गंगा

*😊गंगा मैया देती हैं जीवात्मा को मोक्ष - गंगा सप्तमी 11 मई 2019, शनिवार😊* *🌿🚩भारत एक ऐसा देश है जहां प्रकृति की किसी न किसी रुप में पूजा होती है। प्राकृतिक स्त्रोतों को यहां देवी देवता की संज्ञा ही नहीं दी जाती बल्कि पौराणिक कथाओं के जरिये उनकी पूजा करने को न्यायसंगत भी बनाया गया है। हर देवी-देवता का अपना पौराणिक इतिहास है। ऐसा ही इतिहास मोक्षदायिनी, पापमोचिनी मां गंगा का भी है। गंगा हिंदूओं धर्म के मानने वालों के लिये आस्था का एक मुख्य केंद्र तो है साथ ही गंगा नदी आर्थिक रुप से भी भारतवर्ष की जीवनरेखा भी मानी जाती है। आइये जानते हैं गंगा नदी की कहानी कैसे धरती पर अवतरित हुई गंगा मैया।* *🔔गंगा का जन्म* *गंगा के जन्म को लेकर मुख्यत:  दो बातें प्रचलित हैं। जिसमें एक के अनुसार मान्यता है कि वामन रुप में राक्षस बलि से जब भगवान विष्णु ने मुक्ति दिलाई तो उसके बाद ब्रह्मदेव ने भगवान विष्णु का चरण धोया और इस जल को अपने कमंडल में भर लिया जिससे गंगा पैदा हुई और ब्रह्मा के पास रहने लगी। दूसरे के अनुसार जब भगवान शिव ने नारद मुनि ब्रह्मदेव एवं भगवान विष्णु के समक्ष गाना गाया तो इस संगीत के प्रभाव से विष्णु का पसीना बहकर निकलने लगा जो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल में भर लिया। बाद में इसी कमंडल के जल से गंगा का जन्म हुआ और वह ब्रह्मा के संरक्षण में स्वर्ग में रहने लगी।* *🔔गंगा अवतरण की पौराणिक कथा* *वैसे तो गंगा की महिमा अनेक पौराणिक ग्रंथों में बतायी गयी है। लेकिन गंगा को धरती पर लाने का श्रेय भगीरथ को दिया जाता है। जिसकी प्रचलित कथा कुछ इस प्रकार है।* *भगवान श्री राम के पूर्वज और ईक्ष्वाकु वंश के राजा सगर की दो पत्नियां थी लेकिन लंबे अर्से तक संतान का सुख नहीं मिला तो राजा सगर पत्नियों सहित तपस्या के लिये हिमालय चले गये। वहां ब्रह्मा के पुत्र भृगु ऋषि के आशीर्वाद से रानी सुमति ने एक तुंबी जैसे आकार के गर्भ पिंड को जन्म दिया तो केशनी ने एक पुत्र को। राजा सगर निराश होकर उस तुंबी को फोड़ने ही वाले थे की आकाशवाणी हुई जिसमें कहा कि इसमें 60 हजार बीज हैं जिन्हें घी से भरे मटके में अलग-अलग रखने पर कालांतर में 60 हजार पुत्रों की प्राप्ति होगी। जब राजा सगर के 60 हजार पुत्र हुए तो  तो दूसरी को एक पुत्र हुआ। ऋषि ने कहा कि वंश को बढाने वाला केवल एक पुत्र होगा।* *जब राजा सगर के पुत्र जवान और शक्तिशाली हो गये। अब राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ करवाया और घोड़े की सुरक्षा में अपने 60 हजार पुत्र तैनात कर दिये लेकिन इंद्र ने बड़ी चालाकी से घोड़ा चुराकर बहुत दूर कपिल मुनि की गुफा में उसे बांध दिया मुनि हजारों सालों से तपस्या में लीन थे। अब घोड़े को ढूंढते-ढूंडते राजा सगर के पुत्र मुनि की गुफा तक आ पंहुचे वहां घोड़े को बंधा देखकर वे मुनि को चोर समझ बैठे और उन्हें अपमानित करने लगे। जैसे ही मुनि की आंख खुली तो उनकी क्रोधाग्नि से सगर से सभी पुत्र भस्म हो गये। जब वे वापस नहीं लौटे तो सगर को काफी चिंता हुई। कुछ दिन बाद उन्हें सूचना मिली की आखिरी बार उन्हें एक गुफा में अंदर जाते हुए देखा था वहां से लौटकर नहीं आये*। *इसके बाद राजा सगर ने अपने पौत्र अशुंमान को उनकी तलाश में भेजा। अंशुमान सीधे उस गुफा में पहुंचे और राख की ढेरियां देखकर सारा माजरा समझ गये