गीताज्ञान

*महाभारताचे "नऊ सार सूत्र".* *१) "जर मुलांच्या चुकीच्या वागण्यावर नियंत्रण ठेवले नाही तर शेवटी आपण असहाय्य व्हाल" - कौरव.* *२) "तुम्ही कितीही बलवान असा, परंतु अनीतिने तुमचे ज्ञान, अस्त्र, शस्त्र, सामर्थ्य व आशीर्वाद सर्व काही व्यर्थ ठरतील."- कर्ण.* *३) "मुलांना इतके महत्वाकांक्षी बनवू नका की, विद्येचा दुरुपयोग करीत स्वत:चा नाश करुन घेऊन सर्वनाशाला आमंत्रण देईल."- अश्वत्थामा.* *४) "कोणाला असे वचन कधीही देऊ नका, की तुम्हाला अधर्मासमोर शरण जावे लागेल." - भीष्म पितामह.* *५) "संपत्ती, सामर्थ्य आणि सत्ता यांचा दुरूपयोग आणि दुराचारी लोकांची संगत शेवटी आत्म-विनाशाचे दर्शन घडविते" - दुर्योधन.* *६) "विचाराने अंध व्यक्ती म्हणजे मद्य, अज्ञान, मोह, काम आणि सत्ता देखील विनाशाकडे घेऊन जाण्यास कारणीभूत ठरते."- धृतराष्ट्र.* *७) "मनुष्याच्या बुद्धीची सांगड जर विवेकाशी घातली असेल तर विजयाची खात्री पक्की आहे." - अर्जुन.* *८) "प्रत्येक कामात छल व कपट निर्माण केल्याने आपण नेहमीच यशस्वी होऊ शकत नाही."- शकुनी.* *९) "नीति, धर्म आणि नियत या कर्माचे नियम पाळल्यास जगातील कोणतीही शक्ती आपल्याला पराभूत करू शकत नाही." - युधिष्ठिर.* *जर या नऊ सूत्रांकडून धडा घ्या, अन्यथा महाभारत होणे निश्चित आहे.* *जो इतरांना संपविण्याची तयारी करतो, तो स्वतःला वाचवण्यात कमी पडतो व संपतो, आणि जो दुसऱ्याला वाचवण्याचा प्रामाणिक प्रयत्न करतो, तो स्वतः कधीच संपत नाही. हीच नियती आहे.* *दुसऱ्याची वाट लावण्यापेक्षा त्याला चांगली वाट दाखवण्याचे कार्य करा.अन्यथा आपली केव्हा वाट लागेल हे कळत नाही* *"माणसाचा दर्जा हा जात, धर्म व मिळकती वरून ठरत नसतो, तर तो माणुसकीच्या विचारांवरून ठरत असतो . धर्म कोणताही असो शेवटी हिशोब कर्माचा होतो, धर्माचा नाही."* *आयुष्य सुंदर व अनमोल आहे.आनंदात जगावे...😇😇* 🙏🏻🙏🏻🌷🌷

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Neha Sharma Sep 22, 2020

*पुरुषोत्तम मास में श्रीमद भगवद्गीता के 15वे अध्याय का पाठ बहुत फलदायी है।* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 🍁💎🍁 *अथ पञ्चदशोऽध्यायः* 🍁💎🍁 *पुरुषोत्तमयोगसंसाररूपी अश्वत्वृक्ष का स्वरूप और भगवत्प्राप्ति का उपाय* *श्रीभगवानुवाच...... *ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ । *छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ৷৷15.1৷৷ *भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। ৷৷15.1৷৷ *अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । *अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ৷৷15.2৷৷ *भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं৷৷15.2৷৷ *न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । *अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा৷৷15.3৷৷ *भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है৷৷15.3৷৷ *ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । *तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी৷৷15.4৷৷ *भावार्थ : वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा) के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है৷৷15.4৷৷ *निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌৷৷15.5৷৷* *भावार्थ : जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद (परम-धाम) को प्राप्त करता हैं৷৷15.5৷৷ *न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । *यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम৷৷15.6৷৷ *भावार्थ : उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है৷৷15.6৷৷ *ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । *मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति৷৷15.7৷৷ *भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है। (७) *शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । *गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌৷৷15.8৷৷ *भावार्थ : शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है৷৷15.8৷৷ *श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । *अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते৷৷15.9৷৷ *भावार्थ : इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है৷৷15.9৷৷ *उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ । *विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः৷৷15.10৷৷ *भावार्थ : जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं৷৷15.10৷৷ *यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ । *यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः৷৷15.11৷৷ *भावार्थ : योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं৷৷15.11৷৷ प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन *यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ । *यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌৷৷15.12৷৷ *भावार्थ : हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ৷৷15.12৷৷ *गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । *पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः৷৷15.13৷৷ *भावार्थ : मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ৷৷15.13৷৷ *अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । *प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌৷৷15.14৷৷ *भावार्थ : मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ৷৷15.14৷৷ *सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । *वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ৷৷15.15৷৷ *भावार्थ : मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ৷৷15.15৷৷ *द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । *क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ৷৷15.16৷৷ *भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है৷৷15.16৷৷ *उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । *यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः৷৷15.17৷৷ *भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है৷৷15.17৷৷ *यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । *अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः৷৷15.18৷৷ *भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ৷৷15.18৷৷ *यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ । *स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ৷৷15.19৷৷ *भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है৷৷15.19৷৷ *इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । *एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ৷৷15.20৷৷ *भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं৷৷15.20৷৷ *ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ ।। जय श्री राधेकृष्णा ।। 🌷🌷🙏🙏🌷🌷 ~~~~~~~~~~

