छूटने के लिए संतों ने कहा है - झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार मत करो। *इनसे छूटने की ताकत आपमें तब होगी, जब आप इनसे बचने के लिए कोशिश करेंगे और आप की चढ़ाई ऊपर होगी।* इन दोनों प्रकारों की कोशिश होनी चाहिए। इसलिए ‘नाम का तेल सुरत की बाती, ब्रह्मअगिन उद्गारु रे।' आँख बंदकर देखो और सोचो कि मैं कहाँ हूँ? आपको उत्तर आवेगा - मैं अंधकार में हूँ। इसमें क्या मिलेगा? अंधकार में क्या मिलेगा? *भगवान बुद्ध ने कहा - ‘अंधकारेन ओनद्धा प्रदीपं न गवेस्सथ।' अंधकार में पड़े हुए तुम प्रदीप की खोज क्यों नहीं करते?* कोई कहे मैं तो विद्वान हूँ, मैं अंधकार में कहाँ हूँ? तो आप आँख बंदकर देखिए, अंधकार मिलेगा। आपके अंदर प्रकाश का तल भी है। अंधकार के तल को पार कीजिए, फिर प्रकाश का तल मिलेगा। तब ‘जगमग जोत निहारु मंदिर में’ संत कबीर साहब की यह वाणी चरितार्थ होगी। यह कोई गप की बात नहीं है। *सब कोई अभ्यास कीजिए, प्रत्यक्ष होगा।* यह प्रवचन उत्तरप्रदेश राज्यान्तर्गत मुरादाबाद में दिनांक 10.10.1954 ईo के प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.91 : स्तुति, प्रार्थना और उपासना* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 91)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! बारंबार का जन्म लेना दु:खकर है। इसलिए संतों ने साग्रह कहा कि *इस जन्म-मरण से छूट जाने के लिए ईश्वर का भजन करो।* जिस प्रकार कोई भले आदमी किसी के दुःख को देखकर उसको सुख पाने की शिक्षा देते एवं उपाय करते हैं, उसी प्रकार संतों ने संसार के लोगों को दुखिया देखकर ईश्वर की भक्ति करने के लिए बताया। ईश्वर की भक्ति में केवल तीन बातों को बताया गया - *स्तुति, प्रार्थना और उपासना।* स्तुति कहते हैं यशगान को। अपने उपकारक का गुणगान करना स्तुति है। ईश्वर ने माता के गर्भ-काल से ही सबों की रक्षा की है। जन्म लेने से पूर्व ही माता के पास दूध का भण्डार देना, यह ईश्वर की दया है। हमलोग हर घड़ी, हर समय, हर जगह ईश्वर से अपने को उपकृत पाते हैं। *ऐसे परम उपकारक परम प्रभु परमात्मा का यशगान नहीं करना कृतघ्नता है।* प्रार्थना कहते हैं, माँग को। ईश्वर से क्या माँगें? ईश्वर से ईश्वर को माँगो। जब ईश्वर की प्राप्ति होगी, तो कोई माँग नहीं रहेगी। इसलिए ईश्वर की प्रार्थना करो। ईश्वर के पास जाने के लिए भजन करना, उपासना है। संतों की शिक्षा के अनुकूल गुरु महाराज ने हमलोगों को तीनों प्रकार की शिक्षा दी। *त्रयकाल संध्या करने बताया - ब्राह्ममुहूर्त में, दिन में स्नान के बाद और सायंकाल।* इन तीनों समयों में अबाधित रूप से उपासना करो। वह कर्म पाप है, जो ईश्वर-भक्ति में विघ्न डाले। इसलिए संतों ने कहा - झूठ मत बोलो, चोरी नहीं करो, व्यभिचार मत करो। नशाओं का सेवन नहीं करो और हिंसा मत करो। मत्स्य-मांस का भक्षण मत करो। जैसे हाथी-घोड़े को सिखाकर लोग उनपर सवारी करते हैं। उसी प्रकार *तुम अपने को सिखाओ, संयत में रखो अपने को।* यदि तुम संयत में रखोगे, तो अपने पर ही अपनी सवारी द्वारा परमात्मा तक पहुँचोगे। *भजन में जप, ध्यान दो ही बातें हैं।