गंगा दशहरा

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एक बात और विलक्षण है ! उसपर आप ध्यान दें। बहुत ही लाभ की बात है, जब कभी भगवान अचानक याद आ जायँ, भगवान का नाम अचानक याद आ जाए, उस समय यह समझे कि भगवान मेरे को याद करते हैं। भगवान ने अभी मेरे को याद किया है। नहीं तो मैंने उद्योग ही नहीं किया, फिर अचानक ही भगवान कैसे याद आये ? ऐसा समझकर प्रसन्न हो जाओ कि मैं तो निहाल हो गया। मेरे को भगवान ने याद कर लिया। अब और काम पीछे करेंगे। अब तो भगवान में ही लग जाना है, क्योंकि भगवान याद करते हैं, ऐसा मौका कहाँ पड़ा है ? ऐसे लग जाओ तो बहुत ज्यादा भक्ति है। जब अंगद रवाना हुए और उनको पहुंचाने हनुमानजी गये तो अंगद ने कहा-- बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहू मोरि 'याद कराते रहना रामजी को। तात्पर्य जिस समय अचानक भगवान याद आते हैं, उस समय को खूब मूल्यवान समझकर तत्परता से लग जाओ। -- श्री रामसुखदास जी महाराज #जयश्रीसीताराम

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।। श्रीहरि ।। गंगादशहरा [ ज्येष्ठ शुक्ल दशमी ] नमामि गंगे तव पादपंकजं सुरासुरैर्वन्दितदिव्यरूपम् । भुक्तिं च मुक्तिं च ददासि नित्यं भावानुसारेण सदा नराणाम् ।। हे मातु गंगे ! आप मनुष्यों को नित्य ही उनके भावानुसार भुक्ति और मुक्ति प्रदान करती हैं । मैं देवताओं और राक्षसों से वन्दित आपके दिव्य चरणकमलों को नमस्कार करता हूँ । गंगाजी देवनदी हैं, वे मनुष्यमात्र के कल्याण के लिये धरतीपर आयीं, धरतीपर इनका अवतरण ज्येष्ठ शुक्लपक्ष की दशमी को हुआ । अतः यह तिथि उनके नामपर गंगादशहरा के नाम से प्रसिद्ध हुई- दशमी शुक्लपक्षे तु ज्येष्ठमासे बुधेऽहनि । अवतीर्णा यतः स्वर्गाद्धस्तर्क्षे च सरिद्वरा ।। इस तिथि को यदि बुधवार और हस्तनक्षत्र हो तो यह तिथि सब पापों का हरण करनेवाली होती है- ज्येष्ठशुक्लदशम्यां तु भवेत्सौम्यदिनं यदि । ज्ञेया हस्तर्क्षसंयुक्ता सर्वपापहरा तिथिः ।। ज्येष्ठ शुक्ल दशमी सम्वत्सर का मुख कही जाती है । इस दिन स्नान और दान का विशेष महत्त्व है- ज्येष्ठस्य शुक्लादशमी सम्वत्सरमुखा स्मृता । तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषतः ।। इस तिथि को गंगा स्नान एवं श्रीगंगाजी के पूजन से दस प्रकार के पापों* ( तीन कायिक, चार वाचिक तथा तीन मानसिक )-का नाश होता है । इसलिये इसे दशहरा कहा गया है । ब्रह्मपुराण का वचन है- ज्येष्ठे मासि सिते पक्षे दशमी हस्तसंयुता । हरते दश पापानि तस्माद् दशहरा स्मृता ।। इस दिन गंगाजी में अथवा सामर्थ्य न हो तो समीप की किसी पवित्र नदी या सरोवर के जल में स्नानकर अभयमुद्रायुक्त मकरवाहिनी गंगाजी का ध्यान करे और नाममन्त्र-'गंगायै नमः' से अथवा निम्न मन्त्र से आवाहनादि षोडशोपचार पूजन करे- 'ॐ नमः शिवायै नारायण्यै दशहरायै गंगायै नमः ।' उक्त मन्त्र में 'नमः' के स्थानपर 'स्वाहा' शब्द का प्रयोग करके हवन भी करना चाहिये । तत्पश्चात् 'ॐ नमो भगवति ऐं ह्रीं श्रीं ( वाक्-काम-मायामयि ) हिलि हिलि मिलि मिलि गंगे मां पावय पावय स्वाहा'-इस मन्त्र से पाँच पुष्पांजलि अर्पित करके गंगा के उत्पत्ति स्थान हिमालय एवं उन्हें पृथ्वीपर लानेवाले राजा भगीरथ का नाममन्त्र से पूजन करना चाहिये । पूजा में यथाशक्ति दस प्रकार के पुष्प, दशांग धूप, दस दीपक, दस प्रकार के नैवेद्य, दस ताम्बूल एवं दस फल होने चाहिये । दक्षिणा भी दस ब्राह्मणों को देनी चाहिये, किंतु उन्हें दान में दिये जानेवाले यव ( जौ ) और तिल सोलह-सोलह मुट्ठी होने चाहिये । भगवती गंगाजी सर्वपापहारिणी हैं । अतः दस प्रकार के पापों की निवृत्ति के लिये सभी वस्तुएँ दस की संख्या में निवेदित की जाती हैं । इस दिन सत्तू का दान और गंगादशहरास्तोत्र का पाठ किया जाता है साथ ही गंगावतरण की कथा भी सुनी जाती है । * अदत्तानामुपादानं हिंसा चैवाविधानतः । परदारोपसेवा च शारीरं त्रिविधं स्मृतम् ।। पारूष्यमनृतं चैव पैशून्यं चापि सर्वशः । असम्बद्धप्रलापश्च वाङ्मयं स्याच्चतुर्विधम् ।। परद्रव्येष्वभिध्यानं मनसानिष्टचिन्तनम् । वितथाभिनिवेशश्च त्रिविधं कर्म मानसम् ।। ( मनु○ १२ । ७, ६, ५ ) अर्थात् बिना दिये हुए दूसरे की वस्तु लेना, शास्त्र वर्जित हिंसा करना तथा परस्त्रीगमन करना-तीन प्रकार के शारीरिक ( कायिक ) पाप हैं । कटु बोलना, झूठ बोलना, परोक्ष में किसी का दोष कहना तथा निष्प्रयोजन बातें करना वाचिक पाप हैं और दूसरे के द्रव्य को अन्याय से लेने का विचार करना, मन से दूसरे का अनिष्ट चिंतन करना तथा नास्तिक बुद्धि रखना मानसिक पाप हैं । 'कल्याण' गंगा-अंक [ जनवरी सन् २०१६ ई○ ] से, विषय- [ ग ] गंगा-सपर्या ☆ गंगादशहरा, पृष्ठ-संख्या- ४७९, गीताप्रेस, गोरखपुर

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