अटल_है_और_हमेशा_अटल_रहेंगे।💐💐

"सफलता भी कर्मठ व्यक्तियों के चरण चूमती है , ऐसा प्रकृति का नियम है । *महारानी धुर्वदेवी* लेखक - डा• विजेंद्र सिंह भाग - 1 तीखे नयन नक्श, आकर्षक व्यक्तित्व, सुडौल बदन, गुलाब की पंखुरी जैसे अधर, कमल के फूल जैसे कपोल, हिरनी जैसी चाल, सुराही जैसी गर्दन, चांद जैसी सुन्दरता समेटे *महारानी धुर्वदेवी* अद्वितीय सुन्दरता की प्रतिमा थी । भगवान् ने जैसे उस के एक - एक अंग को बहुत सोच समझ कर, सांचे मे ढाला हो । कहानी लगभग , चौथी शताब्दी के उत्तरार्ध की है । पाटलिपुत्र के सिंहासन पर, सम्राट समुद्र गुप्त की मृत्यु के बाद, उनका ज्येष्ठ पुत्र राम गुप्त आसीन हो गया । ज्येष्ठ पुत्र को राज सिंहासन देने की प्रथा थी । राम गुप्त , *महारानी धुर्वदेवी* के आकर्षण मे मदहोश रहता, महारानी धुर्वदेवी अद्वितीय सुन्दरी थी, । उस की चर्चा राज्य ही मे नही, दूसरे राज्यों तक फैली थी । राम गुप्त एक विलासी राजा था । महारानी धुर्वदेवी के सम्मोहन ने राज - काज से उस की रुचि हटा दी । राज्य की सब व्यवस्था मंत्रियों के हाथ थी । मंत्रियों द्वारा प्रजा को न्याय नही मिल पाता था । सब व्यवस्था भंग थी । प्रजा दुखी थी । अर्थ व्यवस्था भी बिगड़ती गयी । कर्मचारियों को समय पर पगार नही मिलती थी । राज्य की सीमायें भी सुरक्षित नही थी । सेना छिन्न - भिन्न हो गई । पाटलिपुत्र मे अराजकता का राज्य हो गया । राज्य के हालात देख कर, राम गुप्त का अनुज चन्द्र गुप्त अत्यंत क्षोभित था, मगर क्या करता ? राज्य की बागडोर उस के ज्येष्ठ भ्राता राम गुप्त के हाथ थी, जो एक विलासी व कर्महीन राजा था । महारानी धुर्वदेवी की सुन्दरता की चर्चा, शक राज ने भी सुन रखी थी । शकराज भी ध्रुवदेवी को पाना चाँहता था । शकराज के गुप्तचर, दास व दासियाँ , धुर्वदेवी की सुन्दरता का बखान करना न भूलते । शकराज, धुर्वदेवी के लिए लालायित होने लगा । स्वप्न मे भी उसे धुर्वदेवी दिखाई देने लगी । वह धुर्वदेवी को पाने के लिए, मौके की तलाश मे था, तभी उस के गुप्तचरों ने, पाटलिपुत्र राज्य की बिगड़ी हुई व्यवस्था शकराज को बतायी । शकराज ऐसे ही मौके की तलाश मे था । शकराज ने समय को पहचाना । पाटलिपुत्र के हालात अच्छे नही है, अतः उसे मौका मिल गया । उस ने अपनी सेना संगठित कर, पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया । राम गुप्त की सेना पहले से ही छिन्न - भिन्न थी , शकराज की सेना का क्या सामना करती ? फिर भी सैनिक वीरता से लड़ने लगे । युद्ध भूमि मे तलवार से तलवार टकराने लगीं , सैनिकों के सर कट कर जमीन पर गिरने लगे । चारों तरफ हाहाकार मचने लगा । पृथ्वी खून से लाल हो गयी । घायल सैनिक खून से लथपथ, इधर - उधर भाग ने लगे, कुछ भूमि पर पड़े मौत की प्रतीक्षा करने लगे । राम गुप्त कुछ सैनिकों के साथ भाग कर किले मे छिप । कुछ सैनिक वीरगति को प्राप्त गए, कुछ युद्ध बन्दी । राम गुप्त की सेना, शकराज की सेना का सामना न कर सकी । राम गुप्त के, किले मे पहुंचते ही किले का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया गया । बाहर जो सैनिक बचे, वह शकराज के सैनिकों ने मार डाले । राम गुप्त लगभग सौ सैनिक व प्रजा के साथ किले के अन्दर बन्द हो गया । युद्ध बन्द हो चुका था । शकराज की सेना ने किले को चारो तरफ से घेर लिया । किले