कृष्ण भजन

Swamini Dec 12, 2019

*‼भक्तिमती मीराबाई चरित (32)‼* मिथुला, चम्पा और दूसरी दासियाँ धैर्य से अपनी बाईसा से ज्ञान की बातें सुन रही थी। मीरा ने फिर कहा, "इस संसार में कहीं भी सुख नहीं है। सुख और आनन्द जुड़वा भाई है-इनके मुख की आकृति भी एक-सी है-पर स्वभाव एक दूसरे से विपरीत है। मानव ढूँढता तो है आनन्द को, किन्तु मुख-साम्य के कारण सुख को ही आनन्द जानकर अपना लेता है। और इस प्रकार। आनन्द की खोज में वह जन्म जन्मान्तर तक भटकता रहता है।" "इनके स्वभाव में क्या विपरीतता है?" मिथुला ने जिज्ञासा की। "आनन्द सदा एक-सा रहता है। इसमें घटना बढ़ना नहीं है। पर सुख मिलने के साथ ही घटना आरम्भ हो जाता है। इस प्रकार मनुष्य की खोज पूरी नहीं होती और जीवन के प्रत्येक पड़ाव पर वह सुखी होने का स्वप्न देखता रहता है।" एक बात और सुन मिथुला, इस सुख का एक मित्र भी है और यह दोनों मित्र एक ही स्वभाव के है। उसका नाम है दुख। दुख भी सुख के समान ही मिलते ही घटने लग जाता है अतः यदि सुख आयेगा तो उसका हाथ थामें दुख भी चला आयेगा। " "आनन्द की कोई पहचान बाईसा?। उसका ठौर ठिकाना कैसे ज्ञात हो कि पाने का प्रयत्न किया जाये।" "पहचान तो यही है कि वह इकसार है, वह ईश्वर का रूप है। ईश्वर स्वयं आनन्द स्वरूप है। जैसे सुख के साथ दुख आता है, उसी प्रकार आनन्द से ईश्वर की प्रतीति होती है। इसे पाने के बाद यह खोज समाप्त हो जाती है। अब रही ठौर ठिकाने की बात, तो वह गुरु और संतो की कृपा से प्राप्त होता है। उसके लिए सत्संग आवश्यक है। संत जो कहे, उसे सुनना और मनन-चिन्तन करना और भी आवश्यक है।" मीरा धैर्य से मिथुला की जिज्ञासा के उत्तर में कितने ही भक्तों के प्रश्नों का समाधान करती जा रही हैं। फिर मीरा ने आगे कहा, "दुख और सुख दोनों का मूल इच्छा है और इच्छा का मूल मोह है। एक इच्छा की पूर्ति होते ही उसी की कोख से कई और इच्छायें जन्म ले लेती है। यही तृष्णा है और इसका कहीं भी अन्त नहीं।" मीरा ने थोड़ा रूककर फिर कहा, "अब हम आनन्द का भी स्वरूप समझें। जैसे हमें दूसरे सुखी दिखाई देते है, पर वे सुखी है नहीं। उसी प्रकार जिनको आनन्द मिलता है, वे बाहर से दुखी दिखाई देने पर भी दुखी नहीं होते।" "बाईसा हुकम! एक बात बतलाइये, क्या भक्त और अच्छे लोग पिछले जन्म में दुष्कर्म ही करके आये है कि वर्तमान में दुख पाना उनका भाग्य बन गया और सभी खोटे लोग पिछले जन्म में धर्मवान थे कि इस जन्म में मनमानी करते हुये पिछले कर्मों के बल पर मौज मना रहे है?" "अरे नहीं, ऐसा नहीं होता। शुभ, अशुभ और मिश्रित तीन प्रकार के कर्म होते है। जैसे पापी केवल पाप ही नहीं, कभी जाने-अन्जाने में पुण्य भी करते है, उसी तरह पुण्यात्मा के द्वारा भी कोई न कोई अन्जाने में अपराध हो जाता है। तुमने देखा होगा मिथुला! मातापिता अपनी संतान में तनिक-सी भी खोट सह नहीं पाते है। यदि दो बालक खेलते हुये लड़ पड़े तो माता-बाप अपने ही बच्चे को डाँटते है कि तू उसके साथ खेलने क्यों गया? ठीक वैसे ही प्रभु अपने भक्त में तनिक-सी कालिख भी नहीं देख-सह पाते।" मीरा ने समझाते हुये कहा। फिर मीरा ने आगे कहा, "जब प्रारब्ध बनने का समय आता है तो भक्त के संचित कर्मों से ढूँढ-ढूँढ करके बुरे कर्मफलों का समावेश किया जाता है कि शीघ्र से शीघ्र यह सब समाप्त हो जायें और वह प्रभु के आनन्द को प्राप्त कर सके. दूसरी तरफ़, पापियों पर दया करके शुभ कर्मो का फल प्रारब्ध-भोग में समावेशित किया जाता है कि किसी भी प्रकार यह सत्संग पाकर सुधर जाये। क्योंकि भक्त के पास तो भगवान के नाम रूपी चिन्तामणि है जिसके बल से वह कठिन दुख और विपत्तियों को सह