उन्होंने कपिल मुनि से विनती की कोई उपाय बताएं कि इस अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए मेरे चाचाओं को मुक्ति कैसे मिल सकती है। मुनी ने उन्हें बताया कि गंगा जी धरती पर आयें तो उनके जल ही ये मुक्ति को पा सकते हैं। फिर क्या था अंशुमान ने गंगा को धरती पर लाने का संकल्प किया अंशुमान ने कपिल मुनी के बताये अनुसार ब्रह्मा को खुश करने की बहुत कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली इसके बाद इनके बेटे दिलीप ने भी कठोर तप किया लेकिन ब्रह्मा का दिल नहीं पसीजा।* *दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। अब भगीरथ भी कठोर तप करने लगे। देवताओं को चिंता सताने लगी कि कहीं गंगा स्वर्ग से भू लोक पर न चली जाएं उन्होंने भगीरथ के तप को भंग करने की कोशिश भी की लेकिन नाकाम रहे। अंतत: ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए और गंगा को धरती पर भेजने के लिये राजी हो गये।  उधर गंगा स्वर्ग लोक छोड़ना नहीं चाहती थी उन्होंने कहा कि मेरा वेग धरती सह नहीं पाएगी। तब ब्रह्मा ने भगीरथ को भगावन शिव को प्रसन्न कर उन्हें गंगा को धारण करने की कही। भगीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की। भोलेनाथ भगीरथ के तप से प्रसन्न हुए और गंगा को धारण करने को राजी हो गए। गंगा पूरे आवेग से क्रोधित होकर आकाश से उतरी लेकिन शिव की जटा में उलझ कर रह गई। भगीरथ ने फिर से भगवान शिव की स्तुति की और उन्हें मनाया तब तक गंगा का अंहकार भी चूर-चूर हो गया था। फिर भगवान शिव ने गंगा के वेग को नियंत्रित कर धरती पर छोड़ा हिमालय से होते हुए भगीरथ के पिछे-पिछे गंगा चल पड़ी। जिस कारण इसका राम भगीरथी हुआ।* *रास्ते में जाह्नु ऋषि तपस्या में लीन थे उनकी तपस्या भंग हो गई तो क्रोध में आकर उन्होंने गंगा के पानी को पी लिया। भगीरथ ने फिर उन्हें मनाया तो ऋषि ने गंगा को अपने कान से निकाल दिया इस कारण वह जाह्नवी भी कही जाती हैं। कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगा फिर सागर में मिल गई।* *🔔शांतनु से हुआ था गंगा का विवाह* *महाभारत काल की भी एक कथा का संबंध गंगा से बताया जाता है माना जाता है कि एक समय भरतवंश के प्रतापी राजा शांतनु को आखेट खेलते समय गंगा के तट पर गंगा देवी दिखाई दी जिसके सामने शांतनु ने विवाह का प्रस्ताव रखा। गंगा ने शांतनु के प्रस्ताव को सशर्त स्वीकार कर लिया। मुख्य शर्त यही थी कि शांतनु कभी उनसे किसी भी काम में कोई दखलंदाजी नहीं करेंगें और ना ही कोई सवाल करेंगें। जिस दिन शर्त टूटी उसी दिन विवाह भी समाप्त हो जायेगा। राजा शांतनु ने शर्त स्वीकार कर विवाह कर लिया साल दर साल गंगा और शांतनु की सात संतान पैदा हुई लेकिन गंगा हर बार जन्म के तुरंत बाद शीशु को जल में प्रवाहित कर देती। जब आठवीं संतान को गंगा ने जन्म दिया और उसे प्रवाहित करने को चलने लगी तो शांतनु से रहा नहीं गया और उन्होंने गंगा से सवाल कर लिया। इस पर विवाह की शर्त भंग हो गई और गंगा वापस स्वर्ग को गमन कर गई लेकिन जाते जाते गंगा ने शांतनु को वचन दिया कि वे स्वयं बच्चे का पालन-पोषण कर बड़ा होने के बाद इसे लौटा देंगी। कालांतर में उनकी यह संतान गंगापुत्र भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुई।* *🔔गंगा धार्मिक महत्व* *गंगा के धार्मिक महत्व को इसी से देखा जा सकता है कि लगभग हर हिंदू परिवार में गंगाजल अवश्य मिलेगा। जीवन का प्रत्येक संस्कार गंगाजल से पूरा होता है यहां तक कि पंचामृत में गंगाजल भी एक अमृत के रुप में शामिल होता है। महापापी व्यक्ति भी गंगा के जल में स्नान कर पवित्र हो जाता है। जीवन के अंतिम क्षणों में गंगाजल की दो बूंद मुंह में डल जाएं तो माना जाता है व्यक्ति बिना किसी पीड़ा के प्राणत्याग कर मुक्ति को पाता है। हरिद्वार, काशी से लेकर प्रयाग तक भारतवर्ष के अधिकतर धार्मिक स्थलों का निर्माण गंगा के किनारे हुआ है। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम स्थल को तीर्थराज की संज्ञा दी जाती है। काशी के घाटों पर होने वाली गंगा मैया की आरती का नजारा अलग ही आनंद देने वाला होता है।* *🎂🔥तीज-त्यौहार हों या पवित्र माह में लगने वाले मेले, कुंभ, महाकुंभ से लेकर सिंहस्थ तक, ग्रहणों से लेकर पूर्णिमा, अमावस्या और एकादशियों तक गंगा स्नान के बिना पूजा, व्रत या उपवास का फल अपेक्षाकृत नहीं मिलता। गंगा मैया तक पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिये उनकी अस्थियों का विसर्जन, तर्पण तक गंगा मैया में किया जाता है। यहां तक कुछ लोग तो अपने जीवन के काल के अंतिम दिन तक गंगा मैया की गोद में बिताना चाहते हैं और यहीं अपने प्राण त्यागने की इच्छा रखते हैं। माना जाता है कि गंगा किनारे जिसका अंतिम संस्कार होता है वह धन्य हो जाता है उसका जीवन सफल हो जाता है।🔥😊🌿* *🙏कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि धार्मिक दृष्टि से गंगा का स्थान हिंदूओं में सर्वोपरि माना जाता है।🙏* *🔥Jai Shree Mahakal🔥* *👍🔥गंगा सप्तमी 11 मई 2019, शनिवार🙏🔥* Link 👇👇👇👇https://www.mymandir.com/p/0WqyFb?ref=share 🙏श्रीगङ्गासहस्रनामस्तोत्रम् Link 👇👇👇👇 https://www.mymandir.com/p/CYZmAb?ref=share *😊😊श्री गंगा स्तोत्रं *🙏Link👇👇👇https://www.mymandir.com/p/SDTAsb?ref=share 🔯इति श्री गंगा चालीसा Link 👇👇👇👇 https://www.mymandir.com/p/4beBC?ref=share *😊गंगाष्टकम् - श्रीमहर्षि वाल्मीकिविरचितं Link 👇👇👇https://www.mymandir.com/p/Msh9L?ref=share

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*卐 💥श्री गंगा चालीसा 卐*💥 *🙏श्री गंगा जी हिन्दू धर्म की देवी हैं। हिन्दू धर्म में इन्हें बहुत पवित्र माना जाता है। मान्यता के अनुसार देवी गंगा लोगों के पाप धोकर उन्हें जीवन मृत्यु के चक्कर से बाहर निकालती हैं तथा मोक्ष प्रदान करती हैं।* *ग्रंथों और पुराणों के अनुसार भक्तों के पाप मिटाने के लिए ही गंगा जी धरती पर अवतरित हुईं थी। गंगा मैया सबसे अधिकतम गहराई वाली नदी तथा पवित्र मानी गई है|* *🌿इनकी  उपासना माँ और देवी के रूप मे की जाती है| न केवल भारत वर्ष, अपितु विशव भर मे अपने सोंदार्ये और महत्व के कारण जानी  जाती है|* *Jai Shree Mahakaal* -  *गंगा के चालीसा का पाठ करते हैं और गंगा मैय्या से अपने लिए पापों को ख़त्म करने की कामना करैं।* *卐 श्री गंगा चालीसा 卐* *॥ दोह॥*  जय जय जय जग पावनी, जयति देवसरि गंग। जय शिव जटा निवासिनी, अनुपम तुंग तरंग॥ *॥ चौपाई ॥*  जय जय जननी हरण अघ खानी। आनंद करनि गंग महारानी॥ जय भगीरथी सुरसरि माता।  कलिमल मूल दलनि विख्याता॥ जय जय जहानु सुता अघ हनानी। भीष्म की माता जगा जननी॥ धवल कमल दल मम तनु साजे। लखि शत शरद चंद्र छवि लाजे॥ वाहन मकर विमल शुचि सोहै।  