गीतामृत

Manoj Prasadh Feb 23, 2021

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sn.vyas Feb 8, 2021

गीता के अन्त में भगवान् ने उपदेश किया है ---- "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥" (१८/६६) सभी धर्मों का परित्याग कर एक मात्र मेरी शरण ग्रहण करो , मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा , शोक मत करो। यह श्लोक अनेकों उपनिषदों में भी आया है तथा "शिव-गीता" में शंकर जी ने श्रीराम के प्रति ज्यों का त्यों कहा है। यहां आये सर्वधर्म का अर्थ हिन्दू , सिक्ख, ईसाई आदि धर्म मत समझ लेना , क्योंकि वैदिक सनातन धर्म को छोड़कर सब मत-मतान्तर हैं , धर्म नहीं । धर्म केवल एक है और संसार के किसी भी भाषा में धर्म का पर्यायवाची शब्द नहीं आया है । सम्प्रदाय, रिलीजन, मजहब आदि शब्द मत विशेष को व्यक्त करते हैं , समग्र धर्म को नहीं । सर्वधर्मान् में चारों वर्णों , चारों आश्रमों , तीन प्रकार की स्त्रियों (कुमारी कन्या , पतिव्रता तथा विधवा) के विशेष-धर्म , देश-धर्म , दान-धर्म , आपद्-धर्म , मोक्ष-धर्म इत्यादि जिन धर्मों का महाभारत के शान्तिपर्व तथा अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह जी ने युधिष्ठिर के प्रति उपदेश किया है , वे सर्वधर्म हैं । इस श्लोक के सम्बन्ध में अनेक आचार्य विभिन्न प्रकार की व्याख्याएं करते हैं । कुछ लोग इस श्लोक का प्रत्येक व्यक्ति के प्रति अर्थ लगाते हुए कहते हैं कि सभी लोग अपने वर्णाश्रम धर्म का परित्याग करके एकमात्र भगवान् की शरण में चला जाये , भगवान् उसे सभी विपत्तियों से मुक्त कर देते हैं । किन्तु यह व्याख्या गीता के पूरे सिद्धान्त पर ही पानी फेर देती है , क्योंकि भगवान् की आज्ञा पाने से पूर्व ही अर्जुन दोनों काम कर चुके थे । वे क्षात्र-धर्म का परित्याग करके वानप्रस्थी या संन्यासी या ब्राह्मण-वृत्ति से निर्वाह चाहते थे तथा "शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥" मैं आपकी शरण में हूँ , मुझे उचित उपदेश दीजिये, मैं आपका शिष्य हूँ । फिर अर्जुन के लिए भगवान् ने स्थान-स्थान पर युद्ध रूप स्वधर्म का पालन करने की आज्ञा दी । दूसरे अध्याय का दूसरा और तीसरा तथा इक्तिसवें से लेकर अडतीसवें श्लोक तक एवं चौथे , आठवें , ग्यारवें तथा अठारवें अध्याय में भी अपने कर्म को करने की आज्ञा दी । अन्त में यह तक कहा कि यदि तुम दुराग्रहपूर्वक युद्ध नहीं करना चाहते हो , तो भी तुम्हारा क्षात्र स्वभाव तुमसे अवश्य युद्ध करवायेगा । आगे फिर कहा कि मैंने अत्यन्त गुह्यतम ज्ञानोपदेश किया है , इस पर विचार करके तुम्हारी जैसी इच्छा हो , वैसा करो । तो इन वचनों से सिद्ध होता है कि भगवान् ने स्वधर्म का त्याग कर अपनी शरणागति का उपदेश अर्जुन को नहीं दिया , क्योंकि भगवान् स्वधर्म का पालन के लिए कहते हैं। यदि भगवान् का यही तात्पर्य होता तो अठारवें अध्याय के बहत्तरवें श्लोक में भगवान् ने अर्जुन से पूछा है ---- "हे अर्जुन ! तुमने एकाग्रचित्त होकर गीता सुनी या नहीं ? तुम्हारी अज्ञान से उत्पन्न अहंता-ममता दूर हुई या नहीं ?" उत्तर में अर्जुन ने कहा --- "अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा अज्ञान नष्ट होने पर शुद्ध-सच्चिदानन्द स्वरूप की स्मृति हुई है , मैं सन्देह रहित होकर आपकी आज्ञा का पालन करूँगा ।" वैसे तो भगवान् का अर्जुन के प्रति एक ही प्रकार की आज्ञा है , पर कुछ लोगों को यहां दो प्रकार की आज्ञा प्रतीत होती है । पहला -- युद्ध करने की आज्ञा । दूसरा --- सामान्य-विशेष दोनों धर्मों का त्याग कर शरण में आने की आज्ञा । किन्तु अर्जुन ने इन दोनों में से किस आज्ञा का पालन किया ?--- यह महाभारत के युद्ध से सिद्ध ही है । अर्जुन नारायण रूपी श्रीकृष्ण के नित्य सखा नर के अवतार हैं । जैसे पक्षी पक्षी की , बंगाली बंगाली की , गुजराती गुजराती की भाषा समझता है , वैसे ही सखा अर्जुन की बात को भगवान् तथा भगवान् के हृदय की बात को अर्जुन जानते हैं कि मेरे प्रति भगवान् की युद्ध रूपी आज्ञा ही हितकारिणी है । तो यहां प्रश्न होता है कि क्या स्वधर्म के त्याग की आज्ञा नहीं है ? तो उत्तर होगा ---- "हाँ है , पर गृहस्थवर्य अर्जुन के लिए नहीं , किन्तु अर्जुन को सम्बोधित करते हुए परमहंस संन्यासियों के लिए आज्ञा है , अर्जुन के लिए नहीं ।" जिसने धर्म का अनुष्ठान ही नहीं किया , वह त्याग ही क्या करेगा ? जैसे अन्न का , धन का , वस्त्र का , स्त्री-पुत्रादिकों का वही त्याग कर सकता है , जिसके पास हो । अतः सर्वधर्म के परित्याग की आज्ञा सभी के लिए नहीं है , किन्तु परमहंस संन्यासियों के लिए है --- यह सिद्ध हुआ । अब कोई प्रश्न कर सकता है कि यदि ऐसा सिद्ध होता है तो भगवान् ने श्लोक में "त्वा" शब्द का प्रयोग क्यों किया ? इसका समाधान आनन्द तीर्थ जी महाराज (श्री मध्वाचार्य जी) ने अपने गीता के "लेश-भाष्य" में किया है कि गृहस्थ अर्जुन के लिए ऐसी आज्ञा कैसे कल्याणकारिणी हो सकती है ? भगवान् गृहस्थ अर्जुन के लिए धर्म के त्याग का उपदेश नहीं करते , प्रत्युत् अभिमान रहित होकर स्वधर्म का पालन करने की आज्ञा देते हैं। "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" में सभी धर्मों के अभिमान का त्याग करके एकमात्र मेरी शरण ग्रहण करो , मैं तुम्हे सब पापों से छुड़ा दूंगा , शोक मत करो । भाव यह है कि दाता को दान का अभिमान , विद्वान् को विद्या का , तपस्वियों को तप का , भक्त को भक्ति का , ज्ञानी को ज्ञान का अभिमान छोड़कर एकमात्र भगवान् की शरण ग्रहण करने चाहिए ; उसको भगवान् वासना सहित पापों से छुड़ाकर शोक-मोह से रहित कर देते हैं ।

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