गीता-सार

आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 10 : श्री भगवान का ऐश्वर्य श्लोक--39 आप सभी प्रभु जी को को जय श्री कृष्णा🙌🙌 हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 10.39 अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९ || यत्– जो; च– भी;अपि– हो सकता है; सर्व-भूतानाम्– समस्त सृष्टियों में; बीजम्– बीज; तत्– वह; अहम्– मैं हूँ; अर्जुन– हे अर्जुन; न– नहीं; तत्– वह; अस्ति– है; विना– रहित; यत्– जो; स्यात्– हो; मया– मुझसे; भूतम्– जीव; चर-अचरम्– जंगम तथा जड़ | यही नहीं, हे अर्जुन! मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ | ऐसा चर तथा अचर कोई भी प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना रह सके | तात्पर्य : प्रत्येक वस्तु का कारण होता है और इस सृष्टि का कारण या बीज कृष्ण हैं | कृष्ण की शक्ति के बिना कुछ भी नहीं रह सकता, अतः उन्हें सर्वशक्तिमान कहा जाता है | उनकी शक्ति के बिना चर तथा अचर, किसी भी जीव का अस्तित्व नहीं रह सकता | जो कुछ कृष्ण की शक्ति पर आधारित नहीं है, वह माया है अर्थात् “वह जो नहीं है |” ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/G3UD0iW7VWPAPnRWD6cXJi ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/BNcTp4lD8lJKIw9A6jOoUJ

+20 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 6 शेयर

आज का श्लोक: श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप अध्याय 10 : श्री भगवान का ऐश्वर्य श्लोक--38 आप सभी प्रभु जी को को जय श्री कृष्णा🙌🙌 हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे *हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।* *हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।।* 🙌🏼🙌🏼 आज का श्लोक : श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप -- 10.38 अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् | मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || ३८ || दण्डः– दण्ड; दमयताम्– दमन के समस्त साधनों में से; अस्मि– हूँ; नीतिः– सदाचार; अस्मि– हूँ; जिगीषताम्– विजय की आकांशा करने वालों में; मौनम्– चुप्पी, मौन; च– तथा; एव– भी ; अस्मि– हूँ; गुह्यानाम् - रहस्यों में; ज्ञानम्– ज्ञान; ज्ञान-वताम्– ज्ञानियों में; अहम्– मैं हूँ | अराजकता को दमन करने वाले समस्त साधनों में मैं दण्ड हूँ और जो विजय के आकांक्षी हैं उनकी मैं नीति हूँ | रहस्यों में मैं मौन हूँ और बुद्धिमानों में ज्ञान हूँ | तात्पर्य : वैसे तो दमन के अनेक साधन हैं, किन्तु इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है दुष्टों का नाश | जब दुष्टों को दण्डित किया जाता है तो दण्ड देने वाला कृष्णस्वरूप होता है | किसी भी क्षेत्र में विजय की आकांक्षा करने वाले में नीति की ही विजय होती है | सुनने, सोचने तथा ध्यान करने की गोपनीय क्रियाओं में मौन ही सबसे महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मौन रहने से जल्दी उन्नति मिलती है | ज्ञानी व्यक्ति वह है, जो पदार्थ तथा आत्मा में, भगवान् की परा तथा अपरा शक्तियों में भेद कर सके | ऐसा ज्ञान साक्षात् कृष्ण है | ************************************ प्रतिदिन *भगवद्गीता का हिंदी में एक श्लोक* प्राप्त करने हेतु, इस ग्रुप को join करें 🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/G3UD0iW7VWPAPnRWD6cXJi ********************************** To receive daily *ONE shloka of Bhagavad Gita in English*, join below group:🙏🏼 https://chat.whatsapp.com/BNcTp4lD8lJKIw9A6jOoUJ

+9 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 11 शेयर
Devanand Jadhav Aug 19, 2019

★🕉गितासार🕉★ 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 🚩 >भगवद्गीता के संस्कृत श्लोक जो बदल सकते हैं आपका जीवन< ●अध्याय अठरावा● ◆मोक्षसन्यासयोग◆ अर्जुन उवाच संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ । त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १८-१ ॥ अर्जुन म्हणाला, हे महाबाहो, हे हृषीकेशा, हे केशिनिषूदना, मी संन्यास आणि त्याग यांचे तत्त्व वेगवेगळे जाणू इच्छितो. ॥ १८-१ ॥ श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्माणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः । सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ १८-२ ॥ भगवान श्रीकृष्ण म्हणाले, कित्येक पंडित काम्य कर्मांच्या त्यागाला संन्यास मानतात. तर दुसरे काही विचारकुशल लोक सर्व कर्मांच्या फळाच्या त्यागाला त्याग म्हणतात. ॥ १८-२ ॥ त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः । यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ १८-३ ॥ कित्येक विद्वान असे म्हणतात की, सर्व कर्मे दोषयुक्त आहेत म्हणून ती टाकणे योग्य होय आणि दुसरे विद्वान असे म्हणतात की, यज्ञ, दान आणि तप रूप कर्मे टाकणे योग्य नाही. ॥ १८-३ ॥ निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम । त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः ॥ १८-४ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुना, संन्यास आणि त्याग या दोहोंपैकी प्रथम त्यागाच्या बाबतीत माझा निर्णय ऐक. कारण त्याग सात्त्विक, राजस व तामस या भेदांमुळे तीन प्रकारचा सांगितला गेला आहे. ॥ १८-४ ॥ यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ । यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥ १८-५ ॥ यज्ञ, दान आणि तप रूप कर्म टाकणे योग्य नाही. उलट ते अवश्य केले पाहिजे. कारण यज्ञ, दान व तप ही तीनही कर्मे बुद्धिमान माणसांना पवित्र करणारी आहेत. ॥ १८-५ ॥ 🔶 🔶 🔶 🔶 🔶 🔶 🔶 🔶 🔶 ●🌹●सुप्रभात●🌹● ========================

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर