गीताज्ञान

Devanand Jadhav Jun 17, 2019

★🕉गितासार🕉★ 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ●अध्याय सातवा● ◆ज्ञानविज्ञानयोग◆ यो वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥ ७-२६ ॥ हे अर्जुना, पूर्वी होऊन गेलेल्या, वर्तमान काळातील आणि पुढे होणाऱ्या सर्व सजीवांना मी जाणतो. पण श्रद्धा, भक्ती नसलेला कोणीही मला जाणत नाही. ॥ ७-२६ ॥ इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥ ७-२७ ॥ हे भरतवंशी परंतप अर्जुना, सृष्टीत इच्छा व द्वेष यांमुळे उत्पन्न झालेल्या सुखदुःखरूप द्वंद्वाच्या मोहाने सर्व सजीव अत्यंत अज्ञानाला प्राप्त होतात. ॥ ७-२७ ॥ येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌ । ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥ ७-२८ ॥ परंतु निष्कामभावाने श्रेष्ठ कर्मांचे आचरण करणाऱ्या ज्या पुरुषांचे पाप नष्ट झाले आहे, ते राग-द्वेष यांनी उत्पन्न होणाऱ्या द्वंद्वरूप मोहापासून मुक्त असलेले दृढनिश्चयी भक्त मला सर्व प्रकारे भजतात. ॥ ७-२८ ॥ जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌ ॥ ७-२९ ॥ जे मला शरण येऊन वार्धक्य व मरण यांपासून सुटण्याचा प्रयत्‍न करतात ते पुरुष, ते ब्रह्म, संपूर्ण अध्यात्म आणि संपूर्ण कर्म जाणतात. ॥ ७-२९ ॥ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः । प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥ ७-३० ॥ जे पुरुष अधिभूत, अधिदैव व अधियज्ञ यांसह (सर्वांच्या आत्मरूप अशा) मला अंतकाळीही जाणतात, ते युक्त चित्ताचे पुरुष मला जाणतात, म्हणजे मला येऊन मिळतात. ॥ ७-३० ॥ 🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶 ●★●सुप्रभात●★●