अमिय कलश कर लखि मन मोहै॥ जड़ित रत्न कंचन आभूषण। हिय मणि हर, हरणितम दूषण॥ जग पावनि त्रय ताप नसावनि। तरल तरंग तंग मन भावनि॥ जो गणपति अति पूज्य प्रधाना। तिहूं ते प्रथम गंगा स्नाना॥ ब्रह्म कमंडल वासिनी देवी। श्री प्रभु पद पंकज सुख सेवि॥ साठि सहस्त्र सागर सुत तारयो। गंगा सागर तीरथ धरयो॥ अगम तरंग उठ्यो मन भावन। लखि तीरथ हरिद्वार सुहावन॥ तीरथ राज प्रयाग अक्षैवट।  धरयौ मातु पुनि काशी करवट॥ धनि धनि सुरसरि स्वर्ग की सीढी। तारणि अमित पितु पद पिढी॥ भागीरथ तप कियो अपारा। दियो ब्रह्म तव सुरसरि धारा॥ जब जग जननी चल्यो हहराई। शम्भु जाटा महं रह्यो समाई॥ वर्ष पर्यंत गंग महारानी।  रहीं शम्भू के जटा भुलानी॥ पुनि भागीरथी शंभुहिं ध्यायो। तब इक बूंद जटा से पायो॥ ताते मातु भइ त्रय धारा। मृत्यु लोक, नाभ, अरु पातारा॥ गईं पाताल प्रभावति नामा।  मन्दाकिनी गई गगन ललामा॥ मृत्यु लोक जाह्नवी सुहावनि। कलिमल हरणि अगम जग पावनि॥ धनि मइया तब महिमा भारी। धर्मं धुरी कलि कलुष कुठारी॥ मातु प्रभवति धनि मंदाकिनी। धनि सुरसरित सकल भयनासिनी॥ पान करत निर्मल गंगा जल।  पावत मन इच्छित अनंत फल॥ पूर्व जन्म पुण्य जब जागत। तबहीं ध्यान गंगा महं लागत॥ जई पगु सुरसरी हेतु उठावही। तई जगि अश्वमेघ फल पावहि॥ महा पतित जिन काहू न तारे। तिन तारे इक नाम तिहारे॥ शत योजनहू से जो ध्यावहिं। निशचाई विष्णु लोक पद पावहिं॥ नाम भजत अगणित अघ नाशै। विमल ज्ञान बल बुद्धि प्रकाशै॥ जिमी धन मूल धर्मं अरु दाना।  धर्मं मूल गंगाजल पाना॥ तब गुण गुणन करत दुख भाजत। गृह गृह सम्पति सुमति विराजत॥ गंगाहि नेम सहित नित ध्यावत। दुर्जनहुँ सज्जन पद पावत॥ बुद्दिहिन विद्या बल पावै। रोगी रोग मुक्त ह्वै जावै॥ गंगा गंगा जो नर कहहीं।  भूखे नंगे कबहु न रहहि॥ निकसत ही मुख गंगा माई।  श्रवण दाबी यम चलहिं पराई॥ महाँ अधिन अधमन कहँ तारें।  भए नर्क के बंद किवारें॥ जो नर जपै गंग शत नामा। सकल सिद्धि पूरण ह्वै कामा॥ सब सुख भोग परम पद पावहिं।  आवागमन रहित ह्वै जावहीं॥ धनि मइया सुरसरि सुख दैनी। धनि धनि तीरथ राज त्रिवेणी॥ कंकरा ग्राम ऋषि दुर्वासा। सुन्दरदास गंगा कर दासा॥ जो यह पढ़े गंगा चालीसा। मिली भक्ति अविरल वागीसा॥ *॥ दोहा ॥*  नित नव सुख सम्पति लहैं। धरें गंगा का ध्यान। अंत समय सुरपुर बसै। सादर बैठी विमान॥ संवत भुज नभ दिशि ।  राम जन्म दिन चैत्र। पूरण चालीसा कियो।  हरी भक्तन हित नैत्र॥ *॥ 🔯इति श्री गंगा चालीसा ॥🔯*  *👍मान्यता के अनुसार करोड़ो जन्मों के पाप गंगा की वायु के स्पर्श मात्र से समाप्त हो जाते हैं। स्पर्श और दर्शन की इच्छा और गंगा में स्नान करने से व्यक्ति को दस गुणा पुण्य की प्राप्ति होती है।* *🎡🎠इसके अलावा समान्य दिन में स्नान करने से भी जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। विशेष तिथियों और अवसरों पर गंगा स्नान का व्यक्ति को विशेष फल प्राप्त होता है।💗💗*   *🍒HAR HAR GANGE *🍒 *🚩HAR HAR MAHADEV*🚩 *🔔Jai Shree Mahakal*🔔 🙏श्रीगङ्गासहस्रनामस्तोत्रम् Link 👇👇👇👇 https://www.mymandir.com/p/CYZmAb?ref=share *🙏श्री गंगा स्तोत्रं *🙏Link👇👇👇https://www.mymandir.com/p/SDTAsb?ref=share