* जप में वाचिक, उपांशु और मानस; तीन प्रकार के होते हैं। बोल-बोलकर जप करना वाचिक जप है। इससे श्रेष्ठ जप है उपांशु जप। उपांशु जप में केवल होठ हिलते हैं। उसकी आवाज केवल अपने सुन सकते हैं। मानस जप - जपों का राजा है। यह केवल मन से ही जपा जाता है। वाचिक और उपांशु से हजार गुणा श्रेष्ठ है मानस जप। मानस जप एक प्रकार से ध्यान ही है। तीनों में विशेष मानस जप है। यह सब जपों से श्रेष्ठ है। इसके बाद गुरु-मूर्ति का ध्यान है। जैसा कि संत कबीर साहब ने कहा - *मूल ध्यान गुरु रूप है, मूल पूजा गुरु पाँव। मूल नाम गुरु वचन है, मूल सत्य सतभाव।।* स्थूल ध्यान के बाद सूक्ष्म ध्यान करो। सूक्ष्म ध्यान के लिए कबीर साहब ने कहा - *गगन मण्डल के बीच में, तहवाँ झलके नूर। निगुरा महल न पावई, पहुँचेगा गुरु पूर।। नैनों की करि कोठरी, पुतली पलंग बिछाय। पलकों की चिक डारि के, पिय को लिया रिझाय।। कबीर कमल प्रकासिया, ऊगा निर्मल सूर। रैन अंधेरी मिटि गई, बाजे अनहद तूर।।* तथा बाबा नानक के वचन में भी आया है – *तारा चड़िया लंमा किउ नदरि निहालिआ राम। सेवक पूर करंमा सतिगुर सबदि दिखालिआ राम। गुरु सबदि दिखालिआ सचु समालिआ। अहिनिसि देखि विचारिआ। धावतु पंच रहे घरु जाणिआ कामु क्रोध विषु मारिआ। अंतरि जोति भई गुरु साखी चीने राम करंमा। नानक हउमै मारि पतीणे तारा चड़िया लंमा।।* और श्रीमद्भगवद्गीता के अनुकूल अणोरणीयाम् प्रत्यक्ष हो जाता है। इसी अणोरणीयाम् को उपनिषद् में परम विन्दु कहा है - *बीजाक्षरं परम विन्दुं नादं तस्योपरिस्थितम्। सशब्दं चाक्षेरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्।। - ध्यानविन्दूपनिषद्* अर्थात् परम विन्दु ही बीजाक्षर है; उसके ऊपर नाद है। नाद जब अक्षर (अनाश ब्रह्म) में लय हो जाता है, तो नि:शब्द परम पद है। इस विन्दु को पकड़कर नाद को ग्रहण करके परमात्मा तक पहुँचो। *नाद यानी शब्द तीन प्रकार के होते हैं - प्राणमय, इन्द्रियमय, मनोमय।* प्राणमय शब्द ध्वन्यात्मक है। जो सूक्ष्म ध्यान में प्रकट होता है। मुँह से कहना, कान से सुनना इन्द्रियमय शब्द है। इसके लिए गुरु से जानो कि किस शब्द का जप करेंगे। फिर इसको मन ही मन जपना मनोमय शब्द है। *नित्य इस विषय को सुनिए। सुनने से इस ओर प्रेरण होता है। इसलिए नित्य सत्संग करो। सत्संग से ही लोग ईश्वर- भजन करते हैं। सत्संग से जितना लाभ होता है, उससे विशेष कोई लाभ नहीं।* किसी एक खास उपासना या सम्प्रदाय को श्रेष्ठ कहना, दूसरे को न्यून समझना गलत बात है। जो जिस सम्प्रदाय में हैं, उसमें जो उपासना है, वह करें। *किसी को नीच, किसी को ऊँच कहना हमारे गुरु महाराज (बाबा देवी साहब, मुरादाबाद) के ज्ञान में पाप है।* किसी सम्प्रदाय से लड़ाई-झगड़ा मत करो। सभी मिलकर रहो। ईश्वर का भजन करो। *सभी संतों ने सदाचार पालन करने कहा, ध्यान करने कहा और सत्संग करने कहा। इन तीनों को नित्य किया कीजिए।