के चारो तरफ शकराज की सेना के शिविर लग गये । राम गुप्त अन्दर बन्द हो कर रह गया । कई दिन इसी तरह बीत गए, किले के अन्दर खाद्य सामग्री समाप्त होती जा रही थी । राम गुप्त बहुत परेशान था, क्या किया जाए ? बाहर निकलने के सभी बन्द थे । बाहर शकराज की सेना घेरा डाले पड़ी थी । कोई उपाय नही सूझ रहा था । किस तरह जान बचाई जाए ? राम गुप्त इसी कशमकश था, तभी द्वारपाल ने आकर, राम गुप्त से कहा --- महाराज , शकराज सन्धि के लिए अपना दूत भेजना चाहता है , आप की आज्ञा हो तो दूत को अन्दर आने दिया जाए । राम गुप्त, किले के हालात से व्यथित था, कुछ दिन और बन्द रहे तो भूखों मरने की परिस्थिति पैदा हो जायेगी ! ऐसे मे यदि खुद शकराज सन्धि का प्रस्ताव रहा है, तो इस से अच्छी बात और क्या हो सकती है ? *** अन्धे को क्या चाहिए ! ! ! दो आंख *** राम गुप्त की आज्ञा मिलते ही, दूत को किले के अन्दर ले लिया गया । दूत को देखते ही राम गुप्त ने कहा --- कहो दूत, शकराज ने क्या संदेशा भेजा है ? दूत --- महाराज की जय हो ! ! ! महाराज मै तो दूत हूँ , अभयदान दें, महाराज राम गुप्त --- निर्भय होकर बोलो, शकराज ने सन्धि के लिए क्या शर्त भेजी है ? दूत ने पत्र निकला, और पढ़ने लगा ---- राम गुप्त, यदि आप युद्ध से बचना चाहते हो, और अपना राज्य बचाना चाहते हो, तो महारानी धुर्वदेवी को हमारे सुपुर्द कर दो। अन्यथा आप खुद जानते हो, कि क्या होगा ? दूत --- महाराज शकराज ने कहा है कि हम धुर्वदेवी को लेकर वापस चले जायेंगे, आप का राज्य, आप का ही रहेगा । सन्धि की शर्त मे धुर्वदेवी का नाम सुनकर, राम गुप्त का सर शर्म से झुक गया । बचने का कोई दूसरा रास्ता भी नही था , अतः सन्धि की शर्त मान कर राम गुप्त ने स्वीकृति दे दी । सन्धि की शर्त के अनुसार, आज शाम तक धुर्वदेवी को शकराज के शिविर मे पहुंचाना था । भाग - 2 दूत वापस चला गया, किले के अन्दर चर्चाशुरु हो गई, कि महारानी शाम तक शकराज को सौंप दी जायेंगी । यह खबर चन्द्र गुप्त के कानों तक भी पहुंच गई । चन्द्र गुप्त, राम गुप्त का अनुज था । राम गुप्त की कर्म हीनता ने चन्द्र गुप्त को झकझोर दिया । चन्द्र गुप्त के पैरों तले जमीन खिसक गई, मानो आकाश से तड़तड़ाती दामिनी उस के ऊपर गिरी हो, वह विचलित हो कर तुरन्त रनिवास मे पहुंच गया, जहाँ राम गुप्त और महारानी धुर्वदेवी विचार मग्न थे । चन्द्र गुप्त --- भ्राता श्री, हम यह क्या सुन रहे है ? राम गुप्त --- हाँ अनुज, अब यही एक रास्ता बचा है । चन्द्र गुप्त --- जिल्लत की जिन्दगी से वीर गति अच्छी है । राम गुप्त --- मौत सर पर नाच रही है ! धुर्वदेवी को देकर हम हज़ारों जिंदगियां बचा सकते है । वे मौत मरने से क्या लाभ ????? चन्द्र गुप्त --- भ्रात श्री , हमारे पुरखों ने अनेक युद्ध लड़े , सभी मे विजय श्री ने उनके चरण छुये , हमारे पिता श्री को तो नेपोलियन की उपाधि प्राप्त थी और हम एक छोटे से युद्ध मे कुल वधू को देकर सन्धि कर रहे है ? यह सब आपकी कर्म हीनता का परिणाम है । राम गुप्त --- चीख कर - - - चन्द्र गुप्त - - - - चन्द्र गुप्त --- अब चीखने से क्या लाभ । आप ने कुल वधू देने की सन्धि स्वीकार की है, कुल को कलंकित किया है, पुरखों की इज्जत को दाग लगाया है ; मगर मै ऐसा नही होने दूंगा । राम गुप्त --- अब हम कर भी क्या सकते है ? सौ सैनिकों को साथ लेकर