कबीरदास

आशुतोष Aug 29, 2020

••दोहे•• ◆ ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग । तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग ।। •भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रोशनी होती है, ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूंढ लो। ◆ नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए । मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए ।। •भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि आप कितना भी नहा धो लीजिए, लेकिन अगर मन साफ़ नहीं हुआ तो ऐसे नहाने से क्या फायदा, जैसे मछली हमेशा पानी में ही रहती है लेकिन फिर भी वो साफ़ नहीं होती, बल्कि मछली में से तीव्र बदबू आती है। ◆ आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर । इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर ।। •भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि जो इस दुनियां में आया है उसे एक दिन जरूर जाना है। चाहे राजा हो या फ़क़ीर, अंत समय यमदूत सबको एक ही जंजीर में बांध कर ले जायेंगे। ◆ लूट सके तो लूट ले, हरी नाम की लूट । अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट ।। •भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार ज्ञान से भरा पड़ा है, हर जगह राम बसे हैं। अभी समय है राम की भक्ति करो, नहीं तो जब अंत समय आएगा तो पछताना पड़ेगा।

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आशुतोष Aug 27, 2020

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