जाता है। फिर प्रभु की दृष्टि उसपर से ज़रा भी नहीं हटती। यही कारण है कि भक्त सज्जन दुखी और दुर्जन सुखी दिखाई देते है।" "जगत में इतने लालच है बाईसा हुकम! यदि भक्त नामक जीव अशेष दुख उठाकर परिस्थितियों की शिला से फिसल गया, तो वह बेचारा तो दोनों ओर से गया।" मिथुला के ऐसा कहने पर दूसरी दासियों ने मुस्कराते हुये हाँ में हाँ मिलाई. मीरा ने इस संशय का समाधान करते हुये कहा, "यदि इस पथ का पथिक विचलित होकर संसार के विषयों के प्रलोभन से अथवा परिस्थितियों की शिला से फिसल भी जाये तब भी भगवान उसके जीवन में कई ऐसे प्रसंग उपस्थित करते है, जिससे वह संभल जाये। यदि वह नहीं संभल पाये तो अगला जन्म लेने पर जहाँ से उसने साधना छोड़ी थी, वहीं से वह आगे चल पड़ेगा।" "मिथुला! कहाँ तक करूणासागर भगवान की करूणा का बखान करूँ-उसके अराध्य बार-बार फिसलने का खतरा उपस्थित ही नहीं होने देते। अपने भक्त की संभाल प्रभु स्वयं करते है।" मीरा ने कहा। मीरा ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के कठिन विषयों को सरल शब्दों में अति स्नेह से समझाती हुई बोली, "मिथुला! अगर भगवान परिस्थितियों में निज जन को डालते हैं तो क्षण-क्षण उसकी संभाल का दायित्व भी स्वयं लेते है। देखो, दुखों की सृष्टि मनुष्य को उजला करने के लिए हुई है। क्योंकि दुख से ही वैराग्य का जन्म होता है और प्रभु सुख प्राप्ति के लिए किए गये प्रत्येक प्रयत्न को निरस्त कर देते है। हार थककर वह संसार की ओर पीठ देकर चलने लगता है। फिर तो क्या कहें? संत, शास्त्र और वे सभी उपकरण, जो उसकी उन्नति में आवश्यक है, एक-एक करके प्रभु जुटा देते है। इस प्रकार एक बार इस भक्ति के पथ पर पाँव धरने के पश्चात लक्ष्य के शिखर तक पहुँचना आवश्यक हो जाता है, भले दौड़कर पहुँचे याँ पंगु की भांति सरकते-खिसकते पहुँचे।" "जिसने एक बार भी सच्चे मन से चाहा कि ईश्वर कौन है? अथवा मैं कौन हूँ, उसका नाम भक्त की सूची में लिखा गया। उसके लिए संसार के द्वार बन्द हो गये। अब वह दूसरी ओर जाने के लिए चाहे जितना प्रयत्न करे कभी सफल नहीं हो पायेगा। गिर-गिर कर उठना होगा। भूल-भूल कर पुनः भक्ति का पथ पकड़ना होगा। पहले और पिछले कर्मों में से छाँट-छूँट करके वे कर्मफल प्रारब्ध बनेंगे जो उसे लक्ष्य की ओर ठेल दें।" "जैसे स्वर्णकार स्वर्ण को, जब तक खोट न निकल जाये, तबतक बार-बार भठ्ठी में पिघला कर ठंडा करता है और फिर कूट-पीट कर, छीलकर और नाना रत्नों से सजाकर सुन्दर आभूषण तैयार कर देता है, वैसे ही प्रभु भी जीव को तपा-तपा कर महादेव बना देते है। एक बार चल पड़ा फिर तो आनन्द ही आनन्द है।" "परसों एक महात्माजी फरमा रहे थे कि कर्मफल याँ तो ज्ञान की अग्नि में भस्म होते है अथवा भोग कर ही समाप्त किया जा सकता है, तीसरा कोई उपाय नहीं है।" चम्पा ने पूछा, "बाईसा हुकम! भक्त यदि मुक्ति पा ले तो उसके संचित कर्मों का क्या होगा?" "ये कर्म भक्त का भला बुरा करने वालों में और कहने वालों में बँट जायेंगे। समझी?" मीरा अपनी दासियों की जिज्ञासा से प्रसन्न हो मुस्कुरा कर बोली, "आजकल चम्पा बहुत गुनने लगी है।" चम्पा सिर झुका कर बोली, "सरकार की चरण-रज का-का प्रताप है। लगता है, मैंने भी किसी जन्म में," ईश्वर कौन है, "यह सत्य जानने की इच्छा की होगी जो प्रभु ने कृपा करके आप जैसी स्वामिनी के चरणों का आश्रय प्रदान किया है।" *🌻जय जय मीरा माधव🌻* *॥ श्री राधारमणाय समर्पणं ॥* *क्रमशः .................)* *‼जय जय मीरा के मोहन‼*

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Meena Dubey Dec 12, 2019

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