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. 🌞 *आज का हिन्दू पंचांग* 🌞 🌞 *23 सितंबर 2020 (बुधवार)* 🌞 ♨️ _*संवत, मास एवं पक्ष*_ ♨️ ⚔️ *विक्रमी संवत* - 2077 ⚔️ *शक संवत* -1942 🌞 *ऋतु* - शरद 🌞 *अयन* - दक्षिणायन 🌞 *मास* - आश्विन *(अधिक)* 🌞 *पक्ष* - शुक्ल ♨️ _*पंचांग के पांच अंग*_ ♨️ 1️⃣ *तिथि* - सप्तमी 19:56 तक, अष्टमी 2️⃣ *नक्षत्र* - ज्येष्ठा 18:25 तक, मूल 3️⃣ *योग* - आयुष्मान 23:41 तक, सौभाग्य 4️⃣ *करण* - गर 08:39 तक, वनिज 19:56, भद्रा 5️⃣ *वार* - बुधवार ♨️ _*सूर्य एवं चंद्र राशि*_ ♨️ ☀️ *सूर्य राशि* - कन्या 🌝 *चन्द्र राशि* - वृश्चिक 18:25 तक, धनु ☀️ *सूर्य उदय/अस्त* - 06:17 से 18:23 तक ♨️ _*शुभ मुहूर्त*_ ♨️ ☑️ *ब्रह्म मुहूर्त* - 04:42 से 05:29 तक ☑️ *अभिजीत मुहूर्त* - कोई नहीं ♨️ _*अशुभ मुहूर्त*_ ♨️ ❌ *राहुकाल* - 12:20 से 13:50 तक ❌ *गंडमूल* - अहोरात्री तक ❌ *भद्रा* - 19:56 से 30:17 तक ❌ *दिशाशूल* - उत्तर दिशा में ♨️ _*व्रत / त्यौहार / विशेष*_ ♨️ 🚩 ♨️ _*आज का सुविचार*_ ♨️ *आलस्यं मदमोहौ चापलं गोष्टिरेव च।* *स्तब्धता चाभिमानित्वं तथा त्यागित्वमेव च।* *एते वै सप्त दोषाः स्युः सदा विद्यार्थिनां मताः ॥* *भावार्थ* : _विद्यार्थियों को सात अवगुणों से दूर रहना चाहिए। ये हैं - आलस, नशा, चंचलता, गपशप, जल्दबाजी, अहंकार और लालच।_ 🙏 *शुभ प्रभात* 🙏 🙏 *जय श्री राम* 🙏 🙏 *आपका दिन मंगलमय हो* 🙏

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*पुरुषोत्तम मास में श्रीमद भगवद्गीता के 15वे अध्याय का पाठ बहुत फलदायी है।* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ 🍁💎🍁 *अथ पञ्चदशोऽध्यायः* 🍁💎🍁 *पुरुषोत्तमयोगसंसाररूपी अश्वत्वृक्ष का स्वरूप और भगवत्प्राप्ति का उपाय* श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌ । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌ ৷৷15.1৷৷ भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। ৷৷15.1৷৷ अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः । अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ৷৷15.2৷৷ भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं৷৷15.2৷৷ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा । अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा৷৷15.3৷৷ भावार्थ : इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है৷৷15.3৷৷ ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी৷৷15.4৷৷ भावार्थ : वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा) के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है৷৷15.4৷৷ *निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌৷৷15.5৷৷* भावार्थ : जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद (परम-धाम) को प्राप्त करता हैं৷৷15.5৷৷ न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः । यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम৷৷15.6৷৷ भावार्थ : उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है৷৷15.6৷৷ ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति৷৷15.7৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है। (७) शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः । गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌৷৷15.8৷৷ भावार्थ : शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है৷৷15.8৷৷ श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते৷৷15.9৷৷ भावार्थ : इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है৷৷15.9৷৷ उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌ । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः৷৷15.10৷৷ भावार्थ : जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं৷৷15.10৷৷ यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्‌ । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः৷৷15.11৷৷ भावार्थ : योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं৷৷15.11৷৷ प्रभाव सहित परमेश्वर के स्वरूप का वर्णन यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम्‌ । यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम्‌৷৷15.12৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ৷৷15.12৷৷ गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः৷৷15.13৷৷ भावार्थ : मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ৷৷15.13৷৷ अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्‌৷৷15.14৷৷ भावार्थ : मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ৷৷15.14৷৷ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्‌ ৷৷15.15৷৷ भावार्थ : मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ৷৷15.15৷৷ द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ৷৷15.16৷৷ भावार्थ : हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है৷৷15.16৷৷ उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः৷৷15.17৷৷ भावार्थ : परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है৷৷15.17৷৷ यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः৷৷15.18৷৷ भावार्थ : क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ৷৷15.18৷৷ यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्‌ । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ৷৷15.19৷৷ भावार्थ : हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है৷৷15.19৷৷ इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ । एतद्‍बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ৷৷15.20৷৷ भावार्थ : हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं৷৷15.20৷৷ ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ॥ ।। जय श्री कृष्ण ।। ~~~~~~~~~~

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