* यह प्रवचन कटिहार नगर स्थित श्रीसंतमत सत्संग मंदिर में दिनांक 26.8.1954 ईo को प्रातःकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.89 : संसार में पनडुब्बी चिड़िया की तरह रहो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 89)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! जहाँ कहीं कभी नहीं गए हो, राजाज्ञा हो कि वहाँ जाना पड़ेगा; किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलेगी, उस स्थान पर जाना होगा, तब तुम्हारे मन में कैसा दु:ख होगा! नहीं मालूम कि कहाँ ले जाया जाएगा, वह स्थान कैसा है, दुःख-सुख वहाँ के कैसे हैं? परन्तु जाना अवश्य होगा। बिना गए कल्याण नहीं होगा। जिस क्षण के लिए आज्ञा हो जाएगी, उस क्षण से कुछ आगा-पीछा नहीं होगा; कुछ मुरौवत (लिहाज) नहीं होगा। *चलना है रहना नहीं, चलना बिस्वावीस। सहज तनिक सुहाग पै, कहा गुथावै सीस।।* संत लोग कहते हैं कि इस आज्ञा में अदल-बदल नहीं हो सकता। किंतु तुम यदि कोशिश करो तो जिस स्थान में तुम जाओगे, उसको जीवन में देख लोगे। *यदि पूरी कोशिश करो, तो उस स्थान में भी जा सकोगे, जहाँ सदा सुख-ही-सुख है, वहाँ से लौटना नहीं होता।* सब लोगों के घर में कोई-न-कोई शरीर छोड़ते हैं। ऐसा कोई घर नहीं, जिस घर में किसी ने शरीर न छोड़ा हो। जो जाता है, वह जानता नहीं कि कहाँ जाना होगा; किंतु जाना होता है। सुख-दु:ख मिला हुआ भी स्थान है और कहीं दु:ख-ही-दु:ख का भी स्थान है, ये ही स्वर्ग-बैकुण्ठादि स्थान हैं। वहाँ का भोग समाप्त होने से या किसी कारण के उपस्थित हो जाने से बहुत शीघ्र ही इस मृत्युलोक के किसी स्थान पर जन्म हो जाएगा। राजा ययाति बड़े प्रभावशाली और पुण्यात्मा थे। किसी कारण इन्द्र लुके (छिपे) हुए थे। इन्द्रासन खाली था, तो विचार हुआ कि मृत्युलोक में वैसा कोई है, जिसे इस आसन पर बैठाया जाय, जो इन्द्र जैसा ठीक-ठीक प्रबंध कर सके। ययाति को ही चुना गया। ययाति गए और उस आसन पर विराजे। यदि ययाति ठीक तरह से रह सकते, तो जबतक इन्द्र नहीं आते, तबतक वहाँ रहते; किंतु ययाति को घमण्ड हो गया। वहाँ लोगों को वे अपमानित करते थे। *सभी ने विचारा कि इनको नीचे गिराना चाहिए, इसलिए उनके सामने उनके पुण्य की चर्चा करो। वे अपने मुख से पुण्य की चर्चा करेंगे और नीचे गिर जाएँगे।* ऐसा ही हुआ, घमण्ड में आकर अपने पुण्य का वर्णन करने लग गए और वहाँ से नीचे गिरा दिए गए। ‘सुर पुर ते जनु खसेउ ययाती।' *उनके गिरते समय मुँह से बहुत लार निकली, वही कर्मनाशा नदी है।* उनके कुल का कोई तपस्या कर रहा था। उसने समझा कि मेरे कुल के श्रेष्ठ आदमी नीचे गिर रहे हैं। इसलिए उसने कहा कि ठहर जाइए, तो वे वहीं ठहर गए। भगवान विष्णु के पार्षद जय-विजय ने सनक, सनंदन आदि को द्वार पर रोक दिया, जिस कारण वे क्रोधित हुए और शाप दिया - *मृत्युलोक में जाकर राक्षस होकर जन्म लो।* वे बहुत डरे और विनती की, तब उन सनक, सनंदन आदि ऋषियों ने कहा - ‘भगवान से प्रार्थना करना, वे तुम्हारा उद्धार करेंगे। भगवान के पास वे बहुत गिड़गिड़ाए। भगवान ने कहा – ‘मैं तुम्हारे लिए अवतार लूँगा और अपने हथियार से उद्धार करूँगा। *चाहे बड़ी अवधि ही क्यों न हो, किंतु उनके समाप्त होने पर फिर यहाँ जन्म लेना पड़ेगा।* गोलोक में राधाजी ने कृष्ण के सखा श्रीदामा को शाप दिया। श्रीदामाजी ने भी राधाजी को शाप दिया। श्रीदामाजी राक्षस हो गए और राधाजी को इस पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा। श्रीदामाजी राक्षस हुए और भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें मारा। इस प्रकार कितने इतिहास हैं। *ऊँचे-से-ऊँचे लोक से भी गिरना होता है।