लड़े, और प्रजा को भी कटवा दे ? चन्द्र गुप्त --- नही, अब आप को युद्ध लड़ने की आवश्यकता नही । सौ सैनिकों को साथ लेकर मै युद्ध लड़ूगा , शकराज से ! ! ! मै शकराज की बाजुओं के बल को तोलूंगा कि कितना बल है शकराज की बाजुओं । धुर्वदेवी --- नही चन्द्र गुप्त, अब कोई रास्ता नही बचा है, मुझे जाने दो, मेरे जाने से हजारों जिंदगियां बच जायेंगी, एक अकेली जान देकर मै कुल को भी कलंकित नही होने दूंगी । चन्द्र गुप्त --- भाभी सा - - - कैसे ? धुर्वदेवी --- मुझे लेकर शकराज वापस चला जायेगा, यह युद्ध समाप्त हो जायेगा, मै शकराज की चेरी बन कर नही रहूँगी, इस अंगूठी मे जड़े हीरे को निगल कर अपनी जान दे दूँगी । राज्य के लिए मै अपनी बलि देने को तैयार हूँ । चन्द्र गुप्त --- नही भाभी सा , उस से पहले हम वीर गति को पाना ही अपनी किस्मत समझेंगे । राज्य चला जाये, मगर कुल की इज्जत नही ! ! ! राम गुप्त --- नही, चन्द्र गुप्त नही । सौ सैनिकों के साथ तुम, शकराज की विशाल सेना का सामना कैसे करोगे ? चन्द्र गुप्त --- तुम कायर हो, तुम्हारे ही कारण यह दिन देखने को मिला है, अन्यथा दुश्मन की क्या मजाल जो, पाटलिपुत्र की तरफ आंख उठा कर भी देख सके । जी तो चाँहता है कि शकराज से पहले तुम्हारा ही कत्ल कर दूँ । और चन्द्र गुप्त ने तमतमा कर क्रोध मे अपनी तलवार खींच ली - - - धुर्वदेवी --- नही चन्द्र गुप्त, ऐसा मत करो, राज्य के लिए मै अपनी बलि देने को तैयार हूँ । मुझे जाने दो ! ! ! ! ! चन्द्र गुप्त --- तुम अवश्य जाओगी, मगर शाम को - - - ---- इतना कहकर चन्द्र गुप्त वहाँ से चल दिया, और सीधा सैनिकों के पास पहुंच गया । लगभग सौ सैनिक किले मे मौजूद थे, उन्हे अपनी योजना समझायी , और अंधेरा होते ही युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा । वैसे एक सौ सैनिक शकराज की विशाल सेना से क्या लड़ते, मगर चन्द्र गुप्त की रणनीति मे दम दिखाई दिया, तो सैनिकों ने भी अपनी जान हथेली पर रख कर युद्ध के लिए कमर कस ली । भाग - 3 निशा की पहली किरण के साथ ही पाटलिपुत्र के किले का मुख्य दरवाज़ा खुला । अंधेरा किले को अपने आगोश मे समेट रहा था । मुख्य द्वार से एक डोला लेकर चार कहार निकले । डोले की सुरक्षा के लिए चार - चार सैनिक, हाथो मे नंगी तलवार लिए आगे - पीछे चल रहे थे । डोला शकराज की सेना के बीचोंबीच निकलता हुआ, शकराज के शिविर की ओर बढ़ रहा था । शकराज के सैनिक डोला को जाते हुए देख रहे थे । डोला को देख कर शकराज की सेना मे खुशी की लहर दौड़ गई । सैनिक अपनी जीत का जश्न मनाने लगे , उन्हें पूरी उम्मीद थी कि महारानी धुर्वदेवी जैसे ही शकराज के शिविर मे पहुंच जाएगी, शकराज जीत की घोषणा कर देंगे , और हम सब अपने वतन को वापस चल देंगे । डोला शकराज के शिविर के ठीक सामने पहुंच गया । शकराज सेनापति के साथ शिविर के अन्दर था । शिविर के द्वार पर चार प्रहरी, हाथों मे भाला पकड़कर खड़े थे ।