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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ सोलहवाँ अध्याय:(दैवासुरसंपद्विभागयोग) द्वादश दिवस 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः। यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्‌ ।।17।। अपने को श्रेष्ठ मानने वाले तथा सदैव घमण्ड करने वाले, सम्पत्ति तथा मिथ्या प्रतिष्ठा से मोहग्रस्त लोग किसी विधि-विधान का पालन न करते हुये कभी-कभी नाममात्र के लिये बड़े ही गर्व के साथ यज्ञ करते हैं। सज्जनों, आसुरी लोग अपने आप को सब क़ुछ मानते हुये, किसी प्रमाण या शास्त्र की परवाह न करते हुये कभी-कभी तथाकथित धार्मिक‌ या याज्ञिक अनुष्ठान करते हैं, चूँकि वे किसी प्रमाण में विश्वास नहीं करते, इसलिये वे अत्यधिक घमंड़ी होते हैं, थोड़ी सी सम्पत्ति तथा झूठी प्रतिष्ठा पा लेने के कारण जो मोह यानी भ्रम उत्पन्न होता है, उसी के कारण ऐसा होता हैं, कभी-कभी ऐसे असुर उपदेशक की भूमिका भी निभाते है और लोगों को भ्रान्त करते है तथा धार्मिक‌ सुधारक या ईश्वर के अवतारों के रूप में प्रसिद्ध हो जाते हैं। आसुरी लोग यज्ञ करने का दिखावा भी करते है या दैवताओं की पूजा भी करते हैं या अपने निजी ईश्वर की सृष्टि भी कर लेते हैं, सामान्य लोग उनका प्रचार ईश्वर कह कर करते हैं, उन्हें पूजते है और मूर्ख लोग ऐसे पाखंड़ियों को धर्म और अध्यात्म में बढ़ा-चढ़ा मानते हैं, ऐसे लोग संन्यासी का वेश भी धारण कर लेते हैं और उस वेश में सभी प्रकार का अधर्म करते हैं, वास्तव में इस संसार से विरक्त होने वाले पर अनेक प्रतिबन्थ होते हैं, लेकिन ऐसे असुर इन प्रतिबन्धों की परवाह नहीं करते। ऐसे आसुरी लोगों के समक्ष आदर्श मार्ग जैसी कोई वस्तु नहीं, जिस पर चला जाय, इस श्लोक में "अविधिपूर्वकम" शब्द इसीलिये प्रयुक्त ‌हुआ हैं, जिसका अर्थ है विधि-विधानों की परवाह न करते हुये, ये सभी बातें सदैव अज्ञान तथा मोह के कारण होती हैं, सज्जनों, भगवद्गीता मानवीय शास्त्रों की कुंजी हैं, मानव जीवन के सारे सिद्धान्त भगवद्गीता में प्रतिपादित हैं,वेद और उपनिषद् का नवनीत भी भगवद्गीता में आत्मसात् हुआ हैं और मनुष्य से जुड़ा सारा उपदेश समाविष्ट हैं। सज्जनों! वह कंठ ही क्या जिसने गीता का अपने जीवन में गायन न किया, वे कदम ही क्या जो गीता के मार्ग पर न चले, वह वाणी धन्य हो जाती है, जिसे गीता का रसास्वादन हो जाता है, उस वयक्ति का जीवन धन्य है जो सोने से पहले भगवद्गीता जैसे धर्मग्रन्थ का श्लोक श्रवण करने को मिलता हैं, गीता के दिव्य ज्ञान के दो शब्द सुनने-पढ़ने को मिलते हैं, भ्रम में रहने वाले वयक्ति का मानव जीवन असफल हो जाता है, भले ही वह करोड़ों का मालिक क्यो न हो, लेकिन गीताजी के श्लोकों और सूत्रों को दिन-भर अपने चिन्तन और मनन में रखने वालों का मानव जीवन धन्य हो जाता है,भले ही वह श्रमिक ही क्यों न हो। भाई-बहनों, भगवान् करें, आप सभी का भी मनुष्य जन्म सफल हों, विकारो में तो हर आदमी का जीवन गुजर ही रहा है, लेकिन जीवन के ऐश्वर्य-ईश्वर के रसास्वादन में जिनका जीवन गुजरता हैं, ऐसे मनुष्य का प्रत्येक दिन भले ही अमावस्या जैसा अंधकारमय क्यों न हों, असल में वह प्रत्येक दिन पूनम के चन्द्रमा के समान है, पूर्ण रोशनी लिये, दोस्तों! मैं भगवद्गीता की पोस्ट बहुत सारे ग्रूपों में करता हूँ, इसलिये मुझें यह लिखना पड़ रहा है कि अगर हम जाती, वर्ण या विशेष धर्म के चश्मे से गीता से प्रेम रखते है, तो यह गीता के साथ अन्याय हैं, गीता प्रत्येक मानव के लिये हैं। सज्जनों आपमें से अगर कोई भाई या बहन जैन हो और उस नाते गीता को अस्वीकार करते हो, तो ऐसा करके आप गीता को नहीं, अपितु अपने जीवन के अन्तर्सत्यों को अस्वीकार कर बैठोगे, इस्लाम के अनुयायी होने के कारण गीता से परहेज रखोगे, तो कुरान के सन्देशों को समझने में आपसे चूक हुई हैं, जैनत्व, हिन्दुत्व, बौद्धत्व या इस्लाम, ये सब छिलके हैं, दोस्तों! किसी भी फल का महत्व छिलकों में नहीं होता, छिलकों को एक तरफ करो और गूदे को स्वीकार करो, शक्ति गूदे में हैं, छिलकों में नहीं। भाई-बहनों! मनुष्य को छिलके इतने लुभाते है कि भीतर का पदार्थ गौण हो जाता है, अगर हम छिलकों को एक तरफ रख कर भगवद्गीता को सुनेंगे, पढ़ेंगे, गीता का आचमन करेंगे, गीता को ह्रदय में धारण करेंगे, तो हमारा मनुष्य जन्म सफल हो सकता हैं, जीवन में एक महान् चमत्कार घटित हो सकता हैं, यह गीता जीवन में वह अन्तर-रूपांतर कर देगी, जिसके अभाव में हम जन्म-जन्मान्तर एक योनि से दूसरी योनि में भटकते रहे हैं। शेष जारी ... जय श्री कॄष्ण! ॐ नमो भगवते वासुदेवाय् 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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Devanand Jadhav Jun 16, 2019

★🕉गितासार🕉★ 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 ●अध्याय सातवा● ◆ज्ञानविज्ञानयोग◆ यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌ ॥ ७-२१ ॥ जो जो सकाम भक्त ज्या ज्या देवतास्वरूपाचे श्रद्धेने पूजन करू इच्छितो, त्या त्या भक्ताची त्याच देवतेवरील श्रद्धा मी दृढ करतो. ॥ ७-२१ ॥ स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌ ॥ ७-२२ ॥ तो त्या श्रद्धेने युक्त होऊन त्या देवतेचे पूजन करतो आणि त्या देवतेकडून मीच ठरविलेले ते इच्छित भोग निश्चितपणे मिळवितो. ॥ ७-२२ ॥ अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌ । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ ७-२३ ॥ पण त्या मंदबुद्धी लोकांचे ते फळ नाशिवंत असते. तसेच देवतांची पूजा करणारे देवतांना प्राप्त होतात आणि माझे भक्त, मला कसेही भजोत, अंती मलाच येऊन मिळतात. ॥ ७-२३ ॥ अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌ ॥ ७-२४ ॥ मूढ लोक माझ्या सर्वश्रेष्ठ, अविनाशी अशा परम भावाला न जाणता मन-इंद्रियांच्या पलीकडे असणाऱ्या, सच्चिदानंदघन परमात्मस्वरूप मला मनुष्याप्रमाणे जन्म घेऊन प्रगट झालेला मानतात. ॥ ७-२४ ॥ नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्‌ ॥ ७-२५ ॥ आपल्या योगमायेने लपलेला मी सर्वांना प्रत्यक्ष दिसत नाही. म्हणून हे अज्ञानी लोक जन्म नसलेल्या आणि अविनाशी मला परमेश्वराला जाणत नाहीत. अर्थात मी जन्मणारा-मरणारा आहे, असे समजतात. ॥ ७-२५ ॥ 🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶 ●★●सुप्रभात●★●

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ramkumar verma Jun 15, 2019

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