* स्वर्गादि जो पितृलोक हैं, वहाँ के भोग समाप्त होने पर फिर यहाँ जन्म लेना पड़ता है। इस प्रकार कहाँ जाना होगा, ठिकाना नहीं। निरापद तो कोई भी लोक नहीं। संतों ने कहा - *निरापद स्थान भी है, जहाँ जाकर कोई आपदा नहीं रहती।* संतों की आज्ञा के अनुकूल यदि तुम बरतो (आचरण करो) यानी भक्ति करना आरंभ करो और पूरी भक्ति नहीं कर सको, तो शरीर छूटने पर फिर तुम स्वर्ग स्थान को पाओगे और वहाँ से लौट आकर फिर ईश्वर का भजन करोगे और उस निरापद पद को भी प्राप्त कर लोगे। किंतु तुम उसका ख्याल नहीं करते और निडर होकर बैठे हुए हो। कब तुम्हें काल की ठोकर लगेगी और तुम चले जाओगे, ठिकाना नहीं। इसलिए चेतो और ईश्वर-भजन करो। यह शरीर पानी का बुदबुदा है, कब फूट जाएगा, ठिकाना नहीं। *नहिं बालक नहिं यौवने, नहिं बिरधी कछु बंध। वह औसर नहिं जानिये, जब आय पड़े जम फंद।।* बालकपन में मरोगे कि जवानी में मरोगे कि बूढ़े होकर मरोगे, ठिकाना नहीं। *यम के फन्दे में कब पड़ोगे, तुम नहीं जानते।* भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – *प्रयाण काले मनसा चलेन भक्त्यायुक्तो योगबलेन चैव। भुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्।।* अर्थात् वह भक्तियुक्त पुरुष अंतकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी तरह स्थापित करके, फिर निश्छल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य परमपुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है। जो कोई इसके दर्शन का हिस्सक (आदत) लगा लेता है और मरने के समय उसी ओर मन लगाता है, तो उसी परम पुरुष को प्राप्त करता है। ‘उस' शब्द यहाँ पर अणु-से-अणु तमस से परे के लिए कहा गया है। यह बिल्कुल निरापद तो नहीं है; किंतु इसको जो प्राप्त करके शरीर छोड़ेगा, तब जो फिर इस संसार में आएगा, तो इस संस्कार से प्रेरित होकर फिर भजन करेगा और निरापद स्थान को प्राप्त कर लेगा। इसलिए *संसार में पनडुब्बी चिड़िया की तरह रहो।* *जैसे जल महि कमलु निरालमु मुरगाई नैसाणै। सुरति सबदि भवसागरु तरिअै नानक नामु बखाणै।।* हमलोगों का दृष्टियोग-साधन अणोरणीयान् को पकड़ने के लिए है। अनहद नाद का ध्यान सुरत-शब्द-योग का अभ्यास करना है। इसके आगे अनाहत नाद है। अनाहत नाद से ही ईश्वर की पहचान होगी, परंतु पहले उस अणोरणीयान् का ध्यान किए बिना अनहद नाद को पकड़ना नहीं हो सकता। इसलिए पहले विन्दु को पकड़ो, फिर अनहद शब्द को सुनो। *पापी हृदय में भजन नहीं हो सकता; झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार आदि पाप बुद्धि से भजन नहीं कर सकते।* *तुलसी दया न छोड़िये, जब लगि घट में प्राण।* हमारा किसी ने अपकार किया है, हम उसका अपकार नहीं करें। जिसने अपकर्म किया - पाप किया, वह दया का पात्र होगा, उसपर दया करो, उसका अपकार मत करो। अभी कुछ दिन जियोगे, किंतु जीव का जीवन अनंत है। इसलिए *अनंत जीवन के लिए पाप-कर्म क्यों करो, जो दुःख-ही-दुःख भोगते रहो। इसलिए पाप-कर्म छोड़ो और भजन करो।* यह प्रवचन श्रीसंतमत सत्संग मंदिर सिकलीगढ़ धरहरा, पूर्णियाँ में दिनांक 6.6.1954 ईस्वी को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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