एकादशी_व्रत_

🕉️ हिंदू धर्म के अनुसार एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से ही कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना चाहिए। एकादशी के दिन क्या करें और क्या न करें... 1. एकादशी के दिन क्रोध न करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए। 2. एकादशी का व्रत-उपवास करने वालों को दशमी के दिन मांस, लहसुन, प्याज, मसूर की दाल आदि निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। 3. रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा विलास से दूर रहना चाहिए। 4. एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और अंगुली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। 5. यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। 6. फिर प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि 'आज मैं चोर, पाखंडी़ और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूंगा और न ही किसी का दिल दुखाऊंगा। रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूंगा।' 7. तत्पश्चात 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएं। 8. भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें और कहे कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना। 9. यदि भूलवश किसी निंदक से बात कर भी ली तो भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कर धूप-दीप से श्री‍हरि की पूजा कर क्षमा मांग लेना चाहिए। 10. एकादशी के दिन घर में झाडू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। 11. इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। 12. अधिक नहीं बोलना चाहिए। अधिक बोलने से मुख से न बोलने वाले शब्द भी निकल जाते हैं। 13. इस दिन यथा‍शक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। 14. वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें। 15. एकादशी (ग्यारस) के दिन व्रतधारी व्यक्ति को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। 16. केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। 17. प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। 18. द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए। कैसे प्रारंभ हुआ एकादशी व्रत? इस संबंध में पद्म पुराण में कथा है कि एक बार पुण्यश्लोक धर्मराज युधिष्ठिर को लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त दुःखों, त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने, हजारों यज्ञों के अनुष्ठान की तुलना करने वाले, चारों पुरुषार्थों को सहज ही देने वाले एकादशी व्रत करने का निर्देश दिया। इस व्रत को करने से जीवन के सारे कष्ट समाप्त हो जाते हैं और उपवास करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है। जय श्री राधे राधे🙏🙏🚩🚩🚩

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जैसे देवताओं में भगवान विष्णु, प्रकाश-तत्त्वों में सूर्य, नदियों में गंगा प्रमुख हैं; वैसे ही व्रतों में सर्वश्रेष्ठ व्रत एकादशी-व्रत को माना गया है । इस तिथि को जो कुछ दान किया जाता है, भजन-पूजन किया जाता है, वह सब भगवान श्रीहरि के पूजित होने पर पूर्णता को प्राप्त होता है अर्थात् प्रत्येक पुण्य कर्म अनंत फल देता है । मनुष्य के सात जन्मों के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप दूर हो जाते हैं और भगवान श्रीहरि पूजित होने पर संतुष्ट होकर प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं । यदि मनुष्य को श्रीहरि की प्रसन्नता व सांनिध्य चाहिए तो व्रत के नियम का पालन करना अनिवार्य है । एकादशी-व्रत के नियमानुसार इस दिन अन्न खाना निषिद्ध है, विशेष रूप से चावल (चावल से बना पोहा, लाई आदि) नहीं खाना चाहिए । एकादशी को व्रत करके रात्रि में जागरण व कीर्तन करने का विधान है; जिससे व्रती के सभी पाप भस्म होकर विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । नामदेवजी की एकादशी व्रत के प्रति निष्ठा एक बार भगवान विट्ठल के मन में उमंग उठी कि नामदेवजी के एकादशी-व्रत की परीक्षा करनी चाहिए । यह विचार कर भगवान ने एक अत्यंत दुर्बल ब्राह्मण का रूप धारण किया और एकादशी के दिन नामदेवजी के घर जाकर बड़ी दीनता से पुकारने लगे–’मैं बहुत भूखा हूँ, कई दिन से भोजन नहीं मिला है, मुझे कुछ अन्न दो ।’ अत्यंत दीन याचक को देख कर नामदेवजी ने कहा–’आज तो एकादशी है, अन्न नहीं दूंगा, कुछ फलाहार (दूध, फल आदि) कर लीजिए । प्रात:काल जितनी इच्छा हो, उतना अन्न ले लीजिएगा ।’ बहुत देर तक नामदेवजी याचक को फलाहार लेने के लिए मनाते रहे; लेकिन याचक अन्न ही लेने की बात पर अड़ा रहा और नामदेवजी एकादशी के दिन अन्न नहीं देने की हठ कर रहे थे । ————————— शास्त्रों के अनुसार एकादशी के दिन अन्न (गेहूं, चावल आदि) खाने व देने से पाप लगता है, इसके लिए कहा गया है कि—‘ब्रह्महत्या आदि समस्त पाप एकादशी के दिन अन्न में रहते हैं । अत: एकादशी के दिन जो अन्न का भोजन करता है, वह पाप-भोजन करता है ।’ यदि एकादशी का व्रत न भी कर सकें तो इस दिन चावल और उससे बने पदार्थ नहीं खाने चाहिए और न किसी को देने चाहिए । —————————- कुछ ही समय में नामदेवजी और याचक की हठ की खबर चारों ओर फैल गई । लोग नामदेवजी के घर के बाहर इकट्ठे हो गए । वे नामदेवजी को समझाने लगे कि वे इस दुर्बल भूखे ब्राह्मण पर क्रोध न करें और इसे खाने के लिए कुछ अन्न दे दें; लेकिन नामदेवजी नहीं माने । दिन का चौथा पहर बीतने पर वह भूखा ब्राह्मण इस प्रकार पैर फैला कर लेट गया, मानो मर गया हो । गांव के लोग नामदेवजी की एकादशी-व्रत के प्रति निष्ठा को नहीं जानते थे । अत: उन्होंने नामदेवजी पर ब्रह्म-हत्या का पाप लगा कर समाज से बहिष्कृत कर दिया । लेकिन नामदेवजी इससे बिल्कुल भी चिंतित नहीं हुए । एकादशी-व्रत के अपने नियम के अनुसार नामदेवजी ने रात्रि भर जागरण और कीर्तन किया । प्रात:काल होते ही उन्होंने चिता बनाई और उस ब्राह्मण के मृत शरीर को गोद में लेकर चिता पर बैठ गए । लोगों ने जब ऐसा करने से मना किया तो उन्होंने कहा–’इस हत्यारे शरीर को न रख कर प्रायश्चितस्वरूप इसे भस्म कर देना ही उत्तम है ।’ उसी समय भगवान प्रकट हो गए और मुसकरा कर कहने लगे–’मैंने तो तुम्हारी परीक्षा ली थी । तुम्हारी एकादशी-व्रत के प्रति निष्ठा मैंने देख ली । वह मेरे मन को बहुत प्रिय लगी, मुझे उससे बहुत सुख मिला ।’  ऐसा कह कर भगवान अंतर्ध्यान हो गए । लोगों ने जब भगवान की यह लीला देखी तो वे नामदेवजी के चरणों में नतमस्तक हो गए और उनके भक्त बन गए । एक बार नामदेवजी के घर एकादशी की रात्रि में कीर्तन व जागरण हो रहा था । कीर्तन में उपस्थित भक्तों को प्यास लगी तो नामदेवजी जल लाने नदी पर गए । लेकिन मार्ग में एक प्रेत के भय से कोई भी व्यक्ति उनके साथ नहीं आया । नामदेवजी को आया देख कर प्रेत ने विकराल रूप धारण कर लिया और अपने साथियों सहित उनके चारों ओर फेरी लगाने लगा । नामदेवजी इससे जरा भी भयभीत नहीं हुए । प्रेत को अपने भगवान का स्वरूप मान कर उन्होंने कमर पर बंधे फेंटे में से झांझ निकाल ली और पद गाने लगे । तुरंत ही प्रेत न जाने कहां गायब हो गया और सांवले सलौने श्यामसुन्दर वहां प्रकट हो गए ।  भगवान ने नामदेवजी की एकादशी-व्रत के प्रति निष्ठा की प्रशंसा की और अंतर्ध्यान हो गए । अपने इष्ट का दर्शन पाकर नामदेवजी भी अत्यंत प्रसन्न होकर कीर्तन करते हुए भक्तों को जल पिलाने चल दिए । जय श्री संत नामदेव महाराज 👑 जय श्री राम जय श्री कृष्ण जय श्री हरी विठ्ठल रुक्मिणी माता की 💐 👏 शुभ रात्री वंदन 👣 🌹 👏 🌿 हर हर महादेव जय श्री महाकाली जय श्री महाकाल जी ॐ नमः शिवाय नमस्कार शुभ एकादशी शुभ रात्री 👏🚩🐚🌷🍃🌱💞🚩 आप सभी भारतवासी मित्रों को कामदा एकादशी की हार्दिक शुभकामना ये नमस्कार 🙏 🌷 🌹 🌿 🚩 🐚⛺🌃🔥⚡ 🙏✨🍃🌼🎪🌙🌟⚡🌈🌀🌠