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*🙏श्री गंगा स्तोत्रं *🙏 *💗गंगा से अलग होकर भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती। गंगा सहस्त्रों वर्षों से अविरल प्रवाहित, भारतीय संस्कृति को युगों से गढ़ती, सभ्यताओं एवं संस्कृतियों को रूप देती, दुःखों एवं सुखों की साक्षी रही है। हमारी श्रद्धा, विश्वास तथा आस्था ने अपने तट पर वासित अध्यात्म एवं योग के अन्वेषियों को आत्म एवं जगत के रहस्यों की , ब्रहमज्ञान की अनुभूति कराई है। इसी से यह मोक्षदायिनी संज्ञा से विभूषित हुई है। दूषित मन, अपराधी मन, विक्षोभित मन इसके सान्निध्य मात्र से पावन, निर्मल और शुद्ध हुए हैं और इसी से इसे पतित पावनी की पदवी मिली। युगों-युगों से प्रवाहित गंगा, भारतीय संस्कृति की धुरी तथा भारतीयों की आस्था का केन्द्र बनी हुई है* *🔥गंगा आराधना को समर्पित भावभरी पंक्तियां हैं। इसकी रचना आद्य शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र बहुत ही मधुर और लययुक्त है। भक्तिभावपूर्वक इसका पाठ करने से सभी तरह के शाप, ताप नष्ट हो जाते हैं, बुद्धि विमल हो जाती है और व्यक्ति जीवन-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है ।* *l🌿 श्रीमच्छनकराचार्य रचित गंगा स्तोत्र ll*🚩 देवि सुरेश्वरि भगवति गंगे त्रिभुवनतारिणि तरल तरंगे। शंकर मौलिविहारिणि विमले मम मति रास्तां तव पद कमले ॥ १ ॥ भागीरथिसुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः । नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २ ॥ हरिपदपाद्यतरंगिणि गंगे हिमविधुमुक्ताधवलतरंगे । दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३ ॥ तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् । मातर्गंगे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४ ॥ पतितोद्धारिणि जाह्नवि गंगे खंडित गिरिवरमंडित भंगे । भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतितनिवारिणि त्रिभुवन धन्ये ॥ ५ ॥ कल्पलतामिव फलदां लोके प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके । पारावारविहारिणि गंगे विमुखयुवति कृततरलापांगे ॥ ६ ॥ तव चेन्मातः स्रोतः स्नातः पुनरपि जठरे सोपि न जातः । नरकनिवारिणि जाह्नवि गंगे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुंगे ॥ ७ ॥ पुनरसदंगे पुण्यतरंगे जय जय जाह्नवि करुणापांगे । इंद्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८ ॥ रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् । त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥ ९ ॥ अलकानंदे परमानंदे कुरु करुणामयि कातरवंद्ये । तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुंठे तस्य निवासः ॥ १० ॥ वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः । अथवाश्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥ ११ ॥ भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये । गंगास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२ ॥ येषां हृदये गंगा भक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः । मधुराकंता पंझटिकाभिः परमानंदकलितललिताभिः ॥ १३ ॥ गंगास्तोत्रमिदं भवसारं वांछितफलदं विमलं सारम् । शंकरसेवक शंकर रचितं पठति सुखीः त्व ॥ १४ ॥ *💥॥ इति श्रीमच्छनकराचार्य विरचितं गङ्गास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥*💥 *🔥Jai Shree Mahakal🔥* 🙏श्रीगङ्गासहस्रनामस्तोत्रम् Link 👇👇👇👇 https://www.mymandir.com/p/CYZmAb?ref=share

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