डोला को रोकते हुए एक प्रहरी बोला --- कहार, डोला को कन्धे से नीचे उतारो, तभी डोला के साथ चल रहे सैनिक ने कहा --- सन्धि के अनुसार, डोला शिविर के अन्दर ही उतरेगा, बाहर नही - - - प्रहरी --- डोला जांच के बाद ही अन्दर शिविर मे पहुंचेगा । इतना कहकर प्रहरी डोला की तरफ बढ़ा, तभी एक सैनिक ने अपना हाथ लम्बा कर के अपनी तलवार प्रहरी के सीने मे सामने से पीछे की तरफ पार निकल दी, प्रहरी लहूलुहान हो कर जमीन पर तड़पने लगा , यह सब देखकर अन्य प्रहरी भाला लेकर सैनिकों की तरफ बढ़े, लेकिन सैनिक पूरी तरह मुस्तैद थे, क्षण मात्र मे चारों प्रहरी वहीं ढेर कर दिये । बाहर आवाज सुनकर, शकराज , सेनापति के साथ जैसे ही शिविर से बाहर निकला , तभी डोला का पर्दा हिला और पलक झपकते ही, चन्द्र गुप्त डोला से बाहर कूद पड़ा । चन्द्र गुप्त के हाथ की तलवार जैसे ही हवा मे लहरायी , - - - ख-चा -क - - - - - ख - चा- क - - - , कर के शकराज व सेनापति के सर धड़ से अलग हो गए । शकराज और सेनापति मारे गए, चन्द्र गुप्त के सैनिक, तीन - तीन, चार - चार की टुकड़ी बना कर , शकराज की सेना पर टूट पड़े । शकराज के सैनिक जीत के जश्न मे मदहोश थे, तभी चन्द्र गुप्त के सैनिक मौत बनकर टूट पड़े । शकराज के सैनिक कुछ समझ पाते, तब तक सैकड़ो सैनिकों की लाशें जमीन पर बिछ गई, । शकराज और सेनापति के मारे जाने की सूचना जैसे ही सेना मे फैली , शकराज की सेना मे भगदड़ मच गयी । चन्द्र गुप्त के सैनिक कितने हैं , शकराज की सेना अन्धेरे के कारण इस का अंदाज भी न लगा सकी । शकराज के सैनिक, अपने अस्त्र - शस्त्र छोड़कर, अपनी जान बचाने के लिए, अन्धेरे मे इधर - उधर भाग ने लगे । अन्धेरे मे भागते हुए शकराज के सैनिकों पर, चन्द्र गुप्त के सैनिक मौत बनकर टूट पड़े । कुछ मारे गए, कुछ भागने मे सफल हुए । देखते ही देखते शकराज की सेना गायब हो गई । शिविर खाली हो गये । चन्द्र गुप्त, सैनिकों के साथ अंधेरे मे, किले के चारो तरफ, शकराज के सैनिकों को ढूंढ रहा था । किले के चारो तरफ शकराज के सैनिकों की लाशें जमीन पर बिछी हुई थी, कोई भी सैनिक जीवित न मिला । चन्द्र गुप्त के सामने मौत नाच रही थी, उस के सर पर भूत सवार हो रहा था, उस ने बीन - बीन कर शकराज के सैनिक काट दिये, तभी राम गुप्त, उस के सामने पड़ गया ! ! ! ! राम गुप्त को देख कर, चन्द्र गुप्त का क्रोध और भड़क उठा । ऐसे कायर राजा से क्या लाभ ? जो प्रजा की रक्षा न कर सके, राज्य की सीमाओं की रक्षा न कर सके , अपनी पत्नी को भी सन्धि मे दाव पर लगा दे ! चन्द्र गुप्त की तलवार हवा मे लहरायी, और राम गुप्त का सर एक ही वार मे धड़ से अलग हो गया । पूरी रात, किले के आस-पास शकराज के सैनिकों की तलाश जारी रही । मगर शकराज की जीवित बची सेना भाग चुकी थी, किले के आस-पास सिर्फ लाशें ही वाकी थी । चन्द्र गुप्त महान योद्धा था । सफलता भी कर्मठ व्यक्तियों के चरण चूमती है , ऐसा प्रकृति का नियम है, । भगवान् ने चन्द्र गुप्त के हाथ शकराज का अन्त लिखा था । विजय श्री ने चन्द्र गुप्त के चरण चूम लिये । सुबह चन्द्र गुप्त ( द्वितीय ) का राज्याभिषेक हुआ । चन्द्र गुप्त , पाटलिपुत्र का सम्राट बना । उस ने 380 ई॰ से 412 ई॰ तक, अपने पितामह चन्द्र गुप्त (प्रथम ) व अपने पिता श्री समुद्र गुप्त के पद चिन्हों पर चल कर राज्य का विस्तार किया । उसे चन्द्र गुप्त *विक्रमादित्य* की उपाधि से भी नवाजा गया । चन्द्र गुप्त के शासन काल मे ही, चीनी यात्री व्हेनसांग ने भारत की यात्रा की थी । चन्द्र गुप्त के बाद, चन्द्र गुप्त व महारानी धुर्वदेवी का पुत्र, कुमार गुप्त पाटलिपुत्र का सम्राट बना । ******* डा~ विजेंद्र सिंह" - *महारानी धुर्वदेवी*

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