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M.S.Chauhan Apr 7, 2021

*शुभ दिन बुधवार* *जय हरि विष्णुदेव* *आपको सपरिवार एकादशी की हार्दिक शुभकामनाएं* *पापमोचनी एकादशी बुधवार 07 अप्रैल 2021 को है इसका समय पोस्ट के अंत में दिया गया है जरूर पढ़ें जी* ¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤¤ *चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है I इस वर्ष यह व्रत बुधवार 07 अप्रैल 2021को मनाया जा रहा है I यह एकादशी सभी तरह के पापों को नष्ट करती है। इससे यह भी पता चलता है कि कामभावना मोक्ष प्राप्त करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है, जिसे जीतने में साधारण मनुष्य तो क्या, ऋषि मुनि भी असफल होते हैं।* *महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से चैत्र (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार फाल्गुन ) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की तो वे बोले : ‘राजेन्द्र ! मैं तुम्हें इस विषय में एक पापनाशक उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाता के पूछने पर महर्षि लोमश ने कहा था ।* *मान्धाता ने पूछा: भगवन् ! मैं लोगों के हित की इच्छा से यह सुनना चाहता हूँ कि चैत्र मास के कृष्णपक्ष में किस नाम की एकादशी होती है, उसकी क्या विधि है तथा उससे किस फल की प्राप्ति होती है? कृपया ये सब बातें मुझे बताइये ।* *पापमोचनी एकादशी व्रत की कथा :-* *लोमशजी ने कहा: नृपश्रेष्ठ ! पूर्वकाल की बात है । अप्सराओं द्वारा सेवित चैत्ररथ नामक सुंदर वन में मंजूघोषा नामक अप्सरा को स्वर्ग के राजा इन्द्र ने उसी स्थान में तपस्या कर रहे ऋषि मेधावी की तपस्या को भंग करने के लिए भेजा। शाप के भय से मंजूघोषा आश्रम से एक कोस दूर ही वीणा बजाते हुए मधुर गीत गाने लगी। महर्षि मेधावी चैत्ररथ वन में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करते थे । मंजुघोषा मुनि के भय से आश्रम से एक कोस दूर ही ठहर गयी और सुन्दर ढंग से वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी । मुनिश्रेष्ठ मेघावी घूमते हुए उधर जा निकले और उस सुन्दर अप्सरा को इस प्रकार गान करते देख बरबस ही मोह के वशीभूत हो गये । मुनि की ऐसी अवस्था देख मंजुघोषा उनके समीप आयी और वीणा नीचे रखकर उनका आलिंगन करने लगी । मेघावी भी उसके साथ रमण करने लगे । रात और दिन का भी उन्हें भान न रहा । इस प्रकार उन्हें बहुत दिन व्यतीत हो गये । मंजुघोषा देवलोक में जाने को तैयार हुई । जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेघावी से कहा: ‘ब्रह्मन् ! अब मुझे अपने देश जाने की आज्ञा दीजिये ।’* *मेघावी बोले: देवी ! जब तक सवेरे की संध्या न हो जाय तब तक मेरे ही पास ठहरो ।* *अप्सरा ने कहा: विप्रवर ! अब तक न जाने कितनी ही संध्याँए चली गयीं ! मुझ पर कृपा करके बीते हुए समय का विचार तो कीजिये !* *लोमशजी ने कहा: राजन् ! अप्सरा की बात सुनकर मेघावी चकित हो उठे । उस समय उन्होंने बीते हुए समय का हिसाब लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते हुए उन्हें सत्तावन वर्ष हो गये । उसे अपनी तपस्या का विनाश करनेवाली जानकर मुनि को उस पर बड़ा क्रोध आया । उन्होंने शाप देते हुए कहा: ‘पापिनी ! तू पिशाची हो जा ।’ मुनि के शाप से दग्ध होकर वह विनय से नतमस्तक हो बोली : ‘विप्रवर ! मेरे शाप का उद्धार कीजिये । सात वाक्य बोलने या सात पद साथ साथ चलनेमात्र से ही सत्पुरुषों के साथ मैत्री हो जाती है । ब्रह्मन् ! मैं तो आपके साथ अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं, अत: स्वामिन् ! मुझ पर कृपा कीजिये ।*’ *मुनि बोले: भद्रे ! क्या करुँ ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है । फिर भी सुनो । चैत्र कृष्णपक्ष में जो एकादशी आती है उसका नाम है ‘पापमोचनी ।’ वह शाप से उद्धार करनेवाली तथा सब पापों का क्षय करनेवाली है । सुन्दरी ! उसीका व्रत करने पर तुम्हारी पिशाचता दूर होगी ।* *ऐसा कहकर मेघावी अपने पिता मुनिवर च्यवन के आश्रम पर गये । उन्हें आया देख च्यवन ने पूछा : ‘बेटा ! यह क्या किया ? तुमने तो अपने पुण्य का नाश कर डाला !*’ *मेघावी बोले: पिताजी ! मैंने अप्सरा के साथ रमण करने का पातक किया है । अब आप ही कोई ऐसा प्रायश्चित बताइये, जिससे पातक का नाश हो जाय*। *च्यवन ने कहा: बेटा ! चैत्र कृष्णपक्ष में जो‘पापमोचनी एकादशी’ आती है, उसका व्रत करने पर पापराशि का विनाश हो जायेगा*। *पिता का यह कथन सुनकर मेघावी ने उस व्रत का अनुष्ठान किया । इससे उनका पाप नष्ट हो गया और वे पुन: तपस्या से परिपूर्ण हो गये । इसी प्रकार मंजुघोषा ने भी इस उत्तम व्रत का पालन किया । ‘पापमोचनी’ का व्रत करने के कारण वह पिशाचयोनि से मुक्त हुई और दिव्य रुपधारिणी श्रेष्ठ अप्सरा होकर स्वर्गलोक में चली गयी ।* *पापमोचनी एकादशी व्रत की विधि :-* *पापमोचिनी व्रत में भगवान विष्णु के चतुर्भुज रूप की पूजा की जाती है। व्रती को एक बार दशमी तिथि को सात्विक भोजन करना चाहिए। मन से भोग-विलास की भावना त्यागकर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। एकादशी के दिन सूर्योदय काल में स्नान करके व्रत का संकल्प करना चाहिए। संकल्प के उपरांत षोडषोपचार सहित श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए। भगवान के समक्ष बैठकर भगवद् कथा का पाठ अथवा श्रवण करना चाहिए*। *पापमोचनी एकादशी का माहात्म्य :-* *भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! जो श्रेष्ठ मनुष्य ‘पापमोचनी एकादशी’ का व्रत करते हैं उनके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । इसको पढ़ने और सुनने से सहस्र गौदान का फल मिलता है । ब्रह्महत्या, सुवर्ण की चोरी, सुरापान और गुरुपत्नीगमन करनेवाले महापातकी भी इस व्रत को करने से पापमुक्त हो जाते हैं।* *जानें क्यों वर्जित है एकादशी पर चावल खाना :-* *पौराणिक मान्यता के अनुसार माता शक्ति के क्रोध से बचने के लिए महर्षि मेधा ने शरीर का त्याग कर दिया और उनका अंश पृथ्वी में समा गया। चावल और जौ के रूप में महर्षि मेधा उत्पन्न हुए, इसलिए चावल और जौ को जीव माना जाता है। जिस दिन महर्षि मेधा का अंश पृथ्वी में समाया, उस दिन एकादशी तिथि थी, इसलिए इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णु प्रिया एकादशी का व्रत संपन्न हो सके*। *एकादशी पर चावल न खाने का ज्योतिषीय कारण:-* *ज्योतिष मान्यता के अनुसार चावल में जल तत्व की मात्रा अधिक होती है। जल पर चन्द्रमा का प्रभाव अधिक पड़ता है। चावल खाने से शरीर में जल की मात्रा बढ़ती है, इससे मन विचलित और चंचल होता है। मन के चंचल होने से व्रत के नियमों का पालन करने में बाधा आती है।एकादशी व्रत में मन का पवित्र और सात्विक भाव का पालन अति आवश्यक होता है, इसलिए एकादशी के दिन चावल से बनी चीजें खाना वर्जित कहा गया है*। *यदि व्रत करना न संभव हो तो :-* *जो लोग किसी कारण से एकादशी व्रत नहीं कर पाते हैं, उन्हें श्री हरि एवं देवी लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए एकादशी के दिन खान-पान एवं व्यवहार में सात्विकता का पालन करना चाहिए। इस दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा नहीं खाएं। एकादशी के दिन किसी से झूठ या अप्रिय वचन न बोलें और प्रभु का स्मरण करें। यह व्रत बहुत पुण्यमय है ।* *!! श्री राधे राधे जी !!* *व्रत समय:- 07/04/21 को सुबह 2:09 से* *08/04/21 को सुबह 2:28 बजे तक!* *परायण समय :-* *08/04/21 को दोपहर 1:39 से शाम 4:11 बजे तक!* *जय श्रीकृष्ण गोविंद हरे मुरारी* *हे नाथ नारायण वाशुदेवा!* 🌷🏵️🌲🙏🌲🏵️🌷

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